एआई इंसानों जैसी रचनाएँ बना रहा है जिससे कलाकारों की कमाई और अधिकारों पर असर पड़ रहा है. अगर रचनाकारों को सही फायदा नहीं मिला तो नई रचनाएँ कम होंगी और एआई भी कमजोर पड़ेगा. समझें कि किस तरह संतुलन जरूरी है.
यह लेख वर्ल्ड क्रिएटिविटी एंड इनोवेशन डे 2026: अब कल्पना भी ऑटोमेटेड? नामक श्रृंखला का हिस्सा है.
रचनात्मकता लंबे समय से मानव बुद्धिमत्ता की एक प्रमुख पहचान मानी जाती रही है. लेकिन आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) में हो रही प्रगति इस सीमा को धुंधला करने लगी है. जनरेटिव एआई सिस्टम अब स्क्रिप्ट लिख सकते हैं, संगीत बना सकते हैं, चित्र तैयार कर सकते हैं, एनीमेशन डिजाइन कर सकते हैं और अलग-अलग कलात्मक शैलियों की नकल भी कर सकते हैं. प्रकाशन, विज्ञापन, फिल्म और गेमिंग जैसे क्षेत्रों में एआई टूल्स तेजी से रचनात्मक प्रक्रियाओं का हिस्सा बनते जा रहे हैं.
एआई सिस्टम विशाल मात्रा में मानव-निर्मित सामग्री पर प्रशिक्षित होते हैं. टेक्स्ट और डेटा माइनिंग (TDM) जैसी प्रक्रियाओं के जरिए ये लाखों किताबों, तस्वीरों, गीतों और लेखों का विश्लेषण करते हैं, ताकि भाषा, संरचना और शैली के पैटर्न को समझ सकें. इससे वे ऐसे परिणाम तैयार कर पाते हैं जो रचनात्मक कार्यों जैसे लगते हैं. यह क्षमता उन्हें तेजी से और बड़े पैमाने पर सामग्री तैयार करने में सक्षम बनाती है, जिससे उत्पादन लागत कम होती है और रचनाकारों के लिए नए उपकरण उपलब्ध होते हैं.
अगर नई रचनाएँ नहीं बनेंगी, तो एआई के नतीजे कमजोर और कम विविध होंगे. जनरेटिव एआई इंसानों की रचनात्मकता पर निर्भर है, लेकिन उसी को कमजोर भी करता है. यही इसका बड़ा विरोधाभास है. इसलिए कॉपीराइट और एआई के बीच संतुलन बनाना जरूरी है, ताकि रचनात्मकता बनी रहे.
इस विकास ने एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है. एआई मॉडल अक्सर कॉपीराइट वाली सामग्री पर बिना लेखक या अधिकार धारकों की स्पष्ट अनुमति के प्रशिक्षित किए जाते हैं. इसके बाद ये सिस्टम ऐसा कंटेंट बना सकते हैं जो उन्हीं मूल कार्यों से प्रतिस्पर्धा करता है, जिनसे इन्हें प्रशिक्षित किया गया था. यदि एआई बिना रचनाकारों को भुगतान किए उनकी शैली की नकल कर सकता है या वैकल्पिक सामग्री बना सकता है, तो कॉपीराइट कार्यों का आर्थिक मूल्य घट सकता है. समय के साथ, इससे नए रचनात्मक कार्यों के निर्माण के लिए मिलने वाले प्रोत्साहन कमजोर हो सकते हैं. दूसरी ओर, जनरेटिव एआई खुद भी लगातार नए मानव-निर्मित कार्यों पर निर्भर रहता है. अगर नई रचनाएँ नहीं बनेंगी, तो एआई के नतीजे कमजोर और कम विविध होंगे. जनरेटिव एआई इंसानों की रचनात्मकता पर निर्भर है, लेकिन उसी को कमजोर भी करता है. यही इसका बड़ा विरोधाभास है. इसलिए कॉपीराइट और एआई के बीच संतुलन बनाना जरूरी है, ताकि रचनात्मकता बनी रहे.
कॉपीराइट से संरक्षित रचनात्मक कार्यों को ‘नॉन-राइवलरस‘ माना जाता है, यानी एक व्यक्ति द्वारा किसी कार्य का उपयोग करने से दूसरे व्यक्ति की उपयोग करने की क्षमता कम नहीं होती. एक बार बनने के बाद, ऐसे कार्यों की कई प्रतियां बनाई जा सकती हैं और उन्हें एक साथ कई लोग उपयोग कर सकते हैं, बिना उनके खत्म हुए.
यह एक आर्थिक चुनौती पैदा करता है: जहाँ मूल रचना बनाने की लागत अक्सर अधिक होती है, वहीं उसकी अतिरिक्त प्रतियां बनाने की लागत बहुत कम होती है. यदि पर्याप्त सुरक्षा न हो, तो ऐसे कार्यों की आसानी से नकल और वितरण किया जा सकता है, जिससे रचनाकार अपनी लागत नहीं निकाल पाएंगे. इसे अर्थशास्त्र में ‘फ्री-राइडर समस्या‘ कहा जाता है, जहाँ लोग बिना भुगतान किए दूसरों के कार्य का लाभ उठा लेते हैं, जिससे नए कार्य बनाने का प्रोत्साहन कम हो सकता है.
कॉपीराइट इस समस्या का समाधान करने की कोशिश करता है. यह लेखकों को सीमित समय के लिए उनके कार्यों के पुनरुत्पादन, वितरण और लाइसेंसिंग पर विशेष अधिकार देता है. इससे रचनाकार अपने श्रम और निवेश से आर्थिक लाभ कमा सकते हैं. आर्थिक कारणों के अलावा, अन्य सिद्धांत भी कॉपीराइट को सही ठहराते हैं. एक विचार यह है कि व्यक्ति को अपनी रचना पर स्वाभाविक अधिकार होता है. दूसरा दृष्टिकोण यह कहता है कि रचनात्मक कार्य लेखक के व्यक्तित्व का विस्तार होते हैं, इसलिए उन पर उनका नैतिक अधिकार भी होना चाहिए. तीसरा तर्क यह है कि समाज में योगदान के लिए रचनाकारों को पुरस्कृत किया जाना चाहिए, और कॉपीराइट एक अस्थायी एकाधिकार के रूप में उन्हें इसका लाभ देता है.
मूल रूप से, कॉपीराइट अन्य बौद्धिक संपदा अधिकारों की तरह ज्ञान और रचनात्मकता को आर्थिक मूल्य में बदलने का एक साधन है. यह समाज के कल्याण को बढ़ाता है, क्योंकि यह ऐसे रचनात्मक कार्यों के निर्माण को प्रोत्साहित करता है जो अन्यथा शायद बन ही नहीं पाते.
आर्थिक प्रोत्साहनों के अलावा, अन्य सिद्धांत भी कॉपीराइट संरक्षण को उचित ठहराते हैं. एक दृष्टिकोण यह है कि व्यक्ति को अपनी रचना के फल पर स्वाभाविक संपत्ति अधिकार होता है, यानी लेखक का अपने कार्य पर जन्मजात अधिकार है. दूसरा दृष्टिकोण नैतिक अधिकारों पर जोर देता है, जिसके अनुसार रचनात्मक कार्य लेखक के व्यक्तित्व का विस्तार होते हैं. मूल रूप से, कॉपीराइट अन्य बौद्धिक संपदा अधिकारों की तरह ज्ञान और रचनात्मकता को आर्थिक मूल्य में बदलने का एक साधन है. यह समाज के कल्याण को बढ़ाता है, क्योंकि यह ऐसे रचनात्मक कार्यों के निर्माण को प्रोत्साहित करता है जो अन्यथा शायद बन ही नहीं पाते.
एआई पारंपरिक कॉपीराइट की समझ को काफी हद तक चुनौती देता है. जैसा पहले बताया गया, कई एआई सिस्टम बड़े डेटा सेट पर प्रशिक्षित होते हैं, जिनमें कॉपीराइट वाली सामग्री शामिल होती है, अक्सर बिना लेखकों या अधिकार धारकों की स्पष्ट अनुमति के. इससे यह सवाल उठता है कि क्या एआई प्रशिक्षण के लिए कॉपीराइट सामग्री के उपयोग पर अनुमति या भुगतान जरूरी होना चाहिए. साथ ही, जनरेटिव एआई के बढ़ने से यह भी सवाल पैदा हुआ है कि एआई द्वारा बनाए गए कंटेंट को कैसे देखा जाए और क्या उसे कॉपीराइट संरक्षण मिलना चाहिए.
जब एआई ऐसे रचनात्मक कार्य बनाने लगता है जो मानव कलाकारों के काम से प्रतिस्पर्धा करते हैं, तो दोनों कई बाजारों में एक-दूसरे के विकल्प बन जाते हैं. इससे कुल रचनात्मक सामग्री की मात्रा बढ़ती है, जिससे लोगों द्वारा एक-एक काम के लिए दी जाने वाली कीमत कम हो सकती है. साथ ही उत्पादन की अर्थव्यवस्था भी बदल जाती है. एआई को प्रशिक्षित करने में शुरू में ज्यादा खर्च आता है, लेकिन एक बार तैयार होने के बाद नई सामग्री बनाना बहुत सस्ता हो जाता है. यानी एआई रचनात्मक उत्पादन की लागत को काफी हद तक कम कर देता है.
भविष्य के एआई मॉडलों के लिए उपलब्ध उच्च गुणवत्ता वाला डेटा भी घट सकता है. एआई के दौर में कॉपीराइट को ऐसा होना चाहिए जो मानव रचनात्मकता को बनाए रखे और साथ ही एआई के विकास को भी संभव बनाए.
जैसे-जैसे सामग्री बनाने की लागत घटती है और उसकी मात्रा बढ़ती है, रचनात्मक उद्योगों में प्रतिस्पर्धा भी बदलने लगती है. एआई स्टॉक इमेज, मार्केटिंग और डिजाइन जैसे कामों में इंसानों की जगह ले सकता है, जिससे कलाकारों पर दबाव बढ़ता है. हालांकि यह काम को आसान और सस्ता भी बनाता है. लेकिन इससे कुशल लोगों की जरूरत कम हो सकती है, कमाई घटती है, और लोग नए व अच्छे काम बनाने में कम रुचि लेते हैं.
एआई द्वारा बनाए गए कंटेंट की तेजी से बढ़ोतरी, इसके भविष्य को लेकर गहरी चिंताएँ भी पैदा करती है. मशीन लर्निंग मॉडल बड़े और विविध डेटा पर निर्भर करते हैं, जो ज्यादातर वर्षों से जमा मानव-निर्मित सामग्री होती है. यह डेटा अपने आप उपलब्ध नहीं होता, बल्कि यह उन आर्थिक और संस्थागत व्यवस्थाओं से बनता है जो लोगों को नई सामग्री बनाने के लिए प्रेरित करती हैं.
इससे एआई और मानव रचनात्मकता के बीच एक गहरा संबंध बनता है. अगर रचनात्मक काम के लिए मिलने वाले प्रोत्साहन कमजोर पड़ते हैं, खासकर जहाँ एआई मानव काम की जगह लेता है, तो नई सामग्री का निर्माण कम हो सकता है. इससे भविष्य के एआई मॉडलों के लिए उपलब्ध उच्च गुणवत्ता वाला डेटा भी घट सकता है. एआई के दौर में कॉपीराइट को ऐसा होना चाहिए जो मानव रचनात्मकता को बनाए रखे और साथ ही एआई के विकास को भी संभव बनाए.
एआई डेवलपर्स को डेटा मिलेगा और रचनाकारों को उचित मान्यता और पारिश्रमिक भी मिलेगा. चुनौती यही है कि रचनात्मकता और प्रोत्साहन के बीच संतुलन बनाया जाए-ताकि कॉपीराइट न केवल मानव रचनात्मकता को बनाए रखे, बल्कि एआई के विकास को भी आगे बढ़ा सके.
समय के साथ, यह स्थिति एआई सिस्टम को पुराने या एआई द्वारा ही बनाए गए डेटा पर निर्भर बना सकती है. शोधकर्ताओं का मानना है कि इससे ‘मॉडल कोलैप्स‘ हो सकता है, जिसमें एआई की गुणवत्ता, विविधता और मौलिकता कम हो जाती है. यानी जनरेटिव एआई लंबे समय तक केवल अपने ही बनाए डेटा पर टिक नहीं सकता. उसका विकास अंततः मानव रचनात्मकता पर ही निर्भर रहेगा.
कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि रचनात्मक कार्य केवल पैसे के लिए नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा, पहचान और व्यक्तिगत संतोष के लिए भी किए जाते हैं. फिर भी, आर्थिक प्रोत्साहन सांस्कृतिक उत्पादन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. यदि एआई के कारण कलाकारों के प्रोत्साहन कमजोर पड़ते हैं और रचनात्मक काम कम होता है, तो इससे एआई की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है.
इसलिए नीति-निर्माताओं के सामने चुनौती यह है कि वे रचनाकारों के हित और एआई विकास की जरूरतों के बीच संतुलन बनाएँ. यदि कॉपीराइट सामग्री को बिना रोक-टोक एआई प्रशिक्षण के लिए इस्तेमाल किया जाता है, तो इससे रचनाकारों को नुकसान हो सकता है. वहीं, बहुत सख्त नियम एआई के विकास के लिए जरूरी डेटा तक पहुँच को सीमित कर सकते हैं.
एक समाधान ‘मिश्रित नियमन’ हो सकता है, जिसमें डेटा तक पहुँच और रचनाकारों को भुगतान-दोनों का संतुलन हो. जैसे-सामूहिक लाइसेंसिंग, कानूनी भुगतान व्यवस्था, और डेटा के उपयोग में पारदर्शिता. इससे एआई डेवलपर्स को डेटा मिलेगा और रचनाकारों को उचित मान्यता और पारिश्रमिक भी मिलेगा. अंततः, चुनौती यही है कि रचनात्मकता और प्रोत्साहन के बीच संतुलन बनाया जाए-ताकि कॉपीराइट न केवल मानव रचनात्मकता को बनाए रखे, बल्कि एआई के विकास को भी आगे बढ़ा सके.
The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.
Basu Chandola is an Associate Fellow at the Observer Research Foundation, where his work focuses on the governance of the digital economy, including artificial intelligence, ...
Read More +