शर्म अल-शेख में ट्रंप ने इज़राइल-हमास युद्धविराम का डंका तो बजाया मगर शांति की राह अब भी रेत पर बनी लकीर सी डगमगाती है. अफ़ग़ानिस्तान की तरह, यहां भी उदारवाद की आवाज़ कट्टरपंथ के शोर में दब रही है.
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इज़राइल और हमास के बीच शांति की कोशिश के लिए लाल सागर के किनारे मिस्र के शहर शर्म अल-शेख को चुना. यहां हुए गाज़ा शांति शिखर सम्मेलन में ट्रंप ने क्षेत्रीय और वैश्विक नेताओं की मौजूदगी में युद्धविराम का एलान किया और इसे अपनी बड़ी सफलता बताया लेकिन इस चमक-धमक के बीच स्थायी शांति की राह अब भी धुंधली है क्योंकि न तो कोई ठोस योजना बनी और न ही ज़मीनी स्तर पर भरोसेमंद तैयारी दिखी. सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस शांति समझौते को लागू करने की ज़िम्मेदारी वैचारिक उदारवादियों समूहों को सौंपी गई है, जिनकी सफलता पर अब भी सवाल उठ रहे हैं.
पिछले कुछ समय में शांति और कूटनीति की कोशिशों में कई खामियां सामने आई हैं. स्थायी समाधान की बजाय, देशों ने जल्दी दिखने वाले नतीजों पर ज़्यादा ध्यान दिया है. ट्रंप का मकसद भी यही दिखाना था कि उनकी पहल से लड़ाई थम गई- चाहे तनाव असल में घटा हो या नहीं. यह समझौता भी लंबी शांति से ज़्यादा तात्कालिक राहत देने वाला कदम लग रहा है जो गाज़ा जैसे पुराने संकटों को बस थोड़े वक्त के लिए शांत कर सकता है.
शिखर सम्मेलन और नेतृत्व-स्तरीय समझौतों के सफल क्रियान्वयन के लिए ज़मीनी हक़ीक़तों को स्पष्ट रूप से समझना होता है. स्थायी व्यवस्था बनाने के लिए वैचारिक कोशिशों की ज़रूरत होती है. इस क्षेत्र में किसी भी सफलता के लिए, पहले इस्लामिक जिहादियों और उनकी चरमपंथी विचारधाराओं को इस्लाम धर्म से अलग करने के प्रयास किए गए हैं. स्कॉलर एलेक्स पी. श्मिड ने भी इस बात की ओर ध्यान दिलाया है कि 9/11 के बाद के दौर में, कुछ लोग सभी अहिंसक चरमपंथियों को 'उदारवादी' मानते थे. ये धारणा इराक और अफ़ग़ानिस्तान में लंबे समय तक चले युद्धों के बाद बनी. 'आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध' के दौर चरमपंथी और उदारवादी के बीच के वैचारिक भेदभाव को धुंधला कर दिया. उन्हें संकीर्ण रणनीतिक ढांचों के भीतर सैन्य उद्देश्यों से जोड़ दिया. दोनों देशों में करीब दो दशक तक युद्ध चलते रहे. अमेरिका और पश्चिमी देश इन युद्धों में ऐसे सुलझे कि वो किसी भी कीमत पर इन्हें ख़त्म करना चाहते थे. युद्ध ख़त्म करने की जल्दबाज़ी और राष्ट्र-निर्माण की कोशिशों में उलझे रहने की वजह से उन्होंने चरमपंथियों और उदारपंथियों में अंतर करना ज़रूरी नहीं समझा. इससे ये समस्या कुछ क्षेत्रों में सीमित रहने की बजाए सभी दिशाओं में फैल गई.
“‘वॉर ऑन टेरर’ ने उदारवादी-चरमपंथी का वैचारिक फर्क धुंधला कर दिया”
अमेरिका पर 9/11 के बाद कट्टरपंथी इस्लाम ने तेज़ी पकड़ी. हमास और हिज़्बुल्लाह जैसे समूहों ने इसका इस्तेमाल क्षेत्रीय और राजनीतिक फ़ायदों के लिए किया. आम कार्यकर्ता अक्सर विचारधारा से प्रेरित होते थे, जबकि नेतृत्व को सत्ता की चाहत थी. इस तरह के उग्रवाद की जड़ें मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड के उदय से जुड़ी हैं. मुस्लिम ब्रदरहुड की स्थापना 1928 में एक स्कूल शिक्षक और धर्म पर प्रवचन देने वाले हसन अल-बन्ना ने की थी. 1970 के दशक में, फ़िलिस्तीन मुद्दे को लेकर इस्लामी उग्रवाद को ताक़त मिला. अपने राजनीतिक उद्देश्यों को हासिल करने के लिए विमानों को हाईजैक करना इन पवित्र युद्धों का एक मॉडल बन गया. 1990 के दशक में, पाकिस्तान ने आतंकवाद को अपनी राजकीय विदेश नीति का अंग बना लिया. पाकिस्तान ने कश्मीर में भारत के ख़िलाफ़ लड़ाकों को कट्टरपंथी बनाने और तैनात करने के लिए इसका इस्तेमाल किया. 9/11 के बाद, जिहादी विचारधारा और चरमपंथ को एक और वैचारिक बढ़ावा मिला. इस विचारधारा ने इराक और अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका, पश्चिमी देशों और इज़राइल की कार्रवाइयों को इस्लाम के दुश्मन के रूप में पेश किया.
हालांकि, इनमें से कुछ क्षेत्रों में उदारवादियों को प्रमुख राजनीतिक शक्ति बनाने की चाहत रखना दोधारी तलवार है. 2001 के बाद से, अफ़ग़ानिस्तान में सिर्फ दो ही राष्ट्रपति ऐसे हुए, जिन्हें उदारवादी कहा जा सकता था. हामिद करज़ई और अशरफ़ गनी अफ़ग़ानिस्तान के अभिजात वर्ग से आने वाले पश्चिम समर्थक टेक्नोक्रेट थे. फरवरी 2020 में, ट्रंप के पहले कार्यकाल में अमेरिका और तालिबान ने एक 'एक्ज़िट डील' पर दस्तख़त किए. ये अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी को लेकर किया गया समझौता था. इसने अफ़ग़ानिस्तान में आतंक के ख़िलाफ युद्ध वाले अमेरिका के 20 साल के एक कठिन दौर का अंत किया. अमेरिका का अफ़ग़ानिस्तान छोड़कर जाना तालिबान और उसकी विचारधारा के लिए एक बड़ी जीत थी. पूरी दुनिया में ये संदेश गया कि तालिबान जैसे कट्टरपंथी इस्लामी संगठन ने अमेरिकी जैसी महाशक्ति को देश छोड़ने पर मज़बूर कर दिया. अगस्त 2021 में काबुल पर तालिबान का कब्ज़ा हो गया. अब्दुल गनी देश छोड़कर भाग गए और तालिबान ने फिर से पूरे अफ़ग़ानिस्तान पर नियंत्रण हासिल कर लिया.
“अमेरिका की वापसी तालिबान की वैचारिक जीत साबित हुई।”
लगभग दो दशक तक चली जंग से थका हुआ पश्चिम अब आगे और लड़ने के लिए तैयार नहीं था. पश्चिमी देश एक 'उदारवादी' तालिबान चाहते थे, जिससे वे निपट सके. इसे देखते हुए, कुख्यात हक्कानी नेटवर्क के सिराजुद्दीन हक्कानी और तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर के बेटे मुल्ला याकूब समेत कई नेताओं ने खुद को उदारवादी दिखाने की कोशिश की. काबुल में प्रमुख मंत्रालय संभालने वाले मुल्ला बरादर और अमीर खान मुत्तकी जैसे लोगों ने भी खुद को उदारवादी के तौर पर पेश किया. लड़कियों के लिए स्कूली शिक्षा की अनुमति जैसी नीतियों को मौन समर्थन दिया. इसे कंधार स्थित तालिबान के वैचारिक अमीर, हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा को चुनौती माना गया, क्योंकि वो लड़कियों की शिक्षा के ख़िलाफ़ है. इसने तालिबान के भीतर आंतरिक विभाजन पैदा कर दिया, जो आज भी जारी है. खुद को उदारवादी के तौर पर पेश करने वाले इन तालिबानी नेताओं ने वैचारिक शुद्धता और सत्ता के लिए ज़रूरी व्यावहारिकता के बीच एक पहचान का संकट पैदा कर दिया.
शर्म अल-शेख शिखर सम्मेलन के बाद गाज़ा में भी यही विभाजन देखने को मिल सकता है, क्योंकि संकट की राजनीतिक दिशा अभी भी स्पष्ट नहीं है. स्कॉलर मुहम्मद शाहेदा ने तर्क दिया है कि अक्टूबर 2023 से ही हमास के खिलाफ इज़राइल का सख्त सैन्य कार्रवाई जारी है. इज़राइल ने याह्या सिनवार और इस्माइल हानिया जैसे हमास के दिग्गजों नेताओं को उनके अड्डों में घुसकर मार डाला. अगर इज़राइल अपनी आक्रामक कार्रवाई जारी रखता है तो फिर हमास में उदारवादी नेतृत्व उभर पाना मुश्किल होगा. शाहेदा का कहना है कि अगर हमास के पूर्ण निरस्त्रीकरण यानी पूरी तरह हथियार डाल देने जैसी "अतिवादी मांगें" जारी रहीं, तो वों उदारवादियों को अलग-थलग कर देंगी. इससे कट्टरपंथियों को फिर से मज़बूती मिलेगी. इस दलील में कुछ दम है, क्योंकि कुछ समय पहले की रिपोर्ट्स में बताया गया था कि हमास के कुछ नेता बड़े हथियार छोड़ने की तरफ बढ़ रहे हैं. वहीं, कुछ अन्य लोगों का मानना है कि हमास का पूर्ण निरस्त्रीकरण संभव नहीं होगा, क्योंकि सैन्य साधनों के ज़रिए प्रतिरोध करना इस हमास की मूल विचारधारा में शामिल है.
हालांकि, अभी तक इस बात के सबूत नहीं मिले हैं कि उदारवादियों में राजनीतिक शून्यता को तेज़ी से भरने की क्षमता है. संघर्ष में शामिल दो पक्षों के बीच सामान्य संबंधों को बढ़ावा देने के सिद्धांत और दीर्घकालिक राजनीतिक स्थिरता की काबिलियत उदारवादियों ने नहीं दिखाती है. अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का मुख्य विरोध अंदर से ही आया. अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से स्वीकृति पाने की कोशिश में खुद को उदारवादी के तौर पर पेश कर रहे नेताओं ने तालिबान के वैचारिक अमीर की सत्ता को चुनौती देने की कोशिश की. शिया हज़ारा प्रतिनिधियों को सत्ता सौंपने का प्रयास भी किया, जो कुछ ही समय तक चला. पिछले एक साल में कंधार यानी अखुंदज़ादा गुट ने अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता के ज़्यादातार पहलुओं पर फिर से कब्ज़ा कर लिया है.
“हमास के पूर्ण निरस्त्रीकरण जैसी ‘अतिवादी मांगें’ उदारवादियों को किनारे कर देंगी।”
इस बीच, अगर हमास का उदारवादी नेतृत्व कायम रहता है, तो वो ज़्यादा समय तक नहीं टिक पाएगा और उसे पश्चिमी देशों का कठपुतली समझा जाएगा. कोई भी उदारवादी ढांचा, हमास को पूरी तरह से ख़त्म करने के इज़राइल के घोषित उद्देश्य के भी विपरीत रहेगा. हालांकि, अभी ये स्पष्ट नहीं है कि हमास के "विनाश" से इज़राइल का क्या मतलब है? क्या हमास के कट्टरपंथ को ख़त्म करना है या पूरे संगठन को ही बर्बाद करना है. ये भी स्पष्ट नही है कि क्या हमास के बाद के गाज़ा के लिए किसी तरह की राजनीतिक संरचना की कल्पना की गई है या नहीं? आज की स्थिति में, मुख्य भूमिका संयुक्त राष्ट्र के आदेश के तहत यहां तैनात एक इंटरनेशनल स्टेबलाइजेशन फोर्स (आईएसएफ) पर केंद्रित है. हमास इस बात की पूरी कोशिश करेगा कि फ़िलिस्तीन में किसी भी राजनीतिक बदलाव में उसकी भूमिका बनी रहे. हमास का इरादा भी वैसी भूमिका निभाने का होगा, जैसी लेबनान में हिज़्बुल्लाह की है, उसके पास संसदीय प्रतिनिधित्व है. हालाँकि, ये ना सिर्फ अमेरिका और इज़राइल को, बल्कि इस क्षेत्र के ज़्यादातर अरब देशों को भी अस्वीकार्य होगा.
सच्चाई यही है कि अफ़ग़ानिस्तान और गाज़ा जैसे क्षेत्रों में ऐसी कोई उदारवादी शक्तियां नहीं है, जिन्हें केस स्टडी के तौर पर देखा जाए. ये उदारवादी शक्तियां प्रतिनिधित्व हासिल करने का ही तर्क नहीं दे पाई हैं, सत्ता तो बहुत दूर की बात है. एक सामान्य तथ्य ये है कि चरमपंथी समूह अपने लक्ष्यों को तेज़ी से हासिल करने के लिए हिंसा का इस्तेमाल करते हैं. वो उदारवादियों को पीछे धकेल देता है, क्योंकि उदारवादी शक्तियां जटिल बारीकियों, शिक्षा और संवाद पर ज़्यादा भरोसा करती हैं, और ये बातें ज़मीनी स्तर पर टिक नहीं पाती. हालांकि, इसके कुछ अपवाद भी हैं, लेकिन सच्चाई ये है कि इन देशों में कट्टरपंथी ही जनता को जल्दी लुभा पाते हैं. ऐसे में सिर्फ़ 'उदारवादियों' पर राजनीतिक और वैचारिक पुनर्वास का बोझ डालना ज़मीनी स्तर पर बदलाव लाने के लिए काफ़ी नहीं है.
उदारवादी नेता या संगठन अपनी कोशिशों से संस्थाओं, शासन और सत्ता की संरचना को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन उनकी अपनी सीमाएं भी हैं. अफ़ग़ानिस्तान से लेकर सीरिया तक, और अब पश्चिम अफ़्रीका के माली तक, चरमपंथी समूहों ने सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया है. इस्लाम के भीतर उदारवादी राजनीति वैचारिक विकल्प प्रदान कर सकती है, दीर्घकालिक रूप से बेहतर सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन सकती है, लेकिन इसके लिए पश्चिमी देशों को उनकी मदद करनी होगी. उदारवादी ताकतों को नाजुक, दीर्घकालिक सांस्कृतिक और धार्मिक बदलावों में जगह पाने और स्थिरता प्रदान करने के लिए पारंपरिक राजनीतिक वार्ता, मध्यस्थता और समझौते की ज़रूरत है.
कबीर तनेजा ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रैटजिक स्टडीज़ प्रोग्राम के डिप्टी डायरेक्टर और फेलो हैं.
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