कभी अफ्रीका में सेना और सैन्य ठिकानों के दम पर असर रखने वाला फ्रांस अब नई राह पर चल पड़ा है. बदलती राजनीति और बढ़ते चीन-रूस प्रभाव के बीच पेरिस अब व्यापार, टेक्नोलॉजी और निवेश के जरिए अफ्रीका में अपनी जगह मजबूत करना चाहता है. पढ़ें, क्यों नैरोबी सम्मेलन को फ्रांस-अफ्रीका रिश्तों के नए दौर की शुरुआत माना जा रहा है.
11-12 मई को फ्रांस और केन्या ने मिलकर नैरोबी में पहला अफ्रीका-फ्रांस शिखर सम्मेलन कराया. खास बात यह थी कि यह सम्मेलन फ्रेंच बोलने वाले अफ्रीकी देशों के बाहर हुआ. ‘अफ्रीका फॉरवर्ड’ नाम के इस सम्मेलन में कई अफ्रीकी देशों के प्रमुख, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और दुनिया की बड़ी संस्थाओं के लोग शामिल हुए. मकसद था मिलकर आगे बढ़ने का साझा रास्ता बनाना. यह अफ्रीका को लेकर फ्रांस की सोच में बड़े बदलाव का संकेत है.
साहेल में कमजोर पड़ते असर और माली से सेना वापसी के बाद फ्रांस अब अफ्रीका में नई दिशा तलाश रहा है. नैरोबी सम्मेलन उसी बदलती रणनीति की सबसे बड़ी झलक बनकर सामने आया. राष्ट्रपति मैक्रों ने नैरोबी दौरे के दौरान माना कि साहेल इलाके में फ्रांस की पुरानी भूमिका अब लगभग खत्म हो चुकी है. 2022 में माली से सेना हटाने के बाद अब पेरिस दूर बैठकर देख रहा है कि वहां राजनीतिक और सैन्य अस्थिरता लगातार बढ़ रही है. रूस समर्थित सैन्य शासन बमाको के आसपास बढ़ते जिहादी और अलगाववादी विद्रोह से जूझ रहा है.
फ्रांस और अफ्रीका के रिश्ते लंबे समय तक सैन्य ही रहे. 1960 के दशक में जब फ्रांस ने अपनी ज्यादातर अफ्रीकी कॉलोनियों को औपचारिक आजादी दी, तब भी उसने वहां मजबूत सैन्य मौजूदगी बनाए रखी. शीत युद्ध के दौर में इसका बड़ा मकसद था इलाके को सोवियत असर से दूर रखना और वहां के संसाधनों तक अपनी पहुंच बनाए रखना. इस व्यवस्था को ‘फ्रांसाफ्रीक’ कहा गया. ऊपर से यह बराबरी और सम्मान वाला रिश्ता दिखता था, लेकिन असल में ताकत का झुकाव फ्रांस की तरफ ही रहता था. इस मॉडल के जरिए फ्रांस मेजबान देशों के घरेलू मामलों में सीधे दखल दे सकता था और जरूरत पड़ने पर वहां की सरकारों को बचाने के लिए सैन्य कार्रवाई भी करता था.
नैरोबी सम्मेलन उसी बदलती रणनीति की सबसे बड़ी झलक बनकर सामने आया. राष्ट्रपति मैक्रों ने नैरोबी दौरे के दौरान माना कि साहेल इलाके में फ्रांस की पुरानी भूमिका अब लगभग खत्म हो चुकी है. 2022 में माली से सेना हटाने के बाद अब पेरिस दूर बैठकर देख रहा है कि वहां राजनीतिक और सैन्य अस्थिरता लगातार बढ़ रही है.
अफ्रीका में फ्रांस का असर कभी उसकी सेना और सैन्य ठिकानों से तय होता था. दशकों तक पेरिस ने खुद को इलाके का सुरक्षा संरक्षक बनाकर पेश किया. लेकिन अब हालात ऐसे बदल चुके हैं कि फ्रांस को अपनी पूरी अफ्रीका नीति नए सिरे से बनानी पड़ रही है. शीत युद्ध के दौर में फ्रांस ने चाड, गैबॉन और कैमरून समेत कई अफ्रीकी देशों में सीधे हस्तक्षेप किया. मजबूत रक्षा समझौतों के सहारे 1964 से 2014 के बीच फ्रांस ने फ्रेंच बोलने वाले अफ्रीका में 50 से ज्यादा सैन्य अभियान चलाए. इसी वजह से फ्रांस को अफ्रीका का ‘पुलिसमैन’ कहा जाने लगा. फ्रांसीसी सेना ने स्थानीय सेनाओं को भी अपने मॉडल पर ट्रेनिंग दी. इसके लिए डकार से जिबूती और डिएगो-सुआरेज तक सैन्य ठिकानों का बड़ा नेटवर्क बनाया गया. 1970 के दशक में यहां 20 हजार से ज्यादा फ्रांसीसी सैनिक तैनात थे.
शीत युद्ध खत्म होने के बाद भी फ्रांस का असर बना रहा. 2010 के दशक में तो यह फिर बढ़ गया, क्योंकि अफ्रीकी जिहादी गुटों के बढ़ने से साहेल की राजधानियों पर खतरा मंडराने लगा था. इस वजह से फ्रांस ने दोबारा सैन्य दखल बढ़ाया. 2013 से 2022 के बीच ऑपरेशन सर्वल और बरखाने के तहत 5,500 फ्रांसीसी सैनिक कई साहेल देशों में तैनात किए गए. इनके साथ यूरोपीय यूनियन और अफ्रीकी यूनियन की सेनाएं भी थीं. मकसद था सीमा पार फैले जिहादी खतरे को रोकना.
फ्रांस ने अफ्रीका में हजारों सैनिक तैनात किए, स्थानीय सेनाओं को ट्रेनिंग दी और 50 से ज्यादा सैन्य अभियान चलाए. इसके बावजूद जिहादी हिंसा और राजनीतिक संकट खत्म नहीं हुए. उल्टा कई देशों में फ्रांस के खिलाफ नाराजगी और तेज हो गई. लेकिन माली, बुर्किना फासो और नाइजर में लोगों का गुस्सा बढ़ने लगा. वहां आम राय यह बनने लगी कि फ्रांस की मौजूदगी ‘नया उपनिवेशवाद’ है. दूसरी तरफ जिहादी गुटों के खिलाफ मिली सफलता ज्यादा समय तक टिक नहीं पाई. इसकी बड़ी वजह स्थानीय सेनाओं की कमजोरी और अलग-अलग जिहादी गुटों का एक बड़े गठजोड़ JNIM के तहत इकट्ठा हो जाना था.
2017 में राष्ट्रपति बनने के बाद इमैनुएल मैक्रों ने फ्रांस-अफ्रीका रिश्तों को नए तरीके से शुरू करने की बात कही. उनका कहना था कि पेरिस की कोई तय ‘अफ्रीका नीति’ नहीं हो सकती. रिश्ता बराबरी और आर्थिक जुड़ाव पर आधारित होना चाहिए. लेकिन यह नई सोच जल्द ही परीक्षा में पड़ गई. माली (2020 और 2021), बुर्किना फासो (2022), गैबॉन और नाइजर (2023) में तख्तापलट हुए.
2022 तक अफ्रीका में फ्रांसीसी सैनिकों की संख्या घटकर करीब 6 हजार रह गई. इन तख्तापलटों ने ‘फ्रांसाफ्रीक’ मॉडल से दूरी बनाने की शुरुआत कर दी. इसके बाद फ्रांस ने साहेल से सेना हटानी शुरू की. पहले माली से निकला, फिर 2023 में नाइजर और बुर्किना फासो से भी. 2023 में मैक्रों ने एक भाषण में कहा कि अफ्रीका में बचे फ्रांसीसी सैनिकों की संख्या और घटाई जाएगी. 2025 तक यह वापसी लगभग पूरी हो गई. सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक से फ्रांसीसी टुकड़ी पहले ही 2022 में हट चुकी थी.
2024 में पेरिस में ‘फ्रेंच अफ्रीका कमांड’ भी बनाया गया, जो इस सीमित मौजूदगी को संभालता है. अब अफ्रीका में फ्रांस का इकलौता बड़ा सैन्य अड्डा जिबूती में बचा है, जहां करीब 1,500 सैनिक मौजूद हैं. यहां मिराज 2000 लड़ाकू विमान भी तैनात हैं, जिनकी मदद से फ्रांस पूर्वी अफ्रीका और इंडो-पैसिफिक इलाके में अपनी ताकत दिखा सकता है.
इमैनुएल मैक्रों ने अफ्रीका के साथ बराबरी वाले रिश्तों की बात तो की, लेकिन जमीनी राजनीति ने उनकी राह मुश्किल बना दी. लगातार हुए तख्तापलटों ने साफ कर दिया कि अफ्रीका में फ्रांस का पुराना असर अब तेजी से कमजोर पड़ रहा है. साहेल से पीछे हटने के बाद अब अफ्रीका में फ्रांस की सैन्य मौजूदगी बेहद सीमित रह गई है. अब अफ्रीका में फ्रांस की सैन्य मौजूदगी बहुत सीमित रह गई है. अबिदजान और लिब्रेविल में सिर्फ छोटे ‘लायजन डिटैचमेंट’ बचे हैं. 2024 में पेरिस में ‘फ्रेंच अफ्रीका कमांड’ भी बनाया गया, जो इस सीमित मौजूदगी को संभालता है. अब अफ्रीका में फ्रांस का इकलौता बड़ा सैन्य अड्डा जिबूती में बचा है, जहां करीब 1,500 सैनिक मौजूद हैं. यहां मिराज 2000 लड़ाकू विमान भी तैनात हैं, जिनकी मदद से फ्रांस पूर्वी अफ्रीका और इंडो-पैसिफिक इलाके में अपनी ताकत दिखा सकता है.
कुछ ही सालों में अफ्रीका के साथ फ्रांस के पुराने रणनीतिक रिश्ते पूरी तरह बदल गए हैं. पेरिस में अब विदेशी सैन्य अभियानों का मुद्दा लगभग ‘टैबू’ बन चुका है. आइवरी कोस्ट में ऑपरेशन लिकोर्न (2002-2015) और माली में ऑपरेशन बरखाने (2014-2022) जैसे बड़े सैन्य अभियान अब बीते दौर की चीज लगते हैं. साहेल में फ्रांस का अभियान मिला-जुला रहा, जिसे कुछ लोग नाकामी तक मानते हैं. वजह यह थी कि वहां सिर्फ सैन्य ताकत काफी नहीं थी. स्थानीय राजनीतिक समस्याओं का हल भी जरूरी था, जो फ्रांस के बस की बात नहीं थी. माली में तुआरेग और बंबारा समुदायों के बीच समझौता इसी तरह का मामला था.
2020 के दशक में हुए तख्तापलटों के बाद साहेल की सैन्य सरकारें अब राष्ट्रवादी और संप्रभुता की बात करने वाले नेताओं के हाथ में हैं. ये नेता फ्रांस के साथ सहयोग के खिलाफ हैं. लोगों का समर्थन भी इनके साथ है. अब इस इलाके की सरकारें रक्षा सहयोग के लिए मॉस्को की तरफ ज्यादा झुक रही हैं. हालांकि हाल के समय में माली में यह सहयोग कमजोर और असरहीन भी साबित हुआ है. जिहादी विद्रोही गठजोड़ अब राजधानी बमाको की घेराबंदी तक कर चुका है.
इथियोपिया में फ्रांस तीसरा सबसे बड़ा निवेशक है. ऊर्जा से लेकर एआई और डिजिटल ढांचे तक, फ्रांस अब अफ्रीका में अरबों यूरो लगाने की तैयारी कर रहा है. सवाल यह है कि क्या कारोबार और टेक्नोलॉजी के जरिए वह अफ्रीका में अपना खोया असर वापस हासिल कर पाएगा?
एक दौर था जब फ्रांस अफ्रीका का सबसे बड़ा बाहरी ताकतवर खिलाड़ी माना जाता था. लेकिन आज चीन कारोबार और निवेश के मामले में उससे काफी आगे निकल चुका है. यही वजह है कि फ्रांस अब पुराने सैन्य रिश्तों को आर्थिक साझेदारी में बदलने की कोशिश कर रहा है.आज अफ्रीका, फ्रांस के कुल विदेशी कारोबार का सिर्फ करीब 2 फीसदी हिस्सा है. दूसरी तरफ पिछले दो दशकों में अफ्रीका में फ्रांस की हिस्सेदारी आधी रह गई है, जबकि चीन वहां का सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार बन चुका है. इसी बदलाव की झलक मैक्रों के नाइजीरिया, केन्या और इथियोपिया जैसे देशों के दौरों में दिखती है. फ्रांस इनसे आर्थिक रिश्ते मजबूत करना चाहता है. नाइजीरिया और दक्षिण अफ्रीका पहले ही अफ्रीका में फ्रांस के सबसे बड़े कारोबारी साझेदार हैं. साफ है कि फ्रांस अपने फ्रेंच बोलने वाले पुराने साझेदारों को पूरी तरह छोड़ना नहीं चाहता.
बदलते दौर की सबसे बड़ी झलक नैरोबी में हुए अफ्रीका फॉरवर्ड सम्मेलन में दिखी. यहां आने वाले सालों में ऊर्जा, एआई और खेती में 14 अरब यूरो से ज्यादा खर्च किए जाएंगे. फ्रांस की टेलीकॉम कंपनी ऑरेंज ने कहा कि वह अफ्रीका में अपने डिजिटल सेंटरों की संख्या 50 से बढ़ाकर 100 करेगी. वहीं शिपिंग कंपनी CMA CGM ने मोम्बासा बंदरगाह के एक टर्मिनल को आधुनिक बनाने का वादा किया. टोटल एनर्जी नाइजीरिया के तेल और गैस क्षेत्र में 6 अरब डॉलर लगाने जा रही है. आइवरी कोस्ट में फ्रांसीसी कंपनियों का समूह आबिदजान मेट्रो बना रहा है, जो पश्चिम अफ्रीका की सबसे बड़ी परियोजनाओं में से एक है. इथियोपिया में फ्रांस तीसरा सबसे बड़ा निवेशक है. ऊर्जा से लेकर एआई और डिजिटल ढांचे तक, फ्रांस अब अफ्रीका में अरबों यूरो लगाने की तैयारी कर रहा है. सवाल यह है कि क्या कारोबार और टेक्नोलॉजी के जरिए वह अफ्रीका में अपना खोया असर वापस हासिल कर पाएगा?
कुल मिलाकर, अफ्रीका को लेकर फ्रांस का कई दशक पुराना जरूरत से ज्यादा सैन्य नजरिया अब गलत साबित होता दिख रहा है. अब हालात ऐसे हैं कि फ्रांस और अफ्रीका के रिश्तों को नए सिरे से शुरू किया जा सकता है. इस नए दौर में फोकस सेना से ज्यादा व्यापार, टेक्नोलॉजी और लोगों के बीच रिश्तों पर रहेगा.
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Guillaume Gandelin is a Visiting Fellow with the Strategic Studies Programme, Observer Research Foundation. His research focuses on the India-EU and India-France security and defence ...
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