ऑपरेशन सिंदूर ने सिर्फ सीमा पर ताकत नहीं दिखाई बल्कि यह भी साफ कर दिया कि बदलती वैश्विक राजनीति में अमेरिका अपने हितों के हिसाब से भारत और पाकिस्तान दोनों के साथ नए समीकरण बना सकता है. आखिर कैसे एक सैन्य अभियान ने भारत-अमेरिका रिश्तों, कूटनीति और इंडो-पैसिफिक की रणनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया, पढ़िए पूरा विश्लेषण.
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ऑपरेशन सिंदूर कोई सामान्य सैन्य कार्रवाई नहीं थी. यह भारत और पाकिस्तान के बीच ऐसा टकराव था जिसने दोनों देशों की रणनीतिक सोच और शक्ति संतुलन को बदल दिया. इसने वॉशिंगटन में भी हलचल पैदा की, क्योंकि अमेरिका लंबे समय से भारत-पाकिस्तान प्रतिद्वंद्विता में रुचि रखता रहा है. ऑपरेशन सिंदूर ने यह दिखाया कि भारत नियंत्रण रेखा (LoC) के पार सटीक हमला करने की राजनीतिक इच्छा रखता है. इससे यह धारणा कमजोर हुई कि दोनों पड़ोसियों के बीच परमाणु प्रतिरोधक क्षमता पारंपरिक सैन्य कार्रवाई की संभावना को पूरी तरह रोक देती है. भारत के लिए इस घटना से कई सबक मिले, साथ ही युद्धक्षेत्र के भीतर और बाहर ऐसे बदलाव भी सामने आए जो भविष्य में होने वाले किसी भी सैन्य संघर्ष को प्रभावित कर सकते हैं. ड्रोन युद्ध, इलेक्ट्रॉनिक प्रतिरोध उपाय और बाहरी शक्तियों की भूमिका जैसे तत्व ऐसे थे जिन्हें नई दिल्ली ने सिद्धांत रूप में पहले सोचा था, लेकिन अब व्यवहार में देखा. फिर भी, ऑपरेशन सिंदूर का सबसे गहरा प्रभाव सैन्य नहीं बल्कि कूटनीतिक हो सकता है, और इसका सबसे स्पष्ट असर भारत-अमेरिका संबंधों में दिखाई देता है.
ऑपरेशन सिंदूर ने यह दिखाया कि भारत नियंत्रण रेखा (LOC) के पार सटीक हमला करने की राजनीतिक इच्छा रखता है. इससे यह धारणा कमजोर हुई कि दोनों पड़ोसियों के बीच परमाणु प्रतिरोधक क्षमता पारंपरिक सैन्य कार्रवाई की संभावना को पूरी तरह रोक देती है. भारत के लिए इस घटना से कई सबक मिले, साथ ही युद्धक्षेत्र के भीतर और बाहर ऐसे बदलाव भी सामने आए जो भविष्य में होने वाले किसी भी सैन्य संघर्ष को प्रभावित कर सकते हैं.
सबसे बड़ा बदलाव वाशिंगटन के भारत और पाकिस्तान के साथ संबंधों में दिखाई दिया. ट्रंप प्रशासन ने इस संकट का उपयोग करके क्षेत्र में अमेरिका को अधिक लाभकारी स्थिति में पहुंचाने की कोशिश की. इसके पीछे मुख्य रूप से दो कारण थे. ऐसा लगता है कि वाशिंगटन में ईरान के साथ संभावित संघर्ष को लेकर सोच पहले से विकसित हो रही थी, जहां ईरान को क्षेत्र में सक्रिय कई प्रॉक्सी नेटवर्क का ‘मुख्य केंद्र’ माना जा रहा था. पाकिस्तान के साथ बेहतर संबंध बनाने की ट्रंप की सोच कम से कम दो उद्देश्यों से जुड़ी दिखाई देती है. पहला, यदि अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध होता, तो पाकिस्तान का उपयोग सैन्य अभियान, खुफिया जानकारी और निगरानी के लिए एक रणनीतिक सहयोगी के रूप में किया जा सकता था. दूसरा, पाकिस्तान के माध्यम से अमेरिका अपने आर्थिक हितों को आगे बढ़ाना चाहता था. होर्मुज जलडमरूमध्य और फारस की खाड़ी के निकट होने तथा खाड़ी देशों के साथ पाकिस्तान के पुराने और गहरे संबंधों ने इस्लामाबाद को ईरान के खिलाफ किसी भी संभावित अमेरिकी सैन्य और लॉजिस्टिक ढांचे का महत्वपूर्ण केंद्र बना दिया. ट्रंप की व्यावहारिक और अवसरवादी सोच ने ठीक उसी समय पाकिस्तान की उपयोगिता को नए तरीके से देखा, जब भारतीय उपमहाद्वीप में भारत की अधिक आक्रामक और आत्मविश्वासी नीति ने ऐसा अवसर पैदा किया.
भारत के लिए इन रणनीतिक गणनाओं के बड़े राजनीतिक प्रभाव थे. इससे न केवल नई दिल्ली में असहजता बढ़ी, बल्कि भारत की कूटनीतिक गतिविधियों की गुंजाइश भी सीमित हुई. खासकर तब, जब ट्रंप बार-बार यह दावा कर रहे थे कि भारत-पाकिस्तान संघर्ष को रोकने में उनकी निर्णायक भूमिका रही है. यह दावा, जिसे भारतीय अधिकारियों ने काफी हद तक खारिज किया और जिसका कोई ठोस प्रमाण नहीं था, वाशिंगटन की उस व्यापक सोच को दर्शाता था जिसमें वह खुद को एक अनिवार्य मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करना चाहता था, चाहे भारत इस भूमिका को स्वीकार करें या नहीं. भारत, जिसने दशकों से खुद को भारत-पाकिस्तान की ‘हाइफनेटेड‘ सोच से अलग दिखाने की कोशिश की है, उसके लिए ट्रंप की यह नीति एक कूटनीतिक झटका थी.
ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान के साथ ट्रंप के संबंध अमेरिका के लिए भी उपयोगी साबित हुए. इससे ईरान संकट के दौरान अमेरिकी रणनीति को समर्थन मिला और बाद में अमेरिका तथा ईरान के बीच बातचीत के लिए कूटनीतिक रास्ता तैयार करने में भी मदद मिली. उस समय जब तेहरान तक अमेरिका की सीधी कूटनीतिक पहुंच सीमित थी, इस्लामाबाद ने एक बैक-चैनल मध्यस्थ की भूमिका निभाई. ट्रंप प्रशासन ने भारत-पाकिस्तान तनाव का लाभ उठाते हुए पाकिस्तान के साथ अधिक सहयोग बढ़ाने की कोशिश की. इसमें क्रिप्टो परियोजनाओं में निवेश, बलूचिस्तान के खनिज भंडारों में संभावित निवेश और ऊर्जा आपूर्ति समझौते जैसे कदम शामिल थे. इन कारणों ने ट्रंप को पाकिस्तान के साथ संबंध मजबूत करने का पर्याप्त आधार दिया, भले ही इसका असर भारत-अमेरिका संबंधों पर नकारात्मक पड़ा हो. ट्रंप के लिए यह किसी विचारधारा का प्रश्न नहीं था, बल्कि अवसर और आर्थिक लाभ का मामला था, क्योंकि उनकी आर्थिक सोच व्यापारिक और संसाधन-केंद्रित रही है.
अब अमेरिका भारत से केवल सहयोग नहीं, बल्कि अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं के अनुसार अधिक तालमेल भी चाहता है. भारत पर ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ, जिनमें रूसी तेल खरीदने पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क भी शामिल था, ने दोनों देशों के संबंधों को और जटिल बना दिया. इससे ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत-अमेरिका संबंधों में मौजूद बाधाएं और गहरी हो गईं.
नई दिल्ली के लिए इस बदले हुए रणनीतिक माहौल की राजनीतिक कीमत अन्य सभी पक्षों से अधिक रही. इसका मुख्य कारण यह था कि ट्रंप ने भारत और पाकिस्तान को एक ही ढांचे में रखकर दोनों के बीच मध्यस्थ बनने की कोशिश की, जिसे भारत में अच्छा नहीं माना गया. भारत की कूटनीति लंबे समय से अमेरिका के साथ संबंधों को किसी एक राष्ट्रपति के बजाय दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी के आधार पर देखती रही है. लेकिन यह रणनीतिक धैर्य भी सीमित है. ट्रंप द्वारा भारत पर लगाए गए टैरिफ, जिनमें रूसी तेल खरीदने पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क भी शामिल था, ने दोनों देशों के संबंधों को और जटिल बना दिया तथा ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत-अमेरिका संबंधों में नई बाधाएं जोड़ दीं. भारत ऐसी स्थिति में था जहां उसे एक तरफ अमेरिका के आर्थिक दबाव और दूसरी तरफ सुरक्षा चुनौतियों दोनों से निपटना पड़ रहा था. रूस से तेल खरीदने पर लगाए गए टैरिफ ने यह दिखाया कि ट्रंप प्रशासन व्यापारिक हितों को ज्यादा महत्व देता है. फिर भी भारत-अमेरिका संबंध कमजोर नहीं पड़े. दोनों देशों ने समझा कि बदलती वैश्विक राजनीति में उनका सहयोग जरूरी है. भारत ने यह भी महसूस किया कि ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति हमेशा भारतीय हितों के अनुसार नहीं है. इसके बावजूद रक्षा सहयोग, तकनीकी साझेदारी, iCET और क्वाड जैसे ढाँचों ने दोनों देशों के रिश्तों को मजबूत बनाए रखा.
दिल्ली यात्रा के दौरान ट्रंप प्रशासन के सहायक विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडाउ ने भारत को यह संकेत दिया कि अमेरिका चीन के साथ की गई पुरानी गलतियों को दोहराना नहीं चाहता. इसका अर्थ यह था कि भारत-अमेरिका संबंधों का पुराना स्वरूप अब बदल सकता है. यह आकलन भारत के लिए अवसर और जोखिम दोनों लेकर आता है. यह स्थिति भारत को अपनी विदेश नीति अधिक स्वतंत्र बनाने का संकेत देती है. साथ ही चिंता भी बढ़ती है कि क्या अमेरिका इंडो-पैसिफिक में पहले जैसी भूमिका निभाएगा. लैंडाउ का संदेश साफ था कि अब अमेरिका भारत से केवल सहयोग नहीं, बल्कि अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं के अनुसार अधिक तालमेल भी चाहता है. भारत पर ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ, जिनमें रूसी तेल खरीदने पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क भी शामिल था, ने दोनों देशों के संबंधों को और जटिल बना दिया. इससे ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत-अमेरिका संबंधों में मौजूद बाधाएं और गहरी हो गईं.
ऑपरेशन सिंदूर के बाद की अवधि का शायद सबसे महत्वपूर्ण सबक यह रहा कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को लेकर पूर्व अमेरिकी प्रशासन जितनी प्राथमिकता देते थे, वैसी सोच ट्रंप प्रशासन में दिखाई नहीं देती. बाइडेन सरकार ने क्वाड और इंडो-पैसिफिक में चीन को संतुलित करने के लिए मजबूत साझेदारी पर जोर दिया, जबकि ट्रंप की नीति ज्यादा सौदे और द्विपक्षीय हितों पर आधारित दिखती है. भारत ने इस क्षेत्र में अमेरिका पर केवल चीन को रोकने के लिए नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन बनाए रखने के लिए भरोसा किया था. अगर अमेरिका की प्राथमिकताएँ बदलती हैं, तो भारत की रणनीतिक चुनौतियाँ बढ़ सकती हैं. ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया कि भारत-अमेरिका संबंध मजबूत भी हैं, लेकिन उनमें कुछ कमजोरियाँ भी मौजूद हैं. भारत के सामने कूटनीतिक चुनौती केवल इस संकट के तात्कालिक प्रभावों को संभालने की नहीं है, बल्कि वॉशिंगटन के साथ अपनी साझेदारी की शर्तों को ऐसे समय में नए सिरे से तय करने की भी है, जब अमेरिकी विश्वसनीयता अब पहले जैसी निश्चित नहीं मानी जा सकती.
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Vivek Mishra is Deputy Director – Strategic Studies Programme at the Observer Research Foundation. His work focuses on US foreign policy, domestic politics in the US, ...
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