Author : Jesse Scott

Expert Speak Raisina Debates
Published on Jun 11, 2026 Updated 0 Hours ago

यूरोपीय संघ के CBAM नियमों से भारतीय स्टील और अन्य उद्योगों पर नया दबाव बढ़ने वाला है. जानिए, कैसे भारत और यूरोप सहयोग के जरिए इस चुनौती को हरित विकास और नए अवसरों में बदल सकते हैं.

CBAM से डरें या इसे अवसर की तरह देखें?

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कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) यूरोपीय संघ (ईयू) की व्यापार और जलवायु नीति का एक बहुत ही महत्वपूर्ण और विवादित हिस्सा बन गया है. भारत के लिए यह सिर्फ एक तकनीकी परेशानी नहीं है, बल्कि एक बड़ी चुनौती है कि कैसे एक तेजी से बढ़ता देश विकास भी करें और साथ ही प्रदूषण (कार्बन) भी कम करे. वहीं ईयू  के लिए, CBAM एक जटिल चुनौती से निपटने का ज़रूरी नियम है. इस मुद्दे पर भारत और ईयू  के बीच सही तालमेल बनना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि यह पूरी दुनिया (ग्लोबल नॉर्थ और ग्लोबल साउथ) के लिए पर्यावरण सहयोग का एक मॉडल बन सकता है.

यह आपसी तनाव बिल्कुल असली और साफ़ है. CBAM के कारण भारी खर्च और कड़े नियमों को मानने का बोझ बढ़ रहा है. भारत से होने वाले कुल निर्यात (एक्सपोर्ट) में से करीब 90 प्रतिशत  हिस्सा लोहे और स्टील का है, जिस पर CBAM का असर पड़ेगा. 2026 से 2030 के बीच, ईयू  को भेजे जाने वाले भारतीय लोहे और स्टील पर लगभग 5 अरब यूरो का टैक्स (टैरिफ) लगेगा. छोटे और मझोले उद्योगों (SMEs) के लिए, जो भारत की जीडीपी में 30 प्रतिशत , मैन्युफैक्चरिंग में 45 प्रतिशत  और निर्यात में 40 प्रतिशत  योगदान देते हैं, इन नियमों को पूरा करना बहुत मुश्किल है. आंकड़े बताते हैं कि डेटा की जांच-परख की मुश्किलों की वजह से ईयू  को होने वाला भारतीय स्टील का निर्यात अभी से कम हो रहा है.

भारत के विशेषज्ञ अब सिर्फ यह नहीं सोच रहे कि ‘हम CBAM का विरोध कैसे करें’, बल्कि यह सोच रहे हैं कि ‘CBAM का फायदा उठाकर भारत के लिए नए मौके कैसे बनाए जाएं’ दूसरी तरफ, ईयू  भी यह मानने लगा है कि अपनी तरह का यह पहला नियम होने के कारण CBAM पूरी तरह परफेक्ट नहीं है और इसमें सुधार की ज़रूरत है - जिसके लिए व्यापारिक साझेदारों से बेहतर बातचीत ज़रूरी है.

CBAM पर नए सिरे से सोच 

इसके पीछे सरकार और संप्रभुता (अधिकार) से जुड़ा एक गहरा मुद्दा भी है. भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार यह आवाज उठाता रहा है कि ईयू  के ऐसे नियम दूसरे देशों की घरेलू नीतियों को प्रभावित करते हैं. ब्रसेल्स (ईयू ) का यह एकतरफा फैसला जो भारत की औद्योगिक नीति को बदल रहा है, वह सिर्फ टैक्स का मामला नहीं है, बल्कि देश की संप्रभुता (आज़ादी) पर सवाल उठाता है. ऐसा फंड 'ग्रीन स्टील' (बिना प्रदूषण वाले स्टील) को बनाने, चलाने के खर्च, कार्बन की निगरानी और जांच (MRV) का ढांचा तैयार करने, छोटे उद्योगों (SMEs) को तकनीकी मदद देने और टेक्नोलॉजी के लिए मिलकर काम करने में मदद करेगा.

फिर भी, दोनों तरफ से कूटनीतिक रुख बदल रहा है. भारत के विशेषज्ञ अब सिर्फ यह नहीं सोच रहे कि ‘हम CBAM का विरोध कैसे करें’, बल्कि यह सोच रहे हैं कि ‘CBAM का फायदा उठाकर भारत के लिए नए मौके कैसे बनाए जाएं’ दूसरी तरफ, ईयू  भी यह मानने लगा है कि अपनी तरह का यह पहला नियम होने के कारण CBAM पूरी तरह परफेक्ट नहीं है और इसमें सुधार की ज़रूरत है - जिसके लिए व्यापारिक साझेदारों से बेहतर बातचीत ज़रूरी है. जनवरी में हुए 'यूरोपीय संघ-भारत दिल्ली शिखर सम्मेलन' में किए गए वादे दोनों पक्षों को मिलकर एक सही और व्यावहारिक समाधान खोजने का एक अच्छा मौका देते हैं.

दो प्रस्तावों पर विशेष ध्यान जरूरी:  

पहला प्रस्ताव है 'इंडिया CBAM लेवी इंडस्ट्रियल डीकार्बोनाइजेशन फंड'. इसके तहत भारत खुद CBAM एक्सपोर्ट टैक्स (लेवी) इकट्ठा करेगा और इस कमाई का इस्तेमाल उद्योगों से प्रदूषण कम करने के लिए करेगा. यूरोपीय संघ (ईयू ) इसे CBAM के आर्टिकल 9 के तहत मान्यता दे सकता है - लेकिन यह मान्यता इस शर्त पर होनी चाहिए कि पैसा इसी काम में लगे, और साथ ही ईयू  भी इसमें बराबर का पैसा मिलाए ताकि दोनों मिलकर इसके लक्ष्यों को संभाल सकें. 2027-28 के अनुमानों के मुताबिक, इस फंड से भारतीय उद्योगों में प्रदूषण कम करने के लिए लगभग 1 अरब यूरो मिल सकते हैं: 50 करोड़ यूरो एक्सपोर्ट टैक्स की कमाई से और 50 करोड़ यूरो यूरोप के क्लाइमेट फंड से. यह फंड 'ग्रीन स्टील' (बिना प्रदूषण वाले स्टील) के खर्चों, प्रदूषण की निगरानी और जांच (MRV) का ढांचा बनाने, छोटे उद्योगों (SMEs) को तकनीकी मदद देने और मिलकर नई टेक्नोलॉजी पर काम करने में मदद करेगा. शुरुआती दो साल का ट्रायल प्रोजेक्ट, और फिर 2029-30 के लिए दोबारा समीक्षा करने की शर्त से दोनों पक्षों को नतीजों को परखने और भरोसा बनाने का मौका मिलेगा. ईयू  आमतौर पर नियम बनाता है और फिर अपने देश के छोटे उद्योगों को ढलने के लिए थोड़ा ज़्यादा समय और आसान शर्तें देता है. भारत और यूरोप को मिलकर यही तरीका अपनाना चाहिए - विकासशील देशों के छोटे उद्योगों के लिए एक 'नियमों की सीढ़ी'  बनानी चाहिए, जो CBAM के लक्ष्यों तक पहुँचने का एक आसान और चरणबद्ध (स्टेप-बाय-स्टेप) रास्ता दे.

अनुमान है कि भारत का स्टील उत्पादन 2030 तक दोगुना और 2047 तक चार गुना हो जाएगा, और तब यह दुनिया के कुल उत्पादन का लगभग पांचवां हिस्सा होगा. दुनिया के टॉप दस स्टील उत्पादकों में भारत का प्रदूषण स्तर सबसे ज़्यादा भारत के उद्योगों को प्रदूषण मुक्त किए बिना वैश्विक पर्यावरण का कोई भी रास्ता सही साबित नहीं हो सकता.

दूसरा प्रस्ताव विकासशील देशों के छोटे उद्योगों के लिए नियमों को आसान बनाने के वास्ते एक 'ईयू -India वर्किंग ग्रुप' (कार्य समूह) बनाने का है. भारत की बड़ी कंपनियां CBAM के साथ काम करने में दुनिया की किसी भी कंपनी जितनी ही सक्षम हैं. लेकिन भारत का 40 प्रतिशत  स्टील उत्पादन छोटे उद्योगों में होता है. भारत और यूरोप को मिलकर यही तरीका अपनाना चाहिए - विकासशील देशों के छोटे उद्योगों के लिए एक 'नियमों की सीढ़ी' बनानी चाहिए जो CBAM के साफ़ लक्ष्यों तक पहुँचने का एक व्यावहारिक रास्ता दे. इसके लिए एक कम लागत वाला, आसान डिजिटल प्लेटफॉर्म (जो पूरी दुनिया के काम आ सके) बनाया जा सकता है, जो पर्यावरण और सुरक्षा के सभी नियमों के लिए एक ही जगह समाधान दे.

अगर इन दोनों प्रस्तावों को मिला दिया जाए, तो ये CBAM से जुड़े कूटनीतिक और आर्थिक दोनों तरह के तनावों को दूर कर सकते हैं. इससे दोनों देशों के आपसी एजेंडे पर राजनीतिक दबाव कम होगा, जिसमें पर्यावरण, व्यापार, निवेश और रणनीतिक साझेदारी जैसे बड़े मुद्दे शामिल हैं. ये प्रस्ताव अधिकारियों को मिलकर काम करने का मौका देंगे, ताकि वे CBAM की जांच-परख से जुड़ी तकनीकी समस्याओं को सुलझा सकें और इसे भारत की अपनी 'कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम' के साथ जोड़ सकें.

दुनिया के टॉप दस स्टील उत्पादकों में भारत का प्रदूषण स्तर फिलहाल सबसे ज़्यादा है. दुनिया भर में स्टील उत्पादन की क्षमता का सबसे ज़्यादा विस्तार भारत में ही हो रहा है. भारत के उद्योगों से प्रदूषण (कार्बन) कम किए बिना दुनिया का कोई भी पर्यावरण मॉडल सफल नहीं हो सकता. अनुमान है कि भारत का स्टील उत्पादन 2030 तक दोगुना और 2047 तक चार गुना हो जाएगा, और तब यह दुनिया के कुल उत्पादन का लगभग पांचवां हिस्सा होगा. दुनिया के टॉप दस स्टील उत्पादकों में भारत का प्रदूषण स्तर सबसे ज़्यादा भारत के उद्योगों को प्रदूषण मुक्त किए बिना वैश्विक पर्यावरण का कोई भी रास्ता सही साबित नहीं हो सकता. बराबरी के व्यवहार का मतलब है कि CBAM का जो भी समाधान निकलेगा, वह नियम के तौर पर ईयू  के सभी व्यापारिक देशों पर लागू होगा. थोपने के बजाय साझेदारी पर टिकी भारत और ईयू  की एक अच्छी तरह से तैयार की गई डील, विकसित और विकासशील देशों के बीच पर्यावरण सहयोग के लिए अब तक का सबसे बेहतरीन उदाहरण बन सकती है.


जेसी स्कॉट ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो हैं और 2019 से बर्लिन के हर्टी स्कूल में एडजंक्ट फैकल्टी भी हैं.

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