Author : Harsh V. Pant

Published on Jun 12, 2026 Commentaries 3 Days ago

अलग-अलग देशों ने पहले भी चीन की जासूसी गतिविधियों को लेकर चेतावनी दी है, लेकिन ‘फाइव आइज’ का संयुक्त अलर्ट बताता है कि खतरा कितना गंभीर हो चुका है. जानिए, कैसे चीन डिजिटल और प्रोफेशनल नेटवर्किंग मंचों के जरिए अपनी खुफिया पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.  

चीन की डिजिटल जासूसी पर ‘फाइव आईज’ की चेतावनी

Image Source: Getty

खुफिया समूह ‘फाइव आईज’ ने पिछले हफ्ते एक संयुक्त बयान जारी किया, जो सिर्फ अपनी अंतर्वस्तु की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए भी अहम है कि उससे सदस्य देशों के बीच जबरदस्त एकता की झलक मिलती है. ‘फाइव आईज’ अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की सुरक्षा एजेंसियों का गुट है, जिसने चेतावनी जारी करते हुए आगाह किया है कि चीन अब प्रोफेशनल नेटवर्किंग व ऑनलाइन रिक्रूटमेंट मंचों के माध्यम से अधिक जासूसी करने लगा है.

सेफगार्डिंग आवर सीक्रेट्स नाम से यह सुरक्षा बुलेटिन जारी की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि चीन की सैन्य खुफिया एजेंसियां लिंक्डइन, इनडीड और अपवर्क जैसे ऑनलाइन मंचों का इस्तेमाल करके ऐसे लोगों की पहचान व भर्ती कर रही हैं, जिनकी पहुंच संवेदनशील जानकारियों तक होती है. ‘फाइव आईज’ के मुताबिक, इनके एजेंट प्राइवेट कंसल्टेंसी, शोध संस्थान या एडवाइजरी कंपनी के प्रतिनिधि बनकर विदेश नीति, रक्षा व रणनीतिक मामलों के जानकारों को ऐसे फर्जी पदों पर नियुक्त करते हैं, जो असली से लगते हैं.

‘फाइव आईज’ अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की सुरक्षा एजेंसियों का गुट है, जिसने चेतावनी जारी करते हुए आगाह किया है कि चीन अब प्रोफेशनल नेटवर्किंग व ऑनलाइन रिक्रूटमेंट मंचों के माध्यम से अधिक जासूसी करने लगा है.

इस क्रम में पहले सामान्य पेशेवरों की तरह हल्की-फुल्की सूचनाएं हासिल की जाती हैं, फिर धीरे-धीरे ऐसी संवेदनशील जानकारियां मांगी जाती हैं, जो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं होतीं. खबरों को मानें, तो इसके लिए भारी-भरकम भुगतान किया जाता है. इसमें मौजूदा और पूर्व सरकारी अधिकारियों, सेना के जवानों, खुफिया विभाग के अधिकारियों, राजनयिकों, रक्षा विश्लेषकों और ऐसे लोगों को निशाना बनाया जाता है, जिनकी संवेदनशील राजनीतिक, आर्थिक या तकनीकी सूचनाओं तक पहुँच होती है.

चीनी की डिजिटल घुसपैठ 

चीनी खुफिया एजेंसियों की रणनीति साफ है, ऐसी खास सूचनाएं जुटाना, जिनसे चीन दीर्घकालिक और रणनीतिक लाभ पा सके. ‘फाइव आईज’ ने इन गतिविधियों को चीन की शासन-कला का एक ऐसा पैटर्न बताया है, जिसमें राष्ट्रीय लक्ष्यों को पाने के लिए सैन्य, खुफिया, कारोबारी और तकनीकी क्षमताओं का इस्तेमाल किया जाता है.

इस चेतावनी को जो बात खास तौर से उल्लेखनीय बनाती है, वह है इसका सामूहिक स्वरूप. अलग-अलग सरकारें पहले भी चीन की जासूसी गतिविधियों को लेकर आगाह कर चुकी हैं, लेकिन ‘फाइव आईज’ के सदस्य देशों द्वारा सामूहिक रूप से इसे जारी करना यह बताता है कि खतरा बड़ा है और लगातार बना हुआ है. इससे यह भी स्पष्ट होता है कि खुफिया चुनौतियों का सामना अब सिर्फ खुफिया चैनलों के जरिए नहीं किया जा सकता. एक ऐसे दौर में, जब प्रोफेशनल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के बीच के फर्क को मिटा रहे हैं, समाज की मजबूती राष्ट्रीय सुरक्षा का एक अहम हिस्सा बन गई है.

पिछले कुछ वर्षों में ऐसी कई रिपोर्ट आई हैं, जिसमें बताया गया है कि कैसे प्रोफेशनल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्मों व कथित अकादमिक संस्थाओं के नाम पर भारतीय शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, नीति विशेषज्ञों व सरकार या सेना से जुड़े रहे लोगों को फंसाने की कोशिशें की गई हैं.

इस चेतावनी को व्यापक भू-राजनीतिक संदर्भ में भी देखना चाहिए. पिछले एक दशक में पश्चिमी देशों में चीन के साइबर हमलों, बौद्धिक संपदा की चोरियों, प्रभाव बढ़ाने वाले अभियानों और रणनीतिक तकनीक हासिल करने के प्रयासों को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं. सुरक्षा एजेंसियां अब इन घटनाओं को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ऐसी रणनीति के तौर पर देख रही हैं, जो वैश्विक प्रभाव व रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में बढ़त हासिल करने के लिए बीजिंग सरकार द्वारा तैयार की गई है. इसमें हिंद-प्रशांत क्षेत्र का भी समान महत्व है. दक्षिण चीन सागर से लेकर ताइवान और क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे जैसे मुद्दों पर बढ़ती प्रतिस्पर्धा को देखते हुए ये खुफिया जानकारियां और ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई हैं.

भारत के सामने अगली चुनौती  

भारत भले ‘फाइव आईज’ का हिस्सा नहीं है और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की नीति पर चल रहा है, पर यह चेतावनी नई दिल्ली के लिए अहम है. सुरक्षा बुलेटिन में जिन चिंताओं का जिक्र किया गया है, उनमें से कई से भारत लगातार जूझता रहा है. पिछले कुछ वर्षों में ऐसी कई रिपोर्ट आई हैं, जिसमें बताया गया है कि कैसे प्रोफेशनल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्मों व कथित अकादमिक संस्थाओं के नाम पर भारतीय शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, नीति विशेषज्ञों व सरकार या सेना से जुड़े रहे लोगों को फंसाने की कोशिशें की गई हैं. ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा’ पर लगातार तनाव और भारत-चीन के बीच व्यापक प्रतिस्पर्धा को देखते हुए रक्षा, विदेश नीति, प्रौद्योगिकी और हिंद-प्रशांत से जुड़े मामलों में हमारे विशेषज्ञों की अहमियत समझी भी जा सकती है.

भारत में सरकारी अधिकारियों, सेना के जवानों, शोधार्थियों व अकादमिक क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों को अब ज्यादा सजग रहने की जरूरत है. बिना मांगे सर्वे के ऑफर, सलाह-मशविरे के अनुरोध और सामान्य सी दिखने वाली शोध परियोजनाओं में शामिल होने के निमंत्रणों की सूक्ष्म जांच-पड़ताल होनी चाहिए.

इसलिए, भारत में सरकारी अधिकारियों, सेना के जवानों, शोधार्थियों व अकादमिक क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों को अब ज्यादा सजग रहने की जरूरत है. बिना मांगे सर्वे के ऑफर, सलाह-मशविरे के अनुरोध और सामान्य सी दिखने वाली शोध परियोजनाओं में शामिल होने के निमंत्रणों की सूक्ष्म जांच-पड़ताल होनी चाहिए. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि चीन के अकादमिक और शोध जगत से जुड़े हर रिश्ते बंद कर देने चाहिए, बल्कि ऐसे जुड़ाव अब कहीं अधिक पारदर्शिता और स्पष्ट नियमों के अधीन होने चाहिए. डिजिटल जागरूकता, संस्थागत जांच-पड़ताल और अंतर्राष्ट्रीय खतरों को भांपने वाली क्षमताओं को मजबूत बनाना भी भारत की सुरक्षा-व्यवस्था का अहम हिस्सा होना चाहिए.

इससे पता चलता है कि समान सोच वाले सहयोगियों से हमें मजबूत संबंध बनाने चाहिए. निस्संदेह, खुफिया गुटों का औपचारिक हिस्सा बनने की भारत की संभावना कम है, पर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया व जापान जैसे सहयोगियों के साथ साइबर सुरक्षा, काउंटर-इंटेलिजेंस, उभरती प्रौद्योगिकी व समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में बेहतर सहयोग जरूरी है. ‘क्वाड’ की सफलता इस बात की नज़ीर है कि सार्थक सुरक्षा सहयोग बनाने के लिए रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता करने की जरूरत नहीं पड़ती. चूंकि जासूसी अब डिजिटल व कारोबारी क्षेत्रों में ज्यादा होने लगी है, इसलिए इंटेलिजेंस, साइबर सुरक्षा और जरूरी बुनियादी ढांचों की सुरक्षा करने वाले संस्थानों को मजबूत बनाना आवश्यक है.

‘फाइव आईज’ की चेतावनी हमारी सुरक्षा चिंताओं से काफी हद तक मेल खाती है. जाहिर है, 21वीं सदी में जासूसी सिर्फ पारंपरिक गोपनीय तरीकों से नहीं, बल्कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों, पेशेवर नेटवर्क व व्यावसायिक रिश्तों के जरिये होने लगी है. ऐसे में, भारत की चुनौती सिर्फ ऐसे खतरों से निपटने की नहीं है, बल्कि इसके लिए जरूरी संस्थागत ढांचे को मजबूत बनाने की भी है. जैसे-जैसे हिंद-प्रशांत में भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, मानव पूंजी और संवेदनशील जानकारियों वाली संपत्तियों की सुरक्षा उतनी ही अहम हो गई है, जितनी कि देश की सीमाओं की सुरक्षा.


यह लेख हिंदुस्तान में प्रकाशित हो चुका है.
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Harsh V. Pant

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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...

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