ई-बसें भारत के शहरों की तस्वीर बदल रही हैं लेकिन इनके बढ़ते इस्तेमाल ने बिजली सिस्टम पर नया दबाव भी खड़ा कर दिया है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि सही रणनीति अपनाई जाए तो यही ई-बसें भविष्य में बिजली ग्रिड की सबसे बड़ी ताकत बन सकती हैं. पढ़ें, कैसे ट्रांसपोर्ट और बिजली का यह नया रिश्ता शहरों का भविष्य तय करेगा.
भारत में इलेक्ट्रिक बसों यानी ई-बसों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है. पीएम-ईबस सेवा योजना में 50 से ज्यादा शहरों में 10,000 से ज्यादा ई-बसें पहले ही चल रही हैं, 20,000 बसें और आने वाली हैं. इसके अलावा पीएम ई-ड्राइव योजना के तहत 10,900 और बसों का लक्ष्य है. यह बदलाव चुनौती भी है और मौका भी.
आमतौर पर एक ई-बस बहुत ही बिजली खाती है. मसलन, 12 मीटर लंबी ई-बस की बैटरी क्षमता 200-400 kWh होती है. इन बसों को हाई-पावर डिपो चार्जिंग चाहिए, जो आमतौर पर 50-150 kW की होती है. इन्हें ज्यादातर रात में चार्ज किया जाता है, जिससे डिपो पर बिजली की मांग बहुत बढ़ जाती है. करीब 100 बसों की चार्जिंग में 4 से 5 MW तक बिजली लग सकती है. वहीं बड़े डिपो में यह मांग 60-70 MW तक जा सकती है. इतनी तेजी से बढ़ता लोड पूरे सिस्टम में बदलाव चाहता है. ई-बसें साफ और आधुनिक पब्लिक ट्रांसपोर्ट की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही हैं, लेकिन इन्हें चलाने के लिए भारी बिजली सप्लाई की जरूरत पड़ती है. बड़े डिपो में एक साथ चार्जिंग होने से बिजली खपत कई गुना बढ़ जाती है, जिससे स्मार्ट ग्रिड, बेहतर प्लानिंग और नई चार्जिंग व्यवस्था की जरूरत महसूस हो रही है.
भारत में पब्लिक EV चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर भी तेजी से बढ़ा है. फरवरी 2022 में करीब 1,800 चार्जिंग स्टेशन थे, 2025 के बीच में बढ़कर 29,000 से भी ज्यादा हो गए. इसलिए वितरण से पहले ग्रिड प्लानिंग, टैरिफ डिजाइन और बिजली की मांग से जुड़ी समस्याओं को हल करना जरूरी हो गया है.
नेशनल स्मार्ट ग्रिड मिशन पहले ही चेतावनी दे चुका है कि अनियंत्रित EV चार्जिंग का लोड शहरों में सप्लाई प्रभावित कर सकता है. दूसरी तरफ, भारत में पब्लिक EV चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर भी तेजी से बढ़ा है. फरवरी 2022 में करीब 1,800 चार्जिंग स्टेशन थे, 2025 के बीच में बढ़कर 29,000 से भी ज्यादा हो गए. इसलिए वितरण से पहले ग्रिड प्लानिंग, टैरिफ डिजाइन और बिजली की मांग से जुड़ी समस्याओं को हल करना जरूरी हो गया है.
भारत की बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) की माली हालत फिलहाल सही नहीं है. मार्च 2024 तक इन्हें 84 बिलियन डॉलर का घाटा हुआ है. इसकी बड़ी वजह लागत और राजस्व के बीच का अंतर तो है ही, बिलिंग और वसूली भी है.
घरों और खेती के लिए दी जाने वाली सब्सिडी वाली बिजली के मुकाबले, ई-बस चार्जिंग की मांग मीटर से मापी जा सकती है. इससे DISCOMs को अपनी लागत निकालने का भरोसेमंद तरीका मिलता है. लेकिन ज्यादा बिजली दरें DISCOMs की वसूली और बस सेवाओं की आर्थिक स्थिति के बीच संतुलन बिगाड़ सकती हैं. फिर भारत में ई-बसों की शुरुआती कीमत डीजल बसों से 30-70 फीसदी ज्यादा है. बिजली दरों में बढ़ोतरी मुनाफा कम करेगी और ग्रॉस कॉस्ट कॉन्ट्रैक्ट मॉडल पर दबाव डालेगी, जिस पर ज्यादातर ई-बस प्रोजेक्ट चल रहे हैं.(1) ई-बसों का संचालन अभी भी महंगा माना जाता है, क्योंकि उनकी शुरुआती कीमत डीजल बसों से काफी ज्यादा है. ऐसे में अगर बिजली टैरिफ बढ़ते हैं, तो ऑपरेटर्स का खर्च और बढ़ेगा. एक्सपर्ट्स का कहना है कि सही टैरिफ नीति और बेहतर प्लानिंग के बिना ई-बस मॉडल पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है.
दिल्ली में हुए एक पायलट प्रोजेक्ट ने दिखाया है कि इलेक्ट्रिक वाहन जरूरत पड़ने पर ग्रिड को बिजली वापस भेज सकते हैं. इससे बिजली कंपनियों को लोड मैनेजमेंट आसान करने और ग्रिड को ज्यादा स्थिर बनाने में मदद मिल सकती है. बड़े स्तर पर लागू होने पर यह तकनीक बिजली स्टोरेज की नई व्यवस्था तैयार कर सकती है.
इसके अलावा अप्रैल 2024 से 10 kW से ज्यादा बिजली इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ताओं के लिए टाइम-ऑफ-डे (ToD) टैरिफ लागू किया गया है, जिसे अप्रैल 2025 तक सभी गैर-कृषि उपभोक्ताओं तक बढ़ाया जाएगा. ToD एक तरह से जोखिम भी है और मौका भी. शाम में चार्जिंग महंगी पड़ती है, जबकि रात में बचत है. कई राज्यों में EV के लिए अलग टैरिफ हैं, जो आम व्यावसायिक दरों से 10-20 फीसदी तक कम हैं. हालांकि कई DISCOMs के पास अभी भी वह मीटरिंग और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है, जो ToD को सही तरीके से लागू करने के लिए जरूरी है.
इस समस्या का एक बड़ा समाधान ई-बसों को बिजली ग्रिड से बेहतर तरीके से जोड़ना है, जिससे व्हीकल-टु-ग्रिड (V2G) जैसी तकनीक का इस्तेमाल हो सके. खड़ी हुई ई-बस असल में 200-400 kWh की बिना इस्तेमाल की बैटरी होती है. यानी बिजली स्टोरेज का बड़ा स्रोत. V2G तकनीक बिजली की मांग को संभालने, ग्रिड को स्थिर रखने और रिन्यूएबल एनर्जी को बेहतर तरीके से जोड़ने में मदद कर सकती है. दिल्ली में हुए एक पायलट प्रोजेक्ट ने दिखाया है कि इलेक्ट्रिक वाहन जरूरत पड़ने पर ग्रिड को बिजली वापस भेज सकते हैं. इससे बिजली कंपनियों को लोड मैनेजमेंट आसान करने और ग्रिड को ज्यादा स्थिर बनाने में मदद मिल सकती है. बड़े स्तर पर लागू होने पर यह तकनीक बिजली स्टोरेज की नई व्यवस्था तैयार कर सकती है.
ई-बसें भविष्य में DISCOMs के लिए कमाई का बड़ा जरिया बन सकती हैं, लेकिन इसके लिए सही टैरिफ नीति, स्मार्ट लोड मैनेजमेंट और रिन्यूएबल एनर्जी के बेहतर इस्तेमाल की जरूरत होगी.
दिल्ली में BSES राजधनी पावर लिमिटेड (BRPL) के एक पायलट प्रोजेक्ट ने दिखाया कि V2G चार्जिंग के जरिए EV ग्रिड को बिजली वापस भेज सकते हैं. यानी EV बिजली वितरण कंपनियों को लोड मैनेजमेंट और ग्रिड को ज्यादा लचीला बनाने में मदद कर सकते हैं.(2) अगर इसे बड़े पैमाने पर लागू किया जाए, तो V2G अतिरिक्त बिजली स्टोरेज क्षमता दे सकता है. अगर कोई ई-बस दोपहर में सोलर से चार्ज हो और शाम 6 से 9 बजे के बीच ज्यादा मांग के समय बिजली वापस दे, तो वह ग्रिड सर्विस यूनिट बन सकती है. बस ऑपरेटर्स अतिरिक्त कमाई भी कर सकते हैं.
आगे बढ़ने के लिए तीन क्षेत्रों में मिलकर काम करने की जरूरत है.
V2G के लिए नियम और ढांचा: सरकार, मंत्रालय, प्राधिकरण वसहित सभी भागीदारों को इसके लिए नियम तय करने चाहिए. इससे ई-बसों को ग्रिड सेवाओं से जुड़ने का मौका मिलेगा. अभी दिल्ली में लगभग 40.11 फीसदी इलेक्ट्रिक वाहनों को चार्ज करने में राष्ट्रीय बिजली का इस्तेमाल यह दिखाता है कि शहरों में बिजली की मांग तेजी से बढ़ रही है.
ग्रिड-इंटीग्रेटेड प्लानिंग: पीएम ईबस सेवा और पीएम ई-ड्राइव योजनाओं में शहरों को 'ग्रिड-रेडी' बनाना जरूरी हो. शहरों की ई-बस योजनाओं में बिजली मांग के अनुमान और सबस्टेशनों को अपग्रेड करने की जरूरत को शामिल करना होगा, जैसा कि World Bank की Revamped Distribution Sector Scheme में कहा गया है.
नए टैरिफ: राज्य विद्युत नियामक आयोगों को ऐसे EV टैरिफ लागू करने चाहिए, जो कम लोड वाले समय और रिन्यूएबल एनर्जी के इस्तेमाल को बढ़ावा दें. उन्हें डिमांड चार्ज में भी बदलाव करना चाहिए.
शहरों में बढ़ती मांग: EV चार्जिंग के लिए तेजी से बढ़ती बिजली मांग यह दिखाती है कि ऐसे बिजली वितरण सिस्टम विकसित करना जरूरी है, जो इस बढ़ते लोड को संभाल सकें और बिजली कंपनियों को बेहतर लोड मैनेजमेंट में मदद दें.
ई-बसें भविष्य में DISCOMs के लिए कमाई का बड़ा जरिया बन सकती हैं, लेकिन इसके लिए सही टैरिफ नीति, स्मार्ट लोड मैनेजमेंट और रिन्यूएबल एनर्जी के बेहतर इस्तेमाल की जरूरत होगी. एक्सपर्ट्स का कहना है कि आने वाले सालों में लिए गए फैसले तय करेंगे कि ई-बसें बिजली सिस्टम को मजबूत करेंगी या उस पर अतिरिक्त दबाव बढ़ाएंगी. ई-बस सिर्फ एक टिकाऊ परिवहन साधन नहीं है, बल्कि यह स्थानीय ऊर्जा सिस्टम का भी अहम हिस्सा बनती जा रही है. ई-बसें जिस मात्रा में और जितनी देर तक बिजली इस्तेमाल करती हैं, उससे DISCOMs के लिए कमाई के नए रास्ते खुल सकते हैं. सवाल है कि DISCOMs इस नए मौके का कितना फायदा उठा पाएंगी.
(1) Gross Cost Contract एक ऐसा मॉडल है, जिसमें पब्लिक ट्रांसपोर्ट चलाने वाली कंपनी को हर किलोमीटर के हिसाब से तय रकम दी जाती है. किराए से होने वाली कमाई सरकार या संबंधित सरकारी एजेंसी के पास रहती है और यात्रियों की संख्या कम या ज्यादा होने का जोखिम भी वही उठाती है.
(2) एक ऐसी तकनीक है, जिसमें इलेक्ट्रिक वाहन बिजली ग्रिड से बिजली लेने के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर ग्रिड को बिजली वापस भी दे सकते हैं.The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.
Dr Nandan H Dawda is a Fellow with the Urban Studies programme at the Observer Research Foundation. He has a bachelor's degree in Civil Engineering and ...
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