AI की दुनिया में अब मुकाबला सिर्फ तकनीक का नहीं, बल्कि ताकत और भरोसे का भी बन चुका है. अमेरिका के सबसे एडवांस AI मॉडल्स को लेकर दुनिया भर में होड़ मची है और भारत भी इस दौड़ में तेजी से आगे बढ़ रहा है. लेकिन बड़ा सवाल यही है — क्या भारत को इन सबसे ताकतवर अमेरिकी AI मॉडल्स तक पूरी पहुंच मिलेगी, या उसे हमेशा सीमित इस्तेमाल तक ही रखा जाएगा?
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7 अप्रैल 2026 को एंथ्रोपिक ने क्लाउड मिथोस प्रीव्यू नाम का नया एआई मॉडल पेश किया. कंपनी का कहना है कि यह कंप्यूटर सेफ्टी से जुड़े कामों में बेहद ताकतवर है. एंथ्रोपिक का दावा है कि मिथोस प्रीव्यू ने हर बड़े ऑपरेटिंग सिस्टम और वेब ब्राउजर में गंभीर कमजोरियां ढूंढ निकाली हैं.
दुनिया भर के सियासी नेता इसे लेकर चिंतित हैं. ब्रिटेन के एआई मंत्री कनिष्क नारायण ने कहा कि क्लॉड मिथोस प्रीव्यू साइबर ताकत में बड़ा बदलाव है. यूनाइटेड किंगडम की सरकारी शोध संस्था एआई सुरक्षा संस्थान (AISI) को ही अमेरिका के बाहर पहली बार इस मॉडल तक पहुंच दी गई. संस्था ने जांच के बाद कहा कि यह मॉडल अपने दम पर ऐसी कमजोरियों का फायदा उठा सकता है, जिन्हें माहिर इंसानों को ढूंढने में कई दिन लगते. बताया जा रहा है कि कई मुल्क इस मॉडल तक पहुंच पाने के लिए एंथ्रॉपिक से बातचीत कर रहे हैं.
एंथ्रोपिक के नए एआई मॉडल क्लॉड मिथोस प्रीव्यू ने दुनिया भर की सरकारों की चिंता बढ़ा दी है. कंपनी का दावा है कि यह मॉडल बड़े कंप्यूटर सिस्टम और वेब ब्राउजर की गंभीर कमजोरियां खुद पहचान सकता है. एंथ्रोपिक ने इस ताकतवर एआई मॉडल की पहुंच फिलहाल अमेरिका की कुछ चुनिंदा कंपनियों तक ही सीमित रखी है. खबर है कि व्हाइट हाउस भी इसके इस्तेमाल को लेकर काफी सतर्क है.
गर किसी तकनीक को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अहम माना जाता है, तो उसे लाइसेंसिंग व्यवस्था के तहत रखा जा सकता है. अमेरिका में इस समय जरूरी सुरक्षा सीमाओं को लेकर भी नई बहस चल रही है.
फिलहाल एंथ्रोपिक ने इस मॉडल तक पहुंच अमेरिका की कुछ दर्जन कंपनियों तक ही सीमित रखी है. इन कंपनियों को यह मॉडल उनके सिस्टम की कमजोरियां ढूंढने और उन्हें ठीक करने के लिए दिया गया है. खबरों के मुताबिक व्हाइट हाउस ने एंथ्रोपिक को ज्यादा लोगों तक पहुंच देने से रोक दिया है, क्योंकि इससे जुड़ी सुरक्षा और प्रसार की चिंताएं काफी गंभीर हैं. भारत में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि इस मॉडल से पैदा हुई चुनौती अभूतपूर्व है. भारत सरकार भी इस मॉडल के लिए एंथ्रॉपिक से बातचीत कर रही है.
अभी यह साफ नहीं है कि बाकी देशों को मिथोस या इसके जैसे ताकतवर एआई मॉडल्स तक पहुंच कैसे मिलेगी. अमेरिका के बाहर कंपनियों और सरकारों को कितनी पहुंच मिलेगी, यह काफी हद तक अमेरिकी कंपनियां और अमेरिकी सरकार तय करेंगी. अगर किसी तकनीक को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अहम माना जाता है, तो उसे लाइसेंसिंग व्यवस्था के तहत रखा जा सकता है. अमेरिका में इस समय जरूरी सुरक्षा सीमाओं को लेकर भी नई बहस चल रही है. दुनिया के कई बड़े देश अब अमेरिका के ताकतवर एआई मॉडल्स तक पहुंच पाने की कोशिश में हैं. जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को इस दौड़ में आगे माना जा रहा है, जबकि बाकी देशों के लिए तस्वीर अभी साफ नहीं है.
अभी ऐसा कोई नियम नहीं है जो ताकतवर एआई मॉडल बनाने वाली कंपनियों को पहुंच साझा करने से रोकता हो. लेकिन ये कंपनियां फिलहाल बहुत सावधानी से आगे बढ़ना चाहती हैं. माना जा रहा है कि कंपनियों को यह भी डर है कि अगर उन्होंने ज्यादा पहुंच दे दी, तो अमेरिकी सरकार बाद में प्रतिबंध लगा सकती है. सबसे बड़ी चिंता उन कोशिशों को लेकर है, जिन्हें एआई विशेषज्ञ डिस्टिलेशन की कोशिश कहते हैं. इसमें चीन और रूस जैसे मुल्क ऐसे मॉडल की खासियत तक पहुंच सकते हैं. व्हाइट हाउस ने भी इस खतरे को गंभीरता से लिया है. बहरहाल, इसके नियमों पर बातचीत शायद अभी से शुरू हो चुकी है. जापान, दक्षिण कोरिया, यूनाइटेड किंगडम, यूरोपीय आयोग, जर्मनी, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे मुल्क इस कतार में आगे माने जा रहे हैं.
भारत के मामले में जरूरत इस बात की है कि भारतीय कंपनियों और सरकार को ताकतवर एआई मॉडल्स तक पहुंच दिलाने के लिए नए नियम बनाए जाएं. इसके लिए भारत और अमेरिका के बीच एक भरोसेमंद एआई कॉरिडोर की जरूरत है.
भारत अमेरिका का औपचारिक सहयोगी देश नहीं है. इसलिए पहले जेट इंजन और ड्रोन जैसी तकनीकों पर निर्यात छूट हासिल करने में भारत को बहुत मेहनत करनी पड़ी थी. अमेरिका की सरकारी व्यवस्था को तैयार करने में वहां भारत समर्थक अफसरों की बड़ी भूमिका रही. आखिरकार व्हाइट हाउस के रणनीतिक दबाव से यह संभव हो पाया. 2005 से 2008 के बीच हुए भारत-अमेरिका परमाणु समझौते और बाद में बाइडेन सरकार के दौरान शुरू हुई महत्वपूर्ण और उभरती तकनीक पहल से जुड़े लोग बताते हैं कि भारत तक सुरक्षित तकनीक पहुंचाना कितना बड़ा काम होता है.
भारत एआई ढांचे में अमेरिकी निवेश का बड़ा केंद्र बन चुका है. माइक्रोसॉफ्ट और गूगल ने सिर्फ पिछले आठ महीनों में भारत में 30 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश किया है. इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट में 200 अरब डॉलर के निवेश ऐलान भी हुए. खाड़ी क्षेत्र और न्यूयॉर्क के निवेशक भारत में खास कामों के लिए बनाए जा रहे बड़े भाषा मॉडल्स (LLM) और स्टार्टअप में भी निवेश बढ़ा रहे हैं.
भारत तेजी से एआई निवेश का बड़ा केंद्र बनता जा रहा है. माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और दूसरी अमेरिकी कंपनियां भारत में अरबों डॉलर लगा रही हैं. इसके साथ ही बड़े भाषा मॉडल और नए एआई कारोबारों में भी विदेशी निवेश लगातार बढ़ रहा है. अमेरिका के लिए भारत सिर्फ बड़ा बाजार नहीं, बल्कि एआई विस्तार की अहम जगह बन चुका है.
अमेरिका और भारत दोनों के लिए एक अलग एआई कॉरिडोर बनाना कई वजहों से जरूरी है. पहली वजह अमेरिका का नजरिया है. भारत एआई ढांचे में अमेरिकी निवेश का बड़ा केंद्र बन चुका है. माइक्रोसॉफ्ट और गूगल ने सिर्फ पिछले आठ महीनों में भारत में 30 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश किया है. इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट में 200 अरब डॉलर के निवेश ऐलान भी हुए. खाड़ी क्षेत्र और न्यूयॉर्क के निवेशक भारत में खास कामों के लिए बनाए जा रहे बड़े भाषा मॉडल्स (LLM) और स्टार्टअप में भी निवेश बढ़ा रहे हैं.
माइक्रोसॉफ्ट के मुताबिक बिग टेक का मकसद एआई को बड़े पैमाने पर प्रसार करना है. गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई का कहना है कि एआई के साथ भारत बहुत तेजी से आगे बढ़ेगा. इसी वजह से गूगल भारत में प्रोडक्ट, ट्रेनिंग और ढांचे समेत पूरा निवेश कर रहा है. एंथ्रोपिक के प्रमुख डारियो अमोदेई ने भी कहा है कि एआई के भविष्य को तय करने में भारत की बहुत अहम भूमिका होगी. एंथ्रॉपिक ने 2025 में भारत में अपना दफ्तर खोला और भारतीय कारोबारी समूहों के साथ बड़े समझौते किए.
कई मायनों में भारत अमेरिकी एआई प्लान का बड़ा उदाहरण बन चुका है. इसका मकसद अमेरिकी तकनीकों को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना है. इसके पीछे सोच यह है कि जितने ज्यादा लोग अमेरिकी तकनीक इस्तेमाल करेंगे, उतना ही कम वे चीन की तकनीक पर निर्भर होंगे. अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत एक बड़ा बाजार है. सुंदर पिचाई ने भी कहा है कि भारतीय यूजर दुनिया में वॉइस और फोटो से सर्च करने वालों में सबसे आगे हैं.
अगर भारतीय यूजर, कंपनियां और सरकार यहां निवेश करने वाली अमेरिकी कंपनियों के सबसे अच्छे मॉडल्स तक पहुंच नहीं पा सके, तो भारत के बाजार तक पहुंच मुश्किल बन सकती है और दूसरे रास्तों तलाश की जाएगी.
सुंदर पिचाई से लेकर डारियो अमोदेई तक, कई बड़े तकनीकी दिग्गज मानते हैं कि एआई के भविष्य में भारत की भूमिका बेहद अहम होगी. इसी वजह से विदेशी कंपनियां भारत में अपने दफ्तर खोल रही हैं, नए समझौते कर रही हैं और एआई ढांचे पर तेजी से पैसा लगा रही हैं. एआई ढांचे, इस्तेमाल, बड़े स्तर पर विस्तार और कारोबारी समझौतों के बीच जो साझेदारी बन रही है, वह सिर्फ बाजार और निवेश पर नहीं बल्कि भरोसे पर भी टिकी है. अगर भारतीय यूजर, कंपनियां और सरकार यहां निवेश करने वाली अमेरिकी कंपनियों के सबसे अच्छे मॉडल्स तक पहुंच नहीं पा सके, तो भारत के बाजार तक पहुंच मुश्किल बन सकती है और दूसरे रास्तों तलाश की जाएगी.
भारतीय नजरिए से भी अमेरिका के साथ ऐसा ढांचा बनाना जरूरी है, जिससे भारतीय कंपनियों, यूजर्स और सरकारी अफसरों को इन मॉडल्स तक कानूनी और आसान पहुंच मिल सके. सवाल है कि भारत के पास और क्या रास्ते हैं? अभी दुनिया में सिर्फ कुछ ही कंपनियां ऐसे ताकतवर मॉडल बना पा रही हैं और जितनी जानकारी है, वे सभी अमेरिकी कंपनियां हैं. चीन के मॉडल्स अभी उनसे 7 से 18 महीने पीछे माने जाते हैं.
फिर भी जब चीन के मॉडल्स आएंगे, तो उन्हें भारत में इस्तेमाल करना फायदा कम और खतरा ज्यादा माना जा रहा है. भारत की चीन के साथ लंबी और विवादित सीमा है. ऐसे में चीन के ऐसे मॉडल्स इस्तेमाल करना जोखिम भरा होगा, जो भारतीय तंत्र की कमजोरियां पहचान और ठीक कर सकें. भारत के सामने अब बड़ा सवाल यह है कि उसे दुनिया के सबसे ताकतवर एआई मॉडल्स तक पहुंच कैसे मिलेगी. फिलहाल ऐसी तकनीक बनाने में अमेरिकी कंपनियां सबसे आगे हैं, जबकि चीन अभी भी कई महीनों पीछे माना जा रहा है. भारत के लिए चीन के एआई मॉडल्स इस्तेमाल करना सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि सुरक्षा का भी मामला है.
भारत और अमेरिका के बीच एआई कॉरिडोर बनाने की मांग अब तेज हो रही है. माना जा रहा है कि अगर भारत को लगातार उन्नत अमेरिकी मॉडल्स तक पहुंच नहीं मिली, तो देश को कमजोर और दूसरे दर्जे के विकल्पों पर निर्भर रहना पड़ सकता है.
इस हालत में भारतीय डेवलपर्स के पास दो ही रास्ते हैं - चीन के ओपन सोर्स मॉडल्स या भारत के अपने मॉडल्स. तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि चीन के ओपन सोर्स मॉडल्स को सुरक्षित तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है. लेकिन रणनीतिक मामलों के जानकार इससे सहमत नहीं हैं. वहीं भारतीय डेवलपर्स राजनीति से ज्यादा उन मौकों में दिलचस्पी रखते हैं, जो ऐसे मॉडल्स दे सकते हैं.
जब तक भारत के अपने मॉडल्स पूरी तरह मजबूत विकल्प नहीं बन जाते, तब तक अमेरिकी एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस (API) पर निर्भर रहना मजबूरी है. इसलिए जरूरी है कि भारत को हर समय सबसे ताकतवर अमेरिकी मॉडल्स तक पहुंच मिलती रहे. इसी वजह से भारत और अमेरिका की सरकारों और कंपनियों को मिलकर जल्द से जल्द भरोसेमंद एआई कॉरिडोर का ढांचा तैयार करना चाहिए. वरना भारत हमेशा दूसरे दर्जे के विकल्पों पर निर्भर रह जाएगा. भारत और अमेरिका के बीच एआई कॉरिडोर बनाने की मांग अब तेज हो रही है. माना जा रहा है कि अगर भारत को लगातार उन्नत अमेरिकी मॉडल्स तक पहुंच नहीं मिली, तो देश को कमजोर और दूसरे दर्जे के विकल्पों पर निर्भर रहना पड़ सकता है.
दूसरी तरफ अमेरिकी कंपनियों को भी यह समझना होगा कि अगर भारत को चुनिंदा मुल्कों की सूची से बाहर रखा गया, तो इसका असर गंभीर हो सकता है. इसलिए ऐसा ढांचा जरूरी है, जो अमेरिका और भारत दोनों में ऐसे नियम बनने से रोक सके, जो कई सालों से बढ़ रही तकनीकी साझेदारी को नुकसान पहुंचाएं. भारत का बाजार अभी खुला है, लेकिन इसे हमेशा के लिए तय मान लेना गलत होगा. आखिर में पहुंच देना या रोकना किसी भी पक्ष के हाथ में होता है.
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Rudra Chaudhuri is a Vice President. His research and policy work focuses on the important role of technology and innovation in diplomacy, statecraft, development and ...
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