चीन सीमा से सटे गांवों में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए भारत ने प्रयास तेज कर दिए हैं. इसके अंतर्गत ‘वाइब्रेंट विलेजेस प्रोग्राम’ जैसी महत्वाकांक्षी घोषणा की गई है. इसमें चीन से लगी 3,400 किमी की सीमा पर लगभग 3,000 गांव चिह्नित किए गए हैं, जहां आधारभूत सुविधाओं को बेहतर बनाया जाएगा. इन सीमावर्ती गांवों में सड़क निर्माण के लिए ही 2,500 करोड़ रुपये का आवंटन हुआ है. अरुणाचल प्रदेश में पनबिजली परियोजनाओं के मोर्चे पर भी गति बढ़ाई जा रही है. भारत-तिब्बत सीमा पुलिसकर्मियों के लिए सुविधाओं को बेहतर बनाया जा रहा है.
तिब्बत पर कब्जे के 70 साल बाद भी वह न तो दलाई लामा का आध्यात्मिक प्रभाव और न ही भारत एवं तिब्बत के बीच सांस्कृतिक संबंधों को खत्म कर पाया है. यह चीन के लिए बड़ी चिंता का विषय है.
दूरसंचार कंपनियों से कहा गया है कि वे अरुणाचल के उस तवांग जिले में मोबाइल कनेक्टिविटी को सुधारें, जहां गत वर्ष दिसंबर में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच झड़प हुई थी. सीमा पर बुनियादी ढांचे से जुड़ी यह व्यापक योजना चीन द्वारा अरुणाचल के कुछ हिस्सों का नाम बदलने के बीच शुरू हुई है. चीन इन गांवों को तिब्बत का हिस्सा बताता आया है. सरकार द्वारा इन क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने का उद्देश्य यहां जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाना है, ताकि स्थानीय निवासी वहां रहने के लिए प्रेरित हों और आजीविका की राह में दूसरे शहरों की ओर पलायन न करें. इस प्रकार यह पूरी कवायद सीमावर्ती सुरक्षा को चुस्त-दुरुस्त बनाने पर केंद्रित है.
चीनी मंशा
सीमावर्ती क्षेत्रों में अवसंरचना बनाकर और सैन्य-नागरिक जुगलबंदी से स्थलीय एवं सामुद्रिक सीमा का अतिक्रमण करना चीनी तिकड़म का एक प्रमुख हिस्सा रहा है. इस साल चीन ने तिब्बत और शिनजियांग को जोड़ने वाली नई रेलवे लाइन बिछाने का एलान किया है. यह रेल लाइन वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी के बहुत करीब और उस अक्साइ चिन से होकर गुजरेगी, जिस पर भारत का दावा है कि चीन ने उसे जबरन कब्जाया हुआ है. इसी प्रकार 2021 में घोषित परिवहन योजना के अनुसार चीन अपनी मुख्य भूमि को ताइवान से जोड़ने के लिए एक एक्सप्रेस-वे और सुपरफास्ट रेल मार्ग तैयार कर रहा है. ये कुछ ऐसी मिसालें हैं, जो यथास्थिति को बदलने की चीनी मंशा प्रकट करती हैं.
जबसे चीन ने अपनी सेना का आधुनिकीकरण आरंभ किया है तब से दक्षिण चीन सागर में उसके अतिक्रमण एवं कब्जे की घटनाएं बढ़ी हैं. इसके बाद वह सैन्य ठिकाने और अन्य अवसंरचना खड़ी करता है. मछली पकड़ने वाले अपने जहाजों की सुरक्षा की आड़ में चीन ने स्कारबोरो शोल का प्रभावी नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया है, जिस पर फिलीपींस का दावा है. सोवियत संघ के पतन से चीन ने एक सबक यह सीखा कि उसे अपने आंतरिक इलाकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी.
तिब्बत पर कब्जे के 70 साल बाद भी वह न तो दलाई लामा का आध्यात्मिक प्रभाव और न ही भारत एवं तिब्बत के बीच सांस्कृतिक संबंधों को खत्म कर पाया है. यह चीन के लिए बड़ी चिंता का विषय है. इसी कारण चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग द्वारा तिब्बत सीमा की सुरक्षा की आवश्यकता को रेखांकित करने के बाद खबरें आईं कि तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में गांव बसाकर वहां चीन के प्रति वफादार लोग बसाए जा रहे हैं. चीनी सरकारी मीडिया द्वारा इसे शिनजियांग स्वायत्त क्षेत्र बताना भी यही दर्शाता है कि स्थानीय आबादी को ‘चीनी रंग’ में रंगने को लेकर शासन की व्यग्रता कितनी बढ़ती जा रही है.
उल्लेखनीय है कि चीन ने पिछले वर्ष भूमि सीमा कानून बनाया है. यह कानून चीनी सेना और चीन के सशस्त्र पुलिस बल को सीमा की सुरक्षा बनाए रखने की जिम्मेदारी सौंपता है. इस कानून के अनुसार नागरिक सीमावर्ती अवसंरचना की सुरक्षा के दायित्व से बंधे हैं. इसमें सीमा पर बुनियादी ढांचे को उन्नत करना और लोगों की नए सिरे से बसावट पर भी जोर है. इसमें राजनीतिक शिक्षा की जरूरत भी जताई गई है, ताकि लोगों में चीनी राष्ट्र के प्रति जुड़ाव का सामुदायिक भाव मजबूत हो.
हाल में ऐसे संकेत भी मिले कि अरुणाचल से सटे क्षेत्रों में चीनी सेना सैन्य शिक्षा को बढ़ावा दे रही है. इस उपक्रम में ऐसी रणनीति बनाई जा रही है, जो चीन के साम्राज्यवादी राजवंशों और आधुनिक साम्यवादी तानाशाहों के बीच कड़ियां जोड़ती है. साम्राज्यवादी चीन में ऐसा किसान-सैनिक गठजोड़ बना था, जिसमें वफादार सैनिकों को धन के बदले जमीन दी जा जाती और जब भी राज्य को उनकी सेवाओं की जरूरत पड़ती तो उन्हें वापस मोर्चे पर बुला लिया जाता था.
निरंतर चौकसी आवश्यक
करीब तीन साल पहले सीमा पर चीन के साथ छिड़ा गतिरोध वार्ताओं के तमाम दौर गुजरने के बाद भी हल होने का नाम नहीं ले रहा. हालांकि, कुछ क्षेत्रों में तनातनी आंशिक रूप से घटी है, लेकिन कुछ सीमावर्ती गांवों के नाम बदलकर चीन ने अरुणाचल में नया मोर्चा खोल दिया है. सीमावर्ती गांवों से जुड़ी नई योजना के माध्यम से यही लगता है कि भारत सरकार सीमा पर चीनी षड्यंत्रों से निपटने को लेकर चौकन्नी है. इस योजना का खाका पेश करते समय गृहमंत्री अमित शाह ने दोटूक कहा कि देश की एक इंच भूमि पर कब्जा नहीं होने दिया जाएगा. यह अतीत में भारत के उस रुख के सर्वथा विपरीत है कि ‘चीन ने जो जमीन कब्जाई है, वहां तो घास का एक तिनका भी नहीं उगता.’ यह चीनी चुनौती से निपटने की राह में भारत के नए आत्मविश्वास को दर्शाता है.
यह कहना गलत नहीं होगा कि अपनी स्वतंत्रता के लिए निरंतर चौकसी आवश्यक है. इसलिए हमें नक्शों से जुड़ी चीनी सनक को गंभीरता से लेते हुए उसका समय से करारा जवाब देना होगा.
स्पष्ट है कि देश की क्षेत्रीय अखंडता के मामले में सरकार कोई कोताही नहीं बरत रही और न कोई समझौता करने को तैयार है. यही कारण है कि चीन और पाकिस्तान द्वारा दबाव और आलोचना के बावजूद जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को खत्म करने के रुख पर भारत सरकार अडिग रही. पिछले महीने ही अरुणाचल में जी-20 से जुड़ी एक बैठक आयोजित हुई तो मई में एक बैठक श्रीनगर में प्रस्तावित है. वैसे, चीन जैसे प्रपंच दुनिया के लिए नए नहीं हैं. 1990 के खाड़ी युद्ध से पहले इराक ने एक आधिकारिक नक्शा प्रकाशित कर उसमें कुवैत को अपना हिस्सा दिखाया था, जिसे दुनिया ने अनदेखा कर दिया. इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि अपनी स्वतंत्रता के लिए निरंतर चौकसी आवश्यक है. इसलिए हमें नक्शों से जुड़ी चीनी सनक को गंभीरता से लेते हुए उसका समय से करारा जवाब देना होगा.
यह लेख जागरण में प्रकाशित हो चुका है.
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