बांग्लादेश में महिलाएं कारखानों से लेकर आंदोलनों तक हर मोर्चे पर आगे दिखती हैं लेकिन सत्ता के गलियारों में उनकी आवाज अब भी कमजोर है. पढ़िए, इस विरोधाभास की पूरी कहानी.
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बांग्लादेश के लोकतंत्र के सफर में एक अजीब उलझन दिखता है. देश के बड़े नेतृत्व में महिलाओं के आगे रहने, भारी संख्या में महिला वोटरों के निकलने और कपड़ों के कारोबार (रेडीमेड गारमेंट सेक्टर) में उनकी बड़ी आर्थिक भागीदारी के बावजूद, असली राजनीति में उनका दखल बहुत कम है. यह लेख दिखाता है कि कैसे मुख्य राजनीतिक दलों- खासकर अवामी लीग (AL) और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP)- की अंदरूनी कमियों और समाज के पुराने तौर-तरीकों ने दोनों सरकारों के राज में इस भेदभाव को बनाए रखा. यह लेख मांग करता है कि राजनीति में भागीदारी का एक ऐसा बेहतर तरीका अपनाया जाए, जो सिर्फ दिखावे के लिए नहीं बल्कि बांग्लादेश के राजनीतिक संगठनों में महिलाओं को उनका असली हक और प्रभाव दिला सके.
बांग्लादेश की राष्ट्रीय संसद (जातीय संसद) में कुल 350 सीटें हैं, जिनमें से 300 सीटों पर सीधे चुनाव होते हैं. बाकी बची 50 सीटें ‘महिला सांसदों के लिए आरक्षित’ (RSWP) होती हैं, जो पार्टियों को चुनाव में मिले वोटों के अनुपात में दी जाती हैं. पुरुषों के दबदबे वाली पार्टियों, पैसों की कमी और समाज में महिलाओं की भूमिका को लेकर पुरानी सोच ने मिलकर महिलाओं को सीधे चुनाव लड़कर संसद में पहुंचने से रोका है.
यह लेख मांग करता है कि राजनीति में भागीदारी का एक ऐसा बेहतर तरीका अपनाया जाए, जो सिर्फ दिखावे के लिए नहीं बल्कि बांग्लादेश के राजनीतिक संगठनों में महिलाओं को उनका असली हक और प्रभाव दिला सके.
महिला उम्मीदवारों की चुनाव में कम भागीदारी का यह तरीका हाल ही के फरवरी 2026 के आम चुनावों में भी दिखा, जहाँ केवल सात महिला उम्मीदवार सीधे चुनाव जीतकर सांसद (MP) बनीं, और नई बनी 50 सदस्यों की कैबिनेट में सिर्फ तीन महिलाओं को जगह मिली. यहाँ तक कि फिलहाल महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के प्रमुख भी एक पुरुष मंत्री (ए.जेड.एम. जाहिद हुसैन) हैं, जो दिखाता है कि बड़े फैसले लेने वाले पदों पर महिलाओं की संख्या कितनी सीमित है.
बांग्लादेश की राजनीति की दो बड़ी नेता, शेख हसीना और खालिदा जिया, ने 1991 में दूसरे संसदीय गणतंत्र की स्थापना के बाद से मिलकर लगभग 31 सालों तक प्रधानमंत्री के रूप में देश संभाला. फिर भी, इससे पुरुषों के मुकाबले संसद की कार्यवाहियों में महिलाओं की हिस्सेदारी नहीं बढ़ पाई. साल 1973 से आरक्षित सीटों (RSWP) के नियम के जरिए बांग्लादेश की राष्ट्रीय संसद में महिलाओं की संख्या धीरे-धीरे बढ़ी है. शुरुआत में, 1972 के संविधान में महिलाओं के लिए 10 साल के लिए 15 सीटें आरक्षित की गई थीं, जिन्हें 2011 में 15वें संवैधानिक संशोधन द्वारा बढ़ाकर 50 कर दिया गया. जब 1996 में शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सत्ता में आई, तब सामान्य सीटों पर महिलाओं की संख्या 300 में से केवल 8 थी.
अगर इसमें 30 आरक्षित सीटों को भी जोड़ लिया जाए, तो संसद में महिलाओं की कुल हिस्सेदारी केवल 11.5 प्रतिशत थी. साल 2009 से 2024 तक हसीना के मजबूत शासन के दौरान, महिला सांसदों (और आरक्षित सीटों) की औसत हिस्सेदारी बढ़कर 20.1 प्रतिशत हो गई, जिसमें 2008 में 21, 2014 में 19 और 2019 में 22 महिला उम्मीदवार चुनी गईं. हालांकि, 2024 के विवादित आम चुनावों में रिकॉर्ड तोड़ संख्या में महिला उम्मीदवारों (94) ने चुनाव लड़ा, लेकिन शेख हसीना और अवामी लीग को सत्ता से हटाए जाने से ठीक पहले चुनी गई महिला सांसदों की संख्या घटकर केवल 12 रह गई.
जुलाई की क्रांति को महिलाओं के नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शन के रूप में एक ऐतिहासिक पल माना गया, क्योंकि इस आंदोलन में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था. लेकिन जब आंदोलन शांत हुआ, तो राजनीतिक फैसले लेने के मामलों में महिला प्रदर्शनकारियों और नेताओं को धीरे-धीरे किनारे कर दिया गया. वैचारिक मतभेदों के कारण जब आंदोलन अलग-अलग गुटों में बंट गया, तो महिला प्रदर्शनकारी (खासकर छात्राएं) पीछे हट गईं और पुरुष नेतृत्व वाले पदों पर आगे आ गए.
शुरुआत में, 1972 के संविधान में महिलाओं के लिए 10 साल के लिए 15 सीटें आरक्षित की गई थीं, जिन्हें 2011 में 15वें संवैधानिक संशोधन द्वारा बढ़ाकर 50 कर दिया गया. जब 1996 में शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सत्ता में आई, तब सामान्य सीटों पर महिलाओं की संख्या 300 में से केवल 8 थी.
महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को केवल 'दिखावे' (टोकन) के तौर पर इस्तेमाल करने का यह चलन तब भी जारी रहा जब तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बीएनपी (BNP) पार्टी ने बांग्लादेश में सरकार बनाई. फिलहाल संसद में केवल सात चुनी हुई महिला सांसद हैं, जो 1991 में खालिदा जिया के पहले कार्यकाल (पांच चुनी हुई महिला सांसद) के मुकाबले बेहद मामूली सुधार है, लेकिन 2026 के ये आंकड़े उनके दूसरे कार्यकाल (साल 2001) जितने ही अटक कर रह गए हैं.
बांग्लादेश में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बीएनपी (BNP) पार्टी की सरकार बनने के बाद भी महिलाओं को केवल 'दिखावे' के लिए राजनीति में रखने का चलन जारी रहा. वर्तमान में, संसद में केवल सात चुनी हुई महिला सांसद हैं, जो 1991 में खालिदा जिया के पहले कार्यकाल के मुकाबले एक बहुत मामूली सुधार है, 2026 के आम चुनाव में अब तक की सबसे कम महिला उम्मीदवार (78) देखी गईं, जो चुनाव लड़ रहे कुल 1,981 उम्मीदवारों का केवल 3.93 प्रतिशत है. जमात-ए-इस्लामी, इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश, लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP), जनता दल और बांग्लादेश नेशनलिस्ट फ्रंट सहित 30 से अधिक राजनीतिक दलों ने इस चुनाव में एक भी महिला उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया. इसके अलावा, इन 78 महिला उम्मीदवारों और 7 चुनी हुई महिला सांसदों में से एक बड़ी संख्या ऐसी महिलाओं की है, जिनके पारिवारिक या वैवाहिक रिश्ते बड़े और प्रभावशाली राजनेताओं के साथ हैं, जिससे जमीनी स्तर पर नई महिला नेताओं के आगे बढ़ने के लिए बहुत कम जगह बचती है.
बांग्लादेश की राजनीति में महिलाओं की कम भागीदारी और संसद में अमीर घराने की महिलाओं के पारिवारिक दबदबे ने मिलकर गरीब और कामकाजी वर्ग की महिलाओं को सबसे ज्यादा किनारे कर दिया है. बांग्लादेश दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रेडीमेड कपड़ा (RMG) निर्यातक देश है, जिसने साल 2022-23 में 47 अरब अमेरिकी डॉलर की कमाई की, जो देश की कुल निर्यात कमाई का 82 प्रतिशत है. साल 2022 तक इस उद्योग के लगभग 40 लाख मजदूरों में 80 प्रतिशत से ज्यादा महिलाएं थीं, जो कपड़ा क्षेत्र को महिलाओं को औपचारिक रोजगार देने वाला देश का सबसे बड़ा जरिया बनाता है. इसके बावजूद, मजदूर अक्सर कहते हैं कि उन्हें केवल ‘काम निकालने की वस्तु‘ समझा जाता है और सिर्फ काम करने वाली मशीन मान लिया जाता है.
बड़े स्तर पर देखा जाए तो, एक ऐसा समावेशी और निष्पक्ष राजनीतिक माहौल तैयार करने के लिए शिक्षा के अंतर और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को दूर करना भी उतना ही जरूरी है, जो बांग्लादेश में अलग-अलग वर्ग और सामाजिक पृष्ठभूमि की महिलाओं के अनुभवों को सही मायने में सम्मान दे सके.
जुलाई के आंदोलन के दौरान, महिला कपड़ा मजदूर भी ज्यादा वेतन, काम के बेहतर माहौल और राजनीतिक फैसलों में अपनी जगह की मांग को लेकर छात्र प्रदर्शनकारियों के साथ शामिल हो गईं. इसके तुरंत बाद, पूर्व सत्ताधारी दल के सदस्यों से जुड़ी फैक्ट्रियों के बंद होने से कई मजदूर बेरोजगार हो गए और उन्हें सैलरी भी नहीं मिली. मजदूरों की एक मुख्य मांग बढ़ती महंगाई से निपटने के लिए वेतन में 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी की थी, जो आंदोलन के भेदभाव-विरोधी नारे से प्रेरित थी. अंतरिम सरकार ने केवल 9 प्रतिशत की बढ़ोतरी को मंजूरी दी, इसके बाद पुलिस और सुरक्षाबलों के साथ हुई झड़पों ने इस बात को और पक्का कर दिया कि मजदूरों की आवाज को आज भी दबाया जा रहा है.
यह बेदखली साफ दिखाती है कि कैसे महिला होना और साथ ही गरीब वर्ग से होना, दोनों मिलकर किसी को राजनीति से दूर कर देते हैं. कामकाजी महिलाओं के सामने कई रुकावटें होती हैं, जैसे घर के बिना वेतन वाले काम संभालना, समाज और पैसों का कम सहारा मिलना. नतीजा यह है कि महिलाओं का प्रतिनिधित्व आज भी केवल अमीर और रसूखदार परिवारों तक ही सीमित है. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और अवामी लीग दोनों ने इस ढर्रे को एक नियम बना दिया है, जिससे यह तय हो गया है कि महिलाओं की राजनीतिक तरक्की जमीनी स्तर के नेतृत्व के बजाय पुरुषों के दबदबे वाली पार्टियों के प्रति वफादारी पर ही निर्भर रहे.
बांग्लादेश के चुनावी माहौल में महिलाओं की यह भारी कमी 'रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल ऑर्डर' (RPO) के नियमों के बिल्कुल उलट है, जिसके तहत साल 2030 तक राजनीतिक दलों की समितियों में 33 प्रतिशत महिला प्रतिनिधित्व का लक्ष्य रखा गया है. इसके विपरीत, वर्तमान में यह आंकड़ा केवल 2.33 प्रतिशत पर अटका हुआ है. जुलाई क्रांति की भेदभाव-विरोधी भावना के बाद भी, 2026 के आम चुनावों के नतीजे यह बताते हैं कि अधिक महिला उम्मीदवारों को आगे लाने के लिए तुरंत और विशेष रूप से जेंडर-संवेदनशील (महिलाओं के अनुकूल) प्रयास करने की सख्त जरूरत है.
यह जिम्मेदारी सबसे पहले राजनीतिक दलों से शुरू होती है, राजनीतिक दल उम्मीदवारों के चयन में पुरुष-प्रधान सोच को चुनौती देकर और पारदर्शी व योग्यता के आधार पर टिकट बांटकर एक ऐसा माहौल बना सकते हैं जहाँ सबको मौका मिले. ऐसे कदमों से आगे बढ़ने की इच्छा रखने वाली महिला नेता राजनीतिक अवसरों को बेहतर ढंग से समझ सकेंगी, उनके लिए तैयारी कर सकेंगी और उन तक पहुँच पाएंगी. बड़े स्तर पर देखा जाए तो, एक ऐसा समावेशी और निष्पक्ष राजनीतिक माहौल तैयार करने के लिए शिक्षा के अंतर और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को दूर करना भी उतना ही जरूरी है, जो बांग्लादेश में अलग-अलग वर्ग और सामाजिक पृष्ठभूमि की महिलाओं के अनुभवों को सही मायने में सम्मान दे सके.
अनसूआ बसु रे चौधरी, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में 'नेबरहुड इनिशिएटिव' के साथ सीनियर फ़ेलो हैं.
श्रेया दास, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में इंटर्न हैं.
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Anasua Basu Ray Chaudhury is Senior Fellow with ORF’s Neighbourhood Initiative. She is the Editor, ORF Bangla. She specialises in regional and sub-regional cooperation in ...
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