सरकार ने अत्याधुनिक लड़ाकू विमान के विकास और निर्माण के लिए तीन निजी कंपनियों को टेंडर दिया है. HAL को इस प्रक्रिया से बाहर रखना रक्षा उत्पादन नीति में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है. इसका मकसद देश की स्वदेशी क्षमताओं का विस्तार और सशक्तीकरण करना है.
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भारत सरकार ने अपने सबसे महत्वाकांक्षी पांचवीं पीढ़ी के स्वदेशी स्टील्थ फाइटर जेट प्रोग्राम, एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) के शुरुआती मॉडल (प्रोटोटाइप) बनाने के लिए तीन निजी कंपनियों के नेतृत्व वाले समूहों को टेंडर जारी कर एक ऐतिहासिक शुरुआत की है. इस पूरे फैसले का सबसे बड़ा मोड़ सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को इस प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर रखना है, जिसने दशकों से भारतीय सैन्य विमान निर्माण पर अपना एकाधिकार बनाए रखा था. अब इस रेस में टाटा ग्रुप स्वतंत्र रूप से, भारत फोर्ज (BEML और डेटा पैटर्न्स के साथ), तथा एलएंडटी (BEL और डायनामेटिक टेक्नोलॉजीज के साथ) मिलकर प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं. रक्षा मंत्रालय का यह कदम केवल एक खरीद समझौता नहीं है, बल्कि देश के रक्षा-औद्योगिक ढांचे में आया एक बहुत बड़ा बदलाव है. वायुसेना द्वारा विमानों की डिलीवरी में होने वाली पारंपरिक देरी और क्षेत्रीय सुरक्षा की चुनौतियों को देखते हुए सरकार ने अब सरकारी एकाधिकार को खत्म करने का फैसला किया है. इसका मुख्य उद्देश्य देश की निजी कंपनियों की ताकत, आधुनिक तकनीक और निवेश क्षमता का उपयोग करके रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करना है, ताकि भारत आने वाले समय में एक बड़े हथियार आयातक देश से बदलकर खुद को एक वैश्विक एयरोस्पेस और रक्षा तकनीक महाशक्ति के रूप में स्थापित कर सके.
भारत ने अपने सबसे बड़े सैन्य विमान कार्यक्रम, AMCA (5th जेनरेशन फाइटर जेट) की कमान सरकारी कंपनियों के बजाय निजी क्षेत्र को सौंपने का बड़ा फैसला किया है. जैसा कि बताया गया है, तेजस जैसे प्रोजेक्ट्स में सरकारी देरी और वायुसेना में लड़ाकू विमानों की कमी के कारण यह कदम उठाना जरूरी हो गया था क्योंकि पुरानी व्यवस्था अब सुरक्षा की आधुनिक जरूरतों के लिए पर्याप्त नहीं है. हालांकि, यह एक 'सोचा-समझा जोखिम' है क्योंकि पांचवीं पीढ़ी के विमान बनाना बेहद जटिल काम है और निजी कंपनियों के पास विमानों के एकीकरण और परीक्षण का पुराना अनुभव नहीं है. इस प्रोजेक्ट में विदेशी कंपनियों से सिर्फ जरूरी तकनीक (जैसे इंजन) ली जाएगी, लेकिन मुख्य नियंत्रण भारत के हाथ में ही रहेगा. यदि यह प्रयोग सफल रहा, तो भारत दुनिया का एक बड़ा रक्षा उत्पादक देश बन जाएगा और इसकी पूरी रक्षा संरचना बदल जाएगी.
रक्षा मंत्रालय का यह कदम केवल एक खरीद समझौता नहीं है, बल्कि देश के रक्षा-औद्योगिक ढांचे में आया एक बहुत बड़ा बदलाव है. वायुसेना द्वारा विमानों की डिलीवरी में होने वाली पारंपरिक देरी और क्षेत्रीय सुरक्षा की चुनौतियों को देखते हुए सरकार ने अब सरकारी एकाधिकार को खत्म करने का फैसला किया है.
भारत ने अपनी सेना को मजबूत करने के लिए एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया है, जिसके तहत देश के सबसे जरूरी और आधुनिक फाइटर जेट प्रोग्राम, यानी AMCA (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट), की जिम्मेदारी अब सरकारी कंपनियों के बजाय प्राइवेट सेक्टर को सौंपने की तैयारी की जा रही है. नई दिल्ली का यह कदम दशकों पुरानी उस व्यवस्था को पूरी तरह बदल देगा जहाँ सेना के विमान बनाने का काम सिर्फ सरकारी कंपनियों जैसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के पास होता था. दरअसल, भारतीय वायुसेना के पास लड़ाकू विमानों की कमी हो रही है और तेजस जैसे पुराने सरकारी प्रोजेक्ट्स में काफी देरी हुई है, जिसके कारण सरकार को यह समझ आ गया है कि पुरानी और सुस्त व्यवस्था से आधुनिक सुरक्षा चुनौतियों का मुकाबला नहीं किया जा सकता. AMCA एक बेहद अत्याधुनिक, दो इंजनों वाला स्टील्थ (दुश्मन के रडार से बचने वाला) लड़ाकू विमान है, जिसमें सुपरक्रूज, उन्नत एईएसए (AESA) रडार और अंदर ही हथियार रखने की जगह जैसी बेहतरीन तकनीकें होंगी. भारत अब पूरी तरह आत्मनिर्भर बनना चाहता है. हालांकि, यह कदम एक 'सोचा-समझा जोखिम' है क्योंकि पांचवीं पीढ़ी का विमान बनाना बच्चों का खेल नहीं है; इसमें बड़ी-बड़ी महाशक्तियां भी परेशान हो चुकी हैं. टाटा और एलएंडटी जैसी भारतीय प्राइवेट कंपनियों ने पिछले कुछ सालों में पुर्जे बनाने का अच्छा अनुभव तो हासिल कर लिया है, पर उनके पास पूरे विमान को असेंबल करने और टेस्ट करने का तजुर्बा नहीं है. इसके लिए प्राइवेट कंपनियों, डीआरडीओ (DRDO) और विदेशी सहयोगियों को मिलकर बहुत तालमेल से काम करना होगा. इस प्रोजेक्ट में इंजन जैसी कुछ खास चीजों के लिए विदेशी मदद तो ली जाएगी, पर पूरा कंट्रोल भारत के हाथ में ही रहेगा. कुल मिलाकर, यदि यह दांव कामयाब रहा तो भारत दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार बनने के बजाय एक बहुत बड़ी सैन्य और तकनीकी महाशक्ति बनकर उभरेगा.
भारत का AMCA प्रोजेक्ट एक बड़ा कदम होने के साथ-साथ एक 'सोचा-समझा जोखिम' भी है क्योंकि पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान बनाना दुनिया के सबसे कठिन कामों में से एक है, जिसमें बड़ी-बड़ी महाशक्तियां भी बजट बढ़ने और तकनीकी दिक्कतों से परेशान रही हैं. हालांकि भारतीय निजी कंपनियों के पास मैनेजमेंट और फैक्ट्रियों की ताकत है, लेकिन उनके पास सरकारी कंपनी HAL की तरह पूरे विमान को जोड़ने और टेस्ट करने का पुराना अनुभव नहीं है. इसी वजह से प्राइवेट कंपनियों, एडीए (ADA), डीआरडीओ (DRDO) और विदेशी साझेदारों के बीच बहुत मजबूत तालमेल की जरूरत होगी. इसके बावजूद इस फैसले का रणनीतिक तर्क बिल्कुल साफ है; भारत एक ऐसा आधुनिक रक्षा माहौल बनाना चाहता है जो दुनिया के टक्कर का हो. अगर यह प्रोजेक्ट सफल रहा, तो यह AMCA मॉडल भविष्य में एडवांस ड्रोन, टैंक और नौसैनिक जहाज बनाने के लिए एक खाका बनेगा और भारत के रक्षा उत्पादन की पूरी संरचना को हमेशा के लिए बदल देगा.
AMCA को प्राइवेट सेक्टर के लिए खोलना पिछले कुछ दशकों का सबसे बड़ा और क्रांतिकारी रक्षा सुधार माना जा रहा है. यह फैसला साफ करता है कि नई दिल्ली अब सरकारी कंपनियों के एकाधिकार से बाहर निकलकर एक आधुनिक और नए विचारों वाली सैन्य व्यवस्था बनाना चाहती है.
भारत का AMCA कार्यक्रम सिर्फ एक लड़ाकू विमान बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विदेशी सहयोग और देश की संप्रभुता के बीच एक बेहतरीन संतुलन है. इस प्रोजेक्ट के तहत इंजन, एवियोनिक्स और स्टील्थ जैसी मुख्य तकनीकों के लिए विदेशी कंपनियों के साथ एक नपा-तुला और नियंत्रित समझौता किया जाएगा. उदाहरण के लिए, शुरुआत में भारत अमेरिकी जीई एफ414 (GE F414) इंजन का इस्तेमाल करेगा, लेकिन उसका असली मकसद भविष्य में अपनी खुद की स्वदेशी इंजन क्षमता को विकसित करना है. यह नीति दिखाती है कि भारत विदेशी तकनीक की मदद तो लेगा, पर मुख्य कमान पूरी तरह अपने हाथ में रखेगा.
AMCA को प्राइवेट सेक्टर के लिए खोलना पिछले कुछ दशकों का सबसे बड़ा और क्रांतिकारी रक्षा सुधार माना जा रहा है. यह फैसला साफ करता है कि नई दिल्ली अब सरकारी कंपनियों के एकाधिकार से बाहर निकलकर एक आधुनिक और नए विचारों वाली सैन्य व्यवस्था बनाना चाहती है. इस बड़े बदलाव में जोखिम भी बहुत ज्यादा हैं. अगर यह कोशिश कामयाब रही, तो भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार खरीदार (आयातक) होने का ठप्पा हटाकर रक्षा तकनीक की एक बड़ी वैश्विक महाशक्ति बन जाएगा. इसके विपरीत, यदि यह असफल रहा, तो बड़े और जटिल प्रोजेक्ट्स को खुद पूरा करने की भारत की क्षमता पर हमेशा के लिए गहरा संदेह पैदा हो जाएगा. असल में, यह कार्यक्रम इस बात की परीक्षा है कि क्या भारत इक्कीसवीं सदी में एक वैश्विक महाशक्ति बनने के लिए जरूरी औद्योगिक और संस्थागत आधार तैयार कर सकता है या नहीं.
यह लेख मूल रूप से मनीकंट्रोल में प्रकाशित हुआ था.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...
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