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Published on May 15, 2026 Updated 3 Days ago

समुद्रों में बढ़ता प्लास्टिक कचरा अब एक गंभीर वैश्विक संकट बन चुका है जिसे सिर्फ सफाई से नहीं बल्कि रोकथाम, रीसाइक्लिंग और नई तकनीकों से ही नियंत्रित किया जा सकता है. इसका असली समाधान प्लास्टिक की खपत घटाने और टिकाऊ विकल्प अपनाने में है. जानिए कैसे.

ब्लू क्राइसिस: क्या समुद्र बच पाएंगे?

समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण इस सदी की सबसे बड़ी पर्यावरणीय और नीतिगत चुनौतियों में से एक बन चुका है. तेज औद्योगिक विकास, एकल-उपयोग प्लास्टिक की बढ़ती खपत और कमजोर कचरा प्रबंधन के कारण समुद्रों में प्लास्टिक प्रदूषण तेजी से बढ़ा है. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अनुसार, हर वर्ष 11 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक प्लास्टिक समुद्री पर्यावरण में पहुंचता है, जबकि समुद्रों में कुल प्लास्टिक का भंडार 75 से 199 मिलियन टन के बीच है. यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो 2040 तक समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण तीन गुना तक बढ़ सकता है.

पर्यावरणीय नुकसान के अलावा, यह संकट आर्थिक और सामाजिक बोझ भी पैदा करता है. समुद्री प्लास्टिक कुल समुद्री कचरे का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा है. पर्यटन, मत्स्य पालन और तटीय आजीविका पर इसका आर्थिक प्रभाव हर वर्ष लगभग 6 से 19 अरब अमेरिकी डॉलर आंका गया है. समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण रोकने के लिए पुनर्चक्रण और नवाचार आधारित समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी नीतियाँ जरूरी हैं.

प्लास्टिक स्मॉग: महासागरों की नई हकीकत

महासागरों में मौजूद कचरे का कम से कम 85 प्रतिशत हिस्सा प्लास्टिक का है. प्लास्टिक लंबे समय तक टिकाऊ रहता है और कई बार सदियों तक नष्ट नहीं होता, इसलिए यह समुद्रों में जमा होता जाता है. समय के साथ बड़े प्लास्टिक टुकड़े रासायनिक, भौतिक और जैविक प्रक्रियाओं से टूटकर माइक्रोप्लास्टिक (5 मिमी से छोटे) और नैनोप्लास्टिक में बदल जाते हैं. ये सूक्ष्म प्लास्टिक कण तटीय क्षेत्रों से लेकर गहरे समुद्री तल और ध्रुवीय क्षेत्रों तक फैल चुके हैं. वर्तमान अनुमान बताते हैं कि महासागरों में लगभग 170 ट्रिलियन प्लास्टिक कण मौजूद हैं, जो ‘प्लास्टिक स्मॉग‘ जैसी स्थिति पैदा कर रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अनुसार, हर वर्ष 11 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक प्लास्टिक समुद्री पर्यावरण में पहुंचता है, जबकि समुद्रों में कुल प्लास्टिक का भंडार 75 से 199 मिलियन टन के बीच है. यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो 2040 तक समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण तीन गुना तक बढ़ सकता है.

माइक्रोप्लास्टिक समुद्री जीवों के जरिए खाद्य श्रृंखला में पहुंचकर मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन रहे हैं. दूसरी ओर, वैश्विक प्लास्टिक उत्पादन लगातार बढ़ रहा है और यह लगभग 450 मिलियन टन प्रतिवर्ष तक पहुंच चुका है, जबकि पुनर्चक्रण की दर 10 प्रतिशत से भी कम है. यह स्थिति दिखाती है कि समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण वैश्विक संसाधन प्रबंधन की गहरी विफलता का संकेत है.

ओशन क्लीनअप से आगे की सच्चाई  

समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए कचरा प्रबंधन, सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर प्रतिबंध और रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देने जैसे पारंपरिक उपाय जरूरी हैं, लेकिन ये पर्याप्त साबित नहीं हो रहे हैं. UNEP ने समुद्री पर्यावरण में प्लास्टिक के लंबे समय तक बने रहने और लगातार जमा होने को देखते हुए दीर्घकालिक और व्यापक हस्तक्षेप की आवश्यकता पर जोर दिया है. मशीनों की मदद से समुद्र से प्लास्टिक हटाना बहुत महंगा है और माइक्रोप्लास्टिक को हटाने में काफी हद तक असफल रहता है. ‘ओशन क्लीनअप’ जैसी पहल ने समुद्री भंवरों से माइक्रोप्लास्टिक हटाने में कुछ प्रगति दिखाई है, लेकिन इसकी क्षमता और बड़े स्तर पर विस्तार अभी भी चुनौती बने हुए हैं. भारत में ‘स्वच्छ सागर सुरक्षित सागर‘ जैसी तटीय सफाई पहल ने जागरूकता और सफाई को बढ़ावा दिया है, लेकिन ये समुद्र तक पहुंचने वाले प्लास्टिक कचरे को शुरुआत में रोकने में सीमित हैं.

जैव-अपघटनीय (बायोडिग्रेडेबल) प्लास्टिक भी पूरी तरह समाधान नहीं हैं, क्योंकि इनके विघटन के लिए विशेष परिस्थितियों की जरूरत होती है और ये लंबे समय तक समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में बने रह सकते हैं. इसी तरह, तटीय सफाई से जुड़ी कई पहलें केवल प्रतीकात्मक बनकर रह जाती हैं और समस्या की जड़ तक नहीं पहुंच पातीं तथा न ही पर्याप्त जन-जागरूकता पैदा कर पाती हैं. उदाहरण के लिए, मैंग्रोव पर निर्भर समुदायों को तटीय विकास परियोजनाओं में शायद ही शामिल किया जाता है और समुदाय आधारित बीच प्रबंधन को ऊपर से थोपे गए सफाई अभियानों के कारण महत्व नहीं मिल पाता.

प्लास्टिक संकट का वैज्ञानिक जवाब  

समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए एंजाइम, सूक्ष्मजीव और शैवाल जैसे जैविक तंत्रों का उपयोग करती है. यह प्लास्टिक के जैव-अपघटन और पुनर्चक्रण के नए रास्ते प्रदान करती है तथा इसे परिपत्र अर्थव्यवस्था के ढांचे में जोड़ने में मदद करती है. वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि कुछ सूक्ष्मजीव प्लास्टिक को विघटित कर सकते हैं. समुद्री और स्थलीय वातावरण में अब तक 30,000 से अधिक प्लास्टिक-विघटनकारी एंजाइमों की पहचान की जा चुकी है. इससे नीति निर्माण में समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी की महत्वपूर्ण भूमिका सामने आती है. हालांकि, जैव-अपघटन की प्रक्रिया अभी धीमी है, क्योंकि प्लास्टिक प्रकृति के लिए नया पदार्थ है, इसलिए उसे तोड़ने वाले एंजाइम अभी पर्याप्त मात्रा में विकसित नहीं हुए हैं.

‘ओशन क्लीनअप’ जैसी पहल ने समुद्री भंवरों से माइक्रोप्लास्टिक हटाने में कुछ प्रगति दिखाई है, लेकिन इसकी क्षमता और बड़े स्तर पर विस्तार अभी भी चुनौती बने हुए हैं. भारत में ‘स्वच्छ सागर सुरक्षित सागर‘ जैसी तटीय सफाई पहल ने जागरूकता और सफाई को बढ़ावा दिया है, लेकिन ये समुद्र तक पहुंचने वाले प्लास्टिक कचरे को शुरुआत में रोकने में सीमित हैं.

समुद्री प्लास्टिक कचरा सूक्ष्मजीव समुदायों के लिए आधार का काम करता है, जिससे बायोफिल्म का निर्माण होता है. ये बायोफिल्म प्लास्टिक कणों के विघटन में मदद करते हैं और इनके माध्यम से प्लास्टिक के तेजी से अपघटन की संभावनाएं बढ़ाई जा सकती हैं. वैश्विक स्तर पर कार्बियोस जैसी कंपनियां एंजाइम आधारित रीसाइक्लिंग तकनीक विकसित कर रही हैं, जिनके जरिए प्लास्टिक को बड़े औद्योगिक स्तर पर दोबारा उपयोग योग्य सामग्री में बदला जा सकता है. भारत में वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) जैसे संस्थान प्लास्टिक विघटन के लिए सूक्ष्मजीव आधारित तरीकों पर काम कर रहे हैं.

सिंथेटिक बायोलॉजी में हो रही प्रगति के कारण ऐसे सूक्ष्मजीव विकसित किए जा रहे हैं जिनकी प्लास्टिक-विघटन क्षमता अधिक बेहतर हो. साथ ही, प्लास्टिक को उपयोगी मूल्यवर्धित उत्पादों जैसे रसायन और जैव-ईंधन में बदला जा सकता है. इसके अलावा, समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी के नवाचार प्लास्टिक के जैव-आधारित विकल्पों के उत्पादन को भी संभव बनाते हैं, जैसे समुद्री शैवाल से बने जैव-अपघटनीय पॉलिमर. भारत में Sea6Energy जैसी कंपनियां समुद्री स्रोतों से प्राप्त जैविक सामग्री विकसित कर रही हैं, जो पारंपरिक प्लास्टिक का विकल्प बन सकती हैं और अधिक टिकाऊ व परिपत्र ब्लू इकोनॉमी की ओर बदलाव को समर्थन दे सकती हैं.

हालांकि, इसकी संभावनाओं के बावजूद बड़े स्तर पर इसका विस्तार अभी भी चुनौतीपूर्ण है. धीमी अपघटन दर, अधिक लागत और नियमों की कमी के कारण समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी अकेले प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या हल नहीं कर सकती.

आगे की राह

समुद्री प्रदूषण रोकने के लिए मजबूत और दीर्घकालिक नीतियां जरूरी हैं.

वित्तीय सहायता: समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी से जुड़े उपायों को बड़े स्तर पर लागू करने के लिए अनुदान (ग्रांट), सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) और उभरते ब्लू इकोनॉमी स्टार्टअप्स में अधिक निवेश जैसे विशेष वित्तीय तंत्र जरूरी हैं. वैश्विक स्तर पर क्षितिज यूरोप जैसे कार्यक्रम जैव-आधारित और परिपत्र अर्थव्यवस्था से जुड़े नवाचारों को समर्थन देते हैं, जिनमें प्लास्टिक विघटन की वैकल्पिक तकनीकें भी शामिल हैं. भारत में स्टार्टअप इंडिया जैसी पहलें ब्लू बायोटेक्नोलॉजी से जुड़े उद्यमों को इनक्यूबेशन सहायता और वित्तीय प्रोत्साहन देकर बढ़ावा देती हैं.

संयुक्त राष्ट्र वर्तमान में वैश्विक प्लास्टिक संधि पर बातचीत कर रहा है, जिसका उद्देश्य प्लास्टिक कचरा प्रबंधन के लिए बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं तय करना है. भारतीय महासागर रिम एसोसिएशन जैसी क्षेत्रीय पहलों में भारत की सक्रिय भागीदारी समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी आधारित नवाचारों को बढ़ावा देने में सहायक हो सकती है. 

मजबूत निगरानी ढांचा: प्लास्टिक को विघटित करने वाले कृत्रिम रूप से विकसित सूक्ष्मजीवों के सुरक्षित उपयोग और तैनाती के लिए स्पष्ट नियम बनाना जरूरी है. इसके साथ ही पर्यावरणीय जोखिम आकलन, बौद्धिक संपदा अधिकार और तकनीक हस्तांतरण के लिए मजबूत व्यवस्थाओं की आवश्यकता है. भारत में समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी को व्यापक जैव-अर्थव्यवस्था और महासागर शासन नीतियों के साथ जोड़ा जा सकता है. वैश्विक स्तर पर यूरोपीय रसायन एजेंसी माइक्रोप्लास्टिक को REACH नियामक ढांचे में शामिल कर रही है. भारतीय संदर्भ में, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी आधारित पहल को राष्ट्रीय महासागर और जैव-अर्थव्यवस्था नीतियों में जोड़ा जा सकता है. अद्यतन विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) ढांचा समुद्री प्लास्टिक कचरे की ट्रैकिंग, डिजिटल निगरानी और सख्त अनुपालन लक्ष्यों पर जोर देता है.

जैव-अर्थव्यवस्था: नीतियों को इस दिशा में प्रोत्साहित करना चाहिए कि प्लास्टिक कचरे को उच्च मूल्य वाले उत्पादों में बदला जाए और समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी को रीसाइक्लिंग प्रणालियों के साथ जोड़ा जाए. वैश्विक स्तर पर महासागरों के लिए पार्ले जैसी पहलें समुद्री प्लास्टिक कचरे को नए उपयोगी पदार्थों में बदलने पर काम कर रही हैं. ओशनवर्क्स समुद्री प्लास्टिक कचरे के संग्रह और पुनर्चक्रण को बढ़ावा देता है ताकि उसका उपयोग विनिर्माण में किया जा सके. 4ocean जैसी पहल समुद्र से प्लास्टिक हटाने के साथ-साथ उससे मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करने पर काम करती है. भारत में ब्लू फ्लैग कार्यक्रम टिकाऊ प्लास्टिक कचरा प्रबंधन और आवश्यक ढांचे को बढ़ावा देता है. पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय समुद्री और माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण पर शोध को समर्थन देता है और नीतिगत निर्णयों में मदद करता है. साथ ही, जन-जागरूकता अभियान और कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के तहत निवेश टिकाऊ समाधानों को बड़े स्तर पर लागू करने में सहायक हो सकते हैं.

मजबूत डेटा और निगरानी प्रणाली: प्लास्टिक प्रदूषण के प्रवाह की निगरानी, प्रदूषण वाले क्षेत्रों की पहचान, समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी आधारित समाधानों की प्रभावशीलता का आकलन और साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण के लिए मजबूत डेटा प्रणाली जरूरी है. उदाहरण के लिए, समुद्री कूड़े पर वैश्विक साझेदारी समुद्री कचरे से संबंधित डेटा साझा करने और निगरानी में सहायता करता है. भारत में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने समुद्री प्लास्टिक और माइक्रोप्लास्टिक रिसाव की निगरानी और डेटा संग्रह को अपनी प्रणाली में शामिल किया है.

अंतरराष्ट्रीय सहयोग: वैश्विक प्लास्टिक संधि जैसे अंतरराष्ट्रीय सहयोग समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी आधारित नवाचारी समाधानों को बढ़ावा दे सकते हैं. संयुक्त राष्ट्र वर्तमान में वैश्विक प्लास्टिक संधि पर बातचीत कर रहा है, जिसका उद्देश्य प्लास्टिक कचरा प्रबंधन के लिए बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं तय करना है. भारतीय महासागर रिम एसोसिएशन जैसी क्षेत्रीय पहलों में भारत की सक्रिय भागीदारी समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी आधारित नवाचारों को बढ़ावा देने में सहायक हो सकती है. 

MSME की भागीदारी: समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी को सफल बनाने के लिए स्थानीय समुदायों और MSMEs की भागीदारी जरूरी है. उदाहरण के तौर पर, इंडोनेशिया में समुदाय आधारित रीसाइक्लिंग पहल ने विकेंद्रीकृत प्रणाली के जरिए स्थानीय स्तर पर प्रभावी प्लास्टिक कचरा प्रबंधन का उदाहरण प्रस्तुत किया है. भारत में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के अंतर्गत तटीय आजीविका कार्यक्रमों को प्लास्टिक कचरा प्रबंधन और परिपत्र अर्थव्यवस्था आधारित व्यापार मॉडल से जोड़ा जा सकता है.

समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए जैव-प्रौद्योगिकी, नवाचार और परिपत्र अर्थव्यवस्था पर आधारित संयुक्त प्रयास जरूरी हैं. पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए इन उपायों को बड़े स्तर पर अपनाने से ब्लू इकोनॉमी को बढ़ावा मिलेगा. इसके लिए सरकारों, निवेश और वैश्विक सहयोग के साथ मजबूत नीतियों की आवश्यकता होगी.


पूर्णिमा वी बी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च असिस्टेंट हैं.
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Poornima Vengaprath Bhattathiri

Poornima Vengaprath Bhattathiri

Dr Poornima V B is an Associate Fellow at ORF. Her work focuses on blue economy, marine circularity, and sustainable resource policy. She has contributed ...

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