Expert Speak Raisina Debates
Published on May 20, 2026 Updated 1 Days ago

भारत–पाक तनाव में अमेरिका की नीति हमेशा अपने रणनीतिक हितों से तय होती रही है- कभी तटस्थ, कभी पाक तो कभी भारत के पक्ष में लेकिन कभी भी बिना शर्त नहीं. हर बड़े संकट में उसने भारत पर संयम का दबाव बनाया है. इसलिए भारत के लिए रणनीतिक स्वायत्तता ही सबसे अहम है- समझिए, वैश्विक राजनीति में स्थायी मित्र नहीं, सिर्फ स्थायी हित होते हैं.

भारत–पाक विवाद: समझिए अमेरिका का असली रुख

Image Source: Getty

भारतीय रणनीतिक समुदाय के भीतर अब यह चिंता बढ़ रही है कि यदि भारतीय भूमि पर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी हमला होता है या भारतीय सेनाओं पर पारंपरिक हमला किया जाता है, तो संयुक्त राज्य अमेरिका (US) भारत की प्रतिक्रिया को सीमित करने की कोशिश कर सकता है. वाशिंगटन अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार ही नीति अपनाएगा और साझा लोकतांत्रिक मूल्यों या नैतिकता के आधार पर भारत का समर्थन करना अपनी जिम्मेदारी नहीं मानेगा. हाल ही में भारत में अमेरिका के पूर्व राजदूत केनेथ जस्टर ने कहा कि अमेरिका और पाकिस्तान के बेहतर होते संबंध नई दिल्ली को पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के खिलाफ जवाबी कार्रवाई में सावधानी बरतने के लिए मजबूर कर सकते हैं. पाकिस्तान का मानना है कि वाशिंगटन के साथ उसके वर्तमान करीबी संबंध और अमेरिका-ईरान वार्ताओं में उसकी भूमिका, किसी संघर्ष की स्थिति में उसे भारतीय जवाबी कार्रवाई से बचा सकती है. 

पाकिस्तानी आतंकवाद या आक्रामकता के सामने अमेरिका द्वारा भारत को बिना शर्त समर्थन न देना कोई नई बात नहीं है. 1947 से ही पाकिस्तान की पारंपरिक और अप्रत्यक्ष आक्रामकता के प्रति भारत की प्रतिक्रिया इस बात पर निर्भर रही है कि भारतीय सरकारों पर बाहरी और आंतरिक दबाव कितना है. ऐतिहासिक रूप से, चाहे अमेरिका में डेमोक्रेटिक सरकार रही हो या रिपब्लिकन, वाशिंगटन ने पाकिस्तान के हमले के बाद कभी अपने आप नई दिल्ली का समर्थन नहीं किया.

हाल ही में भारत में अमेरिका के पूर्व राजदूत केनेथ जस्टर ने कहा कि अमेरिका और पाकिस्तान के बेहतर होते संबंध नई दिल्ली को पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के खिलाफ जवाबी कार्रवाई में सावधानी बरतने के लिए मजबूर कर सकते हैं.

1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में, संघर्ष की शुरुआत पाकिस्तान द्वारा किए जाने के बावजूद अमेरिका ने दोनों देशों को सैन्य आपूर्ति रोक दी थी. फिर भी, युद्ध से पहले पाकिस्तान को अमेरिकी हथियार मिलने के बावजूद भारत ने पाकिस्तानी आक्रामकता का जवाब देने में हिचक नहीं दिखाई. पाकिस्तान ने सोवियत संघ के खिलाफ अमेरिका के साथ खुद को जोड़ने के लिए सैन्य उपकरण प्राप्त किए थे और वह मिडिल ईस्ट डिफेंस ऑर्गनाइजेशन (MEDO), सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (CENTO) और साउथ ईस्ट एशिया ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (SEATO) जैसे समझौतों का सदस्य भी था.

जॉनसन प्रशासन के दौरान अमेरिका ने इस युद्ध में तटस्थ रुख अपनाया और पाकिस्तान की इन संधियों की सदस्यता को भारत पर हमला करने की अनुमति नहीं माना. यदि देखा जाए, तो अमेरिका की तटस्थता भारत के लिए फायदेमंद साबित हुई, क्योंकि पाकिस्तान अमेरिकी सैन्य हथियारों पर अधिक निर्भर था. 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान अमेरिका ने पाकिस्तान के पक्ष में झुकाव दिखाया. यह समर्थन इसलिए था क्योंकि पाकिस्तान ने अमेरिका और चीन के बीच संबंध सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. अमेरिका ने भारत को पश्चिमी पाकिस्तान में सैन्य कार्रवाई बढ़ाने से रोकने के संकेत देने के लिए अमेरिकी नौसेना के सातवें बेड़े के हिस्से के रूप में यूएसएस एंटरप्राइज को भी भेजा. हालांकि, भारत की पश्चिमी सीमा पर सैन्य कार्रवाई मुख्य रूप से रक्षात्मक थी.

अक्टूबर 1971 में हेनरी किसिंजर ने चीन के प्रधानमंत्री झोउ एनलाई से कहा था, ‘हमारा मानना है कि भारत अब पूर्वी पाकिस्तान के मुद्दे को केवल कानूनी समस्या नहीं, बल्कि पूरे पाकिस्तान [जिसमें पश्चिम पाकिस्तान भी शामिल है] के प्रश्न को हल करने के अवसर के रूप में देख रहा है, जिसे उसने कभी पूरी तरह स्वीकार नहीं किया.’ 1970 के दशक में पाकिस्तान ने ‘भौगोलिक आक्रामकता‘ और ‘नक्शागत भ्रम’ की रणनीति अपनाई. उसने दावा किया कि सियाचिन ग्लेशियर सहित पूरा साल्तोरो रिज पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) का हिस्सा है. पाकिस्तान ने ग्लेशियर क्षेत्र में पर्वतारोहण अभियानों को भेजा और CIA तथा पेंटागन के अमेरिकी नक्शों में भी साल्तोरो रिज को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाया गया. इस तरह वाशिंगटन ने सीधे तौर पर ना सही पर पाकिस्तान की नक्शागत रणनीति को स्वीकार कर लिया.

इसी तरह, 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भी क्लिंटन प्रशासन ने भारत को स्वतः समर्थन नहीं दिया. हालांकि वाशिंगटन ने माना कि संघर्ष की शुरुआत पाकिस्तान ने की थी, लेकिन उसे भारत द्वारा पाकिस्तान के कब्जे को हटाने के लिए सैन्य कार्रवाई बढ़ाने की संभावना को लेकर भी चिंता थी. जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ा, अमेरिका का रुख बदलता गया और अंततः उसने अनिच्छा के साथ भारत का समर्थन किया, क्योंकि भारत संघर्ष को और बढ़ाने की स्थिति में दिखाई दे रहा था.

 2019 के पुलवामा हमले के बाद पहली बार भारत ने पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी शिविर पर हवाई हमला किया. 1971 के युद्ध के बाद यह पहली बार था जब भारत ने पाकिस्तान के अंदर जाकर हमला किया.

2001-2002 का संकट दिसंबर 2001 में भारतीय संसद पर लश्कर-ए-तैयबा (LeT) - जो एक पाकिस्तानी आतंकी संगठन है - के हमले के बाद पैदा हुआ. इसके जवाब में भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य जुटाव किया. इसका उद्देश्य पाकिस्तान पर दबाव बनाकर उसे अपने आतंकी प्रशिक्षण शिविर बंद करने के लिए मजबूर करना था, जिसका वादा रावलपिंडी ने किया भी था. हालांकि, आख़िर में अमेरिकी दबाव के कारण भारत पाकिस्तान पर हमला करने से पीछे हट गया. 2002 की शुरुआत में नियंत्रण रेखा (LoC) और अंतरराष्ट्रीय सीमा (IB) के पार सैन्य कार्रवाई के अवसर होने के बावजूद भारत ने संयम बरता. लेकिन सैन्य कार्रवाई में देरी, बदलती मांगें और नई दिल्ली में कमजोर नागरिक-सैन्य समन्वय ने संकट को और कठिन बना दिया.

इस समय तक 9/11 आतंकी हमलों के बाद अमेरिका ‘ग्लोबल वॉर ऑन टेरर‘ (GWOT) में पूरी तरह शामिल हो चुका था और वह पाकिस्तान पर भारतीय हमले को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था. पाकिस्तान को तालिबान और अल-कायदा के खिलाफ लड़ाई में अमेरिका का प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी बनाया गया था. भारत की सैन्य तैनाती अफगानिस्तान में अमेरिकी उद्देश्यों के लिए चुनौती बन रही थी. जिसकी वजह से, पाकिस्तान की वे सैन्य संसाधन, जिन्हें अफगानिस्तान से भाग रहे अल-कायदा आतंकियों के खिलाफ इस्तेमाल होना था, भारत के खिलाफ रक्षा में लगा दिए गए. जब अमेरिका को लगा कि उसके हित सीधे प्रभावित हो रहे हैं, तो नई दिल्ली के पास सेना हटाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा. अमेरिका ने भारत पर भारी दबाव डाला, यहां तक कि अमेरिकियों को दक्षिण एशिया की यात्रा न करने की चेतावनी भी जारी की गई. 1971 के युद्ध के बाद यह केवल दूसरा अवसर था जब भारत और अमेरिका के हित सीधे टकरा रहे थे. नहीं तो, अमेरिका के लिए दक्षिण एशिया हमेशा उसके बड़े भू-राजनीतिक लक्ष्यों के मुकाबले द्वितीयक या तृतीयक क्षेत्र रहा है.

26/11 मुंबई आतंकी हमलों के बाद भी वाशिंगटन ने भारत पर पाकिस्तान के खिलाफ जवाबी कार्रवाई न करने का दबाव बनाया. अमेरिकी दबाव में भारत सरकार ने सैन्य प्रतिक्रिया नहीं दी. हालांकि, देश के भीतर भी सैन्य कार्रवाई को लेकर हिचकिचाहट थी, जो संभवतः भारत के संयम का मुख्य कारण थी. 2019 के पुलवामा हमले के बाद पहली बार भारत ने पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद (JeM) के आतंकी शिविर पर हवाई हमला किया. 1971 के युद्ध के बाद यह पहली बार था जब भारत ने पाकिस्तान के अंदर जाकर हमला किया. फिर भी, वाशिंगटन ने भारत की कार्रवाई का खुलकर विरोध नहीं किया. बल्कि, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बालाकोट एयर स्ट्राइक से पहले कहा था कि भारत ‘बहुत कड़ी कार्रवाई‘ पर विचार कर रहा है और वे इसे समझ सकते हैं.

छह साल बाद, अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले ने भारत को पाकिस्तान के भीतर हवाई हमले करने के लिए मजबूर किया. ये हमले 1971 के बाद सबसे बड़े थे, जिनमें भारतीय वायुसेना ने मुरीदके और बहावलपुर में पाकिस्तानी आतंकी प्रशिक्षण शिविरों को निशाना बनाया.

आज पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में मदद कर रहा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उसे भारत के खिलाफ ज्यादा आक्रामक होने की छूट मिल गई है. भारत को अमेरिका और पाकिस्तान दोनों को साफ संदेश देना होगा कि अगर कोई उकसावे वाली कार्रवाई होती है, तो भारत उसका जवाब देने से पीछे नहीं हटेगा.

मई 2025 में भारत-पाकिस्तान संघर्ष पर अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि यह ‘हमारा मामला नहीं है‘ और अमेरिका केवल बैक-चैनल कूटनीति के जरिए तनाव कम करने की कोशिश कर रहा है. हालांकि, भारी नुकसान उठाने के बाद पाकिस्तान ने 10 मई 2025 को युद्ध विराम की मांग की, जिसे भारत ने स्वीकार कर लिया. इसके बावजूद पाकिस्तान ने दावा किया कि इसका पूरा श्रेय राष्ट्रपति ट्रंप को जाता है, और ट्रंप ने भी इस दावे को खुले तौर पर स्वीकार किया.

भारत के लिए मायने

पिछले 80 सालों में भारत-पाकिस्तान के संघर्षों पर अमेरिका का रुख कई बार बदला है. कभी उसने दोनों देशों के बीच तटस्थ रहने की कोशिश की, कभी पाकिस्तान का साथ दिया और कभी भारत के करीब आया. कई बार अमेरिका ने भारत के प्रति सहानुभूति भी दिखाई, लेकिन उसकी नीति हमेशा अपने फायदे और राष्ट्रीय हितों पर आधारित रही. आज पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में मदद कर रहा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उसे भारत के खिलाफ ज्यादा आक्रामक होने की छूट मिल गई है. भारत को अमेरिका और पाकिस्तान दोनों को साफ संदेश देना होगा कि अगर कोई उकसावे वाली कार्रवाई होती है, तो भारत उसका जवाब देने से पीछे नहीं हटेगा.


कार्तिक बोम्मकंती ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रेटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में सीनियर फेलो हैं.
The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.