Author : Dhaval Desai

Expert Speak Raisina Debates
Published on May 27, 2026 Updated 0 Hours ago

अब शहरों की तरक्की सिर्फ बनी सड़कों और खर्च हुए बजट से नहीं बल्कि इस बात से मापने की मांग उठ रही है कि लोगों की जिंदगी कितनी आसान हुई. ब्रिक्स देश मिलकर ऐसा शहरी ऑडिट मॉडल बनाने की ओर बढ़ रहे हैं जहां सरकारों से सवाल होगा, “कितना पैसा खर्च हुआ?” नहीं बल्कि “जनता को असली फायदा क्या मिला?”

पढ़ें, BRICS शहरों में “क्या बदला?” की बहस

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बेंगलुरु में हाल ही में आयोजित ब्रिक्स (BRICS) सर्वोच्च लेखापरीक्षा संस्थान (SAI) शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए, भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) ने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत के शहरी परिवर्तन के मूल में जवाबदेही होनी चाहिए. सीएजी (CAG) के मुताबिक, विकासशील देशों के शहरों में सरकारी खर्च की जाँच सिर्फ कागजी नियमों और कानूनी तौर-तरीकों के आधार पर नहीं होनी चाहिए, बल्कि इस बात पर होनी चाहिए कि उस खर्च से आम जनता के जीवन में कितना असली सुधार आया. यह अंतर ब्रिक्स देशों के लिए महत्वपूर्ण है, जो मिलकर दुनिया की लगभग आधी आबादी और दुनिया के कुछ सबसे तेज़ी से बढ़ते शहरी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं. जहाँ उनके शहर आर्थिक विकास को गति देते हैं, वहीं वे भीड़भाड़, आवास की कमी और अनौपचारिक बस्तियों (झुग्गी-झोपड़ियों), बाढ़ और अत्यधिक गर्मी, खराब गतिशीलता,प्रदूषण, पर्यावरण क्षरण और अपर्याप्त सार्वजनिक सेवाओं जैसी समस्याओं का भी सामना करते हैं-ये ऐसे मुद्दे हैं जो आर्थिक उत्पादकता और सामाजिक एकजुटता दोनों को प्रभावित करते हैं.

सरकारी खर्च की असली परीक्षा

अधिकांश विकासशील देशों में सार्वजनिक-क्षेत्र के ऑडिट एक प्रक्रियात्मक दायरे तक ही सीमित रहते हैं, जिसमें सार्वजनिक कार्यक्रमों के परिणाम-आधारित मूल्यांकन  पर ज़ोर देने के बजाय कदाचार और अनियमितताओं को रोकने के लिए अनुपालन को प्राथमिकता दी जाती है. उदाहरण के लिए, एक मेट्रो रेल परियोजना खरीद मानदंडों का अनुपालन कर सकती है और फिर भी शहर के यात्रा समय को कम करने में विफल हो सकती है. एक स्मार्ट सिटी डैशबोर्ड तकनीकी रूप से चालू हो सकता है लेकिन उसका उपयोग बहुत कम हो रहा हो. स्वच्छता कार्यक्रमों में निवेश से हो सकता है कि कचरा निपटान की चुनौतियों और स्वच्छता तक खराब पहुँच का समाधान न हो. हालांकि इस तरह की निगरानी महत्वपूर्ण है, फिर भी यह विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती है, जहाँ शहर आर्थिक विकास और जलवायु कार्रवाई के मामले में सबसे आगे हैं. इसलिए अब सवाल यह नहीं है कि धन सही तरीके से खर्च किया गया था या नहीं, बल्कि यह है कि क्या उस खर्च ने नागरिकों के दैनिक जीवन में सुधार किया.

CAG के मुताबिक, विकासशील देशों के शहरों में सरकारी खर्च की जाँच सिर्फ कागजी नियमों और कानूनी तौर-तरीकों के आधार पर नहीं होनी चाहिए, बल्कि इस बात पर होनी चाहिए कि उस खर्च से आम जनता के जीवन में कितना असली सुधार आया. यह अंतर ब्रिक्स देशों के लिए महत्वपूर्ण है, जो मिलकर दुनिया की लगभग आधी आबादी और दुनिया के कुछ सबसे तेज़ी से बढ़ते शहरी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं.

इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन ऑफ सुप्रीम ऑडिट इंस्टीट्यूशंस (INTOSAI) के 'इंटरनेशनल स्टैंडर्ड ऑफ सुप्रीम ऑडिट इंस्टीट्यूशंस' (ISSAI) स्पष्ट रूप से अनुपालन ऑडिट और प्रभावशीलता एवं सार्वजनिक मूल्य पर केंद्रित प्रदर्शन ऑडिट (performance audits) के बीच अंतर करते हैं. यहीं पर ‘ईज ऑफ लिविंग’ (जीवन की सुगमता) और परिणाम-उन्मुख ऑडिटिंग पर CAG का ज़ोर प्रासंगिक हो जाता है. भारत नागरिकों के दृष्टिकोण से 101 शहरों का ऑडिट कर रहा है, जिसमें जीवन की गुणवत्ता, स्थिरता और पहुँच की जांच की जा रही है. CAG ने कहा कि यह धारणा ऑडिट फाइलों के बजाय नागरिकों को जवाबदेही के केंद्र में रखने का प्रयास करता है.

स्मार्ट सिटी बनाम स्मार्ट नतीजे  

इस तरह का बदलाव भारत के लिए एक अत्यंत आवश्यक और अनिवार्य कदम है, जहाँ शहरी मिशनों के प्रदर्शन ऑडिट, प्रक्रियात्मक अनियमितताओं को उजागर करने के साथ-साथ यह भी दर्शाते हैं कि सरकार बुनियादी ढांचे के निर्माण को ही अपने आप में अंतिम लक्ष्य मान लेती हैं. उदाहरण के लिए, देहरादून में 'स्मार्ट सिटी मिशन' के ऑडिट में महंगी ‘स्मार्ट समाधान’ परियोजनाओं के कार्यान्वयन में कई ‘अनियमितताएं‘ सामने आईं. लेकिन प्रक्रियात्मक और वित्तीय अनियमितताओं से कहीं बढ़कर, ऐसे ऑडिट बड़े बुनियादी ढांचे पर होने वाले खर्च और वास्तविक शहरी परिणामों के बीच के अंतर को भी उजागर करते हैं. इसी तरह, केरल में 'अटल नवीकरण और शहरी परिवर्तन मिशन' (AMRUT) के CAG ऑडिट ने योजना, निगरानी और मूल्यांकन में कमियों की ओर इशारा किया है. कई शहरों ने परियोजनाओं में देरी, कम उपयोग की गई संपत्तियों और सेवा सुधारों के अपर्याप्त मूल्यांकन की सूचना दी. 

देहरादून में 'स्मार्ट सिटी मिशन' के ऑडिट में महंगी ‘स्मार्ट समाधान’ परियोजनाओं के कार्यान्वयन में कई ‘अनियमितताएं‘ सामने आईं. लेकिन प्रक्रियात्मक और वित्तीय अनियमितताओं से कहीं बढ़कर, ऐसे ऑडिट बड़े बुनियादी ढांचे पर होने वाले खर्च और वास्तविक शहरी परिणामों के बीच के अंतर को भी उजागर करते हैं.

आजकल सरकारी कामों की जांच सिर्फ इस बात पर होती है कि कितना पैसा खर्च हुआ या कितनी लंबी सड़क बनी. इसके बजाय जाँच इस बात की होनी चाहिए कि क्या जनता को असली फायदा मिला-जैसे ट्रैफिक कम हुआ या पानी की सप्लाई बेहतर हुई. अगर जांच नतीजों पर आधारित होगी, तो सरकारें ठेकेदारों के बजाय जनता की सहूलियत देखकर नीतियां बनाएंगी. इससे सरकारी कामकाज में बड़ा और अच्छा सुधार आएगा.

शहरों के लिए दुनिया का संदेश  

अंतरराष्ट्रीय अनुभव इस तरह के बदलावों के महत्व को साबित करते हैं. उदाहरण के लिए, यूनाइटेड किंगडम के नेशनल ऑडिट ऑफिस की 2025-30 की रणनीति, ‘ट्रस्ट-वैल्यू-इम्पैक्ट‘ (विश्वास-मूल्य-प्रभाव), पारंपरिक अकाउंटिंग अनुपालन और रिपोर्टिंग से आगे बढ़कर परिणाम-आधारित दृष्टिकोण की ओर बढ़ती है, जो सार्वजनिक कार्यक्रमों का मूल्यांकन पैसे की सही कीमत के परिणामों और सेवा की प्रभावशीलता के आधार पर करती है. इसी तरह, ब्राजील के ट्रिब्यूनल डी कॉन्टेसा दा उनियाओ (TCU) ने बहुआयामी गरीबी सूचकांक का उपयोग करके एक अभिनव सार्वजनिक व्यय मूल्यांकन उपकरण तैयार किया है, जो कमजोर एवं कम आय वाले समूहों की जीवन स्थितियों पर इन नीतियों के प्रभाव को मापता है. चीन ने भी स्थानीय प्रशासनिक मूल्यांकन को प्रदूषण में कमी, शहरी परिवहन दक्षता और सार्वजनिक सेवा वितरण जैसे मापने योग्य शहरी संकेतकों से तेजी से जोड़ा है.

मुंबई, शंघाई और जोहान्सबर्ग जैसे ब्रिक्स देशों के बड़े शहरों में झुग्गी-झोपड़ी, प्रदूषण और ट्रैफिक जैसी एक जैसी समस्याएं हैं. इन साझा चुनौतियों से निपटने के लिए इन शहरों को केवल दिखावे के बजाय आपस में मिलकर असली और व्यावहारिक सहयोग करना चाहिए. उदाहरण के लिए, 2014 के मुंबई-शंघाई सिस्टर सिटी समझौते ने एशिया के दो सबसे बड़े वित्तीय और बंदरगाह शहरों के बीच सहयोग के लिए एक रूपरेखा तैयार करने की मांग की थी, जिसमें शहरी विकास, परिवहन, फिनटेक और बेहतर आर्थिक आदान-प्रदान पर बातचीत शामिल थी. डरबन और रियो डी जनेरियो ने संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC), रियो+20 प्रक्रिया और कई अन्य शहरी जलवायु नेटवर्क के वैश्विक जलवायु और तटीय शासन मंचों के माध्यम से हिस्सा लिया है. जोहान्सबर्ग और भारतीय महानगरीय एजेंसियों ने भी इसी तरह आईसीएलईआई (ICLEI) और सी40 सिटीज (C40 Cities) जैसे बहुपक्षीय शहर नेटवर्कों में सतत शहरी गतिशीलता, जलवायु अनुकूलन और महानगरीय शासन पर चर्चा की है. फिर भी इनमें से अधिकांश व्यवस्थाएं कभी-कभार होने वाली ही बनी हुई हैं. 

भारतीय शहर पहले से ही देश की जीडीपी में 60 प्रतिशत से अधिक का योगदान करते हैं और जैसे-जैसे भारत अपने 'विकसित भारत 2047' के एजेंडे को पूरा करने का प्रयास कर रहा है, ये राष्ट्रीय विकास के लिए और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाएंगे.

आजकल सरकारी विकास कार्यों की जाँच सिर्फ खर्च हुए बजट पर होती है, जबकि यह इस बात पर होनी चाहिए कि जनता को कितना फायदा मिला (जैसे ट्रैफिक और पानी की समस्या में सुधार). विकासशील देशों के शहरों में झुग्गी-झोपड़ी, प्रदूषण और बाढ़ जैसी एक जैसी समस्याएं हैं. इन चुनौतियों से निपटने के लिए दुनिया के बड़े शहरों (जैसे मुंबई, रियो, दिल्ली) को केवल दिखावे के समझौते करने के बजाय डिजिटल गवर्नेंस, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और तटीय सुरक्षा जैसे कामों में आपस में असली और व्यावहारिक सहयोग करना चाहिए. 

ब्रिक्स का साझा ‘अर्बन ऑडिट’ विजन  

यदि शहरों के बीच समझौतों को सही जाँच प्रणाली (ऑडिट) से जोड़ा जाए, तो अच्छे नतीजे मिलेंगे. एक साझा 'अर्बन ऑडिट प्लेटफॉर्म' बनाकर ब्रिक्स देश केवल रैंकिंग के लिए लड़ने के बजाय एक-दूसरे के अनुभवों से सीख सकते हैं. इससे सरकारी जांच एजेंसियां सिर्फ कागजी नियमों को देखने के बजाय शहरों के विकास और सुधार में मददगार बनेगी. सरकारी नीतियों की सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि आम लोगों को क्या मिला. नागरिकों के लिए केवल कागजी योजनाएं नहीं, बल्कि समय पर बस आना, जलभराव न होना, सस्ता मकान और इलाज मिलना जरूरी है. नियमों के साथ-साथ अब नतीजों की जवाबदेही भी जरूरी है. 

हाल ही में आयोजित ब्रिक्स सर्वोच्च लेखा परीक्षा संस्थान (SAI) शिखर सम्मेलन इस कमी को स्वीकार करता है. भारत के लिए यह बदलाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. भारतीय शहर पहले से ही देश की जीडीपी में 60 प्रतिशत से अधिक का योगदान करते हैं और जैसे-जैसे भारत अपने 'विकसित भारत 2047' के एजेंडे को पूरा करने का प्रयास कर रहा है, ये राष्ट्रीय विकास के लिए और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाएंगे. फिर भी, खंडित निर्णय लेने, कमजोर नगरपालिका क्षमता, अपर्याप्त डेटा प्रणाली और विभिन्न एजेंसियों के बीच खराब समन्वय का पुराना शहरी शासन ढांचा शहरी परिणामों को कमजोर करना जारी रखता है. हालांकि केवल नागरिक-केंद्रित ऑडिटिंग ही इन संरचनात्मक कमजोरियों को दूर नहीं कर सकती, लेकिन यह सरकार की प्राथमिकताओं को बुनियादी रूप से बदल सकती है कि ‘कितना खर्च किया गया.’ के बजाय ‘नागरिकों के लिए क्या बदला.’ यह सिर्फ एक अकाउंटिंग सुधार से कहीं बढ़कर, एक लोकतांत्रिक जनादेश है.


धवल देसाई ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो और उपाध्यक्ष हैं.
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