Published on May 22, 2026 Commentaries 3 Days ago

भारत–अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन 11 साल बाद फिर से वैश्विक अनिश्चितता के बीच हो रहा है जहां दोनों पक्ष व्यापार, डिजिटल तकनीक, शिक्षा और रक्षा सहयोग को नई मजबूती देने की कोशिश कर रहे हैं. यह साझेदारी सिर्फ सरकारों तक सीमित न रहकर अब अफ्रीका के विकास, रोजगार और डिजिटल बदलाव को गति देने का बड़ा अवसर बन सकती है. जानिए कि कैसे यह सहयोग वैश्विक दक्षिण की नई ताकत बन सकता है.

11 साल बाद फिर से भारत–अफ्रीका संवाद की शुरुआत

Image Source: File Photo

11 वर्षों के बाद भारत–अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन फिर आयोजित हो रहा है. यह ऐसे समय में हो रहा है जब दुनिया युद्ध, आर्थिक अस्थिरता और बढ़ते संरक्षणवाद जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है. पिछले कुछ वर्षों में भारत और अफ्रीका के बीच व्यापार बढ़कर लगभग 100 अरब डॉलर तक पहुंच गया है. भारत ने अफ्रीका में अपने नए दूतावास खोले हैं और रक्षा, शिक्षा तथा विकास सहयोग को भी मजबूत किया है. तंजानिया में IIT और युगांडा में NFSU परिसर इसकी बड़ी मिसाल हैं.

इसके बावजूद दोनों पक्षों के संबंध अभी भी अधिकतर सरकारी स्तर तक सीमित हैं. निजी क्षेत्र और लोगों के बीच सहयोग को और बढ़ाने की जरूरत है. भारत अफ्रीका को डिजिटल सार्वजनिक ढांचा, यूपीआई जैसी तकनीक, MSME अनुभव और कौशल विकास में मदद कर सकता है. साथ ही रक्षा सहयोग, व्यापार, AfCFTA और शिक्षा के क्षेत्र में साझेदारी बढ़ाकर भारत और अफ्रीका एक मजबूत और बराबरी पर आधारित संबंध बना सकते हैं.

भारत-अफ्रीका संबंध  

इसके साथ ही भारत ने अफ्रीका में अपने कूटनीतिक विस्तार को मजबूत करते हुए कई नए मिशन खोले हैं. वर्तमान में भारत के मिशन 45 से अधिक अफ्रीकी देशों को कवर करते हैं. यह उपस्थिति न केवल राजनीतिक संबंधों को मजबूत करती है, बल्कि लोगों के बीच संपर्क और विकास सहयोग को भी बढ़ावा देती है. विशेष रूप से भारत ने मॉरीशस, सेशेल्स और मोज़ाम्बिक जैसे मित्र अफ्रीकी देशों को रक्षा उपकरणों का निर्यात शुरू किया है और कई अन्य देशों के साथ भी चर्चा चल रही है.

पिछले कुछ वर्षों में भारत और अफ्रीका के बीच व्यापार बढ़कर लगभग 100 अरब डॉलर तक पहुंच गया है. भारत ने अफ्रीका में अपने नए दूतावास खोले हैं और रक्षा, शिक्षा तथा विकास सहयोग को भी मजबूत किया है. तंजानिया में IIT और युगांडा में NFSU परिसर इसकी बड़ी मिसाल हैं.

भारत ने संस्थागत और शैक्षिक सहयोग के माध्यम से अफ्रीका के साथ अपनी ज्ञान कूटनीति को भी गहरा किया है. कई प्रतिष्ठित भारतीय संस्थानों ने अफ्रीका में अपनी उपस्थिति स्थापित की है, जो मानव संसाधन विकास में लंबे समय के लिए निवेश को दर्शाता है. तंजानिया में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) परिसर और युगांडा में नेशनल फॉरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी (NFSU) परिसर की स्थापना इसके प्रमुख उदाहरण हैं. अब केवल लोगों को सिखाने पर ही नहीं, बल्कि उनके साथ मिलकर नई चीज़ें सीखने और ज्ञान बनाने पर ध्यान दिया जा रहा है.

आज दुनिया में यूक्रेन युद्ध, ईरान के तनाव और व्यापारिक पाबंदियों जैसी वजहों से काफी अनिश्चितता और दूरियां बढ़ गई हैं. ऐसे मुश्किल समय में भी भारत और अफ्रीका के बीच रिश्ते ज्यादातर केवल सरकारों तक ही सीमित हैं. इनमें प्राइवेट कंपनियों और आम जनता की भागीदारी बहुत कम है. इसी वजह से यह रिश्ता अपनी असली ताकत और एक मजबूत साझेदारी तक नहीं पहुंच पाया है. इसलिए, आने वाला शिखर सम्मेलन सिर्फ पुरानी सफलताओं का जश्न मनाने के लिए नहीं, बल्कि इन बुनियादी कमियों को सुधारकर रिश्ते को सचमुच मजबूत बनाने का एक बड़ा मौका है

आज दुनिया में यूक्रेन युद्ध, ईरान के तनाव और व्यापारिक पाबंदियों के कारण काफी अनिश्चितता है. इन सब का सीधा असर भारत और अफ्रीका दोनों पर पड़ रहा है, खासकर ऊर्जा (तेल-गैस), सामान की सप्लाई और व्यापार के मामले में. इन हालात को देखते हुए, भारत को अफ्रीका के साथ अपनी नीति में बदलाव करना होगा. अब हमें सिर्फ पुराने सिद्धांतों और आदर्शों के बजाय, आज की व्यावहारिक ज़रूरतों पर काम करना चाहिए. इसका मतलब अपनी पुरानी दोस्ती को छोड़ना नहीं है, बल्कि उसे आज के समय के हिसाब से नया रूप देना है. इस रिश्ते को आधुनिक और मजबूत बनाने के लिए अब चार मुख्य बातों पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी है

भारत, अफ़्रीका में डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (जैसे इंटरनेट और डिजिटल सेवाएं) को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा सकता है. भारत के पास बड़े स्तर पर डिजिटल सिस्टम बनाने का अच्छा अनुभव है. अगर अफ़्रीका अपनी ज़रूरतों के हिसाब से भारत की आधार जैसी पहचान प्रणाली और यूपीआई जैसी ऑनलाइन पेमेंट व्यवस्था को अपनाता है, तो वहां के समाज में बड़ा बदलाव आ सकता है. इससे वहां शासन और सरकारी सेवाएं बेहतर होंगी, साथ ही नए बिज़नेस और इनोवेशन को बढ़ावा मिलेगा. इसके अलावा, अफ़्रीका की युवा आबादी के लिए रोज़गार पैदा करने में भारत के छोटे और लघु  उद्योगों का अनुभव काफी मददगार साबित हो सकता है.

अगर हम अपनी पुरानी सफलताओं को ध्यान में रखकर एक सही लक्ष्य चुनें, सबको साथ लेकर चलें और भविष्य की सोच के साथ आगे बढ़ें, तो यह शिखर सम्मेलन पिछले 10 सालों की कमियों को काफी हद तक दूर कर सकता है.

अफ़्रीका व्यापार को आसान बनाने के लिए आर्थिक रूप से एकजुट हो रहा है. इसलिए भारत को अपनी व्यापार और निवेश नीतियों को AfCFTA के नियमों के अनुसार ढालना होगा. इसके तहत भारत को अफ़्रीकी बाज़ारों तक पहुंच आसान बनाने, नियमों को आपस में मिलाने और वहां के क्षेत्रीय उद्योगों में निवेश करने की ज़रूरत है. भारत को आगे बढ़कर अपने विकास के अनुभवों को साझा करना चाहिए ताकि एक मजबूत और एकजुट अफ़्रीकी बाज़ार बनाने में मदद मिल सके. 

भारत–अफ्रीका सहयोग को बढ़ाने वाली पहल 

अब तक अफ़्रीका की मदद करने और उनके अंदरूनी मामलों में दखल न देने की भारत की नीति सफल रही है. भारत को पुरानी महाशक्तियों के दबदबे वाले सुरक्षा मॉडल को छोड़कर 'दक्षिण-दक्षिण सहयोग' यानी विकासशील देशों की आपसी एकता पर ध्यान देना चाहिए. इसके लिए भारत को अफ़्रीकी देशों के साथ रक्षा बातचीत, साझा सैन्य अभ्यास और सैन्य तकनीक शेयर करने को बढ़ावा देना चाहिए. भारत-अफ़्रीका संबंधों को बेहतर दिशा देने के लिए पुराने तौर-तरीकों को बदलने की ज़रूरत है. 'गुटनिरपेक्ष आंदोलन' जैसी पुरानी संस्थाएं एक मजबूत आधार तो दे सकती हैं, लेकिन आज की ज़रूरतों के लिए नए संगठनों की आवश्यकता है. इन नए संगठनों का मुख्य लक्ष्य रणनीतिक आज़ादी, न्यायपूर्ण विकास और दुनिया में मिलकर मजबूत बनना होना चाहिए.

इसके अलावा, दोनों देशों के लोगों के बीच आपसी संबंध बढ़ाने के लिए बातचीत, रिसर्च और शिक्षा के क्षेत्र में मिलकर काम करना होगा. ऐसा करने से यह साझेदारी सिर्फ समय-समय पर होने वाले बड़े सम्मेलनों तक ही सीमित नहीं रहेगी, बल्कि हमेशा मजबूत बनी रहेगी.

हालाँकि भारत–अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन की वापसी में पहले जैसी भव्यता शायद न दिखे, लेकिन इसके महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता. यह ऐसे समय में हो रहा है जब भारत और अफ्रीका दोनों जटिल वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय मामलों में अधिक प्रभावशाली भूमिका की तलाश कर रहे हैं. अगर हम अपनी पुरानी सफलताओं को ध्यान में रखकर एक सही लक्ष्य चुनें, सबको साथ लेकर चलें और भविष्य की सोच के साथ आगे बढ़ें, तो यह शिखर सम्मेलन पिछले 10 सालों की कमियों को काफी हद तक दूर कर सकता है.


यह लेख मूल रूप से हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित हुआ था. 
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Author

Samir Bhattacharya

Samir Bhattacharya

Dr. Samir Bhattacharya is an Associate Fellow at Observer Research Foundation (ORF), where he works on geopolitics with particular reference to Africa in the changing ...

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