अमेरिका में अवैध रूप से रहने या वहां गैर-कानूनी ढंग से प्रवेश करने के आरोप में पकड़े गए कुछ प्रवासी भारतीयों को बीते दिनों जिस प्रकार स्वदेश भेजा गया, उसकी देश में तीखी प्रतिक्रिया दिखी है. भारत द्वारा अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर सहयोग की प्रतिबद्धता के बावजूद अमेरिका का अहंकारी रवैया अखरने वाला है.
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने आश्वासन दिया है कि इस संदर्भ में अमेरिका से चर्चा की जाएगी कि भारतीयों के साथ अभद्र एवं अमानवीय व्यवहार न हो, लेकिन ऐसी आश्वस्ति के बावजूद इस मुद्दे पर आक्रोश थम नहीं रहा.
भारतीयों द्वारा येन-केन-प्रकारेण अमेरिका में घुसने और वहां बसने का किसी तरह बचाव नहीं किया जा सकता, लेकिन उन्हें जिस तरह बेड़ियों में जकड़कर भारत भेजा गया, वह भी स्वीकार्य नहीं हो सकता.
भारतीयों द्वारा येन-केन-प्रकारेण अमेरिका में घुसने और वहां बसने का किसी तरह बचाव नहीं किया जा सकता, लेकिन उन्हें जिस तरह बेड़ियों में जकड़कर भारत भेजा गया, वह भी स्वीकार्य नहीं हो सकता.
ऐसी पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री का अमेरिका दौरा और महत्वपूर्ण हो गया है. फ्रांस दौरे के बाद अमेरिका प्रधानमंत्री मोदी का अगला पड़ाव होगा. प्रधानमंत्री संभवतः 13 और 14 फरवरी को अमेरिका में होंगे, जहां राष्ट्रपति ट्रंप व्हाइट हाउस में उनकी मेजबानी करेंगे. इससे पहले 10 और 11 फरवरी को प्रधानमंत्री एआई समिट के सिलसिले में फ्रांस में होंगे.
आकार लेती परिस्थितियां
वर्तमान में जैसी परिस्थितियां आकार ले रही हैं, उससे इन दौरों की अहमियत और बढ़ गई है. फ्रांस में प्रधानमंत्री आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआइ से जुड़े एक सम्मेलन में सहभागिता करेंगे.
इस सम्मेलन का महत्व इस कारण और बढ़ गया है कि एक तो वैश्विक स्तर पर एआइ के संचालन-परिचालन का कोई स्वीकार्य वैश्विक ढांचा अभी तक अस्तित्व में नहीं आ पाया है और दूसरे, एक चीनी कंपनी द्वारा डीपसीक जैसा सस्ता एआई टूल बनाने से पश्चिम की दिग्गज कंपनियां दबाव में आ गई हैं.
चीन के संदिग्ध चरित्र को देखते हुए डीपसीक की पैठ बढ़ने से वैश्विक डाटा में सेंधमारी और उसके मनमाने इस्तेमाल का जोखिम कहीं ज्यादा बढ़ जाएगा. ऐसे में फ्रांस में प्रस्तावित एआइ सम्मेलन में सहभागियों के समक्ष यह चुनौती होगी कि वे वैश्विक एआई समीकरणों को दुरुस्त करें.
चैटजीपीटी एआई टूल बनाने वाली ओपनएआइ के मुखिया सैम आल्टमैन के हालिया भारत दौरे और किफायती एआई तकनीक को लेकर उनके दांव को देखकर समझा जा सकता है कि दुनिया इस नई उभरती हुई तकनीक को लेकर भारत से बड़ी उम्मीदें लगाए हुए है. फ्रांस में एआइ सम्मेलन से वैश्विक एआइ मानचित्र पर भारत की महत्ता और मुखरता से रेखांकित होगी.
परवान चलते भारत-फ्रांस द्विपक्षीय रिश्ते
फ्रांस में द्विपक्षीय रिश्ते परवान चढ़ाने की भी पूरी तैयारी है. इस दौरान दोनों देशों के बीच सामरिक, आर्थिक और प्रौद्योगिकी के स्तर पर नए समझौते किए जाने की उम्मीद है. राफेल विमान और स्कोर्पीन पनडुब्बी सौदों को नया आयाम देकर जहां सामरिक रिश्ते और प्रगाढ़ होंगे तो इससे हथियारों की खरीद के मामले में भारत के विविधीकरण एवं विभिन्न विकल्पों की भी झलक मिलेगी.
यह भारतीय विदेश एवं सामरिक नीति की स्वायत्तता को भी विस्तार देगा. फ्रांस के मार्सिले में भारत नया वाणिज्य दूतावास भी खोलने जा रहा है. दोनों देशों के बीच जनता से जनता के बीच सहयोग, प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर व्यापक सहमति और शीर्ष नेताओं के बीच सहजता एवं आत्मीयता यही दर्शाती है कि नई दिल्ली और पेरिस परस्पर हितों को समझते हुए संबंधों को सही दिशा में आगे ले जा रहे हैं.
फ्रांस के मार्सिले में भारत नया वाणिज्य दूतावास भी खोलने जा रहा है.
इसमें संदेह नहीं कि सबसे अधिक नजरें प्रधानमंत्री के अमेरिकी दौरे पर होंगी. परिस्थितियों को देखते हुए ऐसी उत्सुकता अकारण भी नहीं. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा सत्ता संभालने के बाद यह दोनों नेताओं की पहली मुलाकात होगी. ट्रंप का अप्रत्याशित व्यवहार और व्यक्तित्व किसी से छिपा नहीं.
नए कार्यकाल में वह जिस आक्रामकता के साथ अपने मूल मुद्दों पर आगे बढ़ रहे हैं, उसे देखते टकराव और तनातनी के मुद्दे भी कम नहीं हैं. इसमें सबसे प्रमुख मुद्दा अवैध प्रवासियों का है. टैरिफ भी ऐसा ही एक मसला है, क्योंकि ट्रंप भारत को टैरिफ किंग वाले देशों में से एक मानते हैं.
मोदी के अमेरिका दौरे में क्या होगा बड़ा?
हालांकि मोदी और ट्रंप के बीच पुरानी आत्मीयता को देखते हुए यही आसार अधिक हैं कि ऐसे मुद्दों पर व्यापक सहमति बन सकेगी. भारत पहले ही अमेरिका को आश्वस्त कर चुका है कि अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर वह अमेरिका का हरसंभव सहयोग करेगा.
ऐसे में प्रधानमंत्री के दौरे पर स्वदेश भेजे जाने वाले भारतीयों के साथ गरिमापूर्ण व्यवहार का मुद्दा सतह पर आ सकता है. जहां तक टैरिफ की बात है तो हालिया केंद्रीय बजट में ही कई ऐसे उत्पादों पर आयात शुल्क और ड्यूटी घटाने के प्रविधान हुए हैं, जिनसे अमेरिकी उत्पादों और कंपनियों को लाभ मिलने का अनुमान है.
स्पष्ट है कि ट्रंप प्रशासन की अपेक्षाओं को भारत समझ रहा है. यदि अमेरिका द्विपक्षीय रिश्तों को आगे बढ़ाना चाहता है तो उसे भी भारतीय अपेक्षाओं का सम्मान करना होगा. इसमें एक मुद्दा उन चरमपंथियों पर सख्ती का भी हो सकता है, जो रह-रहकर भारत को धमकाते रहते हैं और खुलकर भारत विरोधी कृत्यों में संलग्न रहते हैं.
भारत यही चाहेगा कि अमेरिका उन्हें अभिव्यक्ति की आड़ में संरक्षण न प्रदान करे. बाइडन प्रशासन के दौरान यह मुद्दा द्विपक्षीय संबंधों में एक चुभने वाला कांटा बना रहा.
पीएम मोदी उन शासनाध्यक्षों में से एक हैं जिनकी ट्रंप दूसरे कार्यकाल के आरंभ में ही मेजबानी करने जा रहे हैं. यह दर्शाता है कि वह मोदी और भारत को पूरी गंभीरता से लेते हैं. उनकी यही गंभीरता तब भी झलकी, जब ट्रंप प्रशासन के शुरुआती कार्यों में से एक क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक आयोजित करना था.
ट्रंप ने ही 2017 में क्वाड को नए सिरे से सक्रिय किया था, जिसे बाइडन ने आगे बढ़ाया. अब उम्मीद है कि ट्रंप उसे नए तेवर देंगे. यह हिंद-प्रशांत में सहयोगियों के साथ सहयोग बढ़ाने और चीन की चुनौती के तोड़ निकालने की गंभीरता को भी दर्शाता है.
कुल मिलाकर, ट्रंप के साथ बैठक में मोदी द्विपक्षीय संबंधों के लिए अगले चार साल की रूपरेखा तैयार करेंगे. ये संबंध परस्पर विश्वास, सतत एवं निरंतर प्रगति वाले दृष्टिकोण से प्रेरित होंगे.
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