Originally Published The Hindu Published on Jun 15, 2026 Commentaries 0 Hours ago

भारत और म्यांमार के रिश्ते सिर्फ दो पड़ोसी देशों की कहानी नहीं बल्कि सीमाओं, सुरक्षा, व्यापार, बौद्ध विरासत और बड़ी शक्तियों की कूटनीतिक चालों से जुड़ी एक दिलचस्प रणनीतिक कथा हैं. जानिए, क्यों म्यांमार आज भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति की सबसे अहम कड़ी है.

पूर्व की ओर खुलता दरवाज़ा: म्यांमार और भारत

Image Source: X MEA

30 मई 2026 को म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग भारत दौरे पर बिहार के बोधगया पहुंचे. नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात से पहले उन्होंने महाबोधि मंदिर में दर्शन किए, जो बौद्ध धर्म के सबसे पवित्र स्थलों में से एक है और यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल भी है. यह यात्रा दिखाती है कि भारत और म्यांमार के रिश्ते केवल राजनीति नहीं, बल्कि साझा इतिहास, संस्कृति और बौद्ध विरासत से भी जुड़े हैं. 

राष्ट्रपति के रूप में मिन आंग ह्लाइंग की 30 मई से 3 जून 2026 तक की यात्रा एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल मानी जा रही है. राष्ट्रपति बनने के बाद यह उनकी पहली भारत यात्रा थी, जो दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के बदलते भू-राजनीतिक माहौल में भारत-म्यांमार संबंधों के बढ़ते महत्व को दर्शाती है. नई दिल्ली के लिए भी इस यात्रा का समय और इसका संदेश दोनों ही विशेष महत्व रखते हैं. 

अभी क्यों?

फरवरी 2021 में हुए सैन्य तख्तापलट के बाद, जिसमें आंग सान सू ची की निर्वाचित सरकार को सत्ता से हटा दिया गया था, अधिकांश लोकतांत्रिक देशों ने म्यांमार की सैन्य सरकार से दूरी बना ली. पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध लगाए और शासन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने की कोशिश की. इसके विपरीत, भारत ने संवाद बनाए रखने की नीति अपनाई है. विदेश सचिव विक्रम मिस्री के अनुसार, भारत की नीति म्यांमार की आंतरिक राजनीति पर टिप्पणी करना नहीं, बल्कि संवाद और सहभागिता के माध्यम से आगे बढ़ना है. 

राष्ट्रपति के रूप में मिन आंग ह्लाइंग की 30 मई से 3 जून 2026 तक की यात्रा एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल मानी जा रही है. राष्ट्रपति बनने के बाद यह उनकी पहली भारत यात्रा थी, जो दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के बदलते भू-राजनीतिक माहौल में भारत-म्यांमार संबंधों के बढ़ते महत्व को दर्शाती है.

म्यांमार भारत के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया से जुड़ने का महत्वपूर्ण केंद्र है. ‘एक्ट ईस्ट’ और ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीतियों में इसकी केंद्रीय भूमिका है. चार पूर्वोत्तर राज्यों के साथ 1,643 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करने के कारण म्यांमार में अस्थिरता का सीधा असर भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ता है. 

म्यांमार में चीन का बढ़ता प्रभाव भारत के लिए एक बड़ी चिंता है. 2021 के तख्तापलट के बाद जहां पश्चिमी देशों ने दूरी बनाई, वहीं चीन ने निवेश, हथियारों और राजनीतिक समर्थन के जरिए अपनी मौजूदगी मजबूत कर ली. ऐसे में भारत के लिए म्यांमार को पूरी तरह चीन के प्रभाव में छोड़ देना रणनीतिक रूप से हितों के विपरीत होगा. 

इंफ्रास्ट्रक्चर का असली दांव

म्यांमार में भारत की रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं को सबसे अच्छी तरह दर्शाने वाली परियोजनाओं में कालादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट और भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मिन आंग ह्लाइंग के बीच हुई वार्ता में इन दोनों परियोजनाओं को विशेष महत्व दिया गया. 

कलादान परियोजना के तहत कोलकाता को समुद्री मार्ग से सित्तवे बंदरगाह से जोड़ा गया है, जहां से संपर्क कलादान नदी के जरिए पालेतवा तक पहुंचता है और फिर सड़क मार्ग से मिजोरम के जोरिनपुई तक जाता है. परियोजना के समुद्री और नदी मार्ग वाले हिस्से चालू हो चुके हैं तथा पहला कार्गो मई 2023 में सित्तवे पहुंचा था. हालांकि, चिन राज्य के दुर्गम और बाढ़ प्रभावित इलाके से गुजरने वाली 109 किलोमीटर लंबी पालेतवा-जोरिनपुई सड़क अभी अधूरी है. भारत सरकार का लक्ष्य 2027 तक परियोजना को पूरी तरह चालू करना है.

भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग (ट्राइलेटरल हाईवे) परियोजना का उद्देश्य मणिपुर के मोरेह को म्यांमार के रास्ते थाईलैंड के माए सोट जोड़ना है. लगभग 1,360 किलोमीटर लंबी इस परियोजना को आगे कंबोडिया, लाओस और वियतनाम तक विस्तार देने की भी योजना है. इसके पूरा होने पर पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से सीधा सड़क संपर्क मिल सकता है. हालांकि, 2019 तक पूरा होने का लक्ष्य रखने वाली यह परियोजना अब भी अधूरी है. 

म्यांमार में भारत की रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं को सबसे अच्छी तरह दर्शाने वाली परियोजनाओं में कालादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट और भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग हैं.

इन दोनों परियोजनाओं में देरी की सबसे बड़ी वजह म्यांमार का आंतरिक संघर्ष है. मार्ग के आसपास कई इलाकों में सशस्त्र समूहों की मौजूदगी निर्माण कार्य को मुश्किल बना रही है. राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को परियोजनाओं को पूरा करने के लिए हरसंभव प्रयास का आश्वासन दिया, जबकि विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने इन्हें भारत की प्राथमिकता बताया. म्यांमार-भारत व्यापार एवं निवेश सम्मेलन में ह्लाइंग ने इन परियोजनाओं को आसियान-भारत आर्थिक संपर्क का महत्वपूर्ण आधार बताया. वहीं, 2025-26 में द्विपक्षीय व्यापार 1.95 अरब डॉलर तक पहुंच गया और दोनों देशों ने व्यापार बढ़ाने, रुपये-क्यात भुगतान व्यवस्था तथा महत्वपूर्ण खनिजों और रेयर अर्थ तत्वों के क्षेत्र में  सहयोग पर चर्चा की. 

सुरक्षा के मुद्दे पर राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग ने भारत को भरोसा दिलाया है कि म्यांमार की जमीन का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं होने दिया जाएगा. सीमा क्षेत्रों में सक्रिय उग्रवादी और साइबर अपराध नेटवर्क को देखते हुए यह आश्वासन काफी महत्वपूर्ण है. पिछले 18 महीनों में दोनों देशों के सहयोग से 2,400 से अधिक भारतीय नागरिकों को ऑनलाइन ठगी केंद्रों से बचाया गया है. वहीं, शिक्षा क्षेत्र में भारत ने 2026 से म्यांमार के छात्रों के लिए मेकांग-गंगा ICCR छात्रवृत्तियों की संख्या 36 से बढ़ाकर 100 करने की घोषणा की है. 

बड़ी चुनौती   

म्यांमार के राष्ट्रपति के रूप में मिन आंग ह्लाइंग का स्वागत कर भारत ने वहां की मौजूदा राजनीतिक वास्तविकताओं को स्वीकार करने का संकेत दिया है. इसका मतलब यह नहीं है कि भारत सैन्य समर्थित सरकार का समर्थन कर रहा है, बल्कि यह दिखाता है कि म्यांमार के साथ सार्थक संबंध बनाए रखने के लिए फिलहाल सत्ता में मौजूद नेतृत्व के साथ काम करना जरूरी है. म्यांमार के लिए भी यह यात्रा महत्वपूर्ण है. मिन आंग ह्लाइंग 2019 में म्यांमार के सैन्य प्रमुख के रूप में भारत आए थे. राष्ट्रपति बनने के बाद उनकी यह पहली प्रमुख द्विपक्षीय विदेश यात्रा है और इसके लिए भारत का चयन दोनों देशों के बढ़ते महत्व को दर्शाता है. यह कदम म्यांमार की चीन पर अत्यधिक निर्भरता को संतुलित करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है. भारत के लिए यह संबंध भौगोलिक, सुरक्षा और रणनीतिक हितों से जुड़ा है, जहां संवाद बनाए रखना अलगाव की तुलना में अधिक व्यावहारिक माना जाता है.


यह लेख मूल रूप से 'द हिंदू' में प्रकाशित हुआ था.

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