रूस और तालिबान के बढ़ते रिश्ते अफगानिस्तान और आस-पास के क्षेत्र में बदलते हालात का संकेत हैं. जानिए, रूस क्यों तालिबान के साथ नजदीकियां बढ़ा रहा है और इसका क्षेत्रीय सुरक्षा व राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ सकता है.
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21 मई को रूस की सुरक्षा परिषद के सचिव सर्गेई शोइगु ने एक बार फिर अफगानिस्तान से जुड़े रूस के सुरक्षा संबंधी चिंताओं को दोहराया. शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की सुरक्षा बैठक में उन्होंने बताया कि अफगानिस्तान में 20 से अधिक संगठनों के 18,000 से 23,000 तक लड़ाके मौजूद हैं. उन्होंने यह भी कहा कि सीरिया से लड़ाकों की धीरे-धीरे वापसी हो रही है और अफगानिस्तान व उसके पड़ोसी देशों में सिंथेटिक नशीले पदार्थों का उत्पादन और व्यापार बढ़ रहा है. हालाँकि उन्होंने माना कि तालिबान के नेतृत्व वाला इस्लामिक अमीरात इन चुनौतियों, खासकर लड़ाकों की मौजूदगी, से निपटने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि तालिबान की क्षमता सीमित है. इसलिए इन खतरों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए क्षेत्रीय सहयोग जरूरी है.
रूस की आतंकवादी संगठनों की सूची से तालिबान का नाम हटाना और जुलाई 2025 में उसे आधिकारिक मान्यता देना यूरेशिया की रणनीतिक स्थिरता में एक महत्वपूर्ण मोड़ था. इससे यह संकेत मिला कि क्षेत्र के देश तालिबान के साथ सहयोग बढ़ाने के लिए अधिक तैयार हैं. हालांकि, इस साझेदारी को मजबूत करते समय मॉस्को को सावधानी बरतनी पड़ी है. इसका कारण बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की घोषणा के साथ-साथ ऊपर बताए गए सुरक्षा जोखिम और अफगानिस्तान-पाकिस्तान संबंधों में बढ़ता तनाव है, जो क्षेत्र के सुरक्षा समीकरण को बदल सकता है.
मास्को की तालिबान नीति व्यावहारिक और यथार्थवादी सोच पर आधारित है. 2021 में तालिबान के सत्ता में आने ने क्षेत्र से अमेरिका की वापसी का संकेत दिया और रूस ने इस अवसर का जल्दी लाभ उठाते हुए तालिबान के साथ आधिकारिक संपर्क स्थापित कर लिए. काबुल में उसका दूतावास खुला रहा और तालिबान की वापसी के बाद रूस पहला देश बना जिसने काबुल में अपना व्यापारिक प्रतिनिधि कार्यालय खोला. तालिबान द्वारा तेजी से सत्ता पर नियंत्रण स्थापित करना इस नई वास्तविकता को दिखाता था कि क्षेत्र के देशों को अब उसके साथ काम करना ही होगा.
तालिबान के नेतृत्व वाला इस्लामिक अमीरात इन चुनौतियों, खासकर लड़ाकों की मौजूदगी, से निपटने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि तालिबान की क्षमता सीमित है. इसलिए इन खतरों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए क्षेत्रीय सहयोग जरूरी है.
अमेरिका और उसके सहयोगियों की सुरक्षा व्यवस्था खत्म होने के बाद अफगानिस्तान में विभिन्न आतंकवादी संगठनों के फैलने का खतरा बढ़ गया. इससे आशंका पैदा हुई कि आतंकवाद मध्य एशिया तक फैल सकता है और अंततः रूस तक पहुँच सकता है. 2022 में काबुल स्थित रूसी दूतावास पर हुआ बम हमला, जिसकी जिम्मेदारी आईएसकेपी (ISKP) ने ली थी, इस बढ़ते खतरे का पहला बड़ा संकेत था. 2024 में आईएसकेपी ने क्रोकस सिटी हॉल पर हमला किया, जिसमें 140 से अधिक लोगों की मौत हुई. इस हमले ने दिखाया कि यह संगठन सीमा पार हमले करने में सक्षम है. हमलावर मध्य एशिया से थे, जिससे रूस की चिंताएँ और बढ़ गईं. पिछले एक वर्ष में अफगानिस्तान-ताजिकिस्तान सीमा पर सशस्त्र घटनाओं में वृद्धि हुई है और केवल 2025 में ही 17 से अधिक घटनाएं दर्ज की गईं. 26-29 मई रूस के सुरक्षा प्रमुख ने ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, किर्गिस्तान और कजाखस्तान से आईएसकेपी की भर्ती, हमलों की तैयारी और विशेष रूप से उत्तरी अफगानिस्तान में तालिबान शासन को अस्थिर करने की उसकी कोशिशों पर चिंता जताई.
इसके अलावा, 2025 में लगभग 2,742 किलोग्राम नशीले पदार्थ जब्त किए गए. तालिबान द्वारा अफीम की खेती पर प्रतिबंध लगाने के बाद मेथामफेटामाइन जैसे सिंथेटिक नशीले पदार्थों का उत्पादन और तस्करी बढ़ी है, जिसका केंद्र अब ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान बनते जा रहे हैं. 2025 में रूसी सुप्रीम कोर्ट ने तालिबान को आतंकवादी सूची से हटा दिया और उसकी गतिविधियों पर लगा प्रतिबंध निलंबित कर दिया. उसी वर्ष रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने तालिबान को आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में ‘सहयोगी’ बताया. जुलाई 2025 में रूस तालिबान सरकार को मान्यता देने वाला पहला देश बना और बाद में रूस में अफगानिस्तान के नए राजदूत गुल हसन हसन के परिचय-पत्र भी स्वीकार किए.
यह ‘पूर्ण साझेदारी’ की दिशा में उठाया गया कदम अफगानिस्तान के प्रति रूस की बदलती नीति को दर्शाता है. हालांकि ऐसी खबरें थीं कि रूस आईएसकेपी के खिलाफ लड़ाई में तालिबान को हथियार देने में रुचि रखता है, लेकिन हाल ही में दोनों पक्षों ने मॉस्को में एक सम्मेलन के दौरान सैन्य-तकनीकी समझौते पर हस्ताक्षर किए. यह क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों के फैलाव को रोकने की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है.
फरवरी 2026 से पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच गंभीर तनाव चल रहा है, जिसमें दोनों देशों ने एक-दूसरे की सैन्य और सीमा संबंधी संरचनाओं पर हमले किए हैं. यह विवाद मॉस्को के लिए दोधारी तलवार की तरह है. एक ओर यह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित करता है, वहीं दूसरी ओर यदि तालिबान टीटीपी पर प्रतिबंध लगाकर पाकिस्तान से अपने मतभेद सुलझा लेता है, तो तालिबान के भीतर और विभाजन हो सकता है तथा एक ‘नया तालिबान’ उभर सकता है. इसके अलावा, ऐसी स्थिति में अफगान और पाकिस्तानी लड़ाकों के अफगानिस्तान स्थित इस्लामिक स्टेट शाखा में शामिल होने की संभावना भी बढ़ सकती है.
तालिबान के साथ जुड़ाव के पीछे मुख्य कारण एक ओर अफगानिस्तान में सक्रिय आतंकवादी समूहों को लेकर चिंताएँ हैं और दूसरी ओर उन्हें नियंत्रित करने की तालिबान की क्षमता तथा इच्छा को लेकर संदेह भी है.
इस्लामाबाद द्वारा सैन्य हमलों और प्रतिबंधों जैसे दबावपूर्ण उपायों के बीच रूस की प्राथमिकता संघर्ष को समाप्त करना है. उसने दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता की पेशकश भी की है, लेकिन उसका प्रभाव सीमित है. डूरंड रेखा पर लगातार बनी अस्थिरता मध्य एशिया, अफगानिस्तान और पाकिस्तान को जोड़कर हिंद महासागर तक पहुँचाने वाली संपर्क और परिवहन परियोजनाओं के लिए उत्साह को कम कर रही है.
2026 में तालिबान का इस्लामिक अमीरात सत्ता में अपने दस वर्ष पूरे करने की दिशा में आधा रास्ता तय कर लेगा. पिछले पांच वर्षों में रूस ही ऐसा एकमात्र देश रहा है जिसने तालिबान सरकार को कानूनी और आधिकारिक मान्यता दी है. हालांकि अभी व्यापक अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिली है, फिर भी भारत, चीन, मध्य एशियाई गणराज्य और ईरान सहित कई क्षेत्रीय देशों ने तालिबान के साथ संपर्क बनाए हैं और व्यावहारिक सहयोग बढ़ाया है.
तालिबान के साथ जुड़ाव के पीछे मुख्य कारण एक ओर अफगानिस्तान में सक्रिय आतंकवादी समूहों को लेकर चिंताएँ हैं और दूसरी ओर उन्हें नियंत्रित करने की तालिबान की क्षमता तथा इच्छा को लेकर संदेह भी है. अमीरात अपनी विदेश नीति में संतुलित और आर्थिक विकास पर केंद्रित दृष्टिकोण को महत्व देता है. वह व्यापार, परिवहन और बुनियादी ढाँचे के क्षेत्रों में व्यावहारिक सहयोग बढ़ाने पर जोर देता है और खुद को क्षेत्रीय संपर्क को बढ़ावा देने वाले एक महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में प्रस्तुत करता है. दूसरी ओर, रूस क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास से जुड़े अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए इस संबंध को मजबूत कर रहा है. ऐसे में रूस का समर्थन तालिबान की वैधता और अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता को और अधिक मजबूती देता है.
रूस के लिए तालिबान के साथ जुड़ाव का कारण केवल सुरक्षा चुनौतियाँ नहीं हैं. उसकी प्राथमिकता अफगानिस्तान को यूरेशियाई आपूर्ति शृंखलाओं से जोड़ना और क्षेत्रीय संपर्क को मजबूत करना भी है. इसके लिए एक स्थिर अफगानिस्तान बेहद जरूरी माना जाता है. इसी कारण रूस ने क्षेत्रीय देशों से तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता देने की अपील की है. क्षेत्रीय रणनीतिक स्थिरता आज भी शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और मॉस्को फॉर्मेट जैसी व्यवस्थाओं में चर्चा का प्रमुख विषय बनी हुई है.
नवंबर 2025 में अफगानिस्तान के प्रतिनिधि गुल हसन हसन ने SCO में रूस के प्रतिनिधि से मुलाकात की. इस दौरान संगठन में अफगानिस्तान को पर्यवेक्षक (ऑब्जर्वर) का दर्जा देने की संभावना पर चर्चा हुई. पिछले वर्ष आयोजित रूस-अफगानिस्तान व्यापार मंच के दौरान व्यापार, परिवहन और ऊर्जा खोज के क्षेत्रों में पांच समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर हुए. इससे इस्लामिक अमीरात के साथ बढ़ते सहयोग की इच्छा स्पष्ट हुई. वर्तमान में दोनों देशों के बीच व्यापार लगभग 30 से 40 करोड़ अमेरिकी डॉलर के बीच है. अप्रैल और मई 2026 के बीच दोनों पक्षों के प्रतिनिधिमंडलों ने मंत्री, राजदूत और व्यापारिक स्तर पर कई बैठकें कीं. बैंकिंग और आर्थिक सहयोग बढ़ाने को लेकर भी बातचीत जारी है.
आतंकवाद के मध्य एशिया और रूस तक फैलने की आशंका ने सभी क्षेत्रीय देशों के लिए एक स्थिर अफगानिस्तान को महत्वपूर्ण बना दिया है. मॉस्को के हालिया कदम भी इसी सोच को दर्शाते हैं. आगे चलकर दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग जारी रहेगा, लेकिन इसकी गति सीमित और संतुलित रहने की संभावना है.
अफगानिस्तान के साथ रूस का अधिकांश आर्थिक सहयोग तातारस्तान के माध्यम से आगे बढ़ाया गया है. 2025 के पहले ग्यारह महीनों में तातारस्तान और अफगानिस्तान के बीच व्यापार 5.1 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया, जो दोनों देशों के कुल व्यापार का लगभग दस प्रतिशत था. तातारस्तान के निवेशकों ने अफगानिस्तान में निवेश की रुचि दिखाई है, जबकि रूसी वाणिज्य मंडल कृषि, उर्वरक और तेल उत्पादन क्षेत्रों में सहयोग के अवसर तलाश रहा है.
उज्बेकिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान रेलवे परियोजना (जो तेरमेज़ को अरब सागर से जोड़ेगी), तुर्गुंडी-हेरात-स्पिन बोल्दाक रेलवे नेटवर्क, खाफ-हेरात रेलवे नेटवर्क और वाखान कॉरिडोर राजमार्ग जैसी परियोजनाएँ मध्य एशियाई देशों को समुद्री व्यापार के लिए ईरानी बंदरगाहों पर निर्भरता कम करने का विकल्प प्रदान करती हैं. चीन की मेस ऐनाक खदान परियोजना में धीमी प्रगति को लेकर बढ़ती निराशा के बीच अमीरात अपने निवेश स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है. इसके साथ ही जल हस्तांतरण परियोजनाओं में भी रूसी निवेश की चर्चा चल रही है.
तालिबान की आधिकारिक नीति यह मानने से इनकार करती है कि अफगानिस्तान में कोई आतंकवादी संगठन मौजूद है. अमीरात के नेता लगातार यह दावा करते हैं कि उन्होंने आईएसकेपी (ISKP) की गतिविधियों को लगभग खत्म कर दिया है और उनके अनुसार इस दबाव के कारण यह संगठन पड़ोसी पाकिस्तान में फिर से संगठित होने को मजबूर हुआ है.
हालांकि आईएसकेपी ने पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान प्रांतों में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है, लेकिन वह अब भी अफगानिस्तान के भीतर सक्रिय है. इसी वर्ष जनवरी में काबुल के एक चीनी रेस्तरां पर हुआ हमला इसका स्पष्ट उदाहरण है. बदलते क्षेत्रीय सुरक्षा माहौल के कारण तालिबान के प्रति रूस का दृष्टिकोण भी बदला है, जिसके चलते पूरे यूरेशिया में उसकी रणनीति का पुनर्मूल्यांकन हुआ है. आतंकवाद के मध्य एशिया और रूस तक फैलने की आशंका ने सभी क्षेत्रीय देशों के लिए एक स्थिर अफगानिस्तान को महत्वपूर्ण बना दिया है. मॉस्को के हालिया कदम भी इसी सोच को दर्शाते हैं. आगे चलकर दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग जारी रहेगा, लेकिन इसकी गति सीमित और संतुलित रहने की संभावना है. वहीं, दोनों के संबंधों का मुख्य केंद्र आतंकवाद-रोधी प्रयासों और सुरक्षा सहयोग पर रहेगा, क्योंकि व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति अभी भी दोनों देशों की प्राथमिक चिंता बनी हुई है.
राजोली सिद्धार्थ जयप्रकाश ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में जूनियर फ़ेलो हैं.
शिवम शेखावत ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में जूनियर फ़ेलो हैं.
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Rajoli Siddharth Jayaprakash is a Junior Fellow with the ORF Strategic Studies programme, focusing on Russia’s foreign policy and economy, and India-Russia relations. Siddharth is a ...
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Shivam Shekhawat is a Junior Fellow with ORF’s Strategic Studies Programme. Her research focuses primarily on India’s neighbourhood- particularly tracking the security, political and economic ...
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