कभी चीन के सौर उपकरणों का बड़ा खरीदार रहा भारत अब तेजी से खुद एक उत्पादन केंद्र बन रहा है जिससे चीनी उद्योग और सोशल मीडिया में बेचैनी बढ़ गई है. जानिए कैसे भारत की सौर ऊर्जा क्षेत्र में तेज़ प्रगति चीन के लिए नई रणनीतिक चुनौती बनती जा रही है.
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पिछले कुछ दिनों से चीनी इंटरनेट पर भारत द्वारा चीन से कारोबार 'चुराने' की खबरें छाई हुई हैं और इस बार यह मामला फोटोवोल्टिक (PV) यानी सौर ऊर्जा क्षेत्र का है. भारत की फोटोवोल्टिक मॉड्यूल उत्पादन क्षमता 2018 में 10 GW (गीगावाट) से भी कम थी, जो 2026 में ‘आसमान छूते हुए‘ 172 GW तक पहुँच गई है (जो लगभग वैश्विक वार्षिक स्थापना क्षमता के बराबर है). इस तरह आठ वर्षों में इसमें 17 गुना की वृद्धि दर्ज की गई है. दूसरी ओर, चीन में प्रमुख फोटोवोल्टिक कंपनियां 2023 की चौथी तिमाही से अरबों-खरबों युआन का रिकॉर्ड तोड़ घाटा झेल रही हैं, जिससे वे इतिहास के सबसे गहरे नुकसान के दलदल में फंस गई हैं.
2025 में, शेयर बाजार में लिस्टेड 15 चीनी पीवी (PV) कंपनियों में से 11 ने कुल मिलाकर लगभग 50 अरब युआन का घाटा दर्ज किया. पांच प्रमुख कंपनियों-टीसीएल झोंगहुआंग, जिंको सोलर, लोंगी ग्रीन एनर्जी, जेए सोलर, और ट्रिना सोलर, का घाटा तो 28 अरब युआन से भी अधिक रहा. ऐसे समय में, 2000 के दशक में एक शुद्ध आयातक से बदलकर भारत के ‘फोटोवोल्टिक मॉड्यूल और मोबाइल फोन का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा निर्माता’ बनने की खबर ने चीन में जनता का ध्यान अपनी ओर खींचा. यह विरोधाभासी कहानी चीनी सोशल मीडिया पर एक ट्रेंडिंग टॉपिक बन गई. चीनी जनमानस में, किस्मत के इस नाटकीय उलटफेर को सीधे तौर पर चीन से हुए कथित तकनीकी हस्तांतरण से जोड़ा गया, और चीनी कंपनियों की ‘दुश्मन की मदद करने‘ के लिए तीखी आलोचना की गई.
चीनी आकलनों के अनुसार, हाल के वर्षों में चीजें तब बदलने लगीं जब भारत ने अपनी 'मेक इन इंडिया' पहल और उसके साथ सहायक उपाय शुरू किए, जिसमें कंपनियों को भारत में कारखाने स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करने वाली उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना शामिल थी, नतीजतन, यह तर्क दिया जा रहा है कि भारत की मॉड्यूल उत्पादन क्षमता में भारी उछाल आया है.
चीनी फोटोवोल्टिक उद्योग के जानकार उन दिनों को बड़े चाव से याद करते हैं जब चीनी और भारतीय फोटोवोल्टिक कंपनियों के बीच संबंध काफी सरल थे, जहाँ चीन उत्पादन करता था और भारत उपभोग करता था. 2000 से 2015 तक, भारत में चीन का संचयी निवेश केवल 1.24 बिलियन अमेरिकी डॉलर था, जो भारत में कुल वैश्विक निवेश के 0.5 प्रतिशत से भी कम था, इसलिए चीन के लिए भारत चीनी उत्पादों का केवल एक डाउनस्ट्रीम खरीदार था. हालांकि, चीनी आकलनों के अनुसार, हाल के वर्षों में चीजें तब बदलने लगीं जब भारत ने अपनी 'मेक इन इंडिया' पहल और उसके साथ सहायक उपाय शुरू किए, जिसमें कंपनियों को भारत में कारखाने स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करने वाली उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना शामिल थी, नतीजतन, यह तर्क दिया जा रहा है कि भारत की मॉड्यूल उत्पादन क्षमता में भारी उछाल आया है, और इसके साथ ही भारत को फोटोवोल्टिक मॉड्यूल का चीन का प्रत्यक्ष निर्यात नाटकीय रूप से सिकुड़ गया है, जो 2020 में 8.2 GW से घटकर 2024 में 4.5 GW और फिर 2025 में 2.1 GW रह गया है. कुल मिलाकर, वैश्विक स्तर पर चीन के फोटोवोल्टिक उत्पाद निर्यात में कथित तौर पर लगातार दो वर्षों से साल-दर-साल गिरावट आई है, जो जनवरी से अक्टूबर 2025 तक साल-दर-साल 13.2 प्रतिशत गिरकर 24.42 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया है. इसलिए, चीनी पक्ष इस दावे पर भड़का हुआ था कि भारत एक ऐसा उद्योग खड़ा करने के लिए चीनी पूंजी, उपकरण, तकनीक और इंजीनियरों का उपयोग कर रहा है जो मुख्य रूप से चीन को ही चुनौती देता है.
ज्यादातर चीनी विश्लेषकों का मानना है कि चीनी सोलर कंपनियां तमाम खतरों के बावजूद भारत को अपने उपकरण बेच रही हैं. ऐसा उनकी दूरदर्शिता की कमी की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए है क्योंकि उनके पास कोई दूसरा रास्ता ही नहीं बचा है. चीनी कंपनियों की इस मुसीबत की सबसे बड़ी वजह चीन में इस सेक्टर में जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता होना है. उदाहरण के लिए, सोलर मॉड्यूल के मामले में चीन की उत्पादन क्षमता 1100 गीगावाट (GW) से ज्यादा है, जबकि पूरी दुनिया में इसकी मांग सिर्फ 600 गीगावाट है. जिसके चलते वहां की फैक्ट्रियां अपनी कुल क्षमता के सिर्फ 40 फीसदी पर काम कर रही हैं.
चीनी पक्ष इस दावे पर भड़का हुआ था कि भारत एक ऐसा उद्योग खड़ा करने के लिए चीनी पूंजी, उपकरण, तकनीक और इंजीनियरों का उपयोग कर रहा है जो मुख्य रूप से चीन को ही चुनौती देता है.
इस भारी ओवर-सप्लाई के कारण, मॉड्यूल बनाने वाली कंपनियां अपनी क्षमता के 60 फीसदी से भी कम पर चल रही हैं. कई कंपनियां तो हर एक वॉट की बिक्री पर नुकसान उठा रही हैं क्योंकि बाजार में कीमतें उनकी लागत से भी नीचे गिर चुकी हैं. यह पूरा उद्योग एक ऐसे जाल में फंस गया है जहां कमाई तो बढ़ रही है पर मुनाफा गायब है. मॉड्यूल की कीमतें 0.7 युआन प्रति वॉट की लागत सीमा से भी नीचे जा चुकी हैं, जिससे कुछ कंपनियों का ग्रॉस प्रॉफिट मार्जिन माइनस में चला गया है.
इस गलाकाट बाजार में, जहां चीन के घरेलू मार्केट में बढ़ने की कोई गुंजाइश नहीं बची है और कंपनियों को ऑर्डर्स में भारी गिरावट का सामना करना पड़ रहा है, ऐसे में भारत से मिलने वाले ऑर्डर्स इन कंपनियों के लिए संजीवनी का काम कर रहे हैं. भारत को बेची जाने वाली पूरी प्रोडक्शन लाइनों पर ग्रॉस प्रॉफिट मार्जिन 35 फीसदी से ज्यादा मिल रहा है, जो कि चीन में घाटा सहकर बेचने से कहीं बेहतर है. चीनी जानकारों का कहना है कि खुद को बचाने की कंपनियों की इसी होड़ की वजह से एक 'सामूहिक कार्रवाई की दुविधा' पैदा हो रही है, जो चीनी सप्लाई चेन को भारत की तरफ ट्रांसफर होने के लिए मजबूर कर रही है.
कुछ चीनी विश्लेषकों को उम्मीद है कि चीन अभी भी इस नुकसान को रोक सकता है और इस मामले में सुधार कर सकता है. आखिरकार, भारत अभी भी सिर्फ एक ‘सुपर असेंबलर‘ (पुर्जे जोड़ने वाला) ही है-खबरों के मुताबिक उसकी पॉलीसिलिकॉन उत्पादन क्षमता केवल 2 गीगावाट के आसपास है, और वह अपनी 90 फीसदी से ज्यादा जरूरत आयात (इंपोर्ट) से पूरी करता है. सिलिकॉन वेफर बनाने की क्षमता अभी शुरुआती दौर में है, जबकि भारत की सेल बनाने की क्षमता करीब 30 गीगावाट बताई जा रही है, जो उसकी मॉड्यूल उत्पादन क्षमता के छठे हिस्से से भी कम है. इसके अलावा, भारत मॉड्यूल निर्यात (एक्सपोर्ट) के लिए काफी हद तक अमेरिकी बाजार पर निर्भर है और ट्रंप 2.0 की टैरिफ नीतियों के सामने बेहद कमजोर है. विश्लेषकों का तर्क है कि भारतीय उद्योग के इस असंतुलित ढांचे की वजह से, भारत शॉर्ट टर्म में चीन के लिए कोई बड़ा खतरा पैदा नहीं कर सकता.
चीन की असली चिंता यह है कि उसकी अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था ही उसकी सबसे कमजोर कड़ी बनी हुई है, क्योंकि कमजोर घरेलू मांग के बीच वह अपनी जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता की समस्या का कोई आसान हल नहीं ढूंढ पाया है, जिससे उसके मुख्य सेक्टरों में भारी नुकसान हो रहा है.
इस बीच, चीनी सरकार ने कई कदम उठाए हैं-जैसे सोलर मॉड्यूल बनाने वाले उपकरणों को उन तकनीकों की सूची में डालना जिन्हें बिना लाइसेंस के एक्सपोर्ट नहीं किया जा सकता, और 1 अप्रैल 2026 से सोलर उत्पादों पर मिलने वाली एक्सपोर्ट टैक्स छूट को खत्म. चीन का रणनीतिक समूह चीनी कंपनियों को यह सलाह भी दे रहा है कि वे ‘लंबे समय की औद्योगिक सुरक्षा को छोड़कर, सिर्फ शॉर्ट-टर्म में टिके रहने’ की सोच को बदलें, आपस की लड़ाई और प्राइस वॉर से बचें, और वैल्यू चेन में ऊपर बढ़कर अपनी बढ़त बनाए रखें.
बड़े स्तर पर देखें तो चीन इस बात से लगातार परेशान है कि कैसे भारत ने पिछले कुछ सालों में नीतियों, पैसों और भू-राजनीति का इस्तेमाल करके अपने उद्योगों को बढ़ावा दिया है, और वह चीन से पूरी की पूरी सप्लाई चेन को अपने यहां खींचने की क्षमता दिखा रहा है. चीन के रणनीतिकारों को डर है कि एनर्जी स्टोरेज और पावर बैटरी सेक्टर भी कहीं सोलर वाले रास्ते पर न चले जाएं. उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर सही कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में चीन की इलेक्ट्रिक गाड़ियों (EVs) और यहां तक कि सेमीकंडक्टर उपकरणों को भी ऐसे ही खतरों का सामना करना पड़ सकता है. चीन ने हाल ही में सोलर सेल, मॉड्यूल और आईटी सामानों पर भारतीय नियमों के खिलाफ विश्व व्यापार संगठन में शिकायत दर्ज कराई है. लेकिन, चीन की असली चिंता यह है कि उसकी अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था ही उसकी सबसे कमजोर कड़ी बनी हुई है, क्योंकि कमजोर घरेलू मांग के बीच वह अपनी जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता की समस्या का कोई आसान हल नहीं ढूंढ पाया है, जिससे उसके मुख्य सेक्टरों में भारी नुकसान हो रहा है.
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Antara Ghosal Singh is a Fellow at the Strategic Studies Programme at Observer Research Foundation, New Delhi. Her area of research includes China-India relations, China-India-US ...
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