रणनीतिक टिप्पणीकार अक्सर इस बात को लेकर हैरानी जताते हैं कि भारत सैन्य ताक़त को बढ़ाने एवं उसका इस्तेमाल करने को लेकर कितना 'यथार्थवादी' है. आम तौर पर यह माना जाता है कि भारत शासन-सत्ता के लिए पावर पॉलिटिक्स को एक हथियार के रूप में उपयोग करने को लेकर असहज है. हालांकि, कुछ लोगों का यह भी तर्क है कि कई लोग जितना सोचते हैं और विश्वास करते हैं, उसकी तुलना में नई दिल्ली अपने नज़रिए को लेकर और भी ज़्यादा 'यथार्थवादी' है, साथ ही राजनीतिक पर्यवेक्षकों के दृष्टिकोण की तुलना में सामरिक हितों के लिए सैन्य ताक़त के इस्तेमाल को लेकर अधिक सहज है.
भारत किस प्रकार से राजनीतिक उद्देश्यों के लिए अपनी ज़बरदस्त ताक़त का लाभ उठा सकता है, इसके एक व्यावहारिक उदाहरण के तौर पर भारतीय समीक्षक दक्षिण चीन सागर में हाल ही में हुए भारत-आसियान समुद्री अभ्यास (AIME) की ओर इशारा करते हैं
भारत किस प्रकार से राजनीतिक उद्देश्यों के लिए अपनी ज़बरदस्त ताक़त का लाभ उठा सकता है, इसके एक व्यावहारिक उदाहरण के तौर पर भारतीय समीक्षक दक्षिण चीन सागर में हाल ही में हुए भारत-आसियान समुद्री अभ्यास (AIME) की ओर इशारा करते हैं. यह समुद्री अभ्यास 2 मई से 8 मई 2023 के बीच आयोजित किया गया था और इमसें भारत के फ्रंटलाइन युद्धपोत सतपुड़ा एवं दिल्ली ने हिस्सा लिया था. भारत द्वारा एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन नेशन्स (ASEAN) के भागीदारों के साथ एक ब्लॉक के रूप में समुद्री अभ्यास आयोजित करने का यह पहला उदाहरण था. ऐसा लगता है कि इसका मकसद चीन को एक संकेत देना था, जिसकी दक्षिण चीन सागर में मौज़ूदगी ने दक्षिण पूर्व एशियाई देशों को चिंतित कर दिया है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत के लिए यह एक शीर्ष प्राथमिकता वाला कार्य था, क्योंकि भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल हरि कुमार खुद नौसेना के अभ्यास को हरी झंडी दिखाने के लिए सिंगापुर में मौज़ूद थे.
भारत की भूमिका
उल्लेखनीय है कि नई दिल्ली अब तक आसियान (एक ग्रुप के रूप में) के साथ बहुपक्षीय सैन्य अभ्यास आयोजित करने को लेकर उदासीन रही है. इसकी एक बड़ी वजह भारत की बीजिंग को उकसाने की अनिच्छा रही है यानी कि भारत कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहता है, जिससे चीन भड़क जाए. सभी जानते हैं कि भारत के चीन के साथ अपने मतभेद हैं और भारत सरकार में बैठे लोग दक्षिण चीन सागर को एक ऐसी विवादित जगह के रूप में देखते हैं, जिस पर चीन का दबदबा है और जहां भारत का दख़ल बहुत ही सीमित है. इसमें कोई शक नहीं है कि आज भी ऐसी ही स्थिति है. जबकि प्रशांत क्षेत्र की तुलना में भारत की सुरक्षा स्थिति समय के साथ विकसित हुई है, यही वजह है कि नई दिल्ली पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में नौसैनिक ऑपरेशन के लिए अधिक इच्छुक दिखाई देती है और दक्षिण चीन सागर के मसले पर भारत के सुरक्षा प्रतिष्ठान सतर्कता बरतते हुए दिखते हैं. भारत और आसियान के मध्य व्यापक रणनीतिक साझेदारी और बढ़ते रक्षा सहयोग के चलते आपसी संबंधों में प्रगाढ़ता आने के बावज़ूद देखा जाए तो नई दिल्ली दक्षिण चीन सागर के विवादित क्षेत्रों में मिलिट्री ऑपरेशन्स को लेकर सावधान रहती है.
भारत और आसियान को अपने सैन्य सहयोग के एजेंडे को सुधारने एवं मज़बूती देने में सहायता की है. नई दिल्ली के लिए आसियान के साथ रक्षा जुड़ाव 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' के तहत अन्य क्षेत्रों में कार्यात्मक सहयोग का एक तर्कसंगत विस्तार है. जहां तक सैन्य साझेदारी की बात है, तो भारत आसियान के कई अन्य भागीदारों में से एक है.
मीडिया में AIME को लेकर जो उत्साहित करने वाला विश्लेषण किया गया है, वो आकलन विरोधाभासी भी हो सकता है. ज़ाहिर है कि यह बगैर किसी उचित आधार के नहीं है. पिछले सप्ताह आसियान और भारत के बीच जो समुद्री अभ्यास हुआ था, वो दोनों पक्षों के बीच व्यापक स्तर पर विचार-विमर्श का नतीज़ा था. हाल के वर्षों में, ASEAN-इंडिया डायलॉग रिलेशन्स, ASEAN रीजनल फोरम (ARF) और ईस्ट एशिया समिट (EAS) के तत्वावधान में नियमित तौर पर बैठकें आयोजित की गयी, जिन्होंने भारत और आसियान को अपने सैन्य सहयोग के एजेंडे को सुधारने एवं मज़बूती देने में सहायता की है. नई दिल्ली के लिए आसियान के साथ रक्षा जुड़ाव 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' के तहत अन्य क्षेत्रों में कार्यात्मक सहयोग का एक तर्कसंगत विस्तार है. जहां तक सैन्य साझेदारी की बात है, तो भारत आसियान के कई अन्य भागीदारों में से एक है. चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) और रूस जैसे देश भी साउथ ईस्ट एशियन ब्लॉक के साथ नौसैनिक अभ्यास कर चुके हैं और भारत इस तरह का अभ्यास करने वाला चौथा ASEAN डायलॉग पार्टनर है.
आसियान की सैन्य कूटनीति का रिकॉर्ड इसका खुलासा कर रहा है. बाहरी क्षेत्रीय ताक़तों के साथ सैन्य रूप से संलग्न होने के मामले में लंबे समय तक उदासीन रहने के पश्चात वर्ष 2017 में दक्षिण-पूर्व एशियाई ब्लॉक का पहला बहुपक्षीय नौसैनिक अभ्यास दिखाई दिया था. यह नौसैनिक अभियान स्पष्ट रूप से इस विश्वास से प्रेरित था कि आसियान का आर्थिक मुद्दों पर अधिक ध्यान देने की वजह से रक्षा से जुड़े मुद्दों, ख़ास तौर पर दक्षिण चीन सागर में सुरक्षा पर फोकस कम हो गया था. हालांकि, ASEAN ने वर्ष 2011 में डिफेंस मिनिस्टर्स मीटिंग (ADMM) का विस्तार किया था, जिसमें आठ नए सदस्य देशों, यानी चीन, ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, न्यूज़ीलैंड, रूस और अमेरिका को शामिल किया गया था. इसके बाद भी आसियान बाहरी-क्षेत्रीय शक्तियों के साथ युद्धाभ्यास का विरोध करता रहा. वर्ष 2018 में, जब दक्षिण पूर्व एशियाई ब्लॉक ने अपना पहला नौसैनिक अभ्यास किया, तो विडंबना की बात यह थी कि उसका यह अभ्यास चीन के साथ था. देखा जाए तो यह नौसैनिक अभ्यास इस क्षेत्र के राष्ट्रों द्वारा बीजिंग को यह आश्वस्त करने का प्रयास लग रहा था कि चीन उनका कोई विरोधी नहीं, बल्कि एक संभावित भागीदार था. वर्ष 2019 में अमेरिका आसियान के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास करने वाला दूसरा ADMM भागीदार देश बना, इसके बाद वर्ष 2021 में रूस तीसरा देश बना, जिसके साथ आसियान ने नौसैनिक अभ्यास किया था.
कुछ लोगों का मानना है कि आसियान द्वारा जो भी सैन्य अभ्यास संचालित किए जा रहे हैं, उनके कुछ क्रियात्मक आयाम हैं, जैसे कि आसियान की द्विपक्षीय सुरक्षा पहलों का मकसद कोई वास्तविक नतीज़ा हासिल करना नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य अलग-अलग भागीदारों के साथ अपनी एकजुटता को प्रदर्शित करना है. एक इंडोनेशियाई विशेषज्ञ, इवान लक्ष्मण, आसियान द्वारा अलग-अलग प्रकार के इन सैन्य जुड़ावों के पीछे उसकी संतुलन स्थापित करने की इच्छा बताते हैं. उनके मुताबिक़ दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्र मानते हैं कि इस क्षेत्र में कई बेहद उलझे हुए मुद्दे हैं और इन मुद्दों को सुलझाने के लिए एक अनुकूलित यानी एक ख़ास तरह की और अलग पॉलिसी टूलकिट की आवश्यकता है. इतना ही नहीं विभिन्न भागीदारों के साथ काम करने का लक्ष्य किसी भी प्रकार के विवाद और संघर्ष से बचते हुए सबसे कुशल एवं बेहतरीन तरीक़े से समस्याओं का समाधान तलाशना है. लेकिन विविधता और संतुलन दोनों की इच्छा का मतलब यह भी है कि आसियान में मुश्किल फैसले लेने और इनमें से किसी एक का चुनाव करने को लेकर झिझक है, या फिर कहा जाए कि उसमें ऐसा करने का सामर्थ्य नहीं है.
जहां तक नई दिल्ली की बात है, तो वह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक नियम-आधारित व्यवस्था चाहता है. भारतीय नीति-निर्माता राष्ट्रों द्वारा समुद्री क़ानूनों का पालन करने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हैं. 1982 के यूनाइटेड नेशन्स कन्वेंशन ऑन दि लॉ ऑफ दि सी (UNCLOS) यानी समुद्र के क़ानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के अंतर्गत क्षेत्रीय विवादों को बगैर हिंसा के और बगैर ताक़त का इस्तेमाल किए, शांतिपूर्ण ढंग से हल किया जाना चाहिए. लेकिन दक्षिण चीन सागर में चीन द्वारा मानदंडों के उल्लंघन पर भारत कड़ा रुख नहीं अपना रहा है, बल्कि एक लिहाज़ से चुप्पी साधे हुए है. जैसा कि भारतीय अधिकारी इस पूरे मामले को देखते हैं कि दक्षिण चीन सागर में भारत के नौसैनिक अभ्यास का उद्देश्य़ उस क्षेत्र में नौवहन पहुंच और उच्च समुद्री स्वतंत्रता की अनिवार्यता को सामने लाना है. इन नौसैनिक अभ्यासों का उद्देश्य चीन की समुद्री आक्रामकता और दबदबे को चुनौती देना नहीं है, या फिर बीजिंग के बेहिसाब क्षेत्रीय दावों के ख़िलाफ़ उसे चेतावनी देना नहीं है.
दक्षिण चीन सागर का महत्व
भारत-आसियान समुद्री अभ्यास (AIME) को इसी समझबूझ के अंतर्गत आयोजित किया गया था. इस नौसैनिक अभ्यास के सी फेज (Sea Phase) यानी युद्धपोतों की देखभाल और संचालन के बारे में नौसैनिकों को सिखाने का कार्य मुख्य रूप से वियतनाम के विशेष आर्थिक ज़ोन और फिलीपींस के ट्रांज़िट रूट के साथ-साथ लगे अंतर्राष्ट्रीय समुद्र में आयोजित किया गया था. इस अभ्यास में जिन इकाइयों ने हिस्सा लिया, उस सभी ने स्प्रैटली द्वीप समूह या स्कारबोरो शोल के निकट स्थित विवादित समुद्रों से दूरी बनाए रखी. ज़ाहिर है कि चीनी सैन्य बलों ने उस इलाक़े में तांक-झांक तो की, लेकिन नौसैनिक अभ्यास में कोई अड़ंगा नहीं डाला.
लक्ष्य किसी भी प्रकार के विवाद और संघर्ष से बचते हुए सबसे कुशल एवं बेहतरीन तरीक़े से समस्याओं का समाधान तलाशना है. लेकिन विविधता और संतुलन दोनों की इच्छा का मतलब यह भी है कि आसियान में मुश्किल फैसले लेने और इनमें से किसी एक का चुनाव करने को लेकर झिझक है, या फिर कहा जाए कि उसमें ऐसा करने का सामर्थ्य नहीं है.
सच्चाई यह है कि दक्षिण चीन सागर में भारत के समुद्री ऑपरेशन्स सिर्फ चीन के पहलू तक सीमित नहीं है, बल्कि उनका लक्ष्य उससे भी आगे है. भारत, जिसने लंबे वक़्त से हिंद महासागर में स्वयं को एक नेट-सिक्योरिटी प्रदाता के रूप में देखा है यानी कि अपनी ही नहीं क्षेत्र के अन्य देशों की सुरक्षा ज़रूरतों को पूरा करने वाले के रूप में देखा है, वो अब व्यापक इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा मुहैया करने की अपनी भूमिका को बढ़ाने का इरादा रखता है. भारत के नीति निर्माता व्यापार और कनेक्टिविटी के लिए इस क्षेत्र के बढ़ते महत्व को बखूबी पहचानते हैं. उल्लेखनीय है कि भारत की 55 प्रतिशत से अधिक व्यापारिक गतिविधियां दक्षिण चीन सागर से होकर गुजरती हैं, ऐसे में इसमें कोई संदेह नहीं है कि नई दिल्ली के लिए समुद्री सुरक्षा का मुद्दा पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है. भारत के लिए हालांकि, दक्षिण पूर्व एशिया के साथ संबंधों को मज़बूती देना, भारतीय हथियारों के निर्यात के लिए एक संभावित बाज़ार को तैयार करने के लिए आवश्यक है. इन परिस्थितियों में इस क्षेत्र में भारतीय नौसेना की मौज़ूदगी एक भरोसेमंद भागीदार और क्षमता विकसित करने वाले के रूप में नई दिल्ली के रुतबे और प्रभुत्व को बढ़ाने का एक तरीक़ा है.
निष्कर्ष
इस सबके बावज़ूद, दक्षिण चीन सागर में भारत की तथाकथित समुद्री सक्रियता 'यथार्थवादी' नुमाइंदगी से कम दिखती है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि पिछले सप्ताह समुद्री अभ्यास से पारस्परिक संचालन और एकीकरण को सुधारने में निश्चित तौर पर मदद ज़रूर मिली होगी. इससे ऑपरेशन प्रक्रियाओं को दुरुस्त करने और एक-दूसरे के बेहतर युद्ध कौशल को साझा करने में सहायता मिल सकती है. हालांकि, वास्तविकता में अगर इसे सिर्फ़ राजनीतिक नज़रिए से देखें, तो इस नौसैनिक अभ्यास के फायदे नहीं के बराबर या अव्यावहारिक दिखाई देते हैं. देखा जाए तो भारत और आसियान द्वारा अपने सामरिक सामर्थ्य के प्रदर्शन के बावज़ूद, इस नौसैनिक युद्धाभ्यास को दक्षिण चीन सागर के गैर-विवादित क्षेत्रों में सीमित रखा गया था, ज़ाहिर है कि कहीं न कहीं इसे चीन की महत्वाकांक्षा और दबदबे से समझौता करने के तौर पर या उससे दूरी बनाए रखने के तौर पर माना जा सकता है.
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Abhijit Singh एक सीनियर फेलो हैं और ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में मैरीटाइम पॉलिसी इनिशिएटिव के प्रमुख हैं.
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