Author : Sushant Sareen

Expert Speak Raisina Debates
Published on May 06, 2026 Updated 0 Hours ago

ऑपरेशन सिंदूर को एक साल हो गया और इस एक साल में खेल के नियम बदल चुके हैं, अब भारत आतंकवाद का जवाब उसकी जड़ पर देता है. इधर पाकिस्तान भी नई तैयारी में जुटा है. जानिए कैसे अगला टकराव पहले से ज्यादा बड़ा और खतरनाक हो सकता है.

सिंदूर के बाद का भारत: हर मोड़ पर बढ़त

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ऑपरेशन सिंदूर केवल 80 घंटों से थोड़ा अधिक समय तक चला लेकिन इसने जो रणनीतिक अनिवार्यताएँ उजागर और सक्रिय की हैं, वे भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए कहीं अधिक लंबे समय तक प्रभाव डालने वाली साबित हो रही हैं. इस संघर्ष के दौरान दोनों पक्षों द्वारा सीखे गए सबक (सही और गलत दोनों) यह तय करेंगे कि भविष्य में ऐसे टकराव होंगे या नहीं, और यदि होंगे तो उनकी तीव्रता, उग्रता और अवधि कैसी होगी-सिर्फ समय के संदर्भ में ही नहीं, बल्कि भौगोलिक विस्तार के संदर्भ में भी. इन सबकों के साथ-साथ अन्य युद्ध क्षेत्रों-यूक्रेन और ईरान-से मिले अनुभव भी भविष्य में भारत-पाकिस्तान के बीच किसी युद्ध की स्थिति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे.

भारत का आतंकवाद विरोधी अभियान  

ऑपरेशन सिंदूर ने सीमा-पार आतंकवाद को लेकर भारत की नीति और सैन्य रुख में एक बड़ा बदलाव दर्शाया, और यह स्पष्ट था. ‘विराम’ के बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की नीति को साफ शब्दों में रखा. उनके अनुसार, भारत किसी भी आतंकी हमले को युद्ध की कार्रवाई मानेगा; भारत राज्य और गैर-राज्य तत्वों में कोई भेद नहीं करेगा, यानी अगली बार पाकिस्तान की सरकार और सेना को आतंकवादी ठिकानों, शिविरों और ढांचों के साथ-साथ निशाना बनाया जाएगा. भारत आतंकवादियों को उनकी लोकेशन की परवाह किए बिना निशाना बनाएगा. भारत अब हमलों को केवल पीओके तक सीमित नहीं रखेगा, बल्कि पाकिस्तान के भीतर भी कार्रवाई करेगा. वह आतंकवाद के खिलाफ कहीं भी वार करने में सक्षम है और परमाणु दबाव में नहीं आएगा. भारत संघर्ष की तीव्रता पर नियंत्रण रखेगा, संयम की जगह अब सख्त और ठोस जवाबी कार्रवाई होगी.

पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद के निर्यात का जवाब देने के लिए सैन्य कार्रवाई की नीति के अलावा, ऑपरेशन सिंदूर ने भारत को उसके विभिन्न ‘रणनीतिक’ साझेदारियों की विश्वसनीयता या उसकी कमी के बारे में भी एक चेतावनी दी. अब युद्ध किसी पर निर्भर हुए बिना लड़ने होंगे. अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक संबंधों को लेकर जो सकारात्मक धारणाएँ थीं, वे टूट चुकी है. चीन का पाकिस्तान को समर्थन अपेक्षित था, लेकिन अमेरिका द्वारा संभावित खुफिया सहायता ने भारत को चौंकाया. सैटकॉम की भूमिका पर मतभेद के बावजूद, अमेरिका की विश्वसनीयता पर गहरा संदेह पैदा हुआ है. राजनीतिक स्तर पर भी इससे भारत-अमेरिका के बीच भरोसे को गंभीर नुकसान पहुंचा है. वास्तव में, अमेरिकी राष्ट्रपति की भूमिका काफी संदिग्ध रही, जिसने अंततः एक पराजित पाकिस्तान का मनोबल बढ़ाया.

भारत अब हमलों को केवल पीओके तक सीमित नहीं रखेगा, बल्कि पाकिस्तान के भीतर भी कार्रवाई करेगा. वह आतंकवाद के खिलाफ कहीं भी वार करने में सक्षम है और परमाणु दबाव में नहीं आएगा. भारत संघर्ष की तीव्रता पर नियंत्रण रखेगा, संयम की जगह अब सख्त और ठोस जवाबी कार्रवाई होगी.

चिंता की बात यह है कि भारत के नीति-निर्माण तंत्र में कई लोग अब भी यह मानते हैं कि पाकिस्तान के प्रति अमेरिका का समर्थन अस्थायी है और ट्रंप प्रशासन के जाने के बाद यह बदल जाएगा. यह भारत की एक रणनीतिक कमजोरी (ब्लाइंड स्पॉट) है, और जितनी जल्दी इसे समझकर सुधारा जाए, और यह स्वीकार किया जाए कि अमेरिका पाकिस्तान को पूरी तरह नहीं छोड़ेगा, उतना ही भारत के लिए बेहतर होगा.

‘रणनीतिक’ साझेदारों की अविश्वसनीयता और पहली बार लगभग युद्ध जैसी, बिना सीधे संपर्क वाली लड़ाई ने भारत को अपनी रक्षा सेनाओं के तेज़ी से आधुनिकीकरण और सशक्तिकरण की दिशा में मजबूर कर दिया है. आधुनिक युद्ध के उपकरण, प्लेटफॉर्म और हथियारों से लैस होने की होड़ शुरू हो गई है. अब ध्यान ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, साइबर, अंतरिक्ष, स्टेल्थ तकनीक, खुफिया तंत्र, मिसाइल और एयर डिफेंस जैसे क्षेत्रों पर है. इन सभी प्रयासों को ‘सुदर्शन चक्र’ रक्षा कवच के रूप में देखा जा रहा है, जिसे अगले दशक में स्वदेशी रूप से विकसित कर पूरे भारत को कवर करने का लक्ष्य है. दूसरे शब्दों में, भारत राष्ट्रीय सुरक्षा के भविष्य के खतरों से निपटने के लिए तेजी से आक्रामक और रक्षात्मक दोनों क्षमताओं को मजबूत कर रहा है. इसका अर्थ यह भी है कि ड्रोन, मिसाइल और इंटरसेप्टर का बड़ा भंडार तैयार किया जाए और युद्ध की स्थिति में उत्पादन तेजी से बढ़ाने की क्षमता विकसित की जाए.

पाकिस्तान के बेबुनियाद दावे

दूसरी ओर, पाकिस्तान में स्वयंभू फील्ड मार्शल के खोखले दावे और ट्रंप शैली की ‘झूठी जीत’ की बातें उसकी सेना को मिली वास्तविक चोट को छिपा नहीं सकतीं. इसलिए वह तेजी से सैन्य क्षमता बढ़ाने और रणनीति की समीक्षा में जुटी है. अब पाकिस्तान के लिए जरूरी है कि वह अपनी प्रतिरोधक क्षमता (डिटरेंस) को मजबूत करें, एक तरफ अपने परमाणु दबाव को फिर से विश्वसनीय बनाकर और दूसरी तरफ अपनी पारंपरिक सैन्य ताकत को पुनर्निर्मित करके.

 कूटनीतिक स्तर पर पाकिस्तान ने यह समझ लिया है कि उसे भारत के प्रभाव को संतुलित करने और उन्नत तकनीक हासिल करने के लिए सहयोगियों की जरूरत है. इस दिशा में उसके प्रमुख साझेदार चीन और तुर्की हैं. साथ ही, पाकिस्तान भारत के खिलाफ कूटनीतिक ‘लॉफेयर’ को और तेज करेगा.

पाकिस्तान अब चीन से पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान और उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम हासिल करने की कोशिश कर रहा है ताकि ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों से बचाव किया जा सके. इसके अलावा वह इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, ड्रोन, विभिन्न प्रकार की मिसाइलें (विशेषकर एंटी-शिप मिसाइलें) और पनडुब्बियों पर भी ध्यान केंद्रित कर रहा है. कूटनीतिक स्तर पर पाकिस्तान ने यह समझ लिया है कि उसे भारत के प्रभाव को संतुलित करने और उन्नत तकनीक हासिल करने के लिए सहयोगियों की जरूरत है. इस दिशा में उसके प्रमुख साझेदार चीन और तुर्की हैं. साथ ही, पाकिस्तान भारत के खिलाफ कूटनीतिक ‘लॉफेयर’ को और तेज करेगा, इस उम्मीद में कि हाल के कूटनीतिक प्रयास उसे वह हासिल करने में मदद करेंगे जो वह युद्ध के मैदान में नहीं कर पाया.

सैद्धांतिक रूप से, रणनीतिक गहराई की कमी पाकिस्तान के लिए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एक बड़ी समस्या बनकर उभरी. भारत ने पाकिस्तान के पूरे भू-भाग में, यहां तक कि उसकी राजधानी और चार में से कम से कम दो प्रांतीय राजधानियों तक, गहरे अंदर तक हमले किए. इसके विपरीत, पाकिस्तान के हमले भारत-पाक सीमा और जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा के आसपास के एक सीमित क्षेत्र तक ही सीमित रहे. पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता अनुसार, अगली बार वे भारत के पूर्वी हिस्सों तक निशाना साध सकते हैं और बेंगलुरु, हैदराबाद और मुंबई जैसे शहरों को भी अपने लक्ष्य में रख सकते हैं. उन्होंने रिफाइनरी और बंदरगाह जैसे महत्वपूर्ण आर्थिक ठिकानों को निशाना बनाने की धमकी भी दी है.

पहले से अधिक सुदृढ़ भारत

यह बात ईरान के युद्ध से मिले सबक से भी स्पष्ट होती है कि यदि पारंपरिक हथियारों से ही गंभीर नुकसान पहुंचाया जा सकता है, तो परमाणु धमकियों की जरूरत कम हो जाती है.पाकिस्तान के पास ऐसे मिसाइल मौजूद हैं जो इन शहरों और आर्थिक ढांचे को निशाना बना सकते हैं, इसलिए भारत को अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह तैयार रहना होगा. इससे भी अधिक जरूरी है कि भारत पाकिस्तान को स्पष्ट रूप से यह संदेश दे कि यदि उसने किसी शहर या आर्थिक लक्ष्य पर हमला करने की कोशिश की, तो जवाबी कार्रवाई इतनी कठोर होगी कि पाकिस्तान के बंदरगाह, हवाई अड्डे, सड़कें, पुल और प्रमुख शहर बुरी तरह प्रभावित होंगे.

भले ही ऑपरेशन सिंदूर चार दिनों से भी कम समय में समाप्त हो गया, लेकिन अगला संघर्ष अधिक लंबा, अधिक विनाशकारी और बहुआयामी हो सकता है. इसलिए भारत को अपनी कमियों को दूर कर हर प्रकार की चुनौती का मजबूती से सामना करने और किसी भी उकसावे का कठोर जवाब देने के लिए तैयार रहना होगा.

चूंकि भारत अब अत्यधिक सतर्क स्थिति में है, प्रधानमंत्री के अनुसार ऑपरेशन सिंदूर ‘रुका हुआ’ है इसलिए किसी भी पाकिस्तानी आतंकी हमले का जवाब तुरंत देना जरूरी होगा. इसके लिए पहले से लक्ष्यों का चयन और योजना बनाकर तैयार रखना होगा, साथ ही पाकिस्तान की संभावित प्रतिक्रिया को भी ध्यान में रखना होगा. पिछले 80 वर्षों में भारत और पाकिस्तान ने आम नागरिकों और आर्थिक ढांचे को निशाना बनाने से परहेज किया है, लेकिन पाकिस्तान की सेना और राजनीति के बदलते स्वरूप को देखते हुए भविष्य में इस संयम के बने रहने की संभावना कम है. इसलिए भारत को केवल सैन्य ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी तैयार रहना होगा.

भारतीय जनता को यह समझना होगा कि अब सीमा केवल सरहद तक सीमित नहीं रही, बल्कि संघर्ष की स्थिति में उनके घर तक भी पहुंच सकती है. जनता और नेताओं को समझना होगा कि हर कार्रवाई की कीमत होती है. कीमत न चुकाने की मानसिकता जवाबी क्षमता कमजोर करती है. भारत इज़राइल से मुआवजा व्यवस्था सीख सकता है. इसके साथ ही, भारत की सुरक्षा व्यवस्था को अपने सैन्य ठिकानों और कमांड सेंटर की स्थिति पर भी पुनर्विचार करना होगा, क्योंकि ये दुश्मन के प्रमुख लक्ष्य बन सकते हैं. आज के समय में जमीन के ऊपर मौजूद कोई भी संरचना मिसाइल और ड्रोन हमलों के दायरे में है.

ऑपरेशन सिंदूर के एक वर्ष बाद, भारत और पाकिस्तान पहले से कहीं अधिक एक संभावित संघर्ष के करीब नजर आ रहे हैं. दोनों देश आने वाले टकराव के लिए तैयारियां कर रहे हैं. हालांकि, पाकिस्तान को यह भी एहसास हो गया है कि भारत के खिलाफ आतंकवाद फैलाने की जो छूट उसे पहले मिलती थी, वह अब समाप्त हो चुकी है. भले ही ऑपरेशन सिंदूर चार दिनों से भी कम समय में समाप्त हो गया, लेकिन अगला संघर्ष अधिक लंबा, अधिक विनाशकारी और बहुआयामी हो सकता है. इसलिए भारत को अपनी कमियों को दूर कर हर प्रकार की चुनौती का मजबूती से सामना करने और किसी भी उकसावे का कठोर जवाब देने के लिए तैयार रहना होगा.


सुशांत सरीन ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो हैं.
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Sushant Sareen

Sushant Sareen

Sushant Sareen is Senior Fellow at Observer Research Foundation. His published works include: Balochistan: Forgotten War, Forsaken People (Monograph, 2017) Corridor Calculus: China-Pakistan Economic Corridor & China’s comprador   ...

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