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Published on May 05, 2026 Updated 1 Days ago

शहर तेजी से बढ़ रहे हैं लेकिन सही डेटा न होने से नीतियाँ अंदाज़े पर बन रही हैं. जब डेटा पूरा, नियमित और एक जैसा होगा, तभी शहरों का विकास सही दिशा में आगे बढ़ेगा.

शहरी प्लानिंग: आंकड़े या अंदाज़े?

आज भारत के शहरों में 50 करोड़ से अधिक लोग रहते हैं और अनुमान है कि 2036 तक यह संख्या 60 करोड़ तक पहुँच जाएगी. फिर भी, आबादी, अर्थव्यवस्था, सेवाओं और कमजोरियों को सटीक रूप से मापने और समझने की संस्थागत क्षमता उतनी तेजी से विकसित नहीं हो पाई है. कई शहरों में सटीक और संरचित डेटा की कमी है. जहाँ डेटा उपलब्ध है, वहाँ भी उसे शहरों के बीच तुलना योग्य नहीं बनाया जा सकता. महत्वपूर्ण डेटा सेट या तो दशक में एक बार अपडेट होते हैं या ऐसे प्रारूपों में रखे जाते हैं जो अलग-अलग राज्यों में इतने भिन्न होते हैं कि उनका समेकन विश्लेषण के बजाय अनुमान का खेल बन जाता है. शोधकर्ता अक्सर डेटा के अनुमानित विकल्पों (प्रॉक्सी) और आकलनों पर निर्भर रहते हैं. यह कोई छोटा या केवल तकनीकी समस्या नहीं है, बल्कि एक गंभीर मुद्दा है. डेटा की कमी सटीक नीतिनिर्माण में बाधा डालती है और शहरी कार्यक्रमों की प्रभावशीलता को कम कर देती है. भारत को अपनी लगातार बनी हुई डेटा समस्याओं को तुरंत दूर करना होगा, ताकि सूचित नीति निर्णय लिए जा सकें और नीतियाँ व कार्यक्रम अधिकतम लाभ दे सकें, साथ ही शहरी शासन में विश्वास बढ़े.

भारत की त्रि-आयामी डेटा समस्या

भारतीय शहरों के सामने मौजूद डेटा संबंधी चुनौतियाँ तीन मुख्य समस्याओं के मेल से उत्पन्न होती हैं: क्या मापा जा रहा है उसमें कमी, डेटा अपडेट की असंगत आवृत्ति, और असंगत डेटा प्रारूप. आधिकारिक डेटा प्रणाली औपचारिक क्षेत्रों पर आधारित होने के कारण अनौपचारिक और अदृश्य क्षेत्रों को नजरअंदाज करती है, जिससे शोध भी अधूरा रह जाता है. 

भारत के शहरी डेटा में मौजूद अंतराल समान रूप से नहीं फैले हैं, बल्कि वे उन समूहों और व्यवस्थाओं में अधिक केंद्रित हैं जो पहले से ही आधिकारिक रिकॉर्ड में हाशिए पर हैं. उदाहरण के लिए, अधिकांश भारतीय शहरों में अनौपचारिक कचरा बीनने वाले 60 से 90 प्रतिशत तक पुनर्चक्रण योग्य कचरे का प्रबंधन करते हैं, लेकिन आधिकारिक कचरा प्रबंधन डेटा केवल नगरपालिकाओं द्वारा किए गए औपचारिक संग्रह को ही दर्ज करता है. 2016 के ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों में कचरा बीनने वालों को औपचारिक प्रणाली में शामिल करने की बात कही गई थी, लेकिन अधिकांश शहरों ने इसे लागू नहीं किया है. अनौपचारिक कचरा प्रवाह से संबंधित डेटा की कमी के कारण इस क्षेत्र का योगदान बजट आवंटन और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में अदृश्य बना रहता है.

यह कोई छोटा या केवल तकनीकी समस्या नहीं है, बल्कि एक गंभीर मुद्दा है. डेटा की कमी सटीक नीतिनिर्माण में बाधा डालती है और शहरी कार्यक्रमों की प्रभावशीलता को कम कर देती है. भारत को अपनी लगातार बनी हुई डेटा समस्याओं को तुरंत दूर करना होगा, ताकि सूचित नीति निर्णय लिए जा सकें और नीतियाँ व कार्यक्रम अधिकतम लाभ दे सकें.

ये डेटा अंतराल फिर से उसी संरचनात्मक कमी को दिखाते हैं-आधिकारिक मापन प्रणाली औपचारिक और पंजीकृत इकाइयों पर आधारित होने के कारण अनौपचारिक और अदृश्य क्षेत्रों को नजरअंदाज करती है. परिणामस्वरूप, इन पर आधारित शोध और उपकरण भी इन कमियों को दोहराते हैं.

सबसे मूलभूत समस्या यह है कि शहर स्तर पर सामाजिक एकजुटता, सांप्रदायिक तनाव या नागरिक विश्वास जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को मापने के लिए कोई मानकीकृत प्रणाली नहीं है, जबकि ये किसी शहर के कार्य करने को समझने के लिए बेहद जरूरी हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो 53 महानगरों के लिए अपराध डेटा प्रकाशित करता है, लेकिन इसमें भी डेटा का वर्गीकरण असंगत है, जिससे शहरों के बीच तुलना करना विश्वसनीय नहीं रहता. नागरिकों की सुरक्षा संबंधी धारणा, सेवाओं से संतुष्टि या स्थानीय सरकार पर भरोसे जैसी बातें कभी-कभार होने वाले एकमुश्त सर्वेक्षणों में ही दर्ज की जाती हैं, जिनकी कोई नियमित आवृत्ति नहीं होती.

मानसिक स्वास्थ्य अवसंरचना एक और ऐसा क्षेत्र है जो लगभग पूरी तरह से डेटा के दायरे से बाहर है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6 (NFHS-6, 2023–24), जो अधिकांश शोधकर्ताओं के लिए स्वास्थ्य डेटा का प्रमुख स्रोत है, ने अपने नवीनतम दौर में कई बायोमार्कर संकेतकों को हटा दिया और मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित कोई मॉड्यूल भी शामिल नहीं किया. इसके कारण, केवल समय-समय पर होने वाला नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे ही एकमात्र उपलब्ध साधन रह गया है. जो लोग शहरी स्वास्थ्य को समग्र रूप से समझना चाहते हैं, उनके लिए यह कमी बेहद स्पष्ट और गंभीर है.

अनौपचारिक स्वास्थ्य क्षेत्र की अदृश्यता सबसे महत्वपूर्ण अंतराल है. NFHS-6 उत्तरदाताओं से उनके ‘स्वास्थ्य सेवा के स्रोत’ के बारे में पूछता है, लेकिन अनौपचारिक प्रदाताओं-जो कम आय वाले शहरी इलाकों में रहने वाले अधिकांश लोगों को सेवाएँ देते हैं-को या तो ‘निजी क्लिनिक’ की सामान्य श्रेणी में रख देता है या पूरी तरह से नजरअंदाज कर देता है. नेशनल सैंपल सर्वे (NSS) के 75वें दौर ने यह दिखाया कि अनौपचारिक प्रदाताओं को स्पष्ट रूप से ट्रैक करना पद्धतिगत रूप से संभव है, लेकिन इस दृष्टिकोण को अभी तक संस्थागत रूप नहीं दिया गया है.

समय संबंधी समस्या

भारत में शहरी डेटा समय पर अपडेट नहीं होता, और इन्हें एक साथ जोड़ने के लिए कई तरह के अनुमान लगाने पड़ते हैं, जो पूरे विश्लेषण को जटिल और कभी-कभी भ्रामक बना देते हैं. जनगणना, जो जनसांख्यिकीय और आवास संबंधी डेटा का सबसे व्यापक स्रोत है, दस साल के चक्र पर आधारित है. 2021 की जनगणना में देरी हुई है और अब इसे 2027 में किया जाना तय है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) तीन साल के चक्र पर चलता है. पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS), जिसने जनवरी 2025 से मासिक रोजगार अनुमान देना शुरू किया है, अपने अलग कैलेंडर पर चलता है. भारतीय मौसम विभाग (IMD) से जलवायु संबंधी डेटा रोजाना उपलब्ध होता है. वहीं, नगरपालिकाओं की सेवा रिपोर्ट, जब भी प्रकाशित होती हैं, सालाना या उससे भी कम आवृत्ति पर सामने आती हैं. इस तरह की असंगत समय-सीमाएँ किसी शहर की एक सटीक और समग्र तस्वीर तैयार करने में बड़ी बाधा बनती हैं. उदाहरण के लिए, 2011 की जनगणना के आधार पर 2023 के स्वास्थ्य सर्वे और 2024 के रोजगार आंकड़ों को मिलाकर जो निष्कर्ष निकाले जाते हैं, वे आंतरिक रूप से असंगत होते हैं.

शहरों को मजबूत डेटा संग्रह, मानकीकरण और खुले तौर पर उपलब्ध डेटा सिस्टम पर ध्यान देना होगा। अगर यह बुनियादी चीजें ठीक नहीं होंगी, तो कोई भी आधुनिक तकनीक या उपकरण केवल अधूरी जानकारी को ही बेहतर तरीके से दिखा पाएंगे, समाधान नहीं दे पाएंगे.

भारत में शहरी स्थानीय निकाय (ULBs) अपने वित्तीय और प्रशासनिक रिकॉर्ड अलग-अलग प्रारूपों में रखते हैं, जो न केवल राज्यों के बीच बल्कि एक ही राज्य के शहरों के बीच भी भिन्न होते हैं. 15वें वित्त आयोग और अन्य अध्ययनों से पता चलता है कि डबल-एंट्री एक्रुअल आधारित लेखांकन प्रणाली की ओर संक्रमण अभी अधूरा है, और कई ULB अभी भी नकद-आधारित प्रणाली पर निर्भर हैं. जहाँ कर्नाटक केंद्रीकृत पोर्टलों के माध्यम से काम करता है, वहीं महाराष्ट्र अपना अलग म्युनिसिपल अकाउंट कोड अपनाता है. कई छोटे नगरपालिकाएँ अभी भी मैन्युअल या निजी (प्रोप्राइटरी) प्रारूपों में रिकॉर्ड रखती हैं.

जो लोग ऐसे उपकरण विकसित करना चाहते हैं जिन्हें नगरपालिका डेटा को एकत्र और विश्लेषित करना हो-जैसे बजट पारदर्शिता प्लेटफॉर्म, सेवा वितरण ट्रैकर या सार्वजनिक वित्त डैशबोर्ड-उनके लिए यह डेटा विखंडन एक मूलभूत बाधा बन जाता है.

भविष्य की रणनीति

भारतीय शहरों में डेटा की समस्या बड़ी है, लेकिन इसे सुधारा जा सकता है. क्या और कैसे डेटा इकट्ठा हो, यह बदलना होगा. सभी शहरों में एक जैसे डेटा नियम जरूरी हैं, ताकि तुलना आसान हो. सरकार को इसके लिए तय मानक बनाकर फंडिंग से जोड़ना चाहिए. सभी आधिकारिक शहरी डेटा में अनौपचारिक प्रणालियों को शामिल करना जरूरी है, ताकि असमानताओं को बेहतर ढंग से समझा जा सके और समग्र शहरी शासन को बढ़ावा मिल सके.

मापन की आवृत्ति को शहरी बदलावों के अनुरूप बनाना होगा. स्वास्थ्य सेवाओं, नगरपालिका सेवाओं और आवास की निगरानी भी नियमित रूप से की जा सकती है. 2011 में सर्वेक्षित शहर, जिसे 2027 तक दोबारा पूरी तरह नहीं गिना जाएगा, उसके आधार पर वर्तमान में सही योजना और प्रबंधन करना संभव नहीं है. अनौपचारिक लोगों और सेवाओं को सरकारी डेटा में शामिल करना जरूरी है. अगर कचरा बीनने वाले, झुग्गी निवासी और असंगठित कामगार डेटा में नहीं होंगे, तो उन्हें योजनाओं और बजट का लाभ नहीं मिलेगा. इसलिए उन्हें शामिल करना बहुत महत्वपूर्ण है.

शहरी भारत की डेटा समस्या सिर्फ तकनीक की कमी नहीं है, बल्कि सही और पूर्ण डेटा की कमी भी है. अच्छे डैशबोर्ड या विश्लेषण प्लेटफॉर्म तभी काम आते हैं जब डेटा भरोसेमंद और एकसमान हो. इसलिए शहरों को मजबूत डेटा संग्रह, मानकीकरण और खुले तौर पर उपलब्ध डेटा सिस्टम पर ध्यान देना होगा। अगर यह बुनियादी चीजें ठीक नहीं होंगी, तो कोई भी आधुनिक तकनीक या उपकरण केवल अधूरी जानकारी को ही बेहतर तरीके से दिखा पाएंगे, समाधान नहीं दे पाएंगे.



नंदन एच. डावड़ा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के शहरी अध्ययन कार्यक्रम में फेलो हैं.

अदिति दीक्षित ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च इंटर्न हैं.

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