Author : Sohini Bose

Expert Speak Raisina Debates
Published on Jun 09, 2026 Updated 1 Days ago

सीमा पर सख्ती, रिश्तों में खटास... लेकिन क्या तीस्ता बदल सकती है पूरा समीकरण? जानिए कैसे पानी का एक समझौता भारत-बांग्लादेश संबंधों में भरोसे और दोस्ती की नई धारा बहा सकता है.

भारत-बांग्लादेश तनाव के बीच उम्मीद का नाम 'तीस्ता'

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9 मई 2026 को पश्चिम बंगाल में नई सरकार के सत्ता संभालने के साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा प्रमुखता से उभरकर सामने आया. भाजपा ने अपने चुनावी वादों में बांग्लादेश से कथित अवैध घुसपैठ पर सख्ती को प्राथमिकता दी थी, और सरकार बनने के बाद उठाए गए कदमों ने बांग्लादेश के कुछ वर्गों में चिंता बढ़ा दी है. लेकिन पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश का रिश्ता केवल सीमा तक सीमित नहीं है. दोनों साझा इतिहास, संस्कृति, संसाधनों और पारिवारिक संबंधों से जुड़े हुए हैं. इसलिए एक ओर होने वाला कोई भी बदलाव दूसरी ओर भी असर डालता है. सीमा पर होने वाला हर बदलाव भारत और बांग्लादेश दोनों पर असर डालता है. ऐसे में तनाव को कम करते हुए सहयोग को बढ़ावा देना जरूरी है, ताकि रिश्तों में भरोसा और स्थिरता कायम रह सके.

सीमा पर सख्ती, ढाका में बेचैनी

पश्चिम बंगाल सरकार ने कथित अवैध घुसपैठियों को गिरफ्तार कर BSF के हवाले करने का निर्देश जारी किया है, ताकि उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया पूरी की जा सके. सरकार ने सीमा जिलों में भूमि हस्तांतरण को भी मंजूरी दी है, जिससे भारत-बांग्लादेश सीमा के बाकी खुले हिस्सों पर बाड़ लगाई जा सके. राज्य की 2,200 किलोमीटर लंबी सीमा में से करीब 1,600 किलोमीटर पहले से सुरक्षित है, जबकि लगभग 600 किलोमीटर क्षेत्र अभी भी खुला है. पहले चरण में 27 किलोमीटर भूमि BSF को सौंपी गई है, जिसमें 18 किलोमीटर बाड़ निर्माण और 9 किलोमीटर चौकियों व अन्य आवश्यक ढांचागत सुविधाओं के विकास के लिए निर्धारित है। आगे भी अतिरिक्त भूमि हस्तांतरित की जाएगी, जिसका पूरा खर्च केंद्र सरकार और BSF वहन करेंगे.

बांग्लादेश का कहना है कि भारत में अवैध प्रवास का मुद्दा जितना बताया जाता है, वास्तविकता उतनी नहीं है. इसलिए वह बिना पक्के सबूत के निर्वासित लोगों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है. अगर ऐसे मामलों की संख्या बढ़ती है, तो सीमा प्रबंधन पर दबाव भी बढ़ेगा.

राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पश्चिम बंगाल सरकार ने उत्तर बंगाल के सिलीगुड़ी कॉरिडोर की 120 एकड़ भूमि केंद्र को हस्तांतरित करने की मंजूरी दी है. भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाला यह रणनीतिक क्षेत्र ‘चिकन नेक’ के नाम से जाना जाता है. हाल के वर्षों में बांग्लादेश से जुड़े कुछ घटनाक्रमों ने नई दिल्ली की चिंताएं बढ़ाई हैं, जिनमें मुहम्मद यूनुस का पूर्वोत्तर भारत की संवेदनशीलता पर दिया गया बयान, लालमोनिरहाट हवाई अड्डा परियोजना को लेकर चीन से कथित बातचीत और तीस्ता परियोजना में बीजिंग की संभावित भूमिका शामिल हैं. वहीं, तीस्ता परियोजना को वर्तमान BNP सरकार द्वारा भी आगे बढ़ाया जा रहा है, जिससे नई दिल्ली की रणनीतिक चिंताएं बनी हुई हैं. 

भारत इन कदमों को अपनी सुरक्षा और विकास के लिए जरूरी मानता है, लेकिन बांग्लादेश के कुछ समूहों में इन्हें लेकर चिंता बढ़ रही है. सीमा पर बाड़ लगाने, कथित अवैध प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई और सुरक्षा से जुड़े फैसलों को तेजी से लागू किए जाने से यह बेचैनी और बढ़ी है. वहीं, पश्चिम बंगाल में अवैध संपत्तियों पर हुई कार्रवाई को भी कुछ लोग सीमा-पार मुद्दे के रूप में पेश कर रहे हैं, जिससे माहौल और संवेदनशील हो गया है. 

फरवरी 2026 में सत्ता में आई तारिक रहमान सरकार के सामने यह एक बड़ी चुनौती बन गई है. बांग्लादेश का कहना है कि भारत में अवैध प्रवास का मुद्दा जितना बताया जाता है, वास्तविकता उतनी नहीं है. इसलिए वह बिना पक्के सबूत के निर्वासित लोगों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है. अगर ऐसे मामलों की संख्या बढ़ती है, तो सीमा प्रबंधन पर दबाव भी बढ़ेगा. साथ ही, सोशल मीडिया पर फैलने वाली भड़काऊ सामग्री भारत-विरोधी माहौल को और मजबूत कर सकती है. इससे सरकार के लिए भारत के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना कठिन हो सकता है. इसलिए दोनों देशों को केवल निर्वासन के मुद्दे पर ही नहीं, बल्कि तीस्ता जैसे साझा मुद्दों पर भी सहयोग बढ़ाने की जरूरत है, ताकि आपसी विश्वास मजबूत हो सके. 

नदी कूटनीति: विश्वास बहाली का नया रास्ता  

भारत और बांग्लादेश के बीच साझा 54 अंतरराष्ट्रीय नदियों में तीस्ता का विशेष महत्व है. यह नदी सिक्किम और उत्तर बंगाल की पहाड़ियों से निकलकर बांग्लादेश के रंगपुर क्षेत्र तक पहुंचती है. उत्तरी बांग्लादेश की प्रमुख नदी होने के कारण यह 1 करोड़ से अधिक लोगों की कृषि आवश्यकताओं को पूरा करती है और देश के 14% कृषि उत्पादन में योगदान देती है. हालांकि, बांग्लादेशी विशेषज्ञों का मानना है कि भारत द्वारा ऊपरी हिस्से में बनाए गए बांधों के कारण नदी का प्रवाह काफी कम हो गया है, जिससे एक लाख हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि की सिंचाई प्रभावित हुई है. उनके अनुसार, बांधों के निर्माण से पहले जहां लगभग 6710 क्यूसेक पानी बांग्लादेश पहुंचता था, वहीं अब शुष्क मौसम में यह घटकर 1200-1500 क्यूसेक रह गया है और कई बार केवल 200-300 क्यूसेक तक सीमित हो जाता है. यह देश की प्रतिदिन 5,000 क्यूसेक जल आवश्यकता से काफी कम है. ऐसे में दोनों देशों द्वारा इस मुद्दे का समाधान तलाशने के प्रयास स्वाभाविक हैं.

जब चीन ने तीस्ता नदी पर बहुउद्देशीय बैराज बनाने, ड्रेजिंग करने और नदी को एक व्यवस्थित चैनल में विकसित करने का प्रस्ताव दिया, तो ढाका की अंतरिम सरकार और बाद में बीएनपी सरकार ने उसे सकारात्मक रूप से लिया.अब केंद्र सरकार और पश्चिम बंगाल के बीच पहले की तुलना में अधिक राजनीतिक समन्वय दिखाई देता है, जिससे तीस्ता विवाद के समाधान की राह में मौजूद बाधाएं कम हो सकती हैं.

तीस्ता जल बंटवारे को लेकर दोनों देशों के बीच समझौते की कोशिशें नई नहीं हैं. वर्ष 1983 में संयुक्त नदी आयोग (JRC) की 25वीं बैठक में एक अंतरिम समझौता हुआ था, जिसके तहत बांग्लादेश को तीस्ता के जल का 36 प्रतिशत हिस्सा मिलना था. हालांकि, यह व्यवस्था कभी पूरी तरह लागू नहीं हो सकी. इसके बाद 2011 में एक नया समझौता प्रस्तावित किया गया, जिसमें भारत के लिए 42.5 प्रतिशत और बांग्लादेश के लिए 37.5 प्रतिशत जल आवंटित करने की बात थी. लेकिन पश्चिम बंगाल की तत्कालीन सरकार ने राज्य की बढ़ती जल आवश्यकताओं और नदी के घटते प्रवाह का हवाला देते हुए इसका विरोध किया. उसका तर्क था कि बांग्लादेश को अधिक पानी देने से उत्तर बंगाल के लोगों के हित प्रभावित होंगे. भारत में जल संसाधनों का प्रबंधन राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय जल समझौते केंद्र सरकार के अधीन होते हैं. इसी कारण केंद्र और राज्य के बीच सहमति न बन पाने से तीस्ता समझौता लंबे समय तक अटका रहा. 

इसी कारण तीस्ता विवाद लंबे समय से ढाका और नई दिल्ली के बीच सबसे संवेदनशील और विवादास्पद मुद्दों में से एक बना हुआ है. बांग्लादेश के कुछ वर्गों में भारत के प्रति नकारात्मक धारणा को भी इसने बढ़ावा दिया है. यही कारण है कि जब चीन ने तीस्ता नदी पर बहुउद्देशीय बैराज बनाने, ड्रेजिंग करने और नदी को एक व्यवस्थित चैनल में विकसित करने का प्रस्ताव दिया, तो ढाका की अंतरिम सरकार और बाद में बीएनपी सरकार ने उसे सकारात्मक रूप से लिया. हालांकि, अब केंद्र सरकार और पश्चिम बंगाल के बीच पहले की तुलना में अधिक राजनीतिक समन्वय दिखाई देता है, जिससे तीस्ता विवाद के समाधान की राह में मौजूद बाधाएं कम हो सकती हैं. यदि इससे भारत और बांग्लादेश के बीच एक संतुलित और पारस्परिक रूप से लाभकारी जल बंटवारा समझौता संभव होता है, तो यह न केवल दोनों सरकारों की महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि होगी, बल्कि दोनों देशों के लोगों के बीच विश्वास और सद्भाव को भी मजबूत करेगी. 

अगर तीस्ता विवाद का समाधान निकलता है, तो इससे बांग्लादेश में भारत के प्रति बनी नाराजगी कम हो सकती है और तारिक रहमान सरकार की स्थिति भी मजबूत हो सकती है. इसलिए भारत और बांग्लादेश को ऐसे मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए जो दोनों देशों को करीब लाते हैं. साझा हितों, नदी सहयोग और लोगों के फायदे को प्राथमिकता देकर दोनों देश विवादों को संभाल सकते हैं और रिश्तों में कड़वाहट बढ़ने से रोक सकते हैं. 


सोहिनी बोस ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में एसोसिएट फेलो हैं.
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Sohini Bose

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Sohini Bose is an Associate Fellow at Observer Research Foundation (ORF), Kolkata with the Strategic Studies Programme. Her area of research is India’s eastern maritime ...

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