अगर आपकी पसंदीदा डिश बिना मांस के भी वैसा ही स्वाद दे, तो क्या होगा? जानिए, कैसे मीट के शाकाहारी विकल्प स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए फायदेमंद साबित हो रहे हैं.
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हर साल, विश्व पर्यावरण दिवस हमें प्रकृति की रक्षा करने की हमारी सामूहिक जिम्मेदारी की याद दिलाता है. हालांकि हम अक्सर जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए रिन्यूएबल एनर्जी और इलेक्ट्रिक वाहनों को मुख्य जरिया मानते हैं, लेकिन सच यह है कि भोजन का उत्पादन पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाले कामों में से एक है. विशेष रूप से खेती-बाड़ी की गतिविधियां इस नुकसान में बहुत बड़ी हिस्सेदारी रखती हैं, जो कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का 61-81 प्रतिशत, पर्यावरण के अम्लीकरण का 79 प्रतिशत, और जल प्रदूषण का 95 प्रतिशत हिस्सा पैदा करती हैं. हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि साल 2050 तक दुनिया की संभावित 10 अरब आबादी के लिए भोजन की मांग को पूरा किया जाए, वह भी तब जब लोगों का खान-पान मांस पर बहुत अधिक निर्भर है. अगर हम भोजन उत्पादन के इसी पुराने तरीके को अपनाते रहे, तो हमारे प्राकृतिक संसाधन पूरी तरह खत्म हो जाएंगे और दुनिया में मोटापे की समस्या तेजी से बढ़ेगी.
मांस और पशुधन उत्पादन से होने वाला नुकसान इतना अधिक है कि अकेले पशुपालन से इंसानों द्वारा पैदा होने वाले नाइट्रोजन का एक-तिहाई हिस्सा निकलता है. अनुमान है कि साल 2030 तक, वैश्विक तापमान वृद्धि को 2°C और 1.5°C तक सीमित रखने के लिए तय किए गए ग्रीनहाउस गैस बजट का क्रमशः 37 प्रतिशत और 49 प्रतिशत हिस्सा अकेले मांस उत्पादन ही खा जाएगा. साल 2034 तक इस सेक्टर का बाजार मूल्य 2 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक होने की उम्मीद है. आर्थिक और पारंपरिक महत्व से अलग, मांस के उत्पाद शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्व प्रदान करते हैं और यह हमारे भोजन का एक अहम हिस्सा हैं. हालांकि, मांस की बढ़ती खपत पर्यावरण और सेहत दोनों के लिए हानिकारक है, जिससे लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां और मेटाबॉलिक डिसीज होने का खतरा बढ़ जाता है. भले ही शाकाहारी और वीगन डाइट का पर्यावरण पर बहुत कम असर पड़ता है, लेकिन दुनिया की सिर्फ 5 प्रतिशत आबादी ही पूरी तरह शाकाहारी है, जबकि ज्यादातर लोग फ्लेक्सिटेरियन (जो कभी-कभार मांस खाते हैं) हैं.
आर्थिक और पारंपरिक महत्व से अलग, मांस के उत्पाद शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्व प्रदान करते हैं और यह हमारे भोजन का एक अहम हिस्सा हैं. हालांकि, मांस की बढ़ती खपत पर्यावरण और सेहत दोनों के लिए हानिकारक है, जिससे लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां और मेटाबॉलिक डिसीज होने का खतरा बढ़ जाता है.
मीट सब्स्टीट्यूट का मकसद न सिर्फ मांस पर निर्भरता घटाकर प्रोटीन देना है, बल्कि पर्यावरण और सेहत पर पड़ने वाले बुरे असर को कम करना भी है. मीट सब्स्टीट्यूट मुख्य रूप से पौधों से बने खाद्य पदार्थ हैं, जिन्हें मांस के स्वाद और बनावट की तरह तैयार किया जाता है. इन्हें 'मीट एनालॉग्स' या 'इमिटेशन मीट' भी कहते हैं. यह 'वैकल्पिक प्रोटीन' से जुड़ा है, जो भोजन के पोषक तत्वों को बदले बिना प्रोटीन की कमी पूरी करता है. स्थानीय स्तर पर मिलने वाले प्रोटीन-युक्त स्रोतों से टोफू, टेम्पेह और फर्मेंटेड ब्रेडफ्रूट जैसे विकल्प बनाए गए हैं. दुनिया का एक-चौथाई कार्बन फुटप्रिंट भोजन से आता है, इसलिए मीट सब्स्टीट्यूट अपनाना जलवायु सुधार के लिए एक अच्छा विकल्प हो सकता है.
कई रिसर्च में पारंपरिक मांस के मुकाबले मीट सब्स्टीट्यूट के पोषक तत्वों को बेहतर पाया गया है. ज़्यादा रेड मीट खाने से होने वाले नुकसान-जैसे डायबिटीज, कैंसर, दिल की बीमारी और जानवरों से फैलने वाली बीमारियां-सभी जानते हैं. पौधों से बने मीट विकल्पों में फायदे और चुनौतियाँ दोनों हैं. कई देशों के प्रोडक्ट्स पर हुई स्टडीज से पता चलता है कि इनकी न्यूट्रिशन क्वालिटी में काफी अंतर है. कई प्लांट-बेस्ड प्रोडक्ट्स में साधारण मांस की तुलना में ज़्यादा फाइबर और कम सैचुरेटेड फैट होता है. कुछ प्रोडक्ट्स में प्रोटीन की मात्रा बराबर रखते हुए कैलोरी और फैट को कम किया गया है.
पर्यावरण के नजरिए से, लाइफ साइकिल असेसमेंट (LCA) स्टडीज लगातार पारंपरिक पशु उत्पादों की तुलना में मीट सब्स्टीट्यूट के फायदे दिखाती हैं. कई रिसर्च निष्कर्ष निकालते हैं कि मीट एनालॉग का उत्पादन पारंपरिक मांस उत्पादन की तुलना में काफी ज्यादा टिकाऊ है. दालों और फलियों पर आधारित विकल्प अपनी नाइट्रोजन-फिक्सेशन क्षमता के कारण N_2O और NH_3 का कम उत्सर्जन करते हैं, क्योंकि उन्हें बहुत कम या बिल्कुल नाइट्रोजन फर्टिलाइजर की जरूरत नहीं होती है. नतीजतन, कई प्लांट-बेस्ड प्रोटीन सिस्टम पशुधन-आधारित सिस्टम की तुलना में कम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित करते हैं. रिसर्च से पता चलता है कि मांस के प्रोडक्ट्स को प्लांट-बेस्ड विकल्पों से बदलना जलवायु और जैव विविधता दोनों के लिए फायदेमंद हो सकता है. यह कदम संभावित रूप से जलवायु सुधार के फायदों को दोगुना कर सकता है और 2050 तक इकोसिस्टम को होने वाले नुकसान को आधा कर सकता है. हमारी रोजमर्रा की डाइट में खाए जाने वाले प्लांट-बेस्ड फूड्स, एनिमल-बेस्ड फूड्स की तुलना में आधी ग्रीनहाउस गैसें पैदा करते हैं.
जैसे-जैसे तकनीकी विकास जारी रहेगा और उपभोक्ताओं में जागरूकता बढ़ेगी, इस गर्म होती दुनिया में पोषण, पर्यावरण सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने के प्रयासों में मीट सब्स्टीट्यूट्स एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं.
'फ्यूचर फूड्स' में पब्लिश एक स्टडी बताती है कि जो मीट विकल्प मांस के स्वाद और बनावट की नकल करते हैं, वे शाकाहारी भोजन को बढ़ावा देने के बजाय पशु मांस की मांग को कम करने में अधिक प्रभावी हो सकते हैं. मनोवैज्ञानिकों ने एक स्टडी में पाया है कि प्लांट-बेस्ड मीट विकल्प 'एक ऐसा सेहतमंद और पर्यावरण के अनुकूल समाधान देते हैं जो उपभोक्ताओं की पसंद और व्यवहार को ध्यान में रखता है.' इसके अलावा, प्लांट-बेस्ड मीट विकल्प वजन घटाने और मसल्स बनाने में भी मदद कर सकते हैं. बढ़ती पर्यावरणीय चिंताओं ने मीट के विकल्पों की लोकप्रियता और खपत को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है. प्लांट-बेस्ड मीट पर किए गए एक उपभोक्ता सर्वे के अनुसार, 52 प्रतिशत लोगों ने माना कि यह उनके पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने में असरदार है, और 51 प्रतिशत लोगों ने इसे सेहत के फायदों से जोड़कर देखा. इसके अलावा, टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल पैकेजिंग भी फ्लेक्सिटेरियन ग्राहकों को किसी दूसरे प्रोडक्ट के मुकाबले बिना मांस वाले खाद्य पदार्थ को चुनने के लिए बढ़ावा देती है.
प्लांट-बेस्ड मीट का सेवन जीवनशैली में एक ऐसे बदलाव को दिखाता है जो स्थिरता के लक्ष्यों से मेल खाता है. जैसे-जैसे तकनीकी विकास जारी रहेगा और उपभोक्ताओं में जागरूकता बढ़ेगी, इस गर्म होती दुनिया में पोषण, पर्यावरण सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने के प्रयासों में मीट सब्स्टीट्यूट्स एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं.
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Dr. Shoba Suri is a Senior Fellow with ORFs Health Initiative. Shoba is a nutritionist with experience in community and clinical research. She has worked on nutrition, ...
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