हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव का असर सिर्फ तेल और गैस तक सीमित नहीं है. सल्फर की सप्लाई में आई रुकावट ने चीन की लिथियम-कोबाल्ट प्रोसेसिंग और दुनिया की ईवी बैटरी सप्लाई चेन के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है. जानिए कैसे एक अनदेखा रसायन वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा बदलाव और चीन की खनिज ताकत पर भारी पड़ सकता है.
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हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य की नाकाबंदी पर दुनिया का पूरा ध्यान सिर्फ तेल और एलएनजी (LNG) पर टिका है. लेकिन, इससे भी बड़ा और छिपा हुआ संकट महत्वपूर्ण खनिजों की वैश्विक सप्लाई चेन के शुरुआती हिस्से में पैदा हो रहा है. लिथियम और कोबाल्ट प्रोसेसिंग के लिए ज़रूरी सल्फ्यूरिक एसिड खाड़ी देशों के सल्फर पर निर्भर है. इस खनिज क्षेत्र में अग्रणी होने के कारण चीन इस संकट से सीधे प्रभावित है, और उसके द्वारा अपने स्वयं के एसिड निर्यात पर पाबंदी लगाने से यह वैश्विक समस्या और गहरा गई है.
दुनिया का लगभग आधा समुद्री सल्फर व्यापार हॉर्मुज़ जलमार्ग से होता है, जो सऊदी अरब, इराक, यूएई और कुवैत से आता है. फरवरी 2026 के अंत में इस रास्ते के बंद होने के बाद, मार्च में खाड़ी देशों से सल्फर की लोडिंग गिरकर सिर्फ 4 लाख टन रह गई, जो पिछले साल के मुकाबले 74.5 प्रतिशत की भारी गिरावट है. यह कोई मामूली रुकावट नहीं है, बल्कि दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक कमोडिटी चेन एक बड़े बुनियादी संकट से गुज़र रही है.
इस पूरी चेन के केंद्र में चीन है. चीन के लिथियम कन्वर्टर्स आयात किए गए स्पोड्यूमीन कंसंट्रेट को सल्फ्यूरिक एसिड के साथ भूनकर बैटरी-ग्रेड लिथियम हाइड्रोक्साइड और लिथियम कार्बोनेट में बदलते हैं-जो ईवी (EV) कैथोड के लिए बहुत ज़रूरी हैं. ऐसा ही जोखिम चीन की कोबाल्ट सप्लाई चेन में भी है. डीआरसी (DRC) के कोबाल्ट प्लांट खाड़ी देशों से दार-एस-सलाम बंदरगाह के रास्ते आने वाले सल्फर पर निर्भर हैं.
लिथियम और कोबाल्ट प्रोसेसिंग के लिए ज़रूरी सल्फ्यूरिक एसिड खाड़ी देशों के सल्फर पर निर्भर है. इस खनिज क्षेत्र में अग्रणी होने के कारण चीन इस संकट से सीधे प्रभावित है, और उसके द्वारा अपने स्वयं के एसिड निर्यात पर पाबंदी लगाने से यह वैश्विक समस्या और गहरा गई है.
इस बुनियादी मजबूरी को ‘बायप्रोडक्ट ट्रैप‘ कहा गया है. सल्फर का कोई अलग से खनन या उत्पादन नहीं होता. हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य की नाकाबंदी के तेहरान के फैसले ने इस रिफाइनिंग बायप्रोडक्ट की सप्लाई को पूरी तरह रोक दिया है. अगर खाड़ी की रिफाइनरियां बंद हो जाती हैं, तो शेनज़ेन के बैटरी मेकर्स की भारी मांग भी सल्फर की मात्रा को वापस नहीं बढ़ा सकती.
इस नाकाबंदी की वजह से चीन के महत्वपूर्ण खनिज प्रोसेसिंग सेक्टर पर लागत की दोहरी मार पड़ी है. 2026 में जब स्पोड्यूमीन (कच्चा माल) के दाम बढ़े, तब चीनी लिथियम कन्वर्टर्स पहले से ही बहुत कम मुनाफे पर काम कर रहे थे. यह कम मुनाफा साल 2022 के अंत से दुनिया भर में लिथियम की ज़रूरत से ज़्यादा सप्लाई होने के कारण था, जिसने लिथियम कार्बोनेट और हाइड्रोक्साइड की कीमतों को कई सालों के सबसे निचले स्तर पर पहुंचा दिया था. अब कंपनियों को एलएनजी और सल्फ्यूरिक एसिड दोनों की बढ़ी हुई कीमतों का सामना करना पड़ रहा है. चूंकि दुनिया का लगभग 80 प्रतिशत लिथियम केमिकल रिफाइन करने की क्षमता चीन के पास है, इसलिए चीनी कंपनियों पर पड़ने वाले किसी भी लगातार दबाव का पूरी दुनिया की लिथियम सप्लाई पर बहुत बुरा असर पड़ेगा. मंझले स्तर की कंपनियों ने उत्पादन में लगभग 10 प्रतिशत की कटौती की बात कही है, क्योंकि कई प्लांटों के पास केवल एक से दो महीने का ही सल्फर स्टॉक बचा है.
कोबाल्ट को होने वाला नुकसान चीन के अंदर नहीं, बल्कि शुरुआत में (माइनिंग स्तर पर) हो रहा है. 3 मार्च 2026 तक, सेंट्रल अफ्रीकन कॉपरबेल्ट के मुख्य आयात केंद्र दार-एस-सलाम में सल्फर की हाजिर कीमत 615–630 अमेरिकी डॉलर प्रति टन (FCA) आंकी गई थी. डीआरसी के कोलवेज़ी तक पहुँचते-पहुँचते सल्फर की कीमत 900 डॉलर प्रति टन हो जाती है, जबकि दार-एस-सलाम से कोलवेज़ी तक का ट्रक भाड़ा ही लगभग 280 डॉलर प्रति टन बैठता है. इससे सामान्य 3:1 के अनुपात पर सल्फ्यूरिक एसिड बनाने की लागत लगभग 300 डॉलर प्रति टन आ रही है, जो युद्ध से पहले के क्षेत्रीय औसत से कहीं ज़्यादा है. भारी लागत से कोबाल्ट सप्लाई चेन खतरे में है, जिससे चीनी रिफाइनरियां प्रभावित हो रही हैं. वहीं, चीन द्वारा सल्फ्यूरिक एसिड निर्यात पर रोक लगाने से वैश्विक खरीदारों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं.
अब कंपनियों को एलएनजी और सल्फ्यूरिक एसिड दोनों की बढ़ी हुई कीमतों का सामना करना पड़ रहा है. दुनिया का लगभग 80 प्रतिशत लिथियम केमिकल रिफाइन करने की क्षमता चीन के पास है, इसलिए चीनी कंपनियों पर पड़ने वाले किसी भी लगातार दबाव का पूरी दुनिया की लिथियम सप्लाई पर बहुत बुरा असर पड़ेगा.
चीन दुनिया में सल्फ्यूरिक एसिड का सबसे बड़ा निर्यातक है, जिसने 2025 में लगभग 46 लाख मीट्रिक टन एसिड बाहर भेजा था. एसएंडपी ग्लोबल सेरा के विश्लेषकों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार से इतनी बड़ी मात्रा के अचानक हट जाने से बाजार में भारी कमी (घाटा) पैदा हो गई है. ऐसा करके, चीन ने अनजाने में वैश्विक स्तर पर कीमतों को और भड़का दिया है, जिससे अंततः उसके अपने कच्चे माल की लागत ही बढ़ रही है.
सल्फर संकट का असर सिर्फ चीन के औद्योगिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है. दुनिया भर की ज़्यादातर ईवी (EV) बैटरियों में इस्तेमाल होने वाले एनएमसी (NMC - निकेल-मैंगनीज-कोबाल्ट) कैथोड के लिए बैटरी-ग्रेड लिथियम और कोबाल्ट की ज़रूरत होती है, और इन दोनों को निकालने और साफ करने में सल्फ्यूरिक एसिड का बड़ा हाथ है. सल्फ्यूरिक एसिड की बढ़ती कीमतों और खदानों से कम होते उत्पादन का सीधा असर दुनिया भर में ईवी (EV) बनाने की लागत और डिलीवरी के समय पर पड़ रहा है.
इस संकट का फैलाव तांबे के बाजार में साफ देखा जा सकता है. इंटरनेशनल कॉपर स्टडी ग्रुप ने 2026 के लिए पहले ही 1,50,000 टन रिफाइंड तांबे की कमी का अनुमान जताया था, जिसने 2,09,000 टन की बढ़त के पुराने अनुमान को उलट दिया. जेपी मॉर्गन के मॉडल के अनुसार, सबसे खराब स्थिति में यह कमी 3,30,000 टन तक पहुंच सकती है, जो 2009 के बाद से तांबे की पहली बड़ी बुनियादी कमी होगी. सबसे ज़रूरी बात यह है कि इन दोनों अनुमानों में और बढ़ोतरी होने की पूरी आशंका है, क्योंकि सल्फ्यूरिक एसिड की कमी के कारण खदानों में कामकाज ठप होने के आंकड़े अभी इन अनुमानों में शामिल नहीं किए गए हैं.
वैश्विक ईवी बैटरी सप्लाई चेन के सामने कीमतों में एक बड़े बुनियादी बदलाव का खतरा मंडरा रहा है, जो अगले दशक तक खिंच सकता है. इसका सीधा असर उन सभी देशों की अर्थव्यवस्थाओं और लागत पर पड़ेगा जिन्होंने अपनी कार्बन-मुक्ति की रणनीति को पूरी तरह बैटरी से चलने वाले वाहनों के भरोसे तैयार किया है.
इस संकट ने रणनीतिक योजना की एक बहुत बड़ी चूक को उजागर कर दिया है. नाकाबंदी से पहले, स्वच्छ ऊर्जा बदलाव से जुड़े जोखिमों के आकलन में इस बात को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया गया था कि सल्फर की सप्लाई चेन खाड़ी देशों के हाइड्रोकार्बन रिफाइनिंग पर टिकी है और महत्वपूर्ण खनिजों की प्रोसेसिंग में इसकी भूमिका कितनी अहम है. यूएनसीटीएडी (UNCTAD) की मार्च 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, सल्फर के कारण लागत में लगने वाला यह झटका उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के खनिज-निर्भर देशों पर सबसे ज़्यादा पड़ेगा, जो पहले से ही गहरे आर्थिक दबाव में हैं.
हॉर्मुज़ के इस संकट ने यह पूरी तरह साफ कर दिया है कि कोई भी रिफाइनिंग क्षमता सिर्फ उतनी ही मज़बूत होती है, जितनी उसे कच्चा माल देने वाली सप्लाई चेन होती है. समुद्री रास्तों पर कच्चे माल (सल्फर) की सप्लाई रुकने से खनिज रिफाइनिंग में चीन का दबदबा उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी बन गया है. इस गंभीर संकट से तुरंत निपटना अब बेहद ज़रूरी हो चुका है. मुख्य औद्योगिक रसायनों का रणनीतिक स्टॉक (रिज़र्व) बनाना, सल्फ्यूरिक एसिड के बिना काम करने वाली खनिज प्रोसेसिंग की नई तकनीकों में निवेश करना अब तुरंत की व्यावसायिक और औद्योगिक प्राथमिकताएं बन चुकी हैं. वेस्ट पॉइंट पायने इंस्टीट्यूट के अनुसार, इसमें सबसे बड़ी मजबूरी यह है कि सल्फर की सप्लाई बाजार की मांग से नहीं, बल्कि हाइड्रोकार्बन रिफाइनिंग और स्मेल्टिंग (धातु पिघलाने) के काम से तय होती है. जब यह रसायन ही बाज़ार में उपलब्ध न हो, तो शॉर्ट टर्म में कोई भी निवेश या सरकारी मदद इसका विकल्प नहीं बन सकती.
इस नाकाबंदी के महीनों बीत जाने के बाद, अब यह साफ हो चुका है कि इसके नतीजे अस्थायी नहीं होंगे. वैश्विक ईवी बैटरी सप्लाई चेन के सामने कीमतों में एक बड़े बुनियादी बदलाव का खतरा मंडरा रहा है, जो अगले दशक तक खिंच सकता है. इसका सीधा असर उन सभी देशों की अर्थव्यवस्थाओं और लागत पर पड़ेगा जिन्होंने अपनी कार्बन-मुक्ति की रणनीति को पूरी तरह बैटरी से चलने वाले वाहनों के भरोसे तैयार किया है.
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Veer Puri is a Research Assistant with ORF’s Centre for New Economic Diplomacy. At ORF, his research focuses on the Blue Economy and connectivity, with particular ...
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