इबोला और वैश्विक अस्थिरता के बीच भारत-अफ्रीका सम्मेलन टला जिससे “अफ्रीका+1” शिखर बैठकों की उपयोगिता पर सवाल उठे. अब जरूरत दिखावे से आगे बढ़कर स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा पर ठोस सहयोग की है. जानिए कैसे यह साझेदारी भविष्य बदल सकती है.
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इबोला जैसी जानलेवा बीमारी फैलने के बीच अफ्रीकी यूनियन और भारत ने मई 2026 के आखिर में होने वाला चौथा भारत-अफ्रीका सम्मेलन टाल दिया. यह सम्मेलन ग्यारह साल बाद होने जा रहा था. इसी के साथ यह सवाल भी उठता है कि अफ्रीकी देशों और बाहरी ताकतों के बीच होने वाले बड़े-बड़े 'अफ्रीका+1' सम्मेलनों की असली अहमियत आखिर कितनी बची है?
अफ्रीका की बढ़ती अहमियत, संसाधनों की होड़ और दुनिया भर की ताकतों की रस्साकशी ने 'अफ्रीका+1' सम्मेलनों की बाढ़-सी ला दी. सबसे पहले 1973 में पेरिस में पहला फ्रांस-अफ्रीका सम्मेलन हुआ. फिर 1993 में जापान ने टोक्यो इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन अफ्रीकन डेवलपमेंट यानी TICAD शुरू किया. लेकिन यह सम्मेलन मॉडल असल मायनों में 2000 के बाद मशहूर हुआ, जब यूरोपीय यूनियन और चीन दोनों ने अफ्रीका के साथ अपने-अपने सम्मेलन शुरू किए. चीन-अफ्रीका सहयोग मंच यानी FOCAC जल्दी ही अफ्रीका का सबसे असरदार कूटनीतिक मंच बन गया. FOCAC की कामयाबी और अफ्रीका के लिए चीन के बड़े-बड़े आर्थिक पैकेजों ने दुनिया का ध्यान खींचा. फिर 2000 के दशक के दूसरे हिस्से तक इंडोनेशिया, तुर्की, दक्षिण कोरिया, अमेरिका और भारत समेत कई देशों ने अपने-अपने अफ्रीका सम्मेलन शुरू कर दिए. आज ऐसे करीब पंद्रह सम्मेलन मौजूद हैं. पिछले दो दशकों में अफ्रीका दुनिया की बड़ी ताकतों के लिए सबसे अहम मैदान बन गया है. चीन से लेकर अमेरिका और भारत तक, हर कोई यहां अपना असर बढ़ाना चाहता है. मगर लगातार बढ़ते सम्मेलनों के बीच अफ्रीकी देशों को असली फायदा कितना मिल रहा है, इस पर अब खुलकर सवाल उठने लगे हैं.
यह सम्मेलन मॉडल असल मायनों में 2000 के बाद मशहूर हुआ, जब यूरोपीय यूनियन और चीन दोनों ने अफ्रीका के साथ अपने-अपने सम्मेलन शुरू किए. चीन-अफ्रीका सहयोग मंच यानी FOCAC जल्दी ही अफ्रीका का सबसे असरदार कूटनीतिक मंच बन गया.
भारत के अफ्रीका से रिश्ते पुराने रहे हैं, लेकिन सम्मेलन राजनीति में वह देर से उतरा. पहला भारत-अफ्रीका फोरम सम्मेलन 2008 में हुआ. पहले तीन सम्मेलन तीन-चार बरस के फासले पर हुए, मगर चौथा सम्मेलन कोविड महामारी, भारत और अफ्रीकी देशों के चुनावों और अब इबोला फैलने की वजह से बहुत पीछे चला गया. इसी तरह आखिरी अफ्रीका-दक्षिण अमेरिका सम्मेलन 2016 में हुआ था और चौथा सम्मेलन अब तक नहीं हो पाया. इतने ज्यादा सम्मेलन अफ्रीकी नेताओं पर भी लगातार तैयारियों का दबाव डालते हैं. ऊपर से इस मॉडल पर बीते कुछ बरसों में तीखी आलोचना भी हुई है. केन्या के राष्ट्रपति विलियम रूटो ने खुलकर कहा कि ऐसे सम्मेलनों में अफ्रीकी नेताओं को बोलने के लिए बस कुछ मिनट दिए जाते हैं. दूसरी बड़ी शिकायत यह है कि इन बड़े मंचों पर भारी-भरकम घोषणाएं तो होती हैं, लेकिन अमल बहुत कम दिखाई देता है.
दुनिया इस वक्त लगातार बढ़ती अस्थिरता से जूझ रही है. ऐसे में भारत को इस सम्मेलन के टलने को परेशानी नहीं, बल्कि अफ्रीका के साथ अपने रिश्तों को नए सिरे से मजबूत करने के मौके की तरह देखना चाहिए. अफ्रीकन डेवलपमेंट बैंक, यूएनडीपी और UNECA की हालिया रिपोर्ट कहती है कि पश्चिम एशिया संघर्ष शुरू होने के बाद 29 अफ्रीकी देशों की मुद्रा डॉलर के मुकाबले कमजोर हुई है. इससे कर्ज चुकाने की लागत बढ़ गई और आयात महंगे हो गए. सबसे बड़ी बात यह कि मध्य अफ्रीका इस समय इबोला के फैलाव से जूझ रहा है. अफ्रीका पहले ही खाद्य असुरक्षा से जूझ रहा था, ऊपर से जंग ने खाद की कमी और खाने-पीने की चीजों की कीमतों में तेज बढ़ोतरी कर दी. IMF का अंदाजा है कि अगर दुनिया में खाने की कीमतें 20 फीसदी और बढ़ीं, तो करीब दो करोड़ अफ्रीकी लोग खाद्य संकट में धकेल दिए जाएंगे और बीस लाख बच्चे कुपोषण का शिकार हो सकते हैं.अफ्रीका की अर्थव्यवस्थाओं पर युद्ध और वैश्विक अस्थिरता का भारी असर पड़ा है. जब पश्चिमी देश अफ्रीका से दूरी बनाते दिख रहे हैं, तब भारत तेजी से वहां अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है. कारोबार, निवेश और विकास परियोजनाओं के जरिए नई दिल्ली अब अफ्रीका के लिए भरोसेमंद साथी की छवि बना रही है.
अफ्रीकन डेवलपमेंट बैंक, यूएनडीपी और UNECA की हालिया रिपोर्ट कहती है कि पश्चिम एशिया संघर्ष शुरू होने के बाद 29 अफ्रीकी देशों की मुद्रा डॉलर के मुकाबले कमजोर हुई है. इससे कर्ज चुकाने की लागत बढ़ गई और आयात महंगे हो गए. सबसे बड़ी बात यह कि मध्य अफ्रीका इस समय इबोला के फैलाव से जूझ रहा है.
जब पश्चिम दुनिया से पीछे हट रहा है, तब भारत को बड़ी भूमिका निभानी होगी. 2023 की G20 अध्यक्षता के दौरान भारत ने अफ्रीकी यूनियन को G20 की स्थायी सदस्यता दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई. अफ्रीका अब भारत का चौथा सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार है और 2024-25 में दोनों के बीच व्यापार करीब 81.9 अरब डॉलर तक पहुंच गया. 2010 से 2025 के बीच भारत ने वहां करीब 62 अरब डॉलर का निवेश किया, जिससे वह अफ्रीका का पांचवां सबसे बड़ा निवेशक बन गया. भारत सरकार ने 42 अफ्रीकी देशों को बिजली, ऊर्जा, परिवहन, खेती और स्वास्थ्य परियोजनाओं के लिए करीब 12 अरब डॉलर की 196 आसान कर्ज लाइनें दी हैं.
प्राकृतिक दौलत और बढ़ती नौजवान आबादी के बावजूद अफ्रीका बाहरी झटकों के सामने बेहद कमजोर है. स्वास्थ्य और खाने की जरूरतों के लिए वह अभी भी दुनिया के बाजार और विदेशी मदद पर बहुत ज्यादा निर्भर है. सब-सहारा अफ्रीका में इस्तेमाल होने वाली 99 फीसदी वैक्सीन और 70 से 90 फीसदी दवाएं बाहर से आती हैं. खाने की बुनियादी जरूरतों का 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सा भी आयात करना पड़ता है. 2025 में उसका खाद्य आयात बिल बढ़कर 65 अरब डॉलर तक पहुंच गया. खेती की पैदावार बेहद कम है और इस्तेमाल होने वाली करीब 90 फीसदी खाद बाहर से आती है. इसलिए भारत और अफ्रीका की साझेदारी के अगले दौर का असली जोर खाद्य सुरक्षा और मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था बनाने पर होना चाहिए.
अफ्रीका के पास जमीन, खनिज और नौजवान आबादी की कोई कमी नहीं है. फिर भी दवाओं, वैक्सीन और खाने तक के लिए उसकी निर्भरता बाहर की दुनिया पर बनी हुई है. अफ्रीका की सबसे बड़ी जरूरत अब सिर्फ सड़क और पुल नहीं, बल्कि मजबूत अस्पताल और भरोसेमंद खाद्य व्यवस्था है. भारत अगर अपनी ताकत सही जगह लगाए, तो वह इस महाद्वीप के लिए सबसे अहम साझेदार बन सकता है. भारत और अफ्रीका के रिश्तों में स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा पहले से अहम रहे हैं. तीसरे भारत-अफ्रीका फोरम सम्मेलन के दस्तावेज में भी इन क्षेत्रों में साझेदारी पर जोर दिया गया था. स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा दोनों ही अफ्रीका की पचास साल की बड़ी योजना एजेंडा 2063 के अहम हिस्से हैं. आसान कर्ज देकर हर क्षेत्र में थोड़ा-थोड़ा काम करने के बजाय भारत को अपनी ताकत खेती, भोजन और स्वास्थ्य सुरक्षा पर केंद्रित करनी चाहिए. इससे अफ्रीका की दो सबसे बड़ी मुश्किलों पर सीधे असर पड़ेगा. ऊपर से अफ्रीकी देशों पर बढ़ते कर्ज को देखते हुए अब बुनियादी ढांचे के लिए आसान कर्ज देना भी पहले जितना कारगर रास्ता नहीं रह गया है.
भारत अगर अफ्रीका में स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा पर बड़ा दांव लगाता है, तो इससे दुनिया में भारत की पहचान एक भरोसेमंद और जिम्मेदार ताकत के तौर पर और मजबूत होगी.अगर भारत अफ्रीका को खाद्य और स्वास्थ्य सुरक्षा हासिल करने में मदद करता है, तो यह पूरे महाद्वीप के लिए बेहद बड़ा बदलाव साबित हो सकता है.
भारत को 'अफ्रीका की फार्मेसी' के रूप में भी जाना जाता है. HIV/AIDS, मलेरिया, टीबी और दूसरी बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली बड़ी मात्रा में जेनेरिक दवाएं भारत से जाती हैं. कोविड महामारी के दौरान 'वैक्सीन मैत्री' के तहत भारत ने अफ्रीकी देशों को टीके और चिकित्सा मदद भेजी थी. अपोलो, फोर्टिस और डॉ. अग्रवाल आई हॉस्पिटल जैसे भारतीय अस्पताल समूह कई अफ्रीकी देशों में मौजूद हैं. सिप्ला जैसी भारतीय दवा कंपनियों ने युगांडा और दक्षिण अफ्रीका में दवाएं बनानी भी शुरू कर दी हैं.
USAID बंद होने और विदेशी मदद घटने से अफ्रीका के स्वास्थ्य क्षेत्र को बड़ा झटका लगा है. तीसरे भारत-अफ्रीका फोरम सम्मेलन में भारत ने 1 करोड़ डॉलर का भारत-अफ्रीका हेल्थ फंड बनाने का वादा किया था. अब जबकि पश्चिमी मदद में कटौती के गंभीर असर सामने आ रहे हैं, भारत को कहीं बड़ा सहायता पैकेज घोषित करना चाहिए.
अफ्रीका में स्वास्थ्यकर्मियों की भी भारी कमी है. भारत का आशा कार्यकर्ता मॉडल वहां बहुत काम आ सकता है. इसलिए भारत के क्षमता निर्माण कार्यक्रमों को अफ्रीका के स्वास्थ्यकर्मियों को मजबूत बनाने पर जोर देना चाहिए. इसी तरह भारत बेहतर तकनीकी मदद, अच्छी खेती सामग्री और सूखा झेल सकने वाली फसलों के जरिए अफ्रीका की खाद्य सुरक्षा मजबूत कर सकता है. इससे भारतीय कृषि कारोबार को भी अफ्रीका में फैलने का मौका मिलेगा.
अफ्रीका को इस वक्त सिर्फ पैसों की नहीं, डॉक्टरों, दवाओं और मजबूत स्थानीय व्यवस्था की जरूरत है. भारत का आशा मॉडल और दवा क्षेत्र का अनुभव वहां करोड़ों लोगों की जिंदगी बदल सकता है. भारत अगर अफ्रीका में स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा पर बड़ा दांव लगाता है, तो इससे दुनिया में भारत की पहचान एक भरोसेमंद और जिम्मेदार ताकत के तौर पर और मजबूत होगी.अगर भारत अफ्रीका को खाद्य और स्वास्थ्य सुरक्षा हासिल करने में मदद करता है, तो यह पूरे महाद्वीप के लिए बेहद बड़ा बदलाव साबित हो सकता है. साथ ही दुनिया में भारत की छवि एक बड़े और भरोसेमंद विकास साझेदार की तरह और मजबूत होगी. आखिरकार इस वक्त जरूरत नारों और दिखावे की नहीं, बल्कि असली काम की है.
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Dr Malancha Chakrabarty is Senior Fellow and Deputy Director (Research) at the Observer Research Foundation where she coordinates the research centre Centre for New Economic ...
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