Author : Shruti Jain

Expert Speak Raisina Debates
Published on Sep 12, 2025 Updated 1 Hours ago

मौज़ूदा वक़्त में भारत अमेरिकी टैरिफ के दुष्प्रभावों से जूझ रहा है, लेकिन नई दिल्ली इससे निपटने में गंभीरता से जुटी है. एक तरफ भारत विश्व व्यापार संगठन में कृषि पर निर्भर लोगों की आजीविका के मुद्दे को ज़ोरशोर से उठा रहा है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक व्यापार दबावों से अपने कृषि सेक्टर और छोटे किसानों के हितों को सुरक्षित करने के लिए संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है.

टैरिफ और व्यापार संतुलन: भारत की घरेलू विकास अनिवार्यता को समझना

अमेरिका ने भारत पर 50 प्रतिशत का दंडात्मक टैरिफ लगाया है. ट्रंप प्रशासन की ओर से भारत पर की गई यह कार्रवाई किसी भी लिहाज़ से अप्रत्याशित तो नहीं कही जा सकती है, लेकिन यह अनावश्यक और जबरन की गई कार्रवाई ज़रूर है. अमेरिका के साथ व्यापार समझौता वार्ता में नई दिल्ली ने हमेशा अपनी ओर से सीमाएं तय की हैं और बताया है कि इनसे किसी भी सूरत में समझौता नहीं किया जा सकता है. ख़ास तौर पर व्यापार समझौता वार्ताओं के दौरान भारत ने कृषि क्षेत्र को लेकर अपनी सीमाओं को स्पष्ट रूप से ज़ाहिर किया है, जो उसके दीर्घकालिक नज़रिए को प्रकट करता है. अमेरिका के साथ ट्रेड डील वार्ताओं के दौरान भी भारत ने संवेदनशील भू-आर्थिक हालातों को संतुलित करने को प्राथमिकता नहीं दी है, बल्कि अपनी घरेलू ज़रूरतों यानी कृषि क्षेत्र और किसानों के हितों को सुरक्षित रखने को ज़्यादा तवज्जो दी है.

जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ एंड ट्रेड यानी सामान्य शुल्क एवं व्यापार समझौते (GATT) के उरुग्वे दौर ने साल 1995 में विश्व व्यापार संगठन (WTO) के एग्रीमेंट ऑन एग्रीकल्चर यानी कृषि समझौते (AoA) की बुनियाद रखी थी. ज़ाहिर है कि कृषि व्यापार के लिए एक स्वतंत्र और निष्पक्ष प्रणाली स्थापित करने की दिशा में यह समझौता पहली कोशिश थी. उस समय भारत और तमाम दूसरे विकासशील देशों ने चिंता जताई थी कि एग्रीकल्चर सेक्टर के उदारीकरण से न केवल घरेलू खाद्यान्न उत्पादन पर विपरीत असर पड़ेगा, बल्कि उनकी खाद्यान्न आयात पर निर्भरता भी बढ़ेगी. इसके अलावा, कृषि क्षेत्र को खोलने से उनके छोटे और सीमांत किसानों पर बहुत बुरा असर पड़ेगा, क्योंकि ये किसान विकसित देशों में भारी सब्सिडी वाले कृषि उत्पादों के साथ निर्यात में प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम नहीं हैं.

भारत ने इसके बाद GATT की दोहा और नैरोबी में हुई वार्ताओं के अलावा, उसके बाद भी सभी बातचीतों के दौरान अपनी इन मागों को दृढ़ता के साथ दोहराया है, साथ ही विकसित देशों द्वारा कृषि निर्यात पर सब्सिडी को हटाने, खाद्यान्न खरीद के लिए घरेलू सब्सिडी का लगातार इस्तेमाल करने और खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए बफर स्टॉक ऑपरेशन्स की अनुमति जैसी मांगों को भी पुरज़ोर तरीक़े से उठाया है. जिनेवा में वर्ष 2024 में आयोजित विश्व व्यापार संगठन के 13वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC13) में भारत ने अपने "भोजन के अधिकार" के मुद्दे को फिर से उठाया. इसके अतिरिक्त, भारत ने इस सम्मेलन में जहां अपने मुताबिक़ कृषि नीति बनाने और कार्यान्वित करने की मांग की, वहीं खाद्य सुरक्षा के स्थायी समाधान के लिए सार्वजनिक भंडारण के महत्व पर भी ज़ोर दिया.

घरेलू विकास के लिए ज़रूरी अनिवार्यताएं 

भारत में कृषि सेक्टर बहुत व्यापक है और देश की प्रगति में इसकी अहम भूमिका है. आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के मुताबिक़ भारत में जितने कामकाजी लोग हैं, उनमें से क़रीब 46.1 प्रतिशत लोग कृषि क्षेत्र में कार्यरत हैं और उसी से अपनी आजीविका कमा रहे हैं. आंकड़ों से साफ है कि भारत के लिए कृषि सेक्टर बेहद महत्वपूर्ण है और उसकी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर है. इससे यह भी पता चलता है कि बड़ी तादाद में किसानों की आजीविका कृषि क्षेत्र पर निर्भर हैं और उनके हितों से समझौता नहीं किया जा सकता है. इतना ही नहीं, भारत में जितने भी किसान हैं, उनमें 89 प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत हैं, यानी ऐसे किसान हैं जिनके पास दो हेक्टेयर से भी कम खेती योग्य भूमि है. ज़ाहिर है कि इन वजहों से भारत के एग्रीकल्चर सेक्टर को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में तमाम परेशानियों से जूझना पड़ता है. इसलिए भारत हमेशा से यह मांग करता आया है कि उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को अपने यहां कृषि क्षेत्र में ज़्यादा से ज़्यादा सब्सिडी देने की स्वीकृति प्रदान की जाए, ताकि वैश्विक कृषि व्यापार में असंतुलन को समाप्त किया जा सके.

अमेरिका के साथ ट्रेड डील वार्ताओं के दौरान भी भारत ने संवेदनशील भू-आर्थिक हालातों को संतुलित करने को प्राथमिकता नहीं दी है, बल्कि अपनी घरेलू ज़रूरतों यानी कृषि क्षेत्र और किसानों के हितों को सुरक्षित रखने को ज़्यादा तवज्जो दी है.

विश्व व्यापार संगठन द्वारा पहले से ही विकासशील देशों के लिए अपने कृषि सेक्टर को सशक्त करने और आर्थिक स्थित मज़बूत करने हेतु स्पेशल एंड डिफरेंशियल ट्रीटमेंट यानी विशेष एवं विभेदक उपचार का प्रावधान किया गया है. इसके अलावा, WTO की ग्रीन बॉक्स सब्सिडी यानी एक प्रकार की किसानों को आर्थिक सहायता, कृषि अनुसंधान और कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए दी जाने वाली सब्सिडी के तहत ग्रामीण विकास, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता जैसे मुद्दों को व्यापार प्रभावित करने वाला नहीं माना है. हालांकि, कृषि से जुड़े जिन मुद्दों पर सबसे अधिक विवाद है, उनमें भारत के किसानों को दिए जाने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का मसला शामिल है. सरकार द्वारा किसानों की आर्थिक मदद के लिए एमएसपी घोषित करने को WTO के एम्बर बॉक्स सब्सिडी में शामिल किया गया है और कहा गया है कि यह क़दम किसी देश के उत्पादों को अन्य देशों की तुलना में सस्ता बनाकर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित करता है. हालांकि, भारत का तर्क है कि MSP देश के विकास और लोगों के कल्याण को लक्षित करने वाली योजनाओं जैसे प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि और प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) का अभिन्न अंग हैं. इतना ही नहीं, भारत की ओर से यह भी कहा जाता है कि MSP केवल किसानों के लिए आर्थिक सुरक्षा का साधन नहीं है, बल्कि सतत विकास लक्ष्यों (SDG) को हासिल करने से जुड़ा महत्वपूर्ण उपकरण भी है. एमएसपी का मकसद किसानों की आजीविका और उनकी आय में बढ़ोतरी तो है ही, साथ ही इसका उद्देश्य व्यापक स्तर पर विकास करना भी है. 

इसके अलावा, भारत का यह भी कहना है कि खाद्यान्न, डेयरी उत्पाद, आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) फसलों और इथेनॉल पर अमेरिका जैसे विकसित देशों में अभी भी बहुत ज़्यादा सब्सिडी दी जाती है. उदाहरण के तौर पर भारत की एमएसपी की तर्ज़ पर अमेरिका में प्राइस लॉस कवरेज (PLC) यानी मूल्य हानि कवरेज नीति लागू है. इसके तहत जब बाज़ार में कृषि उपज का मूल्य एक निश्चित सीमा के नीचे चला जाता है, तब सरकार की ओर से किसानों को मुआवजा दिया जाता है. इतना ही नहीं, अमेरिका में कई और सब्सिडी योजनाएं भी चल रही हैं, जो वैश्विक बाजार में कृषि उत्पादों की क़ीमतों को प्रभावित करती है. इनमें कृषि जोख़िम कवरेज (ARC), डेयरी मार्जिन कवरेज (DMC), और फसल बीमा प्रीमियम सब्सिडी (CIPS) जैसी कई सब्सिडी योजनाएं शामिल हैं. इसी तरह से यूरोपियन यूनियन (EU) अपनी कॉमन एग्रीकल्चर पॉलिसी यानी सामान्य कृषि नीति (CAP) के अंतर्गत किसानों को सीधे आर्थिक मदद करता है और उन्हें प्रति हेक्टेयर वार्षिक भुगतान भी करता है. इसके अलावा, यूरोपीय संघ में किसानों को ग्रामीण विकास कार्यक्रम सब्सिडी के तहत भी वित्तीय सहायता दी जाती है. हालांकि, विकसित देशों द्वारा दी जाने वाली कृषि सब्सिडी में WTO के प्रावधानों का अनुपालन किया जाता है और उसकी सीमाओं को नहीं लांघा जाता है. लेकिन भारत और दूसरे विकासशील देशों का आरोप है कि विकसित देश अपने किसानों और कृषि सेक्टर को आर्थिक मदद पहुंचाने के लिए WTO के ग्रीन बॉक्स सब्सिडी प्रावधानों की कमियों का लाभ उठाते हैं. इन विकासशील देशों का यह भी आरोप है कि विकसित राष्ट्रों की ओर से उन्हें अपनी कृषि सब्सिडी योजनाओं को बंद करने का दबाव बनाया जाता है.

दबाव में झुकने की नहीं बल्कि सुधार और दृढ़ इच्छाशक्ति की ज़रूरत

भारत की ओर से दिए गए तमाम तर्कों, सुझावों और विचारों का एक ही मतलब है कि देश में इस वक़्त दूसरी हरित क्रांति की ज़रूरत है, लेकिन वो हरित क्रांति पर्यावरण के अनुकूल, अधिक टिकाऊ और जलवायु-प्रतिरोधी होनी चाहिए. हालांकि, खाद्यान्न के मामले में भारत आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है और उसकी अनाज पर निर्भरता कम है. इतना ही नहीं, अब कृषि क्षेत्र से यह भी उम्मीद की जा रही है वह खाद्य सुरक्षा से आगे बढ़कर जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निपटने में अपनी भागीदारी बढ़ाए. यही वजह है कि भारत के लिए आज अपनी कृषि उत्पादकता में सुधार करना और फसलों में विविधिता लाना, साथ ही सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में अपना योगदान बढ़ाना बेहद अहम हो गया है. 

देश में इस वक़्त दूसरी हरित क्रांति की ज़रूरत है, लेकिन वो हरित क्रांति पर्यावरण के अनुकूल, अधिक टिकाऊ और जलवायु-प्रतिरोधी होनी चाहिए. 

इसके अलावा, इससे जुड़ा एक तर्क यह भी है कि कृषि क्षेत्र से जुड़े इंपोर्ट डिपेंडेंसी रेशियो (IDR) यानी वो सीमा जहां तक कोई देश अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए, ख़ास तौर पर खाद्यान्नों की आवश्यकता को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर होता है, हासिल करके न केवल सस्ता अनाज और खाद्यान्न हासिल कर सकता है, बल्कि बेहतर जीवन स्तर भी प्राप्त कर सकता है. नीति विश्लेषक बेन चू ने अपनी पुस्तक 'एक्साइल इकोनॉमिक्स' में जापान का उदाहरण दिया है. उसमें यह भी सामने आया है कि जैसे-जैसे किसी देश की राष्ट्रीय आय बढ़ती है, यानी लोगों की इनकम में इज़ाफा होता है, तो उपभोक्ताओं के खाने-पीने के तौर-तरीक़ों में बदलाव आता है और वे अलग-अलग तरह की खाने की चीज़ों की मांग करते हैं. कहने का मतलब है कि आय बढ़ने पर लोग अनाज के बजाय भोजन में प्रोटीन, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों और फलों का सेवन करना चाहते हैं. जहां तक भारत की बात है, तो देश में दालों, खाद्य तेलों और फलों की क़ीमतों में अभूतपूर्व स्थिरता आई है. इसमें सबसे बड़ा योगदान आयात शुल्क में कमी और टैरिफ से जुड़े अनुकूल नियमों और प्रक्रियाओं का है, जिनसे यह निर्धारित होता है कि विभिन्न श्रेणियों में उपभोक्ताओं से कैसे शुल्क वसूला जाए. इसके अलावा, एक और महत्वपूर्ण क्षेत्र है प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, जिसमें व्यापार उदारीकरण की वजह से विकासशील राष्ट्रों को ख़ासा फायदा हुआ है. भारतीय किसानों को अमेरिका-आधारित उन्नत कृषि-प्रौद्योगिकियों से बहुत लाभ हुआ है, विशेष रूप से महाराष्ट्र में किसानों को डेटा-संचालित तकनीक़ के उपयोग से खेती के दौरान पानी, उर्वरक और कीटनाशक आदि का सटीक प्रबंधन करने में मदद मिली है.

जलवायु संकट के दुष्प्रभावों में सूखा, ज़मीन का बंजर होना और अनियमित बारिश भी शामिल है. ज़ाहिर है कि इस हालातों के मद्देनज़र बिना समय गंवाए तकनीक़ पर आधारित बेहतर खेती उपायों को अपनाने एवं कृषि के उन्नत व टिकाऊ तौर-तरीक़ों के इस्तेमाल की ज़रूरत है. अगर भारत के किसानों की मार्केट तक अधिक से अधिक पहुंच सुनिश्चित की जाती है, तो इससे न केवल उनकी आमदनी बढ़ने के अवसरों में वृद्धि होगी, बल्कि भारत के किसानों को खेती की नई तकनीक़ों की जानकारी हासिल होगी और इससे प्रति हेक्टेयर फसल की पैदावार भी बढ़ेगी. हालांकि, इसका मतलब टैरिफ के दबाव के आगे झुकना कतई नहीं होना चाहिए. व्यापार समझौते में किसी भी तरह का कोई दबाव नहीं होना चाहिए और यह हर लिहाज़ से संतुलित होना चाहिए, तभी निष्पक्ष व्यापार समझौता सुनिश्चित हो सकता है.

भारत को भविष्य की ज़रूरतों के मद्देनज़र और निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए कृषि सेक्टर और किसानों को सशक्त करना है. इसके लिए एक ओर जहां एग्रीकल्चर सेक्टर में अनुसंधान एवं विकास पर ध्यान देना होगा, वहीं किसानों को बेहतर सब्सिडी प्रदान करनी होगी. इसके अलावा, जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देना होगा और फसल की कटाई के बाद उपज के भंडारण, परिवहन और बिक्री आदि के लिए बेहतर प्रबंधन पर फोकस करना होगा. ऐसे दौर में जब व्यापार की बहुपक्षीय व्यवस्था कमज़ोर होती जा रही है, तब राष्ट्रीय हितों को सुनिश्चित करने के लिए मित्र देशों के साथ नज़दीकी बढ़ाना और नई व्यापार साझेदारियां विकसित करना बेहद कारगर होगा. ऐसे में भारत को कृषि समझौतों (AoA) में सुधारों पर विशेष ध्यान देना होगा, ख़ास तौर पर विश्व व्यापार संगठन के पैमाने एग्रीगेट मेजरमेंट ऑफ सपोर्ट (AMS) यानी समग्र समर्थन मापन से जुड़े सुधारों पर अपने हितों के मुताबिक़ बातचीत करनी होगी. AMS वो पैमाना है कि जिससे देश की व्यापार को प्रभावित करने वाली कृषि सब्सिडी का मूल्यांकन किया जाता है. 

भारत को कृषि समझौते में शामिल हुए क़रीब तीस साल हो गए हैं. इतने वर्षों के बाद भी कृषि व्यापार में भारत की प्राथमिकताएं नहीं बदली हैं. वर्तमान में अमेरिका की ओर से भारत पर टैरिफ थोपा गया है और कृषि क्षेत्र को खोलने को लेकर ज़बरदस्त दबाव बनाया गया है, तब भी भारत अपनी नीतियों से पीछे नहीं हटा है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि भारत इन हालातों में आगे क्या रुख़ अपनाएगा और कृषि सेक्टर के हितों को सुरक्षित रखने एवं छोटे किसानों की आजीविका सुनिश्चित करने के लिए क्या क़दम उठाएगा. सवाल यह भी है कि भारत अपने देश में खेती और किसानों की ज़रूरतों एवं वैश्विक स्तर पर अपने कृषि बाज़ारों को दूसरे देशों के लिए खोलने की लगातार बढ़ती मांग के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित कर पाएगा.


श्रुति जैन ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज़ में एसोसिएट फेलों हैं.

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Shruti Jain

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Shruti is an Associate Fellow at the Centre for Development Studies, Observer Research Foundation (ORF), where her research examines the intersections between policy, economic diplomacy ...

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