परिचय
हाल के वर्षों में भारत-ताइवान द्विपक्षीय संबंधों ने उल्लेखनीय प्रगति की है और साझा हितों के मद्देनज़र और नीतियों के तालमेल के चलते रिश्तों की गरमाहट को बल मिला है. सितंबर 2016 में तत्कालीन राष्ट्रपति साई इंग वेन द्वारा लॉन्च की गई ताइवान की नई साउथबाउंड नीति [a] इस साझेदारी को गहरा करने में महत्वपूर्ण साबित हुई है. यह सब तब हुआ है जब भारत और ताइवान के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं और दोनों के बीच का संबंध 1995 में स्थापित प्रतिनिधि कार्यालयों जैसे ताइपेई में भारत-ताइपे एसोसिएशन (ITA) और दिल्ली में ताइपेई इकोनॉमिक एंड कल्चरल सेंटर (TECC) के माध्यम से एक अनौपचारिक फ्रेमवर्क के भीतर फल-फूल रहा है.
हाल के वर्षों में, इस रिश्ते ने ऐतिहासिक मुकाम पाया है जिसे कभी साधना मुश्किल समझा जाता है. इस सबने न सिर्फ़ इस राह में आने वाली चुनौतियों और कमज़ोरियों पर प्रकाश डाला है बल्कि अवसरों को भी प्रकट किया है. भारत और ताइवान दोनों ने 2024 में देश में चुनाव देखे और माना जा रहा है कि यह वह सही समय है जब उपलब्धियों पर चर्चा कर एक फॉरवर्ड लुकिंग एजेंडा के बल पर आगे बड़ा जा सकता है.
एक पड़ताल
पिछले कई दशकों के भारत-ताइवान के बीच के संबंध को खोए हुए अवसरों की दास्तान के अलावा कुछ कहना नामुमकिन है.[1] भारत की 1950 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (PRC) के प्रति राजनयिक मान्यता में लाई गई तब्दीली और 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान चियांग काई-शेक से समर्थन लेने के असफ़ल प्रयास इसकी बयानी करता है. उसके बाद के दशकों में भी, 1991 में भारत में आई विदेशी मुद्रा संकट में ताइवान की गैर मददगार भूमिका और मा यिंग-जेउ प्रशासन के 2011 में एक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) की एकमुश्त अस्वीकृति भी कई दशकों से लगातार हो रही इसी भारत-ताइवान संबंध के खोए अवसरों की बयानगी है.
भारत-ताइवान संबंधों में आशा की पहली किरण 1995 में दोनों देशों के रिप्रेजेन्टेटिव ऑफिस की स्थापना के साथ दिखी जिससे रिश्तों को आगे बढ़ावा मिला और इस प्रक्रिया को विभिन्न क्षेत्रों में की गई समझौतों की एक श्रृंखला ने और ताकत प्रदान की.
भारत-ताइवान संबंधों में आशा की पहली किरण 1995 में दोनों देशों के रिप्रेजेन्टेटिव ऑफिस की स्थापना के साथ दिखी जिससे रिश्तों को आगे बढ़ावा मिला और इस प्रक्रिया को विभिन्न क्षेत्रों में की गई समझौतों की एक श्रृंखला ने और ताकत प्रदान की. जब भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में और त्साई ने 2016 में ताइवान नेतृत्व का पदभार संभाला तब इन रिश्तों में एक नया अध्याय जुड़ा. तब से अब तब भारत और ताइवान के रिश्तों को एक मज़बूत नीतिगत ढांचे और एक स्पष्ट रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि का बल मिला है. इस दौरान इस साझेदारी को फिर से परिभाषित करने वाले सूक्ष्म लेकिन अभी तक के सबसे प्रभावशाली बदलाव हुए हैं. और इस बदलाव का मकसद रहा है बदलते भू-राजनीतिक और नित रूप बदलते ख़तरों को मद्देनज़र साझा हितों की रक्षा करना और आपसी चिंताओं को सहभागी के तौर पर देखना.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 2014 के अपने शपथ ग्रहण समारोह में ताइवान के प्रतिनिधि को दिया गया निमंत्रण और टीएन चुंग-क्वांग द्वारा अपने शपथ ग्रहण समारोह में भारत को दिया गया निमंत्रण बदलते रिश्तों की ओर एक महत्वपूर्ण इशारा था. ताइवान की नई साउथबाउंड नीति ने तब से आपसी इंगेजमेंट के लिए एक स्ट्रक्चर्ड फ्रेमवर्क प्रदान किया है. इस नीति के चार प्रमुख स्तंभ हैं: आर्थिक सहयोग, प्रतिभा का आदान प्रदान, संसाधन का साझा उपयोग और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी. ये स्तंभ निम्नलिखित तीन विषयों में से एक या उससे अधिक क्षेत्रों पर ध्यान आकर्षित करते हैं.[2]
- व्यापार: अपने क्षेत्रीय ऑपरेशन्स का विस्तार करने के लिए ताइवान के छोटे और मध्यम उद्यमों (SMEs) की सहायता करना
- ह्यूमन कैपिटल: छात्रों और प्रोफेशनल लोगों के आदान प्रदान यानी एक्सचेंजों को बढ़ावा देना
- सॉफ्ट पावर: संस्कृति, पर्यटन और प्रौद्योगिकी में ताइवान की ताकत को उजागर करना
इन सब बातों ने गहरे आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को राह प्रदान की है जो सहयोग और पारस्परिक विकास को बढ़ावा देने के लिए एक ठोस आधार निर्मित करती है.
भारत की ईस्ट एशिया के इलाकों के देशों को लेकर उसकी राजनयिक और आपसी रिश्तों की नीति उसके 1990 के दशक की 'लुक ईस्ट' नीति के साथ शुरू हुई थी जिसे बाद में अधिक गतिशील ’एक्ट ईस्ट’ रणनीति में रूपांतरित किया गया. शांगरी-ला डायलॉग के दौरान अपने 2018 के संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने क्षेत्रीय इंगेजमेंट के मील के पत्थर के रूप में कनेक्टिविटी, ट्रस्ट और सम्मान के आधार पर संप्रभुता की रक्षा पर जोर दिया था. उन्होंने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के लिए अपने विज़न को रेखांकित किया और मुख़्यतः दो डोमेन पर ध्यान केंद्रित किया: व्यापार और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी.[3] उनका संदेश स्पष्ट था: "कनेक्टिविटी न केवल क्षेत्रीय समृद्धि को बढ़ाती है, बल्कि लोगों को भी एक साथ लाती है." उन्होंने इस बात पर जोर देकर कहा कि कनेक्टिविटी को लेकर हो रही पहल के अंतर्गत बुनियादी ढांचे के विकास से परे सोचना होगा और आपसी विश्वास बढ़ाने के लिए, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने और स्थिरता को प्राथमिकता देनी होगा.
उनके संबोधन की सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उन्होंने इन प्रयासों को व्यापार लिंकेज को मज़बूत करने के लिए एक सेतु के रूप में माना और न कि क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने के औज़ार के रूप मे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ओपन ट्रेड रेजीम की पुरज़ोर वकालत की जो संरक्षणवादी बाधाओं से मुक़्त हो और रेसिलिएंट सप्लाई चेन सिस्टम से पोषित हो.[4] यह विज़न भारत-ताइवान की साझेदारी को और बल देता है और यह गहरे आर्थिक संबंधों, रणनीतिक सहयोग और पारस्परिक विकास के लिए एक मज़बूत नींव रखता है. ये सारी पहल सामूहिक रूप से एक रेसिलिएंट और परस्पर जुड़े इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के निर्माण में योगदान देने का मार्ग प्रशस्त करती हैं.
चाइना फैक्टर की काट
चीन का प्रभाव लंबे समय से भारत-ताइवान संबंधों की गति को तय करता रहा है. जबकि भारत चीन की ‘वन चाइना’ नीति का समर्थन करने वाले प्रथम देशों में से एक था जिसने तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र और शिनजियांग को चीन के हिस्सों के रूप में मान्यता दी. और तो और ताइवान भारत के चीन से संबंधित आधिकारिक दस्तावेज़ों के साथ-साथ उसके संयुक्त बयानों में किसी भी तरह के उल्लेख में नहीं होता था. धीरे -धीरे, चीन के साथ बढ़ते तनाव के कारण, भारत ने ‘वन चाइना’ नीति का उल्लेख करना बंद कर दिया. अंतिम बार ‘वन चाइना’ नीति का भारत द्वारा आधिकारिक उल्लेख 2008 में पाया गया है. 2014 में, तब की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने एक मज़बूत रुख़ अपनाते हुए चीनी विदेश मंत्री वांग यी को बताया कि चीन द्वारा भारत के लिए ‘वन इंडिया’ नीति के बिना कोई ‘वन चाइना’ नीति संभव नहीं है. समय के साथ, यह भी स्पष्ट हो गया कि चीन को ध्यान में रखकर ताइवान के साथ भारत के संबंधों को तय करना अब उपयोगी नहीं है.
जब भारत ने अपनी ताइवान नीति को चीन के साथ अपने संबंधों से अलग कर लिया तो भारत-ताइवान संबंधों में पर्याप्त प्रगति 2020 से स्पष्ट दिखने लगी. चीन के साथ बढ़ते तनाव और विशेष रूप से 2020 गलवान घाटी की झड़पों ने भारत को अपनी क्षेत्रीय नीति का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए मजबूर किया और भारत अब अपनी क्षेत्रीय रणनीति के अंतर्गत अपनी सुरक्षा को पुख़्ता करने और आर्थिक हितों को आगे बढ़ाने पर अधिक ध्यान केंद्रित करने लगा.
ताइवान की ओर से पेश किए गए न्यू साउथबाउंड पॉलिसी का एक प्रमुख उद्देश्य क्रॉस-स्ट्रेट संबंधों के गिरते स्तर के मद्देनज़र क्षेत्रीय लोकतान्त्रिक देशों के साथ व्यापार में विविधता लाना, और आपसी भागीदारी और बोल्स्टर कनेक्शन अर्थात मज़बूत कनेक्शन को आगे बढ़ाने की आवश्यकता को रेखांकित करना था.
ताइवान की ओर से पेश किए गए न्यू साउथबाउंड पॉलिसी का एक प्रमुख उद्देश्य क्रॉस-स्ट्रेट संबंधों के गिरते स्तर के मद्देनज़र क्षेत्रीय लोकतान्त्रिक देशों के साथ व्यापार में विविधता लाना, और आपसी भागीदारी और बोल्स्टर कनेक्शन अर्थात मज़बूत कनेक्शन को आगे बढ़ाने की आवश्यकता को रेखांकित करना था. ताइवान की नीति में बदलाव भारत के बदलते रुख़ के साथ मेल खाता था क्योंकि नई दिल्ली ने भारत के ताइवान के साथ उसके रिश्तों को लेकर चीन द्वारा तय तथाकथित सीमाओं को भी लांघना शुरू कर दिया जिसने भारत के ताइवान के साथ के संबंधों को सीमित रखा हुआ था. हालांकि भारत का ‘वन चाइना’ नीति में ताइवान को लेकर उसका रुख़ हमेशा अस्पष्ट रहा लेकिन 2020 के बाद के परिदृश्य ने बेशक सहयोग के लिए एक स्पष्ट और अधिक प्रायोगिक ढांचा प्रदान किया है.
भारत के ताइवान के प्रति बदलते दृष्टिकोण ने आर्थिक लचीलापन, रणनीतिक स्वायत्तता और क्षेत्रीय स्थिरता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का संकेत दिया है. इस के साथ-साथ, ताइवान के सक्रिय आउटरीच प्रयासों ने पारंपरिक बाधाओं को तोड़ने के लिए एक पारस्परिक सहयोग का परिचय दिया है जो अधिक मज़बूत और स्थायी साझेदारी के लिए मंच के निर्माण में सहायक है.
झिझक से परे बदलते सुर
सिविल सोसाइटी ने भारत और ताइवान के बीच संबंधों की खाई को पाटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. 2020 मिल्क टी एलायंस [b] ने दक्षिण पूर्व एशिया और पूर्वी एशिया में जमीनी स्तर पर एकजुटता की मिसाल दी. इस कदम ने इस क्षेत्र में प्रतीकात्मक रूप से सत्तावादी शासन के ख़िलाफ़ लोकतंत्रों को एकजुट किया. 2020 में ताइवान के राष्ट्रीय दिवस (10 अक्टूबर) के अवसर पर एक सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) नेता के सार्वजनिक प्रदर्शन ने इस कैमरेडरी की ओर ध्यान आकर्षित किया है.[5] इस घटना को लेकर चीन की तीव्र प्रतिक्रिया के बावजूद, भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने इस विषय पर मीडिया स्वतंत्रता को बनाए रखने पर जोर दिया.[6]
एक दुर्लभ उच्च-स्तरीय बातचीत तब हुई जब 2024 में मोदी ने ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते द्वारा उनके फिर से चुनाव जीतने के बाद के बधाई संदेश को स्वीकार किया.[7] इस कदम ने भारत-ताइवान संबंधों के स्वर में एक सूक्ष्म किन्तु स्पष्ट बदलाव की ओर इशारा किया है.
टेबल-1: म्यूचुअल फूटप्रिंट्स: भारत में ताइवान और ताइवान में भारत की उपस्थिति
देश
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ऑफिस
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शहर
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टिप्पणी
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भारत
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इंडिया-ताइपे एसोसिएशन (ITA)
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ताइपे
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ITA को 1995 में भारत के एक डी-फैक्टो मिशन के रूप में स्थापित किया गया था.
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ताइवान
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ताइपे इकनोमिक एंड कल्चरल सेंटर (TECC)
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नई दिल्ली, चेन्नई और मुंबई
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पहला TECC 1995 में नई दिल्ली में स्थापित किया गया था, इसके बाद 2012 में चेन्नई ऑफिस का उद्घाटन हुआ और 2024 में मुंबई ऑफिस बना.
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ताइवान बाहरी व्यापार विकास परिषद (TAITRA)
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नई दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई
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TAITRA ने ताइपे में एक इंडिया सेंटर भी स्थापित किया है
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ताइवान पर्यटन ब्यूरो (TTB)
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मुंबई
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2018 में एक TTB ऑफिस खोला गया था, लेकिन कोविड-19 महामारी के बाद से, यह निष्क्रिय है.
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ताइवान चैंबर ऑफ कॉमर्स (TCC)
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दिल्ली
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8 अगस्त 2010 को स्थापित किया गया.
पैन-इंडिया TCC की स्थापना 22 अप्रैल 2024 को हुई.
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स्रोत: लेखकों का अपना
COVID-19 महामारी, भू-राजनीतिक समीकरणों में बदलाव, ताइवान स्ट्रेट में संघर्ष की संभावना, ताइवान के बढ़ते आर्थिक महत्व और भारत-प्रशांत सागर इलाके में भारत की बढ़ती भूमिका ने भारत-ताइवान संबंधों की धारा को निश्चित तौर पर प्रभावित किया है. हालांकि, आपसी सहयोग भारत और ताइवान के आपसी संबंधों के स्थापित ढांचे के अंतर्गत ही होता है लेकिन पारस्परिक रूप से लाभकारी और आपसी सहयोग की संभावना वाले क्षेत्रों को आगे बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित कर उन्हें मुख़्य उद्देश्यों के रूप में मान कर कार्य किया जाता है. इस संतुलित दृष्टिकोण ने भारत और ताइवान के बीच अधिक गहरी आपसी समझ और एक दूसरे को लेकर बेहतर परिचय की राह तैयार की है.
पिछले चार वर्षों में, भारत-ताइवान संबंध मज़बूत हुए हैं. कई विश्लेषकों ने चीन के साथ भारत के बढ़ते तनाव के लिए ताइवान के साथ भारत के प्रगतिशील रिश्ते को ज़िम्मेदार ठहराया है. भारत-चीन संबंधों में एक संभावित बेहतरी के संकेतों के चलते कुछ पर्यवेक्षक अब भारत-ताइवान के बीच के रिश्तों की गति में मंदी की भविष्यवाणी भी करने लगे हैं. जबकि चीन भारत सहित कई देशों के लिए अब भी एक महत्वपूर्ण भागीदार बना हुआ है, यह ताइवान के साथ भविष्य में एक मज़बूत साझेदारी के रणनीतिक और आर्थिक मूल्य को कम नहीं करता है. एक दशक पहले, भारत के MEA में कार्यरत एक संयुक्त सचिव ने कहा था कि यदि चीन ने कभी भी ताइवान के साथ भारत के बढ़ते जुड़ाव पर आपत्ति जताई, तो वह मुंहतोड़ जवाब देगा. उन्होंने कहा, "आप (चीन) में ताइवान के लोगों ने और उद्योगों ने आपके देश में अरबों डॉलर का निवेश किया है. अगर वे मेरे देश [भारत] में निवेश करना चाहते हैं तो आपको विरोध क्यों होना चाहिए ? ”[8]
चीन के कारण भारत और ताइवान के बीच अधिक जुड़ाव सीमित रहने की संभावना है. विशेष रूप से आर्थिक और तकनीकी सहयोग से आगे सहयोग की गति की सीमा मानी जा रही है. हालांकि, भारत-ताइवान संबंध धीरे-धीरे चीन की परछाई से बाहर निकलता नज़र आ रहा हैं क्योंकि अब भारत अपने द्विपक्षीय संबंधों को अपने हितों को ध्यान में रखकर आपसी संबंधो की मौजूदा रूपरेखा के अंदर रहकर करने का इच्छुक नज़र आता है.
तीन स्तम्भ: व्यापार, निवेश और प्रौद्योगिकी
तीन स्तम्भ: व्यापार, निवेश और प्रौद्योगिकी
आर्थिक नाते भारत-ताइवान संबंधों का सबसे मज़बूत स्तंभ है. साल 2023 में, द्विपक्षीय व्यापार ने US$ 10 बिलियन के स्तर को पार कर लिया था.[9] भारत अब ताइवान का 16 वां सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर और निर्यात की दृष्टि से 12वां सबसे बड़ा गंतव्य है. ताइवान को हो रहे भारत के प्रमुख निर्यात में खनिज, ईंधन, एल्यूमीनियम, लोहा और स्टील, कार्बनिक रसायन और प्लास्टिक शामिल हैं.[10] भारत में ताइवान की प्रमुख निर्यात सामग्री प्लास्टिक, इलेक्ट्रॉनिक सर्किट, कार्बनिक रसायन, विद्युत मशीनरी और लोहे और स्टील हैं.[11] हालांकि इन सब उत्साहवर्दक आकड़ो के बावजूद, आंकड़े भारत और ताइवान के समग्र विदेशी व्यापार के 1 प्रतिशत से कम हैं क्योंकि अब भारत का कुल व्यापार US$ 1,176 बिलियन और ताइवान के US$ 907 बिलियन तक पहुंच गया है.
टेबल 2: भारत-ताइवान व्यापार (US$ बिलियन में)
साल
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भारत का एक्सपोर्ट
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भारत का इम्पोर्ट
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कुल
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बैलेंस ऑफ़ ट्रेड
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2015-16
|
1.4
|
3.3
|
4.7
|
(-) 1.9
|
2016-17
|
2.2
|
3.1
|
5.3
|
(-) 0.9
|
2017-18
|
2.1
|
3.9
|
6
|
(-) 1.8
|
2018-19
|
2.6
|
4.6
|
7.2
|
(-) 2
|
2019-20
|
1.64
|
4.04
|
5.68
|
(-) 2.4
|
2020-21
|
1.62
|
4.03
|
5.65
|
(-) 2.4
|
2021-22
|
2.76
|
6.23
|
8.99
|
(-) 3.47
|
2022-23
|
2.63
|
8.26
|
10.89
|
(-) 5.63
|
2023-24
|
1.84
|
8.28
|
10.12
|
(-) 6.44
|
स्रोत: लेखकों का अपना, भारत के वाणिज्य विभाग, वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के डेटा का उपयोग किया गया है.
https://tradestat.commerce.gov.in/eidb/iecnt.asp
ताइवान के आर्थिक मामलों के मंत्रालय के इन्वेस्टमेंट कमीशन के आंकड़ों से पता चलता है कि जुलाई 2024 तक लगभग 200 ताइवान की कंपनियों ने भारत में अपना काम स्थापित किया था और निवेश के तौर पर लगभग 1.46 बिलियन अमेरिकी डॉलर का योगदान दिया था और देश में लगभग 170,000 नौकरियां उत्पन्न की.[12] ये कंपनियां इलेक्ट्रॉनिक्स, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी, पेट्रोकेमिकल्स, स्टील, शिपिंग, फुटवियर निर्माण, मोटर वाहन और मोटरसाइकिल पार्ट्स, वित्त और निर्माण सहित कई ऐसी उद्योगों में काम करते हैं.[13] भारत में प्रमुख ताइवान की कंपनियों में होन हए प्रिसिजन इंडस्ट्री (फॉक्सकॉन), विस्ट्रॉन, अपाचे, फेंग ताई, नान लियू और सेंचुरी डेवलपमेंट कॉरपोरेशन शामिल हैं. ताइवानी व्यवसायों ने भारत के विभिन्न राज्यों में अपने मज़बूत औद्योगिक नेटवर्क की स्थापना भी की है. भारत में 55 ताइवानी इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों में से, उदाहरण के लिए, 27 कर्नाटक-तमिलनाडु-आंध्र क्षेत्र में केंद्रित हैं जो देश में अपनी तरह का सबसे बड़ा ऑर्गेनिक क्लस्टर हैं.[14] हालांकि, निवेश अभी भी अपेक्षाओं से कम है, भारत में कुल ताइवानी निवेश अभी भी उसके साउथबाउंड पॉलिसी के अंतर्गत आने वाले देशों के इन्वेस्टमेंट की दृष्टि में बहुत कम हो रहा है.
टेबल 3: ताइवान का साउथबाउंड पॉलिसी के अंतर्गत आने वाले देशों में निवेश
देश
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कुल ताइवानी FDI (US$)
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सिंगापुर
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23.05 बिलियन
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वियतनाम
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13.7 बिलियन
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थाईलैंड
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4.4 बिलियन
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मलेशिया
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3.75 बिलियन
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इंडोनेशिया
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2.86 बिलियन
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भारत
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1.46 बिलियन
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स्रोत: मिनिस्ट्री ऑफ़ इकनोमिक अफेयर्स, ताइवान (रिपब्लिक ऑफ़ चाइना)
बहरहाल, भारत और ताइवान दोनों, चीन से लेकर अपनी कमज़ोरियों के प्रति सचेत नज़र आते हैं और अब वे सक्रिय रूप से अपने आर्थिक संबंधों को चीन से अलग करके देखना और संबंधो में विविधता लाने के लिए रणनीति तैयार करने में व्यस्त हैं. दोनों देशों की ताकत और आकांक्षाएं अच्छी तरह से जुड़े हुए हैं और भविष्य के सहयोग की राह दोनों के लिए सुलभ बनाते हैं. भारत का लक्ष्य 2030 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना है और 2047 तक विकसित राष्ट्र का दर्ज़ा हासिल करना है जब भारत अपनी स्वतंत्रता का शताब्दी वर्ष मना रहा होगा.[15]
भारत के इस विज़न की एक प्रमुख बात प्रोडक्शन की मात्रा पर ध्यान देने की बजाय प्रोडक्शन के माध्यम से वैल्यू एडिशन को प्राथिमकता देना है. भारत को उन्नत कंपोनेंट्स के उत्पादन को बढ़ाने की सख़्त ज़रूरत है ताकि वह वैश्विक वैल्यू चैन के साथ अपने प्रोडक्शन और अर्थव्यवस्था को एकीकृत कर सके. भारत की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना इस रणनीति का केंद्रीय तत्व है जिसका उद्देश्य निर्यात को बढ़ावा देना, व्यापार घाटे को काबू में रखना और उच्च गुणवत्ता वाले रोज़गार के अवसर पैदा करना है.[16] मई 2024 तक, PLI योजना के अंतर्गत निवेश में लगभग 15.24 बिलियन अमेरिकी डॉलर का आगमन हुआ और 850,000 से अधिक नौकरियों का सृजन किया गया.[17] भारत और ताइवान के बीच एक आर्थिक सहयोग का ढांचा इस विज़न को भरपूर आगे बड़ा सकता है जो सप्लाई चैन और बुनियादी ढांचे का विस्तार को बढ़ाकर, प्रतिकूल अभिनेताओं द्वारा संभावित शोषण से बचाने के लिए, इस दृष्टि को आगे बढ़ा सकता है. इस तरह का सहयोग पारस्परिक रूप से फ़ायदेमंद भी होगा, तैयार माल के बजाय महत्वपूर्ण पार्ट्स के निर्यात करने का ताइवान का मॉडल भारत को अपने स्माल स्केल इंडस्ट्री को कम किए बिना भारत के औद्योगिक परिदृश्य में मदद करेगा.
भारत सरकार द्वारा जारी किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24 वैश्विक सप्लाई चैन के एकीकरण की प्रक्रिया को और गहरा करने की बात करता है और इसके महत्व की बात करना है. यह एक ऐसा लक्ष्य है जिसमें पूर्वी एशियाई टाइगर अर्थव्यवस्थाओं द्वारा उपयोग में लाए गई रणनीतियों की आवश्यकता होगी जिन्होंने सफ़लतापूर्वक पर्याप्त विदेशी निवेश को आकर्षित किया है
भारत सरकार द्वारा जारी किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24 वैश्विक सप्लाई चैन के एकीकरण की प्रक्रिया को और गहरा करने की बात करता है और इसके महत्व की बात करना है. यह एक ऐसा लक्ष्य है जिसमें पूर्वी एशियाई टाइगर अर्थव्यवस्थाओं द्वारा उपयोग में लाए गई रणनीतियों की आवश्यकता होगी जिन्होंने सफ़लतापूर्वक पर्याप्त विदेशी निवेश को आकर्षित किया है.[18] इस संदर्भ में, विदेशों में औद्योगिक क्षेत्रों की स्थापना के लिए ताइवान की योजना जैसे कदम एक रणनीतिक अवसर प्रदान करते हैं. ये क्षेत्र भारत के साथ सहयोग की नई गुंजाइश प्रदान कर सकते हैं और चीन के साथ भारत के बढ़ते ट्रेड डेफिसिट को भी बेहतर कर सकते हैं. इसके साथ-साथ यह रणनीति महत्वपूर्ण फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) को भी आकर्षित कर सकती है.
भारत में अमेरिका के फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) के गिरते स्तर के मद्देनज़र इस दिशा में सहयोग और भी ज़रूरी हो जाता है. भारत में अमेरिकी फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट 2022-23 में US$6 बिलियन अमेरिकी डॉलर से गिरकर 2023-24 में US$4.99 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया.[19] भारत में कुल मिलाकर FDI की आमद भी नाटकीय रूप से 2023-24 में 26.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर रह गई है, जो पिछले वर्ष के 42 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बहुत कम है.[20] इन आकड़ो से पता चलता है कि भारत को विदेशी निवेश के अपने स्रोतों में विविधता लाने और आर्थिक लचीलापन और विकास को बनाए रखने के लिए ताइवान जैसे भागीदारों के साथ संबंधों को मज़बूत करने की आवश्यकता है. जैसा कि पहले जिक्र किया गया है भारत में विकास के लिए पर्याप्त क्षमता है. 2018 में हस्ताक्षरित नई द्विपक्षीय निवेश संधि इसे अनलॉक करने के लिए एक मूल्यवान फ्रेमवर्क के रूप में काम कर सकती है. [c]
सेमीकंडक्टर क्षेत्र में सहयोग की गुंजाइश
भारत और ताइवान सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में सक्रिय तौर पर सहयोग कर आगे बढ़ा रहा है. भारत यह मानता है कि उसे अपने सेमीकंडक्टर क्षेत्र की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए और इसके लिए विशेषज्ञ और सहयोग प्राप्त करने के लिए ताइवान एक प्रमुख भागीदार का किरदार निभा सकता है. भारत ने सेमीकंडक्टर क्षेत्र में अरबों डॉलर का निवेश किया है, लेकिन इस दिशा में हो रही प्रगति में तेजी लाने के लिए उसे तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता है. ताइवान जो वैश्विक चिप उत्पादन के 60 प्रतिशत और 90 प्रतिशत उन्नत चिप निर्माण करता है वह भारत के इस प्रयास में नेचुरल पार्टनर के रूप में उभर रहा है. ताइवान की प्रमुख कंपनियों के साथ भारत के बढ़ते रिश्ते दोनों को संयुक्त सेमीकंडक्टर निर्माण सुविधाओं की ख़ोज करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. हाल ही में, मोदी और फॉक्सकॉन के चेयरमैन यांग लियू के बीच बातचीत ने भारत में फॉक्सकॉन की निवेश योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करने के साथ-साथ भारत की अर्थव्यवस्था और विकास में फॉक्सकॉन के योगदान की बढ़ती मान्यता को रेखांकित किया है. चेयरमैन यांग लियू को 2024 में भारत के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म भूषण से अलंकृत किया गया.
इस संदर्भ में, सेमिकॉन इंडिया 2024, जो भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सहयोग से भारत के सेमीकंडक्टर मिशन और डिजिटल इंडिया के ढांचे के तहत US के एक उद्योग संघ सेमीकंडक्टर इक्विपमेंट एंड मटेरियल्स इंटरनेशनल (SEMI) द्वारा आयोजित किया जाता है, ने सितंबर 2024 में उसे आयोजित कर इस दिशा में एक मील के पत्थर का काम किया. सेमिकॉन इंडिया 2024 ने वैश्विक सेमीकंडक्टर सेक्टर, नीति निर्माताओं और शिक्षाविदों से उद्योग के शीर्ष व्यक्तियों नेताओं को एक साथ एक प्लेटफार्म में लाने का काम किया और अंतरराष्ट्रीय सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम में भारत के एकीकरण को आगे बढ़ाने और तेज़ करने की प्रक्रिया में शिक्षाविदों को उस मिशन में साथ जोड़ा. उपकरण निर्माण से लेकर फेब्रिकेशन तक पूरे सेमीकंडक्टर सप्लाई चैन की श्रृंखला को कवर करने वाली लगभग 250 कंपनियों ने चर्चाओं में सेमिकॉन इंडिया 2024 के दौरान भाग लिया.
भारत का सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम गति प्राप्त कर रहा है और इसके अंतर्गत बिग टिकट परियोजनाओं को मंजूरी मिल रही है. गुजरात में ताइवान की पावर चिप सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी (PSMC) के साथ TATA समूह का संयुक्त उद्यम एक सफ़ल प्रसंग है जो भारत की सेमीकंडक्टर क्षमताओं को और अधिक मजबूती प्रदान करता है.[21]
सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन फैसिलिटीज (‘fabs') को स्थापित करने के भारत के प्रयासों को ताइवान की विशेषज्ञता से बहुत लाभ होगा. इस तरह के प्रयास में मज़बूत इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण इकोसिस्टम बनाने के लिए एक ऐसा क्षेत्र बनाने की ज़रूरत है जहां ताइवान की कंपनियों का एक प्रमुख स्थान हो. बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों से हटकर जो अपने स्वयं के ब्रांडों का उत्पादन करते हैं, अधिकांश ताइवानी कंपनिया वैश्विक कंपनियों की आपूर्ति करने वाले ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरिंग(OEMs) के रूप में कार्य करती हैं. इन OEMs के लिए मैन्युफैक्चरिंग लोकेशन में हो रही लागत में फ़ायदे अहमियत रखते हैं. उनके लिए मैन्युफैक्चरिंग की लोकेशन मायने नहीं रखती क्योंकि इन कंपनियों के लिए अक्सर बाज़ार की विचारों ज़रूरत नहीं होती क्योंकि ये अपना सामान दूसरे बड़े ब्रांडो को बेचते हैं.
हालांकि, एक मज़बूत तंत्र और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग में महत्वपूर्ण बढ़ोतरी के बगैर भारत का चीन से हो रहे आयात पर निर्भरता जारी रहने का ख़तरा है. वाणिज्यिक सहयोग की एक मज़बूत कड़ी व्यापार बाधाओं को कम करके द्विपक्षीय व्यापार क्षमता को अनलॉक करना बन सकती है जो कि छोटे और मध्यम उद्यमों (SME) के लिए एक आवश्यक कदम बनेगी क्योंकि व्यापार अक्सर निवेश के लिए एक सूचक और प्रेरक का काम करता है. एक बार अगर ताइवान के SME नए भारतीय ख़रीदारों के साथ संबंधों का निर्माण कर ले तो निवेश स्वाभाविक रूप से होने लगेंगे. विशेष रूप से उन लोगों द्वारा जिनको लागत प्रभावी उत्पादन और प्रचुर मात्रा में और कुशल लेबर की आवश्यकता है. इस तरह के तंत्रों को स्थापित करने के लिए भारत की प्रतिबद्धता भी चीन-प्लस-वन उत्पादन की रणनीति पर चलने वाली ताइवानी कंपनियों के लिए एक शक्तिशाली संकेत होगा विशेषकर जब उन्हें इस बात के लिए उन्हें आश्वस्त किया जाएगा कि भारत और ताइवान की सरकार भारत में एक सुरक्षित और व्यापार-अनुकूल वातावरण को बढ़ावा देने के लिए समर्पित हैं. जैसा ही ताइवानी इलेक्ट्रॉनिक्स फर्मों और उनके आपूर्तिकर्ताओं द्वारा भारत में प्रोडक्शन चालू किया जाएगा तब सेमीकंडक्टर फैब्स के लिए आवश्यक इकोसिस्टम देश में एक व्यापक और आत्मनिर्भर सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए मार्ग प्रशस्त करना शुरू कर देगा.
निरंतरता और उसमें आने वाली बाधाएं
भारत और ताइवान के बीच के रिश्ते को गहरा करने के लिए दोनों सरकारों की प्रतिबद्धता की निरंतरता के बारे में बहुत कम संदेह है. यह विश्वास इस मान्यता के कारण है कि सहयोग पारस्परिक रूप से फ़ायदेमंद है और चीन और ताइवान के साथ संबंध एक्सक्लूसिव नहीं है जैसा कि पारस्परिक रूप से माना जाता रहा है. इस समझ ने भारत-ताइवान संबंधों के विकास को गति प्रदान की है.
पीएम मोदी के नेतृत्व में, भारत-ताइवान संबंध नई ऊंचाइयों को छू रहे हैं. कई क्षेत्रों में विभिन्न समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ताइवान के साथ के रिश्तों में प्रधानमंत्री के रूप में अपनी भूमिका की एक व्यक्तिगत मोहर भी छोड़ी है.
पीएम मोदी के नेतृत्व में, भारत-ताइवान संबंध नई ऊंचाइयों को छू रहे हैं. कई क्षेत्रों में विभिन्न समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ताइवान के साथ के रिश्तों में प्रधानमंत्री के रूप में अपनी भूमिका की एक व्यक्तिगत मोहर भी छोड़ी है. 1999 में भाजपा के महासचिव के रूप में ताइवान का दौरा करने के बाद, यह कोई संयोग नहीं है कि उन्होंने बाद में 2011 में मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान गुजरात में सबसे बड़े ताइवानी व्यापार प्रतिनिधिमंडल को आमंत्रित किया. और अब प्रधानमंत्री के रूप में वे ताइवान से होने वाले निवेश और उनकी तकनीकी विशेषज्ञता का लाभ उठाने पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं.
ताइवान के साथ संबंधों को गहरा करने के लिए मोदी की प्रतिबद्धता स्पष्ट है. उन्होंने साफ़ तौर पर खुले मंच से भारत और ताइवान के बीच मज़बूत आर्थिक संबंद का समर्थन किया है. और उनकी यह बात अब लेबर मोबिलिटी एग्रीमेंट जैसे समझौते के तौर पर फलीभूत हो रही है. यह समझौता भारतीय श्रमिकों को ताइवान के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में काम करने के लिए सक्षम बनाता है और इससे ताइवान में भारतीय श्रमिकों की संख्या में वृद्धि होगी, विशेष रूप से ब्लू-कॉलर नौकरियों में, जिससे दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच अधिक आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा मिलेगा.
हालांकि, प्रेसिडेंट लाई ने मा और त्साई की तरह भारत का दौरा तो नहीं किया है लेकिन वे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत के बढ़ते रणनीतिक महत्व को मान्यता देते हैं. ताइवान के विदेश मंत्री, लिन चिया-लुंग ने भी क्षेत्रीय सुरक्षा को बनाए रखने में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया है. भारत ने अंतर्निहित चुनौतियों के बावजूद ताइवान के साथ घनिष्ठ संबंधों को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाया है. विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कई अवसरों पर, सार्वजनिक रूप से ताइवान को एक महत्वपूर्ण आर्थिक सहयोगी के रूप में स्वीकार किया है.[22]
यह बड़ी रोचक बात है कि ऐसे समय में जबकि भारत ताइवान के साथ अधिक से अधिक आर्थिक सहयोग की कोशिश को बढ़ावा दे रहा है, ऐसे समय में ताइवान के साथ भारत की राजनीतिक और अर्ध-राजनीतिक संबंध अब अधिक संयमित नज़र आ रहे हैं. उदाहरण के लिए भारत और ताइवान के बीच संसदीय यात्राएं काफ़ी हद तक अब रुक सी गई हैं. इससे पहले, ताइवान-भारत पार्लियामेंट्री फ्रेंडशिप एसोसिएशन के तत्वावधान में 2018 में ताइवान से भारत का दौरा करने वाले ताइवान की एक महिलाओं के संसदीय प्रतिनिधिमंडल सहित कई ऐसे आदान-प्रदान हुए थे. इस तरह की यात्राओं के रुकने के कारण के रूप में ऐसी यात्राओं को आयोजित करने वाले उचित प्लेटफार्म की और अनुभव की कमी को माना जाता है हालांकि भारत के विदेश मंत्रालय के इस रुख़ को भी इसका कारण माना जाता है जो शायद यह मानता है कि इस तरह की यात्राएं भारत-ताइवान संबंधों की प्रगति को प्रभावित कर सकती हैं और इन यात्राओं का राजनीतिकरण होने की संभावना है.
अमेरिका और अन्य पश्चिमी लोकतंत्रों के संसदीय प्रतिनिधिमंडल नियमित रूप से ताइवान का दौरा करते हैं लेकिन भारत ने इस पूरी कवायद से खुद को दूर कर लिया है. यह सोचा समझा दृष्टिकोण विवेकपूर्ण होने की संभावना है क्योंकि यह भारत को ताइवान के साथ अपने संबंधों की नींव को ठोस बनाने का मौका देता है और वे आपस में अब पहले उन क्षेत्रों की बाधाओं को दूर कर सकते हैं जो संभावित रूप से प्रगति को बाधित कर सकते हैं. आर्थिक संबंधों की वृद्धि को प्राथमिकता देना और विशेष रूप से सेमीकंडक्टर जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में आपसी संबंध को आगे बढ़ाना भविष्य के लिए एक समझदार कदम है. फिर भी, संसदीय कूटनीति का एक क्रमिक पुनरुत्थान भारत के लिए हितकारी हो सकता है. ये कदम अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट करने और लॉबिंग प्रयासों को मज़बूत करने के लिए एक एवेन्यू प्रदान कर सकते हैं विशेष रूप से सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग में निवेश को आकर्षित करने के लिए यह सहायक हो सकता है.
नीतिगत सिफारिशें
डी-हाइफनेशन को प्राथमिकता दें
ताइवान और चीन के साथ भारत के संबंधों को उनकी विशेष प्रकृति और गुंजाइश को देखते हुए स्वतंत्र रूप से देखे और समझे जाने की ज़रूरत है. क्रॉस-स्ट्रेट को लेकर चीन का ताइवान से मतभेद उनका निजी मामला हैं और यह विवाद इन देशों का भारत जैसे देशों के साथ के उनके संबंध को प्रभावित नहीं करना चाहिए. डी-हाइफनेशन पहले ही हो चुका है, और इसे बनाए रखने के लिए एक रणनीतिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है. भारत-चीन संबंधों को भारत-ताइवान के संबंधों में बाधा नहीं समझा जाना चाहिए. यह मान लेना चाहिए कि भारत और ताइवान उन क्षेत्रों में अपने सहयोग को आगे बढ़ा रहे हैं जो उनके तत्कालीन रिश्तों के फ्रेमवर्क का हिस्सा है और दोनों के लिए फायदेमंद है. इस रिश्ते को लेकर चीन की संभावित आपत्तियों के बावजूद, भारत को ताइवान के साथ अपनी आर्थिक और तकनीकी साझेदारी को प्राथमिकता देनी चाहिए.
मज़बूत संचार, सहयोग और संस्थागत तंत्र स्थापित करें
भारत और ताइवान के बीच औपचारिक राजनयिक संबंधों की अनुपस्थिति को देखते हुए, लगातार संचार चैनलों और सहयोग तंत्र को स्थापित करना आवश्यक है. जबकि सरकार की पहल महत्वपूर्ण है, स्टेकहोल्डर्स में विविधता लाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है और यह भी सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि विभिन्न क्षेत्रों में ज़िम्मेदारी और अवसर साझा किए जाते रहें.
एक्ट ईस्ट पॉलिसी क्षेत्रीय संबंधों के लिए अब तक का सबसे सफ़ल ढांचा रहा है. इसी तरह, नई साउथबाउंड नीति ने ताइवान की अन्य देशों के साथ उसके कनेक्शन को मज़बूत किया है. इन नीतियों में एक आपसी पूरक रिश्ता है और वर्तमान ताइवानी प्रशासन के लिए उन्हें आगे बढ़ाना महत्वपूर्ण है, जबकि भारत को चाहिए कि वह ताइवान को अपनी एक्ट ईस्ट पॉलिसी के अंतर्गत ज़्यादा प्रबल रूप से शामिल करे.
चीन के क्षेत्रीय दावे भौगोलिक वास्तविकताओं को नहीं बदलेंगे और न ही वे ज़मीनी तथ्य में तब्दीली ला सकते हैं. ताइवान एक मज़बूत एशियन टाइगर अर्थव्यवस्था और एक सेमीकंडक्टर पावर हाउस है जो भारत के लिए एक महत्वपूर्ण भागीदार है और हमेशा रहेगा. आर्थिक क्षेत्र में मौजूदा गवर्नमेंट टू गवर्नमेंट कंसल्टेशन को प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा, संस्कृति और शिक्षा जैसे क्षेत्रों को शामिल करने के लिए विस्तारित किया जाना चाहिए.
ग्लोबल कोऑपरेशन एंड ट्रेनिंग फ्रेमवर्क, 2015 में वैश्विक मुद्दों से निपटने के लिए ताइवान की विशेषज्ञता का उपयोग करने के लिए शुरू किया गया एक वैश्विक सहयोग और प्रशिक्षण इनिशिएटिव ताइवान की बेस्ट प्रेक्टिसेस को साझा करने और सीखने के लिए एक मूल्यवान मंच के रूप में अब उभर रहा है. भारत अपने प्रतिनिधि कार्यालय के माध्यम से इसमें भाग ले सकता है और जलवायु परिवर्तन, प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा, वाणिज्यिक हितों और आपदा प्रबंधन जैसी साझा प्राथमिकताओं पर चर्चा में भाग ले सकता है.
कनेक्टिविटी को मज़बूत करें
अभी भी भारत और ताइवान के बीच डायरेक्ट कनेक्टिविटी की कमी है. COVID-19 महामारी के बाद से, ताइवान की चाइना एयरलाइंस ने ताइपे और नई दिल्ली के बीच अपनी एकमात्र सीधी उड़ान अब बंद कर दी है. नतीज़तन, अब दो राजधानियों के बीच यात्रा करने में न्यूनतम 12 घंटे लगते हैं. इस समस्या को दूर करने की आवश्यकता है ताकि आम नागरिकों और सरकारी प्रतिनिधियों दोनों के लिए गतिशीलता सुनिश्चित करने में मदद मिल सके. इससे भारत और ताइवान के बीच पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा. ताइवान पर्यटन ब्यूरो, जिसने 2018 में मुंबई में एक कार्यालय खोला था उसको इस कार्य को आगे बढ़ाना चाहिए और सक्रिय रूप से सीधी उड़ान के लिए प्रयत्न करना चाहिए.
COVID-19 महामारी के बाद से, ताइवान की चाइना एयरलाइंस ने ताइपे और नई दिल्ली के बीच अपनी एकमात्र सीधी उड़ान अब बंद कर दी है. नतीज़तन, अब दो राजधानियों के बीच यात्रा करने में न्यूनतम 12 घंटे लगते हैं. इस समस्या को दूर करने की आवश्यकता है ताकि आम नागरिकों और सरकारी प्रतिनिधियों दोनों के लिए गतिशीलता सुनिश्चित करने में मदद मिल सके.
अकादमिक और थिंक टैंक कनेक्टिविटी को प्राथमिकता देना भी महत्वपूर्ण है. भारत के अध्ययन को ताइवान में अधिक गंभीरता से लिया जाना चाहिए, और थिंक टैंकों के बीच अधिक आदान -प्रदान को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. यह पहल भारत के नए दक्षिण-पूर्व नीति के ढांचे के अंतर्गत शामिल की जानी चाहिए जिससे ज्ञान की खाई को पाटने और आपसी समझ को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है. ताइवान भारतीय नागरिकों के लिए आसान वीजा की सुविधा प्रदान कर सकता है जो पीपल टू पीपल कनेक्टिविटी को बढ़ावा देगा.
ज़्यादा से ज़्यादा भारतीय छात्रों और प्रतिभाओं को आकर्षित करें
ताइवान नई साउथबाउंड नीति लोगों को केंद्र में रखकर बनाई गई है. ताइवान वर्तमान में लेबर प्रॉब्लम से जूझ रहा है और आबादी की उम्र बढ़ने के कारण चुनौतियों का सामना कर रहा है. इसके ठीक विपरीत भारत अपने विशाल और युवा प्रतिभा पूल के लिए जाना जाता है जिसमें छात्रों और पेशेवरों की विशाल आबादी शामिल है. ताइवान चाहता है कि भाषा के अध्ययन और उच्च शिक्षा के अपने पहल के माध्यम से, विशेष रूप से विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में वह अधिक भारतीय छात्रों को आकर्षित करें. ताइवान का गोल्ड कार्ड कार्यक्रम जिसे टैलेंट ताइवान कार्यक्रम के नाम से भी जाना जाता है, उसके माध्यम से अमल में लाए जा रही छात्रवृत्ति और वीजा स्कीम ताइवान के प्लान को प्रभावी तरीके से अमल में ला रहे हैं.
अंतरिक्ष सहयोग में संभावना
ताइवान के लिए संचार सुविधा में बेहतरी रक्षा तैयारियों का एक महत्वपूर्ण पहलू है. वह अब अपनी एक स्वदेशी उपग्रह प्रणाली विकसित कर रहा है, जिसका उद्देश्य अंडर सी डाटा केबल में किसी प्रकार के नुकसान होने पर भी इंटरनेट कनेक्टिविटी को सुनिश्चित करना है.[23] राष्ट्रीय सुरक्षा इस मामले में एक प्रेरणा का काम करता है. ताइवान का नेतृत्व भी सेमीकंडक्टर उत्पादन में अपनी तकनीकी ताकत का लाभ उठाना चाहता है. त्साई प्रशासन ने ताइवान के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए लगभग 790 मिलियन अमेरिकी डॉलर का प्रावधान किया.[24] भारत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में एक वैश्विक ताकत है. 2017 में, इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (ISRO) ने 104 उपग्रहों को एक सिंगल पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) मिशन में लॉन्च किया, जिसमें से 101 विदेशी ग्राहक के थे.[25] कुल मिलाकर, 1999 के बाद से, भारत ने अपनी लॉन्च व्हीकल के माध्यम से 432 विदेशी उपग्रहों को लॉन्च किया है.[26]
दिल्ली में 2023 में आयोजित G20 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लोबल साउथ के लिए एक उपग्रह विकसित करने के लिए एक सहयोगी पहल का प्रस्ताव रखा था जिसमें साझा संसाधनों और सहयोग पर जोर दिया गया.[27] भारत और ताइवान अपने अंतरिक्ष सहयोग को और मज़बूत कर सकते हैं और ताइवान के इंटरनेशनल स्पैसटेक स्टार्ट-अप सपोर्ट प्रोग्राम (ISSSP) जैसी पहल जिसका उद्देश्य ताइवान में वैश्विक अंतरिक्ष स्टार्टअप को आकर्षित करना है ताकि ताइवान स्थित स्टार्ट-अप्स का एक्सेस ग्लोबल मार्केट्स तक हो सके. मार्च 2023 में, भारतीय स्टार्टअप ने ISSSP के समक्ष अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया. सहयोग के लिए सितंबर 2023 में 16 स्टार्टअप में से 8 भारतीय स्टार्टअप को चुना गया. भारत कम लागत वाली उपग्रह लॉन्च सुविधाओं के लिए ताइवान को मदद कर सकता है जो दोनों के बीच के सहयोग को आगे बड़ा सकता है.
निवेश में बढ़ोतरी और सेमीकंडक्टर क्षेत्र में सहयोग
ताइवान अपनी प्रमुख कंपनियों से अधिक निवेश को प्रोत्साहित करके भारत के लिए एक महत्वपूर्ण भागीदार बन सकता है. भारत और डिजिटल इंडिया जैसी भारत की पहल ताइवान की कंपनियों को बड़ी भूमिका निभाने के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है. जबकि सेमीकंडक्टर क्षेत्र सहयोग के लिए एक सोचा समझा सेक्टर है लेकिन इसमें अभी भी बहुत परिवर्तनकारी क्षमता मौजूद है. और इस क्षेत्र में सहयोग को मज़बूत करना दोनों को लाभान्वित कर सकता है जिससे भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं को बढ़ाया जा सकता है और ताइवान की तकनीकी विशेषज्ञता का लाभ उठाया जा सकता है. भारत को ताइवान के औद्योगिक क्षेत्र या टाउनशिप की स्थापना की सुविधा पर भी विचार करना चाहिए जो ताइवान से अधिक कंपनियों और निवेशों को आकर्षित करेगा.
निष्कर्ष
1995 में अपने रिप्रेज़ेंटेटिव ऑफिस की स्थापना के बाद से भारत-ताइवान संबंधों का मकसद अपरिवर्तित रहा है और सहयोग के मौजूदा क्षेत्रों को आगे बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित रहा है और विभिन्न क्षेत्रों में आपसी लाभ के लिए क्षमता रखता है. इस क्षमता की धीमी गति के बावजूद दोनों देशों के बीच का संबंध भविष्य की संभावनाओं से भरा है. इसके पूर्ण लाभ को अनलॉक करने के लिए नए सिरे से ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है. दोनों पक्षों के लिए इस गति को बनाए रखने, प्रगति को बनाए रखने और कॉमन ग्राउंड को तलाशने की ज़रूरत है.
भारत के लिए, चीन के साथ अपने जटिल संबंधों को नेविगेट करते हुए भी ताइवान के साथ संबंधों को मज़बूत करने पर ध्यान केंद्रित करना जारी रखना चाहिए. ताइवान के लिए, उसकी नई साउथ-बाउंड नीति को लागू करने का मतलब सरकार, नागरिक समाज, थिंक टैंक, शिक्षाविदों और मीडिया के साथ संबंध को आगे बढ़ाना है. इसके तहत मज़बूत सरकारी पहल के साथ-साथ भारत के साथ कनेक्शन को गहरा करने के लिए प्रतिबद्धता नज़र आती है.
भारत और ताइवान के बीच गवर्नमेंट टू गवर्नमेंट (G2G), बिज़नेस टू बिज़नेस (B2B), गवर्नमेंट टू बिज़नेस (G2B), गवर्नमेंट टू पब्लिक (G2P) और पीपल टू पीपल (P2P ) सहयोग की कई स्तरों पर बहुत तरक्की की गुंजाइश है. आर्थिक, तकनीकी, सांस्कृतिक और सामाजिक आयामों में इन संपर्कों को मज़बूत करने से भारत और ताइवान के बीच एक टिकाऊ और स्थायी साझेदारी की नींव तैयार होगी.
Endnotes
[1] Observer Research Foundation, “India-Taiwan Tech Rising | PM Modi and President Lai's Vision for Growth,” YouTube video, 1:32 hour, July 21, 2024, https://www.youtube.com/watch?v=rYqWYi2JX1g&t=1262s.
[2] “New Southbound Policy,” Executive Yuan, July 4, 2019, https://english.ey.gov.tw/News3/9E5540D592A5FECD/2ec7ef98-ec74-47af-85f2-9624486adf49
[3] Ministry of External Affairs, Government of India.
[4] Ministry of External Affairs, “Meeting between Prime Minister Shri Narendra Modi and H.E. Mr. Suga Yoshihide, Prime Minister of Japan,” September 23, 2021.
[5] Jassie Hsi Cheng, “The Taiwan–India ‘Milk Tea Alliance’,” Diplomat, October 20, 2020, https://thediplomat.com/2020/10/the-taiwan-india-milk-tea-alliance/.
[6] Ministry of External Affairs, “Transcript of Virtual Weekly Media Briefing by the Official Spokesperson,” October 9, 2020, https://www.mea.gov.in/media-briefings.htm?dtl/33151/Transcript_of_Virtual_Weekly_Media_Briefing_by_the_Official_Spokesperson_08_October_2020.
[7] Narendra Modi (@narendramodi), Twitter, June 5, 2023, https://x.com/narendramodi/status/1798339373785911656
[8] Ko Shu-ling, “Indian Official Optimistic on FTA Deal,” Taipei Times, March 9, 2011, https://www.taipeitimes.com/News/taiwan/archives/2011/03/09/2003497745
[9] Department of Commerce, Ministry of Commerce and Industry, https://tradestat.commerce.gov.in/eidb/iecnt.asp
[10] International Trade Administration, “Taiwan-India Economic Relations,” September 21, 2024, https://www.trade.gov.tw/english/BilateralTrade/BilateralTrade.aspx?code=7030&nodeID=4618&areaID=2&country=SW5kaWE=
[11] International Trade Administration, “Taiwan-India Economic Relations”
[12] International Trade Administration, “Taiwan-India Economic Relations”
[13] “ROC Embassies and Missions Abroad,” https://www.rotaiwan.org/in_en/post/39.html#:~:text=As%20of%20the%20end%20of,%2C%20finance%2C%20and%20construction%20industries.
[14] Invest India, India and Taiwan: A growth led partnership, 2021, Delhi, 2021, https://static.investindia.gov.in/2021-09/InvestIndia_TaiwanPlusReportV6.pdf
[15] K R Srivats, “India will become third largest economy in my third term, says PM Modi,” Hindu Businessline, February 9, 2024,; Prime Minister’s Office, Government of India.
[16] Invest India, Government of India, https://www.investindia.gov.in/production-linked-incentives-schemes-india
[17] Harsh V Pant and Kalpit A Mankikar, “India begins a rebalance of security concerns over China and economic aspirations,” East Asia Forum, October 13, 2024, https://eastasiaforum.org/2024/10/13/india-begins-a-rebalance-of-security-concerns-over-china-and-economic-aspirations/.
[18] Ministry of Finance, “Economic Survey 2023-2024,” https://www.indiabudget.gov.in/economicsurvey/
[19] “India receives highest FDI from Singapore in 2023-24; Mauritius second biggest investor: Government data,” The Hindu, June 2, 2024.
[20] Riya R Alex, “Economic Survey 2024: India's FDI inflow weakens due to geopolitical conflicts, high borrowing costs, says FM Sitharaman,” Mint, July 22, 2024, https://www.livemint.com/economy/economic-survey-2024-indias-fdi-inflows-slows-down/amp-11721632363987.html.
[21] Ministry of Electronics & IT, Government of India, https://pib.gov.in/PressReleaseIframePage.aspx?PRID=2053280
[22] The Times of India, “EAM Jaishankar Delves into India’s Ties with Taiwan, Stressing a Substantial Economic alliance,” YouTube video, 3:35 min, November 16, 2023, https://www.youtube.com/watch?v=3MT6yKldRME.
[23] Kalpit A Mankikar and Satyam Singh, “China threat spurs Taiwan’s space ambitions,” Observer Research Foundation, May 13, 2024, https://www.orfonline.org/expert-speak/china-threat-spurs-taiwans-space-ambitions.
[24] Taiwan Space Agency, Government of Taiwan (Republic of China,) https://www.tasa.org.tw/news_view.php?c=230119002&ln=en
[25] Indian Space Research Organisation, “PSLV-C37 Successfully Launches 104 Satellites in a Single Flight,” https://www.isro.gov.in/SuccessfullyLaunches104.html
[26] Indian Space Research Organisation, “Mission accomplished,” https://www.isro.gov.in/Mission.html
[27] Ministry of External Affairs, Government of India,
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