कभी पाकिस्तान के लिए तालिबान सबसे भरोसेमंद साथी था लेकिन आज वही रिश्ता मिसाइलों और सीमा संघर्षों तक पहुंच गया है. टीटीपी, डुरंड लाइन विवाद और भारत-अफ़ग़ानिस्तान की बढ़ती नज़दीकियों ने इस पुराने गठबंधन को नई दुश्मनी में बदल दिया है. जानें पूरा मामला.
पिछले कुछ महीनों में अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान के संबंधों में तेज़ गिरावट आई है. अप्रैल 2026 में पाकिस्तानी मिसाइलों ने अफ़ग़ानिस्तान में कुनर के एक विश्वविद्यालय और आवासीय इलाके को निशाना बनाया. हैरानी की बात ये है कि हमला उस समय हुआ, जब चीन की मध्यस्थता से दोनों देश टकराव को कम करने में सहमत हुए थे. पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान के बीच संघर्ष का मौजूदा दौर फरवरी में शुरु हुआ था. इसके बाद से पाकिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान में कई हवाई और मिसाइल हमले किए हैं, जिनमें नंगरहार, काबुल और कंधार शामिल हैं. काबुल में तालिबान सरकार ने भी सीमा के पास पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों पर जवाबी हमले किए.
अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के द्विपक्षीय संबंधों के इतिहास को देखते हुए, ये हमले चौंकाने वाल हैं. दो दशक तक, पाकिस्तान और तालिबान ने एक मज़बूत गठबंधन बनाए रखा. 2021 में जब तालिबान दोबारा सत्ता में वापस आया तो पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान समेत कई पाकिस्तान नेताओं ने इसका सार्वजनिक स्वागत किया. पाकिस्तानी नेताओं ने तालिबान को 'स्वभाविक सहयोगी' बताते हुए तालिबान की सत्ता में वापसी को एक ऐसी रणनीतिक उपलब्धि बताया, जो ‘दासता की बेड़ियों को तोड़ती है’. लेकिन हैरानी की बात ये है कि संबंध मज़बूत होने की बजाए पिछले चार साल में दोनों देशों के बीच दोस्ती की जगह दुश्मनी ने ले ली है.
हैरानी की बात ये है कि हमला उस समय हुआ, जब चीन की मध्यस्थता से दोनों देश टकराव को कम करने में सहमत हुए थे. पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान के बीच संघर्ष का मौजूदा दौर फरवरी में शुरु हुआ था. इसके बाद से पाकिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान में कई हवाई और मिसाइल हमले किए हैं, जिनमें नंगरहार, काबुल और कंधार शामिल हैं.
पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान के बीच मौजूदा टकराव के कई कारण हैं, और वो आपस में जुड़े हैं. वैश्विक भू-राजनीतिक स्थितियां, इस क्षेत्र में सुरक्षा को लेकर पैदा हुए हालात, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी), अफ़ग़ानिस्तान और और भारत के बीच बदलते संबंध.
वैश्विक स्तर पर प्रमुख शक्तियों की भू-राजनीतिक प्राथमिकताएं काफ़ी बदल गई हैं. अमेरिका इस समय ईरान-इज़राइल युद्ध और मध्य पूर्व में व्यापक संघर्षों में व्यस्त है. रूस का ध्यान यूक्रेन युद्ध पर लगा है. चीन भी अफ़ग़ानिस्तान का साथ देकर अपने पुराने सहयोगी पाकिस्तान को नाराज़ नहीं करना चाहता. ऐसे में फिलहाल किसी महाशक्ति का ध्यान पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान पर नहीं है. कोई भी इसमें दख़ल देकर मध्यस्थता के सहारे टिकाऊ समाधान की कोशिश नहीं कर रहा.
इसीलिए अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान संघर्ष का विश्लेषण व्यापक भू-राजनैतिक ढांचे के भीतर किया जाना चाहिए. अफ़ग़ानिस्तान पर पाकिस्तान तभी हमला करता है, जब सभी प्रमुख शक्तियों का ध्यान मध्य पूर्व और यूरोप के संकटों पर है. इसकी वजह से पाकिस्तान पर निगरानी और जवाबदेही कम होती जा रही है. इसी का फायदा उठाकर पाकिस्तान इस समय अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर रहा है. इन दोनों देशों के बीच पहले भी अल्पकालिक संघर्ष हुए हैं, लेकिन बाहरी दख़ल से इन्हें जल्दी नियंत्रित कर लिया गया. मौजूदा टकराव के अनियंत्रित होने का कारण ये है कि कोई बाहरी देश सुरक्षा आश्वासन और गारंटी नहीं दे पाया है.
दोनों ही मामलों में पाकिस्तान ने किसी भी प्रकार की जवाबदेही का सामना किए बिना हमला किया. पाकिस्तान पर किसी तरह की रोकटोक की अनुपस्थिति ने वर्तमान संघर्ष को कम करने की बजाए और बढ़ा दिया है. मौजूदा परिस्थितियों को देखकर लग रहा है कि दोनों देशों के बीच टकराव लंबे समय तक चलने का ख़तरा पैदा हो गया है.
इसका नतीजा ये हुआ कि पाकिस्तान अब जब चाहे, तब अपने हिसाब से अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर सकता है. उसने पहले 16 मार्च को काबुल में ओमर ड्रग रिहैबिलिटेशन अस्पताल पर हमला किया. फिर अप्रैल में कुनार में सैयद जमालुद्दीन अफगानी विश्वविद्यालय को निशाना बनाया. दोनों ही मामलों में पाकिस्तान ने किसी भी प्रकार की जवाबदेही का सामना किए बिना हमला किया. पाकिस्तान पर किसी तरह की रोकटोक की अनुपस्थिति ने वर्तमान संघर्ष को कम करने की बजाए और बढ़ा दिया है. मौजूदा परिस्थितियों को देखकर लग रहा है कि दोनों देशों के बीच टकराव लंबे समय तक चलने का ख़तरा पैदा हो गया है.
पाकिस्तान को उम्मीद थी कि जब तालिबान का अफ़ग़ानिस्तान पर कब्जा हो जाएगा तो वो तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) को नियंत्रण में लाएंगे या उसे ख़त्म कर देंगे, लेकिन हुआ उसका उल्टा. पाकिस्तान ने तालिबान पर टीटीपी को आश्रय, प्रशिक्षण और संसाधन देने का आरोप लगाया है. टीटीपी 2022 के बाद से पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर लगातार हमले कर रहा है, विशेष रूप से खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में. हालांकि, तालिबान इन आरोपों को खारिज़ करते हुए तर्क देता है कि टीटीपी, पाकिस्तान का आंतरिक मामला है और इस्लामाबाद को अपनी घरेलू उग्रवाद की समस्या को राजनीतिक और सुरक्षा उपायों के माध्यम से संबोधित करना चाहिए न कि बाहरी दबाव के जरिए.
जब तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता वापस हासिल की, तो पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान ने इसे 'एक नए ब्लॉक' के निर्माण के रूप में देखा. एक ऐसा सुरक्षा ब्लॉक, जो 'रणनीतिक गहराई' को पूरा करने का रास्ता साफ कर सकता था. पाकिस्तान को लगता था कि काबुल में एक मित्र सरकार भारत के खिलाफ़ सुरक्षा लाभ प्रदान करेगी. हालांकि, इस 'रणनीतिक गहराई' का दृष्टिकोण गलत साबित हुआ. तालिबान ने एक स्वतंत्र विदेश नीति का रुख़ अपनाया, जो पाकिस्तान की उम्मीदों के विपरीत थी. अफ़ग़ानिस्तान ने पाकिस्तान के रणनीतिक हितों के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ने के बजाय अधिक स्वतंत्र क्षेत्रीय दृष्टिकोण अपनाया. तालिबान ने अफ़ग़ान समाज में समर्थन मज़बूत करने और पाकिस्तान के अलावा बाकी देशों से संबंध सुधारने की कोशिश की, जिनमें भारत जैसे देश भी शामिल हैं.
इसके अलावा, डुरंड लाइन भी पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच विवाद का एक महत्वपूर्ण बिंदु बनी हुई है. तालिबान समेत अफ़ग़ानिस्तान की अभी तक की किसी सरकार ने डुरंड लाइन को अंतर्राष्ट्रीय सीमा के रूप में मान्यता नहीं दी है. पाकिस्तान के लिए ये राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है, जबकि अफ़ग़ानिस्तान के लिए डुरंड लाइन राजनीतिक और ऐतिहासिक रूप से विवादास्पद बनी हुई है. ये अनसुलझा विवाद द्विपक्षीय तनाव को बढ़ाता है और सीमा-पार सुरक्षा सहयोग को कमज़ोर करता है. इससे क्षेत्रीय संघर्ष और अस्थिरता का ज़ोखिम बढ़ जाता है.
इसके साथ ही, अफ़ग़ानिस्तान का भारत के साथ रिश्तों को फिर से सुधारना पाकिस्तान के लिए नया सिरदर्द साबित हो रहा है. भारत ने तालिबान के साथ संवाद के रास्ते खोले हैं. अफ़ग़ानी विदेश मंत्री मुत्ताक़ी की 9 अक्टूबर 2025 की भारत यात्रा के बाद दोनों देशों ने अपने राजनयिक मिशन में मज़बूत किया है. उच्च स्तरीय औपचारिक दौरे इस बात का संकेत देते हैं कि भारत भी अफ़ग़ानिस्तान में अपना प्रभाव बढ़ाने का इरादा रखता है.
इससे साफ है कि पाकिस्तान का इरादा अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा क्षमता को कमज़ोर करना है. ये रुख एक दीर्घकालिक रणनीतिक सोच को दर्शाता है. पाकिस्तानी की पूर्वी सीमा पर पहले से ही भारत जैसा मज़बूत देश मौजूद है, ऐसे में पाकिस्तान की कोशिश है कि उसकी पश्चिमी सीमा पर स्थित अफ़ग़ानिस्तान ज़्यादा मज़बूत ना बन सके और रणनीतिक घेरेबंदी से बचा जा सके.
पाकिस्तानी अधिकारियों ने ये चिंता व्यक्त की है कि तालिबान अब भारतीय रणनीतिक हितों के साथ तालमेल की ओर बढ़ रहा है. पाकिस्तान के रक्षा मंत्री भी खुलकर ये बात कह चुके हैं. अफ़ग़ानिस्तान-भारत संबंधो मज़बूत होने की स्थिति में पाकिस्तान को अपनी रणनीतिक घेराबंदी का डर सताता है.
अब सवाल ये है कि इस संघर्ष से पाकिस्तान चाहता क्या है? पाकिस्तानी हवाई हमले और मिसाइलें तालिबान को औपचारिक रूप से डुरंड लाइन को मान्यता देने के लिए मज़बूर नहीं कर सकती. भारत के साथ रिश्ते तोड़ना भी तालिबान के लिए संभव नहीं है. विदेशी संबंधों में विविधता लाना अफ़ग़ानिस्तान के लिए समय की ज़रूरत है, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय मान्यता और आर्थिक सहयोग के लिए किसी एक साझेदार पर निर्भर रहना सही नहीं है. तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान को ख़त्म करने की संभावना भी नज़र नहीं आती, क्योंकि तालिबान पहले ही ये दावा कर चुका है कि वह अफगानी धरती पर इस संगठन को आश्रय नहीं देता.
कुछ विश्लेषक तर्क देते हैं कि पाकिस्तान का मक़सद अफ़ग़ानिस्तान की सैन्य क्षमता को कमज़ोर करना है, जिसमें अमेरिका की वापसी के बाद छोड़े गए सैन्य उपकरण भी शामिल हैं. पाकिस्तान का दृष्टिकोण निर्णायक जीत की तुलना में रणनीतिक रोकथाम का है. पाकिस्तान वायु सेना अफ़ग़ानिस्तान की सैन्य अवसंरचना को निशाना बना रही है. इससे साफ है कि पाकिस्तान का इरादा अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा क्षमता को कमज़ोर करना है. ये रुख एक दीर्घकालिक रणनीतिक सोच को दर्शाता है. पाकिस्तानी की पूर्वी सीमा पर पहले से ही भारत जैसा मज़बूत देश मौजूद है, ऐसे में पाकिस्तान की कोशिश है कि उसकी पश्चिमी सीमा पर स्थित अफ़ग़ानिस्तान ज़्यादा मज़बूत ना बन सके और रणनीतिक घेरेबंदी से बचा जा सके.
हालांकि, इस रणनीति के अपने ख़तरे हैं. ये सीमा क्षेत्रों को अस्थिर करती है, अफ़ग़ानी राष्ट्रवादी भावना को भड़काती है, और पहले से ही युद्धग्रस्त क्षेत्र में क्षेत्रीय ध्रुवीकरण को गहरा करती है. इससे पाकिस्तान की सुरक्षा और आर्थिक संसाधनों पर भी दबाव पड़ता है, जबकि ये समय पहले से ही काफ़ी संवेदनशील और आंतरिक उथल-पुथल से भरा है. पाकिस्तान खुद भी आंतरिक स्तर पर कई बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है, ऐसे में युद्ध का एक और मोर्चा खोलना उसे कमज़ोर करेगा.
शिवम शेखावत, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में जूनियर फ़ेलो हैं.
मैवंड साफ़ी, साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में सीनियर PhD स्कॉलर हैं। वे कनेक्टिविटी की जियोपॉलिटिक्स (भू-राजनीति) पर काम कर रहे हैं और उनका खास फ़ोकस अफ़गानिस्तान, दक्षिण एशिया और क्षेत्रीय रणनीतिक गतिशीलता पर है.
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Shivam Shekhawat is a Junior Fellow with ORF’s Strategic Studies Programme. Her research focuses primarily on India’s neighbourhood- particularly tracking the security, political and economic ...
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Maiwand Safi is a senior PhD scholar at South Asian University, working on the geopolitics of connectivity, with a particular focus on Afghanistan, South Asia, ...
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