Author : Harsh V. Pant

Originally Published NDTV Published on May 25, 2026 Commentaries 8 Days ago

नई दिल्ली में हुई 2026 की ब्रिक्स बैठक ने दिखा दिया कि संगठन जितना बड़ा हो रहा है, उसके अंदर के मतभेद भी उतने ही बढ़ रहे हैं. ईरान-यूएई विवाद और साझा बयान पर असहमति ने साफ कर दिया कि ब्रिक्स के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती खुद एकजुट रहना है. 

ब्रिक्स 2026: सहयोग बनाम टकराव

Image Source: X @DrSJaishankar

नई दिल्ली में हुई 2026 की ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक से यह साफ हो गया कि जब दुनिया में तनाव बढ़ता है, तो इस संगठन के बड़े रूप (नए सदस्यों के जुड़ने) के कारण इसके अंदरूनी मतभेद भी खुलकर सामने आ जाते हैं. इस बैठक का मुख्य विषय था: ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण’. इसका मकसद सितंबर 2026 में होने वाले बड़े ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की तैयारी करना था. लेकिन, अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव की वजह से इस बैठक का पूरा रुख बदल गया और संगठन के अंदर की आपसी दरारें सबके सामने आ गईं.

इन मतभेदों का सबसे बड़ा सबूत यह था कि ब्रिक्स के विदेश मंत्री एक साझा बयान पर सहमत नहीं हो पाए. इसकी जगह केवल एक 'चेयरमैन का बयान' जारी किया गया, जिसमें विकास से जुड़े सामान्य मुद्दों पर तो सहमति थी, लेकिन मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) के संकट और विवादों को समझदारी से किनारे कर दिया गया. एक साझा बयान का न होना कोई मामूली बात नहीं थी; इससे यह साफ पता चलता है कि सुरक्षा, संप्रभुता और पश्चिमी देशों के साथ रिश्तों को लेकर ब्रिक्स देशों की सोच कितनी अलग-अलग है.

ईरान और यूएई का आमना-सामना

बैठक में समुद्री व्यापार और ऊर्जा (Energy) रूटों-खासकर हॉर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा पर बहुत जोर दिया गया. इससे यह साफ दिखा कि क्षेत्र में बढ़ते तनाव से उन देशों में काफी घबराहट है जिनके आर्थिक हित इससे जुड़े हैं.

यह संगठन खुद को 'ग्लोबल साउथ' की आवाज के रूप में पेश करना चाहता है, लेकिन इसके कई सदस्य असल में आपस में ही क्षेत्रीय प्रतिद्वंदी हैं. उनके खतरे को देखने का नजरिया अलग है और उनकी भू-राजनीतिक प्राथमिकताएं आपस में मेल नहीं खातीं. 

इस विवाद के केंद्र में ईरान और यूएई थे, जिनकी अलग-अलग रणनीतियों ने ब्रिक्स की एकता की सीमाओं को उजागर कर दिया-ईरान इस मंच का इस्तेमाल अमेरिका और इजरायल के खिलाफ राजनीतिक समर्थन जुटाने के लिए करना चाहता था. उसने इस लड़ाई को एक ब्रिक्स सदस्य की संप्रभुता पर हमला बताया और इसे गैर-पश्चिमी देशों के खिलाफ एक बड़ी साजिश के रूप में पेश किया. ईरान चाहता था कि ब्रिक्स देश खुलकर इस ‘अवैध हमले’ की निंदा करें और ब्रिक्स को पश्चिमी देशों के दबाव के खिलाफ एक मजबूत ढाल की तरह पेश किया जाए. 

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने बातचीत के दौरान काफी कड़ा रुख अपनाया. उन्होंने ईरान को ‘अवैध विस्तारवाद और युद्ध भड़काने की नीति का शिकार’ बताया. उन्होंने ब्रिक्स देशों से अपील की कि वे ‘पश्चिमी दबदबे और अमेरिका की मनमानी’ के खिलाफ खड़े हों. अराघची ने कहा: ईरान ब्रिक्स के सदस्य देशों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मांग करता है कि वे अमेरिका और इजरायल द्वारा अंतरराष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन की खुलकर निंदा करें. उनके इस बयान से साफ था कि तेहरान (ईरान) ब्रिक्स का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करना चाहता था.

ईरान और यूएई के इस मतभेद ने ब्रिक्स के विस्तार के अंदर की एक गहरी और बुनियादी कमी को सामने ला दिया है. यह संगठन खुद को 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील और गरीब देशों) की आवाज के रूप में पेश करना चाहता है, लेकिन इसके कई सदस्य असल में आपस में ही क्षेत्रीय प्रतिद्वंदी हैं. उनके खतरे को देखने का नजरिया अलग है और उनकी भू-राजनीतिक प्राथमिकताएं आपस में मेल नहीं खातीं. एक ही मंच पर मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) के इन विरोधी देशों को शामिल करने से उनके मतभेद कम होने के बजाय और ज्यादा बढ़ गए हैं.  ईरान ब्रिक्स को एक रणनीतिक और राजनयिक ढाल की तरह देखता है, जिसका इस्तेमाल वह पश्चिमी देशों के दबाव का विरोध करने और अपनी बात को सही ठहराने के लिए कर सके. इसके विपरीत, यूएई खुद को दुनिया से जुड़े एक बिजनेस और फाइनेंशियल हब (व्यापारिक केंद्र) के रूप में देखता है. उसका काम तभी चल सकता है जब पश्चिमी देशों और क्षेत्र के अन्य देशों, दोनों के साथ उसके संबंध स्थिर और अच्छे रहें. ये दोनों अलग-अलग सोच दिखाते हैं कि खुद ब्रिक्स के अंदर ही अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को लेकर दो बिल्कुल अलग नजरिए हैं.

इस बैठक से यह भी पता चला कि ब्रिक्स अब केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रह गया है, बल्कि यह धीरे-धीरे राजनीतिक अखाड़ा बनता जा रहा है जहाँ आपसी टकराव ज्यादा हैं. पहले जब ब्रिक्स छोटा था, तब सभी सदस्य वैश्विक वित्तीय संस्थानों (जैसे IMF, World Bank) में सुधार करने और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की आवाज बुलंद करने के मुद्दे पर एकमत थे. लेकिन अब बड़े ब्रिक्स में ऐसे देश शामिल हो गए हैं जिनकी आपस में दुश्मनी है, जिनके प्रभाव क्षेत्र एक-दूसरे से टकराते हैं, और जिनकी विदेश नीतियां एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं.

इस बैठक को पश्चिमी देशों के खिलाफ एक साझा मंच बनाने की ईरान की कोशिश पूरी तरह सफल नहीं हो सकी, उसे केवल आंशिक (थोड़ी सी) सफलता मिली. हालांकि ब्रिक्स के सदस्यों ने क्षेत्र में बढ़ते तनाव पर चिंता जताई और बातचीत से मामला सुलझाने का समर्थन किया, लेकिन कई देशों ने ऐसी भाषा या बयान का विरोध किया जिससे यह लगे कि वे ईरान के लड़ाकू या आक्रामक रुख का समर्थन कर रहे हैं.

अलग-अलग क्षेत्रीय एजेंडा रखने वाले देशों को शामिल करने से दुनिया के सामने संगठन की साख भले ही बढ़ जाए, लेकिन बड़े अंतरराष्ट्रीय संकटों के समय किसी एक फैसले पर सबकी सहमति बनाना अब और भी मुश्किल हो गया है. जैसे-जैसे ब्रिक्स अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं बढ़ाएगा, ऐसे मतभेद और बार-बार सामने आएंगे और उन्हें संभालना उतना ही मुश्किल होता जाएगा.

यह हिचकिचाहट न केवल खाड़ी देशों की संवेदनशीलता को दिखाती है, बल्कि यह भी साफ करती है कि ब्रिक्स के कई सदस्य इस संगठन को पूरी तरह से एक 'पश्चिम-विरोधी' गठबंधन में बदलने के पक्ष में नहीं हैं.

ब्रिक्स विस्तार का विरोधाभास  

इस पूरे घटनाक्रम ने ब्रिक्स के विस्तार के विरोधाभास को खुलकर सामने रख दिया है: नए देशों के जुड़ने से दुनिया में ब्रिक्स का कद, उसकी पहचान और उसकी आबादी का वजन तो बढ़ गया है, लेकिन इसके साथ ही संगठन की अंदरूनी एकता कमजोर हो गई है. अलग-अलग क्षेत्रीय एजेंडा रखने वाले देशों को शामिल करने से दुनिया के सामने संगठन की साख भले ही बढ़ जाए, लेकिन बड़े अंतरराष्ट्रीय संकटों के समय किसी एक फैसले पर सबकी सहमति बनाना अब और भी मुश्किल हो गया है. जैसे-जैसे ब्रिक्स अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं बढ़ाएगा, ऐसे मतभेद और बार-बार सामने आएंगे और उन्हें संभालना उतना ही मुश्किल होता जाएगा.


यह लेख मूल रूप से एनडीटीवी में प्रकाशित हो चुका है. 
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Harsh V. Pant

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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...

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