अफ्रीका के संघर्षग्रस्त इलाकों में चीन सिर्फ खदानें नहीं बल्कि अपना रणनीतिक प्रभाव भी मजबूत कर रहा है. कांगो से लेकर रवांडा तक हर पक्ष से रिश्ते निभाने की उसकी ‘दोहरी नीति’ उसे ताकत तो दे रही है लेकिन क्षेत्रीय तनाव को और भड़का भी सकती है- जानिए पूरी कहानी.
यह ‘चाइना क्रॉनिकल्स’ श्रृंखला की 192वीं कड़ी है.
मध्य अफ्रीका में चीन की भूमिका एक बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रही है. जो संबंध पहले मुख्य रूप से बुनियादी ढांचे, व्यापार और संसाधन दोहन पर आधारित आर्थिक जुड़ाव तक सीमित थे, वे अब धीरे-धीरे सुरक्षा क्षेत्र तक फैल गए हैं. डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) चीन की ‘दोहरी कूटनीति‘ का प्रमुख उदाहरण प्रस्तुत करता है. एक ओर चीन कांगो सरकार के साथ साझेदारी बनाए हुए है, वहीं दूसरी ओर वह रवांडा और युगांडा के साथ रक्षा और आर्थिक संबंध भी बनाए रखता है, जिन पर किंशासा के खिलाफ एम23 विद्रोह को समर्थन देने के आरोप हैं. क्षेत्र में चीन की बढ़ती सैन्य और रक्षा-औद्योगिक गतिविधियां एक अवसरवादी रणनीति की ओर संकेत करती हैं, जो अस्थिरता को और बढ़ाने का जोखिम पैदा करती है.
डीआरसी में चीन औपचारिक रूप से अपनी ‘गैर-हस्तक्षेप नीति‘ को बनाए रखने की बात करता है. हालांकि, उसकी बदलती भागीदारी इस सिद्धांत की अधिक लचीली व्याख्या को दर्शाती है. पिछले कुछ वर्षों में लगातार हुए उच्च-स्तरीय कूटनीतिक संपर्क यह दिखाते हैं कि चीन द्विपक्षीय सहयोग के दायरे को बढ़ाना चाहता है. चीनी अधिकारियों और कांगो के प्रमुख राजनीतिक एवं सुरक्षा नेताओं - जिनमें रक्षा और गृह मंत्रालय के प्रतिनिधि भी शामिल हैं - के बीच बैठकों में कानून-व्यवस्था समन्वय, क्षमता निर्माण और रणनीतिक परिसंपत्तियों की सुरक्षा पर अधिक जोर दिया गया है. इन गतिविधियों को अक्सर चीन की ग्लोबल सिक्योरिटी इनिशिएटिव (GSI) जैसी व्यापक पहलों के तहत प्रस्तुत किया जाता है. जीएसआई से जुड़ाव चीन की भूमिका को सकारात्मक रूप में पेश करता है और उसे एक वैश्विक सुरक्षा शक्ति के रूप में संस्थागत पहचान देता है.
एक ओर चीन कांगो सरकार के साथ साझेदारी बनाए हुए है, वहीं दूसरी ओर वह रवांडा और युगांडा के साथ रक्षा और आर्थिक संबंध भी बनाए रखता है, जिन पर किंशासा के खिलाफ एम23 विद्रोह को समर्थन देने के आरोप हैं.
डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) चीन की ‘दोहरी कूटनीति’ का स्पष्ट उदाहरण है, जहां वह कांगो सरकार के साथ साझेदारी करते हुए एक ही समय में रवांडा और युगांडा के साथ रक्षा और आर्थिक संबंध भी बनाए रखता है, जबकि इन दोनों देशों पर एम23 विद्रोहियों को समर्थन देने के आरोप लगते रहे हैं.
डीआरसी में चीन की बढ़ती सुरक्षा उपस्थिति के पीछे मुख्य कारण वहां के खनन क्षेत्र में उसका गहरा आर्थिक हित है. इस देश के पास कोबाल्ट, कॉपर और कोल्टन जैसे खनिजों के दुनिया के सबसे बड़े भंडारों में से कुछ हैं, जो इलेक्ट्रिक वाहनों, नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए बेहद आवश्यक हैं. डीआरसी में सोना और लिथियम के भी बड़े भंडार मौजूद हैं. पिछले 20 वर्षों में चीनी कंपनियों ने इन खनिज उद्योगों में मजबूत पकड़ बना ली है और कोबाल्ट के उत्पादन व प्रोसेसिंग के बड़े हिस्से पर नियंत्रण कर लिया है. इससे चीन के आर्थिक निवेश और सुरक्षा हित सीधे जुड़ गए हैं, खासकर डीआरसी के संघर्ष और हिंसा से प्रभावित पूर्वी इलाकों में.
पूर्वी कांगो आज भी अफ्रीका के सबसे अस्थिर सुरक्षा क्षेत्रों में से एक बना हुआ है. कई सशस्त्र समूहों की मौजूदगी, कमजोर प्रशासनिक ढांचा और लगातार मानवीय संकटों ने स्थानीय आबादी और विदेशी निवेशकों दोनों को असुरक्षित बना दिया है. चीनी निवेश से जुड़े खनन स्थलों और परिवहन मार्गों पर हिंसा, अपहरण और जबरन वसूली की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं. इन परिस्थितियों ने बीजिंग को अपनी रणनीति में बदलाव करने के लिए मजबूर किया है, जिसके तहत वह धीरे-धीरे अपने जुड़ाव मॉडल में सुरक्षा सहयोग को शामिल कर रहा है.
अपनी सेना सीधे तैनात करने के बजाय चीन ने एक अप्रत्यक्ष रणनीति अपनाई है. उसने कांगो के सुरक्षा कर्मियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों का समर्थन किया है, रसद सहायता प्रदान की है और चीनी कंपनियों द्वारा संचालित खनन स्थलों की सुरक्षा के लिए स्थानीय सैनिकों की तैनाती को प्रोत्साहित किया है. चीनी कंपनियां कर्मचारियों, वाहनों और खनन गतिविधियों की वास्तविक समय निगरानी बढ़ाने के लिए स्मार्ट सेंसर, फाइबर-ऑप्टिक नेटवर्क और 5G कनेक्टिविटी जैसी तकनीकों का भी उपयोग कर रही हैं.
लगातार संघर्षों से परेशान कांगो ने सेना मजबूत करने के लिए बाहरी मदद मांगी. पश्चिमी देश मानवाधिकार और सुशासन की चिंताओं के कारण पीछे हटते रहे, जबकि चीन ने कम शर्तों के साथ सहयोग किया. चीन जोखिम वाले इलाकों में भी काम करने से नहीं हिचकता.
चीन ने अपनी परिसंपत्तियों की सुरक्षा के लिए निजी सुरक्षा कंपनियों की भी तैनाती की है. फ्रंटियर सर्विसेज ग्रुप (FSG) और अन्य चीन-समर्थित कंपनियां अक्सर खनन स्थलों की सुरक्षा, रसद प्रबंधन और वीआईपी आवाजाही की जिम्मेदारी संभालती हैं. ये कंपनियां आमतौर पर कांगो की सुरक्षा सेनाओं के साथ मिलकर काम करती हैं. यह नीति चीन को अपने निवेश और हित सुरक्षित रखने में मदद करती है, जबकि वह दुनिया के सामने ‘गैर-हस्तक्षेप’ की छवि भी बनाए रखता है. इससे कांगो सरकार और उसकी सुरक्षा एजेंसियों के साथ चीन के संबंध मजबूत हुए हैं. चीन कठिन और जोखिम वाले इलाकों में भी निवेश करने से नहीं डरता, जिससे वह डीआरसी का सबसे बड़ा बाहरी साझेदार बन गया है.
चीन अब उस खाली स्थान को भरने की कोशिश भी कर रहा है, जिसे पश्चिमी देशों ने छोड़ा है. किंशासा के लिए चीन के साथ सुरक्षा साझेदारी एक महत्वपूर्ण कमी को पूरा करती है. डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो की सशस्त्र सेनाएं (FARDC) लंबे समय से भ्रष्टाचार, सीमित सैन्य क्षमता और आंतरिक विभाजन जैसी समस्याओं से जूझ रही हैं. लगातार संघर्षों से परेशान कांगो ने सेना मजबूत करने के लिए बाहरी मदद मांगी. पश्चिमी देश मानवाधिकार और सुशासन की चिंताओं के कारण पीछे हटते रहे, जबकि चीन ने कम शर्तों के साथ सहयोग किया. चीन जोखिम वाले इलाकों में भी काम करने से नहीं हिचकता. बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत बड़े पैमाने पर अवसंरचना निवेश के साथ मिलकर इसने चीन को डीआरसी का सबसे प्रभावशाली बाहरी साझेदार बना दिया है. इस संदर्भ में सुरक्षा सहयोग, आर्थिक जुड़ाव के रणनीतिक विस्तार के रूप में कार्य करता है.
इस रणनीति का एक प्रमुख साधन अफ्रीका में चीन के रक्षा उद्योग की बढ़ती मौजूदगी है. नोरिन्को और पॉली टेक्नोलॉजीज जैसी कंपनियां अफ्रीकी सरकारों को सैन्य उपकरणों की प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन चुकी हैं. इनके निर्यात में छोटे हथियार, बख्तरबंद वाहन, ड्रोन और तोपखाना शामिल हैं. ये उपकरण अक्सर पश्चिमी विकल्पों की तुलना में सस्ते होते हैं और उन पर राजनीतिक शर्तें भी कम होती हैं. डीआरसी जैसे देशों के लिए यह सैन्य आधुनिकीकरण का एक व्यावहारिक विकल्प प्रदान करता है.
मध्य अफ्रीका में चीन हर पक्ष से अच्छे संबंध रखकर अपने फायदे बचाना चाहता है. अब वह सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि सुरक्षा और राजनीति में भी बड़ा रोल निभा रहा है. लेकिन उसकी यह दोहरी नीति इलाके में तनाव बढ़ा सकती है और आगे चलकर उसके अपने निवेशों को भी नुकसान पहुंचा सकती है.
एम23 जैसे विद्रोही समूहों के पास चीनी हथियार मिले हैं. चीन की सीधी भूमिका साबित नहीं हुई है, लेकिन भ्रष्टाचार, अवैध हथियार तस्करी और युद्ध के दौरान हथियारों की लूट के कारण ये हथियार विद्रोहियों तक पहुंच रहे हैं. इससे पूर्वी कांगो में हिंसा और सुरक्षा संकट और बढ़ रहा है. क्षेत्र में चीन की सुरक्षा भागीदारी केवल डीआरसी तक सीमित नहीं है. चीन रवांडा और युगांडा के साथ भी रक्षा और आर्थिक संबंध बनाए हुए है, जबकि इन दोनों देशों पर एम23 आंदोलन को समर्थन देने के आरोप लगते रहे हैं. रवांडा ने वर्षों से कई प्रकार के चीनी सैन्य उपकरण खरीदे हैं, जबकि युगांडा ने ड्रोन तकनीक सहित चीनी कंपनियों के साथ रक्षा सहयोग को बढ़ाया है. ये परस्पर जुड़ी साझेदारियां दिखाती हैं कि चीन का प्रभाव क्षेत्रीय संघर्षों के कई- और कभी-कभी एक-दूसरे के विरोधी- पक्षों तक फैला हुआ है.
चीन डीआरसी में अपने खनन निवेश सुरक्षित रखना चाहता है, इसलिए वहां शांति चाहता है. लेकिन पड़ोसी देशों से उसके करीबी संबंध उसे खुलकर पक्ष लेने से रोकते हैं. इससे चीन का प्रभाव तो बना रहता है, पर क्षेत्रीय विवाद सुलझाने की कोशिशें कमजोर पड़ सकती हैं. दुनिया के अन्य संघर्ष क्षेत्रों में चीन का रवैया भी इसी पैटर्न की पुष्टि करता है. म्यांमार में बीजिंग ने अपने हितों की सुरक्षा और अनिश्चित परिस्थितियों से बचाव के लिए ऐतिहासिक रूप से राज्य और गैर-राज्य दोनों प्रकार के पक्षों के साथ संबंध बनाए रखे हैं. मध्य अफ्रीका में चीन हर पक्ष से अच्छे संबंध रखकर अपने फायदे बचाना चाहता है. अब वह सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि सुरक्षा और राजनीति में भी बड़ा रोल निभा रहा है. लेकिन उसकी यह दोहरी नीति इलाके में तनाव बढ़ा सकती है और आगे चलकर उसके अपने निवेशों को भी नुकसान पहुंचा सकती है.
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Dr. Samir Bhattacharya is an Associate Fellow at Observer Research Foundation (ORF), where he works on geopolitics with particular reference to Africa in the changing ...
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