समुद्र आज रोजगार, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक विकास के बड़े स्रोत बन चुके हैं. अफ्रीका के पास अपार समुद्री संसाधन हैं लेकिन कई चुनौतियां उनकी राह में हैं. जानिए, कैसे भारत तकनीक और निवेश के जरिए अफ्रीका की ब्लू इकोनॉमी को नई ताकत दे सकता है.
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ये लेख 'महासागरों का प्रशासन: पहुंच और समानता पर पुनर्विचार' श्रृंखला का हिस्सा है.
ये बात अब साबित हो चुकी है कि ब्लू इकोनॉमी यानी समुद्र पर आधारित अर्थव्यवस्था विश्व आर्थिक उत्पादन और रोजगार में महत्वपूर्ण योगदान देती है. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, पृथ्वी की सतह के लगभग तीन-चौथाई हिस्से महासागर से ढके हैं. तीन अरब से ज़्यादा लोग अपने कल्याण के लिए समुद्री और तटीय जैव विविधता पर निर्भर हैं. वैश्विक जनसंख्या का करीब 44 प्रतिशत समुद्र तट से 100 किलोमीटर के भीतर रहता है, जबकि लगभग 80 प्रतिशत पर्यटन समुद्र तट के पास होता है.
जैसे-जैसे दुनिया की जनसंख्या बढ़ रही है, वस्तुओं और सेवाओं की मांग भी बढ़ रही है. ऐसे में सिर्फ ज़मीन के नीचे मिलने वाले संसाधन इन आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकते. इसलिए, स्थिरता, रोजगार, और गरीबी उन्मूलन के लिए समुद्री संसाधनों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जा रहा है.
कई अफ्रीकी सरकारों के लिए सतत समुद्री अर्थव्यवस्थाओं का निर्माण एक प्राथमिकता बन गया है, क्योंकि महासागर नौकरियों, खाद्य सुरक्षा, आय और मनोरंजन का स्रोत हो सकते हैं. 30,000 किमी की तटीय रेखा के साथ, अफ्रीकी महाद्वीप लगभग 13.1 मिलियन टन मछली और दूसरी समुद्री उत्पादों का उत्पादन करता है. सौर ऊर्जा की भी यहां असीम संभावनाएं हैं. इसमें 10 टेरावॉट सोलर, 350 गीगावॉट हाइड्रो, 110 गीगावॉट पवन ऊर्जा और 15 गीगावॉट भू-तापीय ऊर्जा स्रोत शामिल है. विश्व की जैव विविधता का लगभग 25 प्रतिशत अफ्रीकी महाद्वीप अपने में समेटे हुए है. इन सब आंकड़ों से ज़ाहिर है कि अफ्रीका में अभी तक ब्लू इकोनॉमी का पूरा उपयोग नहीं हो सकता है. अगर इस पर ध्यान दिया जाए तो ये सतत विकास, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक वृद्धि में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है.
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, पृथ्वी की सतह के लगभग तीन-चौथाई हिस्से महासागर से ढके हैं. तीन अरब से ज़्यादा लोग अपने कल्याण के लिए समुद्री और तटीय जैव विविधता पर निर्भर हैं. वैश्विक जनसंख्या का करीब 44 प्रतिशत समुद्र तट से 100 किलोमीटर के भीतर रहता है, जबकि लगभग 80 प्रतिशत पर्यटन समुद्र तट के पास होता है.
इस संभावनाओं के बावजूद, जलवायु परिवर्तन का उभरता ज़ोखिम महासागर-आधारित खाद्य प्रणालियों की स्थिरता को नुकसान पहुंचा सकता है, विशेष रूप से अफ्रीका जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में. वर्तमान में तापमान 1.1°C बढ़ रहा है, और वैश्विक समुद्री पारिस्थितिक तंत्र का लगभग 60 प्रतिशत या तो क्षतिग्रस्त होने का अनुमान है, या फिर इसका अंधाधुंध शोषण किया जा रहा है. ऐसे में जलवायु परिवर्तन और मौसम-संबंधी आपदाओं से खाद्य सुरक्षा के चारों महत्वपूर्ण स्तंभों , उपलब्धता, पहुंच, उपयोग और स्थिरता, कमज़ोर हो रही है.
अफ्रीकी तटीय समुदाय और लघु-स्तरीय मत्स्य पालन उद्योग जलवायु परिवर्तन, बढ़ती जनसंख्या और बढ़ती खाद्य मांग के संयुक्त प्रभाव के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं. उनके पास इसका मुकाबला करने के लिए संसाधन भी नहीं होते. ये कारक खाद्य और जल सुरक्षा, आजीविका को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं. इस तरह देखा जाए तो इनकी वजह से जीवन यापन की लागत बढ़ सकती है. जलवायु परिवर्तन के अलावा भी, कुछ और ख़तरें भी हैं, जो ब्लू इकोनॉमी और इस पर निर्भर समुदायों की आजीविका में बाधा डाल सकते हैं. (चित्र 1 देखें)
चित्र: ब्लू इकोनॉमी की चुनौतियां

Source: Narwal et al, 2023
प्रभावी अनुकूलन रणनीतियों और सतत संसाधन प्रबंधन के बिना, अफ्रीकी महाद्वीप में खाद्य सुरक्षा पर ब्लू इकोनॉमी के प्रभाव की संभावनाएं काफ़ी हद तक घट जाएगी. इससे निपटने के लिए सबसे ज़्यादा ज़ोर बाढ़ और समुद्र स्तर में वृद्धि की रोकथाम के उपायों पर होना चाहिए. इसके लिए बुनियादी ढांचे का विकास और तटीय सुरक्षा की योजनाएं बनाने की ज़रूरत है. नीति, योजना और शासन ढांचे जैसे समुद्री स्थानिक योजना (एमएसपी) और समुद्री संरक्षित क्षेत्र (एमपीए) सतत समुद्री उपयोग की सुविधा के लिए शामिल हो सकते हैं. ऐसी रणनीतियां ब्लू इकोनॉमी के ख़तरों के खिलाफ़ प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने में मदद कर सकती हैं.
अफ्रीका में ब्लू इकोनॉमी पहलों को आगे बढ़ाने के लिए भारत-अफ्रीका सहयोग पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए:
ब्लू इकोनॉमी के सामने जलवायु परिवर्तन, बदलता समुद्री तापमान और मछलियों की घटनी उपलब्धता बड़ी चुनौती है. इसके अलावा, अवैध, अप्रत्याशित और अनियमित (आईयूयू) मछली पकड़ने जैसी पर्यावरणीय चुनौतियों की निगरानी के लिए प्रौद्योगिकी में निवेश पर विचार किया जाना चाहिए इन तकनीकों में पानी के नीचे चलने में सक्षम स्वायत्त नौकाएं और रिमोट सेंसर शामिल हो सकते हैं.
बुनियादी संरचना के विकास के लिए अनूठे वित्तीय और निवेश समाधान जुटाए जाने चाहिए. इसमें ब्लू बॉन्ड, मिश्रित वित्तीय मदद, संरक्षण और पर्यटन राजस्व साझा करने के लिए एन्डाउमेंट फंड जैसे तरीके शामिल हैं. छोटे, मध्यम और माइक्रो उद्यमों (एसएमएमई) के वित्त उत्पाद, बंदरगाह अवसंरचना, लॉजिस्टिक्स और महासागर नवीकरणीय ऊर्जा के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी वित्तपोषण के रास्ते खोजे जाने चाहिए. जीवाश्म ईंधन की बजाए स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने की कोशिश करनी चाहिए. एक समर्पित इंडो-अफ्रीका ब्लू फंड के निर्माण पर भी विचार किया जा सकता है. छोटे व्यवसायों, जलीय कृषि, मत्स्य परियोजनाओं, तटीय और समुद्री पर्यटन परियोजनाओं के लिए अफ्रीका ब्लू वेव जैसी पहल अभी काम कर रही है.
सतत मत्स्य और जलीय कृषि प्रथाओं को बढ़ावा देने के लिए ये ज़रूरी है कि मछली प्रसंस्करण, भंडारण सुविधाओं और मछुआरों को मछली पकड़ने के उपकरण मुहैया कराए जाएं. मछली किसानों और मछुआरों के लिए बाज़ार तक पहुंच आसान करने, कौशल और क्षमता निर्माण पहल में निवेश को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.
नौकरियां सृजित करने वाले पहलों जैसे तटीय पर्यटन और विरासत संबंधित पर्यटन में निवेश को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. जलीय कृषि, बंदरगाह सेवाएं, और एसएमएमई के लिए सहायता भी ब्लू इकोनॉमी के भीतर नौकरियां उत्पन्न कर सकती है.
शोध और नवाचार में अनुसंधान क्षमता का निर्माण शामिल होना चाहिए. इसमें स्नातकोत्तर प्रशिक्षण बढ़ाना, समुद्री डेटा प्लेटफार्मों में निवेश, मानचित्रण और रिमोट सेंसिंग के लिए समुद्री रोबोटिक्स अनुसंधान को प्रोत्साहित करना शामिल है. इससे अफ्रीकी शोधकर्ताओं की नई पीढ़ी के निर्माण में मदद मिलेगी. उद्यमियों को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (ICAR-CMFRI) जैसी संगठनों के साथ प्रशिक्षण का मौका मिलना चाहिए और उनसे तकनीकी मदद मिलनी चाहिए.
कौशल और क्षमता विकास कार्यक्रमों को मछली पालन प्रबंधन और समुद्री विज्ञान में प्रशिक्षण को बढ़ावा देना चाहिए. इसके अलावा, अंतर्राष्ट्रीय या घरेलू विश्वविद्यालयों में एक्सचेंज प्रोग्राम का विस्तार करने में साझेदारी, उच्च शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने को बढ़ावा देने के लिए, ब्लू इकोनॉमी की योग्यताओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए.
भारत–अफ्रीका ब्लू इकोनॉमी सहयोग एक ग्लोबल साउथ में एक अद्वितीय विकास मॉडल पेश करता है. भारत की तकनीकी और औद्योगिक ताकतों को अफ्रीका के समृद्ध समुद्री संसाधनों और बढ़ते संस्थानों के साथ मिलाने से इसके बेहतर नतीजे मिल सकते हैं.
अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ साझेदारी और सहयोग अफ्रीका में ब्लू इकॉनमी परियोजनाओं के कार्यान्वयन के लिए महत्वपूर्ण है. इसलिए, भारत-अफ्रीका साझेदारी को मज़बूत करना आर्थिक, पर्यावरण, संस्थागत और शासन के क्षेत्रों में फायदेमंद होगा. इसे सुविधाजनक बनाने के लिए, ऐसे साझा लीवरेज प्वाइंट्स पर विचार किया जाना चाहिए, जो ब्लू इकोनॉमी में सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए सार्थक सहयोग का आधार बन सकते हैं. इनमें अन्य बातों के अलावा साझा आर्थिक विकास साझेदारी, बढ़ती पर्यावरणीय कमजोरियों की साझा मान्यता और सहयोगात्मक संस्थागत तंत्र की आवश्यकता शामिल हो सकती है.
गरीबी से मुकाबला करने और आवश्यक समुद्री आवासों की सुरक्षा के लिए, अफ्रीकी महाद्वीप को तेज़ी से संयुक्त कार्रवाई और निवेश की ज़रूरत है. अफ्रीका में ब्लू इकोनॉमी में निवेश करने से सतत विकास और वृद्धि की चुनौतियों का समाधान करने में मदद मिलती है. भारत–अफ्रीका ब्लू इकोनॉमी सहयोग एक ग्लोबल साउथ में एक अद्वितीय विकास मॉडल पेश करता है. भारत की तकनीकी और औद्योगिक ताकतों को अफ्रीका के समृद्ध समुद्री संसाधनों और बढ़ते संस्थानों के साथ मिलाने से इसके बेहतर नतीजे मिल सकते हैं.
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Nwabisa Matoti is the Director of Strategy and Internationalisation at the South African International Maritime Institute (SAIMI). She has a combined 25 years of experience ...
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