एआई का भविष्य सिर्फ बड़े शहरों के डेटा सेंटर में नहीं, बल्कि गांवों, ट्रेनों, अस्पतालों और लोगों के हाथों में मौजूद छोटे-छोटे स्मार्ट डिवाइसों में भी तय होगा. यही वजह है कि “एज एआई” भारत के डिजिटल भविष्य की नई ताकत बनकर उभर रहा है. समझिए, क्यों यह तकनीक देश के लिए बेहद अहम मानी जा रही है.
भारत एआई के लिए चिप और तेज कंप्यूटर बना रहा है, लेकिन सिर्फ तकनीक बढ़ाना काफी नहीं है. जरूरी यह है कि एआई का इस्तेमाल बड़े स्तर पर लोगों तक सही तरीके से पहुंचे. भारत में लगभग 1.8 लाख एआई स्टार्टअप हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश अभी भी पायलट चरण में ही सीमित हैं और केवल कुछ विशेष क्षेत्रों के उदाहरण ही सफलतापूर्वक बड़े स्तर पर लागू हो पाए हैं.
एज एआई , एज एआई दूर-दराज इलाकों तक स्मार्ट तकनीक पहुंचा सकता है. यह कमजोर इंटरनेट में भी काम करता है, तेजी से फैसले लेने में मदद करता है और डेटा को क्लाउड पर भेजने के बजाय वहीं तुरंत प्रोसेस कर देता है. इसके अलावा, एज डिवाइसों को क्लाउड-आधारित भारी एआई प्रणालियों की तुलना में अधिक टिकाऊ विकल्प माना जा रहा है. इसका कारण यह है कि एआई कार्य सीधे डिवाइस पर ही संसाधित होते हैं, जिससे लगातार डेटा ट्रांसफर की आवश्यकता कम हो जाती है और एज-विशिष्ट चिप्स की ऊर्जा दक्षता बेहतर होती है.
हालांकि, ये स्थिरता संबंधी लाभ स्वतः नहीं मिलते. एज प्रणालियों को बड़े पैमाने पर ऊर्जा दक्षता, हार्डवेयर घनत्व और संसाधन प्रबंधन जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है. इससे यह स्पष्ट होता है कि इनके पर्यावरणीय लाभ सुनिश्चित करने के लिए सावधानीपूर्वक सिस्टम डिजाइन आवश्यक है. एज एआई का एक और महत्वपूर्ण लाभ नेटवर्क विलंबता को कम करना है. उच्च जोखिम वाली प्रणालियों में यही विलंबता सुरक्षा की सीमा बन जाती है. उदाहरण के लिए, भारत की ‘कवच‘ प्रणाली, जो हजारों किलोमीटर लंबे रेलवे ट्रैक पर तैनात है, ऑन-बोर्ड सेंसर और एज कंप्यूटिंग का उपयोग करती है ताकि सिग्नल पार करने से जुड़ी दुर्घटनाओं को रोका जा सके.
एज एआई दूर-दराज इलाकों तक स्मार्ट तकनीक पहुंचा सकता है. यह कमजोर इंटरनेट में भी काम करता है, तेजी से फैसले लेने में मदद करता है और डेटा को क्लाउड पर भेजने के बजाय वहीं तुरंत प्रोसेस कर देता है. इसके अलावा, एज डिवाइसों को क्लाउड-आधारित भारी एआई प्रणालियों की तुलना में अधिक टिकाऊ विकल्प माना जा रहा है.
स्वास्थ्य क्षेत्र में, निरामई की ‘थर्मलाइटिक्स’ जैसी तकनीकें दिखाती हैं कि एज-आधारित एआई कैसे मरीजों के करीब जांच सुविधाएं पहुंचा सकता है. यह तकनीक कम सुविधाओं वाले क्षेत्रों में भी तुरंत जांच करने में मदद करती है. डेटा और इमेज वहीं प्रोसेस हो जाते हैं, इसलिए बड़े अस्पतालों पर निर्भरता कम होती है. इसमें रेडिएशन या शारीरिक संपर्क की जरूरत नहीं पड़ती और कुछ मिनटों में रिपोर्ट मिल जाती है, जो ग्रामीण इलाकों के लिए बहुत उपयोगी है.
ये उदाहरण दर्शाते हैं कि महत्वपूर्ण प्रणालियों में बुद्धिमत्ता को वहीं मौजूद होना चाहिए जहां निर्णय लिए जाते हैं. इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि ये भारत के डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम में उल्लेखित गोपनीयता और डेटा संप्रभुता के महत्व को रेखांकित करते हैं. साथ ही, वितरित बुद्धिमत्ता अगली पीढ़ी की प्रणालियों का केंद्रीय आधार बनती जा रही है. भारत अपनी डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) क्षमता के आधार पर एक हाइब्रिड एज–क्लाउड इकोसिस्टम विकसित करने की अच्छी स्थिति में है. इससे कम लागत और अधिक लचीलापन बनाए रखते हुए बड़े पैमाने पर रियल-टाइम सेवाएं प्रदान की जा सकती हैं.
भारत में एज एआई की तैनाती को कई असामान्य चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. इनमें पर्यावरणीय, व्यवहारिक और उपयोगिता से जुड़ी बाधाएं शामिल हैं, जो सीधे इसके प्रदर्शन और स्वीकार्यता को प्रभावित करती हैं. 40°C से अधिक तापमान बिना कूलिंग वाले उपकरणों में थर्मल थ्रॉटलिंग और हार्डवेयर क्षति का कारण बन सकता है. वहीं, भारी मानसूनी परिस्थितियां सेंसरों को नुकसान पहुंचा सकती हैं या उन्हें अपनी जगह से हटा सकती हैं.
हत्वपूर्ण बात यह है कि ये भारत के डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन अधिनियम में उल्लेखित गोपनीयता और डेटा संप्रभुता के महत्व को रेखांकित करते हैं. साथ ही, वितरित बुद्धिमत्ता अगली पीढ़ी की प्रणालियों का केंद्रीय आधार बनती जा रही है.
तकनीकी चुनौतियों के अलावा, भरोसे की कमी और कम डिजिटल साक्षरता-विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में-एज एआई के उपयोग को सीमित करती है. खराब यूआई/यूएक्स डिजाइन और पहले के नकारात्मक अनुभवों के कारण लोग स्वचालित प्रणालियों पर आसानी से भरोसा नहीं करते. इसके साथ ही एआई प्रणालियों में पारदर्शिता और व्याख्यात्मकता की कमी भी समस्या है, क्योंकि उपयोगकर्ता अक्सर एआई के परिणामों को आसानी से समझ नहीं पाते. जवाबदेही और कानूनी जिम्मेदारी से जुड़े अस्पष्ट ढांचे इस अविश्वास को और बढ़ाते हैं. ये सभी कारक एज एआई को लागू करना जटिल बना देते हैं.
दूर-दराज जगहों पर लगे एआई उपकरणों को संभालना और सुरक्षित रखना मुश्किल होता है, इसलिए वे चोरी या नुकसान के ज्यादा खतरे में रहते हैं. भारत में मजबूत एज एमएलऑप्स क्षमताएं-जैसे भरोसेमंद ओवर-द-एयर (OTA) अपडेट और मल्टीमॉडल डेटा की रिमोट मॉनिटरिंग-अभी पर्याप्त विकसित नहीं हैं. इससे विशाल क्षेत्रों में फैली प्रणालियों के प्रदर्शन को बनाए रखना और उन्हें सुरक्षित रखना कठिन हो जाता है. यह चुनौती विदेशी मॉडलों में मौजूद पूर्वाग्रहों और सीमित डेटा प्रकारों पर अत्यधिक निर्भरता से और बढ़ जाती है. आज एज एआई अक्सर अधूरे डेटा पर काम करता है, जिससे गलत नतीजे आ सकते हैं. कुछ समूहों का डेटा कम होने से भेदभाव बढ़ सकता है, इसलिए बेहतर और सही डेटा प्रबंधन जरूरी है.
भारत में वर्तमान डेटा सेंटर व्यवस्था मुख्य रूप से मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई और विशाखापत्तनम जैसे महानगरों में केंद्रित है. इसका कारण समुद्री केबल नेटवर्क, औद्योगिक केंद्रों और विकसित डिजिटल ढांचे के निकट होना है. भारत में फिलहाल 10 से भी कम माइक्रो डेटा सेंटर (MDCs) हैं, हालांकि बीएसएनएल के स्थानीय एमडीसी और ओपन क्लाउड कंप्यूट (OCC) जैसी पहलें 10,000 एज सुविधाएं स्थापित करने का लक्ष्य रखती हैं, ताकि एआई और स्थानीय डेटा प्रोसेसिंग को बढ़ावा दिया जा सके.
फिर भी, अनियमित बिजली आपूर्ति और सीमित फाइबर कनेक्टिविटी एज एआई के विस्तार में बड़ी बाधाएं बनी हुई हैं. कई क्षेत्रों में लो-लेटेंसी 5G और एज एआई अनुप्रयोगों के लिए आवश्यक फाइबर नेटवर्क भी उपलब्ध नहीं है. स्थानीय माइक्रो डेटा सेंटर तेज और कम लागत वाली सेवाएं देने में मदद करेंगे, खासकर कमजोर इंटरनेट वाले क्षेत्रों में. लेकिन अगर अलग-अलग सिस्टम आपस में नहीं जुड़ेंगे, तो डेटा साझा करना और तुरंत सही फैसले लेना मुश्किल होगा.
विशेष एज हार्डवेयर की ऊंची प्रारंभिक लागत छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है, विशेषकर लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में, जहां यूनिफाइड लॉजिस्टिक्स इंटरफेस प्लेटफॉर्म (ULIP) जैसी पहलें मौजूद हैं. अलग-अलग कंपनियों की तकनीक और सिस्टम आपस में आसानी से जुड़ नहीं पाते. इससे डेटा बंट जाता है और ड्रोन, सेंसर व वाहन मिलकर तेजी से सही फैसले नहीं ले पाते.
वर्तमान में भारत में स्वदेशी रूप से डिजाइन किए गए एनालॉग-मिक्स्ड सिग्नल इंटीग्रेटेड सर्किट्स (AMICs) की कमी है. ये चिप्स डिजिटल और एनालॉग सिग्नलों को जोड़ते हैं और ऑडियो-वीडियो उपकरणों, ऑटोमोबाइल प्रणालियों (जैसे रडार और सेंसर फ्यूजन) तथा IoT सेंसरों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
भारत में वर्तमान डेटा सेंटर व्यवस्था मुख्य रूप से मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई और विशाखापत्तनम जैसे महानगरों में केंद्रित है. इसका कारण समुद्री केबल नेटवर्क, औद्योगिक केंद्रों और विकसित डिजिटल ढांचे के निकट होना है.
हाल के वर्षों में कई अंतरराष्ट्रीय स्टार्टअप्स ने भारत में अपनी उपस्थिति बढ़ाई है, जिससे युवा भारतीय इंजीनियरों को अत्यधिक विशेषज्ञता वाले कार्यों का अनुभव मिल रहा है. हालांकि, भारत अभी भी इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन ऑटोमेशन (EDA) टूल्स के लिए Synopsys, सीमेंस और Cadence जैसी विदेशी कंपनियों पर निर्भर है. इसके बावजूद, IIT बॉम्बे का eSim जैसे ओपन-सोर्स EDA प्रयास इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल हैं. वहीं, सिम्योग टेक्नोलॉजीज जैसी स्टार्टअप कंपनियां शुरुआती हार्डवेयर डिजाइन के परीक्षण और सत्यापन समाधान विकसित कर रही हैं.
अंततः, पोस्ट-सिलिकॉन विश्वसनीयता अवसंरचना-यानी चिप निर्माण के बाद उनकी जांच और परीक्षण के लिए आवश्यक हार्डवेयर व सॉफ्टवेयर-अभी भी पर्याप्त विकसित नहीं है. वर्तमान में दो फैब और आठ ATMPs/OSATs को मंजूरी दी गई है, लेकिन विभिन्न क्षेत्रों की जरूरतों के अनुरूप अधिक परीक्षण ढांचे की आवश्यकता है. इसके अलावा, सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 के तहत क्वालकॉम ने 2nm चिप डिजाइन का टेप-आउट पूरा किया है, जो एज एआई अनुप्रयोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
भारत को मिडलवेयर और कंपाइलर की कमी का सामना करना पड़ रहा है. मिडलवेयर वह परत होती है जो बिखरे हुए डेटा, मॉडलों और कार्यप्रवाहों को जोड़कर उन्हें एक बड़े और विस्तार योग्य सिस्टम में बदलती है. भारत एआईकोश डेटा सेट एक महत्वपूर्ण मिडलवेयर प्लेटफॉर्म है, जिसके साथ Infosys और Wipro जैसी कंपनियों के एंटरप्राइज समाधान भी मौजूद हैं. फिर भी, भारत की लगभग 45 प्रतिशत कंपनियां अभी भी कम विकसित और अत्यधिक बिखरे हुए डेटा ढांचे पर काम कर रही हैं, क्योंकि अलग-अलग डेटा साइलो को एकीकृत करना कठिन है.
अधिकारियों को एआई और डिजिटल तकनीक की सही समझ देना जरूरी है, ताकि वे इसका अच्छा उपयोग कर सकें. जिलों में युवाओं और छात्रों को जोड़कर स्थानीय समस्याओं के समाधान तैयार किए जा सकते हैं. एआई सिस्टम स्थानीय भाषाओं में होने चाहिए और सरकारी डिजिटल सेवाओं से जुड़े होने चाहिए.
अपाचे टीवीएम और एनवीडिया टेंसरआरटी जैसे कंपाइलर जटिल मशीन लर्निंग मॉडलों के सोर्स कोड का अनुवाद करते हैं और उन्हें मौजूदा हार्डवेयर, जैसे GPU, के अनुरूप ढालने में मदद करते हैं. हालांकि, अभी तक भारत के पास ऐसा कोई एकीकृत, ओपन-सोर्स और स्वदेशी एज कंपाइलर स्टैक नहीं है, जो पायटॉर्च या टेंसरफ्लो जैसे फ्रेमवर्क को एज डिवाइसों के लिए अनुकूलित कोड में प्रभावी रूप से बदल सके. फिर भी, इस दिशा में कई प्रयास किए जा रहे हैं. विशेष रूप से, PolyMage Labs द्वारा विकसित बहु-स्तरीय मध्यवर्ती प्रतिनिधित्व (MLIR) एक नया ओपन-सोर्स तरीका है, जिसका उद्देश्य विभिन्न हार्डवेयर प्रणालियों के बीच मौजूद बिखराव को कम करना है.
वैश्विक अनुभव बताते हैं कि एआई को बड़े स्तर पर लागू करना केवल तकनीकी क्षमता पर नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था में बदलाव पर भी उतना ही निर्भर करता है. इसके कारण बाहरी कंपनियों और विक्रेताओं पर अत्यधिक निर्भरता बढ़ गई है. साथ ही, सरकार अभी भी अपने विभिन्न डेटाबेसों के बीच बेहतर इंटरऑपरेबिलिटी स्थापित करने में कठिनाइयों का सामना कर रही है.
एआई को जमीन पर सफल बनाने के लिए सरकार को हर स्तर पर डिजिटल टीमें बनानी होंगी. अधिकारियों को एआई और डिजिटल तकनीक की सही समझ देना जरूरी है, ताकि वे इसका अच्छा उपयोग कर सकें. जिलों में युवाओं और छात्रों को जोड़कर स्थानीय समस्याओं के समाधान तैयार किए जा सकते हैं. एआई सिस्टम स्थानीय भाषाओं में होने चाहिए और सरकारी डिजिटल सेवाओं से जुड़े होने चाहिए. अगर ऐसे बदलाव नहीं हुए, तो भारत एआई में आगे बढ़ने के बावजूद लोगों तक उसका पूरा फायदा नहीं पहुंचा पाएगा.
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Ishita Deshmukh is a Research Assistant with ORF’s Centre for Security, Strategy & Technology. Her work focuses on how artificial intelligence is reshaping national security, economic ...
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