BRICS सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था नए समीकरणों की ओर बढ़ रही है, भारत खुद को एक स्वतंत्र और संतुलनकारी शक्ति के रूप में पेश करना चाहता है, जबकि चीन और रूस वैश्विक शासन व्यवस्था में बदलाव की मांग को प्रमुखता देने की कोशिश करेंगे.
भारत साल के अंत में BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है.इसमें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी शामिल हो सकते हैं, जबकि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पहले ही आने की सहमति दे दी है. यह समिट ऐसे समय में हो रही है, जब दुनियाभर में उठापटक चल रही है. वैश्विक राजनीति नाजुक दौर से गुजर रही है और मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बिखर रही है.चीन-अमेरिका के बीच तनातनी भी पहले से ज्यादा मुखर है.
नए अलायंस का दौर: रूस के पश्चिमी देशों से सीधे टकराव के चलते नए राजनीतिक और आर्थिक गठबंधन बन रहे हैं. अब विकासशील या पिछड़े (ग्लोबल साउथ) देश उन वैश्विक संस्थाओं में असरदार भागीदारी चाहते हैं, जिन पर लंबे समय से पश्चिमी देशों का प्रभुत्व रहा है. इन हालात में भारत की भूमिका बेहद अहम होने जा रही है.
बड़ी ताकतों से रिश्ते: भारत इस सम्मेलन के जरिए खुद को स्वतंत्र और संतुलित वैश्विक शक्ति के रूप में पेश कर सकता है. भारत दिखा सकता है कि वह किसी गुट का हिस्सा नहीं है बल्कि अपने हितों के अनुसार दूसरे देशों के साथ संबंध रखता है. भारत की खासियत यह है कि उसके रिश्ते लगभग सभी प्रमुख शक्तियों से हैं.अमेरिका के साथ उसके संबंध मजबूत हो रहे हैं. रूस आज भी भारत की विदेश नीति में अहम भूमिका निभा रहा है.
यह समिट ऐसे समय में हो रही है, जब दुनियाभर में उठापटक चल रही है. वैश्विक राजनीति नाजुक दौर से गुजर रही है और मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बिखर रही है.चीन-अमेरिका के बीच तनातनी भी पहले से ज्यादा मुखर है.
रूस-चीन करीब: रूस से पारंपरिक रिश्ते कायम हैं और चीन से तनाव के बावजूद संवाद बनाए रखने की कोशिश जारी है. इसलिए, चिनफिंग और पुतिन की एक साथ मेजबानी भारत की बढ़ती हुई कूटनीतिक ताकत की ओर इशारा करती है. हालांकि, रूस-चीन की बढ़ती करीबी भारत के लिए चिंता का विषय है. अगर रूस कमजोर होकर चीन पर निर्भर हो गया तो यूरेशिया (यूरोप-एशिया) में भारत के रणनीतिक विकल्प सीमित हो सकते हैं.
चीन से संबंध सुधरे: 2020 में गलवान में हुई हिंसक झड़प के बाद भारत-चीन के रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं. वैसे, भारत जानता है कि चीन से संघर्ष कभी-कभार की बात नहीं बल्कि स्थायी स्थिति है. बावजूद इसके दोनों देश समझते हैं कि दो परमाणु शक्तियों के बीच टकराव खतरनाक हो सकता है. इधर दोनों देशों की ओर से संबंधों में बेहतरी की कोशिश हुई है. सम्मेलन में मोदी और शी की मुलाकात में सीमा प्रबंधन, कनेक्टिविटी या सीमित आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दों पर बातचीत हो सकती है. हालांकि बड़े बदलाव की उम्मीद बेमानी है क्योंकि झगड़े की असल जड़ (सीमा विवाद) बनी हुई है. चीन आज भी पाकिस्तान का करीबी है और हिंद महासागर में पांव पसारने के मौके भी वह नहीं छोड़ता.
बदलते लक्ष्य: BRICS उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के बीच आर्थिक सहयोग के लिए बना था, लेकिन अब धीरे-धीरे राजनीतिक रूप लेता जा रहा है. सऊदी अरब, ईरान, इजिप्ट, इथियोपिया और UAE जैसे देश इसमें शामिल हुए हैं. यानी, इन देशों में मौजूदा वैश्विक व्यवस्था से असंतोष बढ़ रहा है. लेकिन, BRICS को पश्चिम-विरोधी संगठन कहना, जल्दबाजी होगी. क्योंकि, इन देशों के हित, राजनीतिक व्यवस्था, महत्वाकांक्षाएं भी अलग-अलग हैं. भारत भी नहीं चाहता कि BRICS को पश्चिमी देशों के खिलाफ मंच बनाया जाए, जैसा कि चीन और रूस की कोशिश रही है. वह BRICS का इस्तेमाल वैश्विक व्यवस्था में सुधार के लिए करने के हक में है, न कि एक वर्चस्ववादी व्यवस्था को हटाकर दूसरी ऐसी ही व्यवस्था बनाने के लिए.
इस अनिश्चितता के दौर में वैश्विक मंच पर भारत की अहमियत बढ़ रही है क्योंकि वह एक साथ कई बड़े देशों और समूहों के साथ संबंध बनाए रखने में सक्षम है. ऐसे में जिनपिंग और पुतिन का भारत आना किसी एक गुट की जीत नहीं बल्कि इससे पता चलता है कि दुनिया आज ज्यादा बंटी हुई है और इसमें शक्ति के ध्रुव कई हैं.
भारत का एजेंडा: भारत चाहेगा कि सम्मेलन में विकास, वित्त, तकनीक के आदान-प्रदान को लेकर बातचीत और फैसले हों. वहीं, चीन और रूस डॉलर पर निर्भरता कम करने और पश्चिमी देशों के प्रभुत्व को चुनौती देने वाले मुद्दों को उठाना चाहेंगे. ऐसे में भारत के लिए सम्मेलन में सर्वसम्मति बनाना आसान नहीं होगा.
नजर भविष्य पर: सम्मेलन से बदलती हुई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की तस्वीर स्पष्ट होगी. अमेरिका जैसे पश्चिमी देशों का दुनिया पर प्रभाव घट रहा है, लेकिन फिलहाल कोई नया शक्तिशाली वैश्विक ढांचा भी पूरी तरह बना नहीं है. इस अनिश्चितता के दौर में वैश्विक मंच पर भारत की अहमियत बढ़ रही है क्योंकि वह एक साथ कई बड़े देशों और समूहों के साथ संबंध बनाए रखने में सक्षम है. ऐसे में जिनपिंग और पुतिन का भारत आना किसी एक गुट की जीत नहीं बल्कि इससे पता चलता है कि दुनिया आज ज्यादा बंटी हुई है और इसमें शक्ति के ध्रुव कई हैं.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...
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