Author : Harsh V. Pant

Originally Published NDTV Published on May 28, 2026 Commentaries 7 Days ago

एक ही हफ्ते में शी जिनपिंग ने ट्रंप और पुतिन का स्वागत ऐसे किया जैसे दो अलग कहानियां एक मंच पर हों. एक तरफ टकराव, दूसरी तरफ रणनीतिक दोस्ती. ऊपर से बराबरी का सम्मान था लेकिन संदेश साफ था- असली संतुलन अब बीजिंग तय कर रहा है. जानिए कि वैश्विक राजनीति के इस नए समीकरण में चीन कैसे केंद्र में आता जा रहा है.

चीन का कूटनीतिक शो: दो महाशक्तियाँ, एक मंच

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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एक ही हफ्ते के भीतर अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप और रूस के व्लादिमीर पुतिन की मेजबानी की. यह कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि चीन की एक सोची-समझी योजना थी. इसके जरिए चीन दुनिया को यह दिखाना चाहता था कि वह अब वैश्विक राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है. वह इतना ताकतवर है कि अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी (अमेरिका) और सबसे करीबी दोस्त (रूस) दोनों का एक समान भव्यता के साथ स्वागत कर सकता है.

चीन बना वैश्विक कूटनीति का केंद्र  

बीजिंग का सीधा संदेश था कि अब दुनिया के सभी रास्ते चीन की तरफ जाते हैं. दोनों नेताओं के स्वागत का तरीका बिल्कुल एक जैसा और बेहद शानदार था-जैसे गार्ड ऑफ ऑनर, तोपों की सलामी, मार्चिंग बैंड और झंडे लहराते बच्चे. चीनी मीडिया ने भी इसे बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया कि चीन दुनिया में स्थिरता लाने वाली एक बड़ी ताकत है. रूसी राष्ट्रपति पुतिन की चीन यात्रा में एक अलग ही नजदीकी और अपनापन देखने को मिला. उनके स्वागत के लिए चीन के एक बड़े नेता मौजूद थे, जो दोनों देशों के बीच गहरे रणनीतिक भरोसे को दिखाता है. पुतिन का दौरा बहुत ज्यादा औपचारिक न होकर व्यक्तिगत था, जिसमें चाय पीना, कविताएं साझा करना और ‘पुरानी दोस्ती’ को बार-बार याद करना शामिल था. दोनों देशों के बयान भी एक जैसे थे, जो उनके आपसी तालमेल को दर्शाते हैं. भले ही चीन ने दिखावे के लिए ट्रंप और पुतिन दोनों को बराबरी का सम्मान दिया, लेकिन बारीक कूटनीति से साफ था कि चीन असल में रूस के ज्यादा करीब है.

इसके विपरीत, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की तीन दिवसीय यात्रा सिर्फ दिखावे और प्रतीकों से भरपूर थी, लेकिन उसमें कोई ठोस नतीजे नहीं निकले. हालांकि दोनों पक्षों के बीच व्यापार, तकनीक, ईरान, ताइवान और आर्थिक समझौतों पर चर्चा जरूर हुई, लेकिन दोनों देशों के बीच के मुख्य और गहरे विवाद अनसुलझे ही रहे. टैक्स (टैरिफ) और सेमीकंडक्टर प्रतिबंधों जैसे बड़े मुद्दों पर कोई खास कामयाबी नहीं मिली. कुल मिलाकर, ट्रंप की इस यात्रा का मुख्य मकसद सिर्फ दोनों देशों के रिश्तों को बिगड़ने से बचाना और आपसी तनाव को कम रखना था.

बीजिंग का सीधा संदेश था कि अब दुनिया के सभी रास्ते चीन की तरफ जाते हैं. दोनों नेताओं के स्वागत का तरीका बिल्कुल एक जैसा और बेहद शानदार था-जैसे गार्ड ऑफ ऑनर, तोपों की सलामी, मार्चिंग बैंड और झंडे लहराते बच्चे. चीनी मीडिया ने भी इसे बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया कि चीन दुनिया में स्थिरता लाने वाली एक बड़ी ताकत है.

रूसी राष्ट्रपति पुतिन का चीन दौरा भले ही छोटा था, लेकिन इसके नतीजे बहुत ठोस और बड़े रहे. इस दौरान दोनों देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा, ट्रांसपोर्ट, तकनीक और सांस्कृतिक सहयोग को लेकर कई अहम समझौते हुए. दोनों पक्षों ने साझा बयानों में बहुध्रुवीय व्यवस्था का समर्थन किया और पश्चिमी देशों के दबदबे का विरोध किया. उन्होंने अपनी रणनीतिक साझेदारी को 'ऐतिहासिक ऊंचाई' पर बताया. दोनों देशों के रिश्ते लगातार मजबूत हो रहे हैं. अमेरिका और चीन के रिश्ते जहां सिर्फ फायदे-नुकसान पर टिके हैं और कमजोर हैं, वहीं चीन और रूस की दोस्ती गहरी है क्योंकि दोनों के भू-राजनीतिक हित एक जैसे हैं.

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का मुख्य मकसद इन दो तरफा रिश्तों से भी कहीं बड़ा था. एक ही समय में ट्रंप और पुतिन दोनों की मेजबानी करके बीजिंग दुनिया को दिखाना चाहता था कि वैश्विक बदलाव के इस दौर में कूटनीति का असली केंद्र चीन ही है. चीन बिना किसी दबाव के दुश्मनों और दोस्तों दोनों के साथ एक साथ बातचीत कर सकता है.

डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा का चीन और निजी तौर पर शी जिनपिंग के लिए एक खास रणनीतिक महत्व था. चीन का तुरंत का मकसद किसी सीधे टकराव में पड़ना नहीं, बल्कि बढ़ते अंदरूनी और बाहरी दबावों के बीच अपने लिए थोड़ा संभलने का समय और माहौल तैयार करना था. इस समय चीन सुस्त आर्थिक विकास, प्रॉपर्टी सेक्टर की मंदी, घटती आबादी और आधुनिक तकनीक के ट्रांसफर पर अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा लगाए जा रहे कड़े प्रतिबंधों से जूझ रहा है. इसी के साथ, चीनी नेतृत्व सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग और रक्षा तकनीकों में आत्मनिर्भर बनने की कोशिशों को तेज कर रहा है. ये सभी लंबे समय के प्रोजेक्ट हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए चीन को एक शांत और स्थिर बाहरी माहौल की सख्त जरूरत है.

मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए, अमेरिका के साथ रिश्तों में थोड़ी सी स्थिरता आना भी चीन के लिए बहुत फायदेमंद है. रणनीतिक रूप से तनाव कम होने से आर्थिक नुकसान का खतरा कम हो जाता है, और व्यापार या ताइवान के मुद्दे पर अचानक कोई बड़ा संकट पैदा होने की आशंका घट जाती है. चीन के रणनीतिकारों का मानना है कि अमेरिका के साथ मुकाबला हमेशा चलने वाला है, इसलिए वाशिंगटन के साथ प्रतिद्वंद्वी को पूरी तरह खत्म करना उनका मकसद नहीं है. उनका असली लक्ष्य इस मुकाबले की रफ्तार को अपने हिसाब से तय करना है, जो चीन के लंबे समय के विकास के अनुकूल हो.

अमेरिका के साथ रिश्तों में आई यह अस्थायी नरमी कोई दोस्ती नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीतिक देरी है. इससे चीन को थोड़ा और समय मिल जाता है, उसकी आर्थिक पहुंच बनी रहती है, और पश्चिमी देशों का एक मजबूत चीन-विरोधी गठबंधन बनने से रुक जाता है. इसी बीच चीन महाशक्तियों के बीच होने वाले लंबे मुकाबले के लिए खुद को तैयार कर रहा है. दूसरी तरफ, पुतिन के दौरे ने चीन की बड़ी रणनीति के एक दूसरे हिस्से को मजबूत किया. रूस अब चीन के लिए एक बेहद कीमती रणनीतिक सहारा बन चुका है, जो उसकी उत्तरी सीमा को सुरक्षित रखता है और पश्चिमी देशों का ध्यान भटकाता है. इस साझेदारी से चीन को सस्ते दामों पर ऊर्जा (तेल-गैस) मिलती है, जिससे उसकी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होती है.

शी जिनपिंग ने दोनों देशों के साथ अलग-अलग स्तर पर बातचीत करके दुनिया के सामने अपनी ताकत, संतुलन और कूटनीतिक सूझबूझ का लोहा मनवाया है. भले ही इस दौरे में बहुत बड़े समझौते न हुए हों, लेकिन आज की वैश्विक राजनीति में यह कूटनीतिक दिखावा और संदेश ही सबसे बड़ी ताकत है, जिसमें बीजिंग पूरी तरह सफल रहा.

जिनपिंग की रणनीति 

चीन और रूस के रिश्तों का संतुलन अब धीरे-धीरे चीन के पक्ष में झुक रहा है. यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी बाजारों से अलग होने के कारण रूस व्यापार, तकनीक, पैसे और कूटनीतिक मदद के लिए पूरी तरह चीन पर निर्भर हो गया है. इस मजबूरी का फायदा बीजिंग को मिल रहा है. इससे चीन को पश्चिमी देशों के साथ सीधे टकराव का नुकसान उठाए बिना रूस के संसाधनों और रणनीतिक सहयोग का पूरा फायदा मिल रहा है.

इसके अलावा, इन दोनों दौरों के समय का चुनाव भी बेहद सोची-समझी कूटनीति का हिस्सा था. ट्रंप के तुरंत बाद पुतिन की मेजबानी करके शी जिनपिंग ने दुनिया और अपने देश के लोगों को यह साफ संदेश दिया कि अमेरिका से बातचीत का मतलब रूस के साथ दोस्ती कम करना नहीं है. इसने पश्चिमी देशों के उस अनुमान को भी गलत साबित कर दिया कि अमेरिका एक 'रिवर्स निक्सन' नीति अपनाकर रूस को चीन से अलग कर देगा.

यह पूरा घटनाक्रम चीनी व्यावहारिक राजनीति का एक बेहतरीन उदाहरण है. शी जिनपिंग ने दोनों देशों के साथ अलग-अलग स्तर पर बातचीत करके दुनिया के सामने अपनी ताकत, संतुलन और कूटनीतिक सूझबूझ का लोहा मनवाया है. भले ही इस दौरे में बहुत बड़े समझौते न हुए हों, लेकिन आज की वैश्विक राजनीति में यह कूटनीतिक दिखावा और संदेश ही सबसे बड़ी ताकत है, जिसमें बीजिंग पूरी तरह सफल रहा.


यह लेख मूल रूप से एनडीटीवी में प्रकाशित हुआ था. 

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