अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का अस्थिर, अनपेक्षित एवं अप्रत्याशित स्वभाव सर्वविदित है. दूसरे कार्यकाल में उन्होंने अपनी चिरपरिचित शैली में एक के बाद एक फैसलों से पूरी दुनिया को चौंकाने का काम किया है. उनके रुख से स्पष्ट है कि पहले कार्यकाल की तुलना में राष्ट्रपति के रूप में अपनी दूसरी पारी में उनका रवैया और आक्रामक रहने वाला है.
वह अमेरिका की प्राथमिकताओं को नए सिरे से तय कर रहे हैं. ऐसे में दुनिया भर के देशों को भी अमेरिका के साथ अपने संबंधों की नई रूपरेखा बनानी पड़ रही है. ऐसे समय में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अमेरिकी दौरे पर सभी की निगाहें टिकी हुई थीं. दोनों नेताओं की बातचीत में कई उलझाऊ मुद्दों के सुलझने के आसार बनते दिखे तो अगले चार साल के लिए द्विपक्षीय संबंधों का खाका भी खिंचा.
प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच बैठक में निजी आत्मीयता के भी दर्शन हुए. व्हाइट हाउस में पीएम मोदी का गर्मजोशी से स्वागत करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि ‘उन्हें उनकी कमी महसूस हो रही थी.’ इजरायली प्रधानमंत्री, जापानी प्रधानमंत्री और जार्डन के राजा के बाद मोदी चौथे वैश्विक नेता हैं, जिनकी ट्रंप ने दूसरे कार्यकाल में मेजबानी की. इस तरह सांकेतिक तौर पर भी इस दौरे की महत्ता सहज ही समझी जा सकती है.
ट्रंप का जैसा व्यक्तित्व है उसे देखते हुए उनके साथ समीकरण दुरुस्त रखने में निजी संबंध बहुत अहम भूमिका निभाते हैं. प्रधानमंत्री को ट्रंप ने मित्र के रूप में संबोधित करते हुए उन्हें ‘टफ नेगोशिएटर’ यानी सौदेबाजी में सख्त और दक्ष भी बताया. पीएम मोदी ने भी ट्रंप के विजन ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ और अपनी संकल्पना ‘विकसित भारत’ के बीच समानता दर्शाते हुए साझा दृष्टिकोण को रेखांकित किया.
बदलने लगी दुनिया की सियासत
दुनिया भर के देश जिस तरह अमेरिका के साथ अपने संबंधों के पुनर्संयोजन में लगे हैं, उसे देखते हुए भारत को भी देर-सबेर यह काम करना था. प्रधानमंत्री के दौरे के साथ यह प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू भी हो गई. ट्रंप प्रशासन इस समय टैरिफ को लेकर बहुत आक्रामक है और पीएम मोदी के साथ बैठक से कुछ घंटे पहले ही ट्रंप ने जवाबी टैरिफ को लेकर कदम बढ़ाने की घोषणा भी की.
राष्ट्रपति ट्रंप ने जवाबी टैरिफ का एलान जरूर किया है, लेकिन अभी उसके लिए आकलन एवं अन्य पहलुओं को तय किया जाना शेष है. ऐसे में कहीं न कहीं भारत के लिए अपने हितों को सुरक्षित बनाए रखने की गुंजाइश बनी हुई है.
स्वाभाविक है कि दोनों नेताओं के बीच इस मुद्दे पर चर्चा हुई है. राष्ट्रपति ट्रंप ने जवाबी टैरिफ का एलान जरूर किया है, लेकिन अभी उसके लिए आकलन एवं अन्य पहलुओं को तय किया जाना शेष है. ऐसे में कहीं न कहीं भारत के लिए अपने हितों को सुरक्षित बनाए रखने की गुंजाइश बनी हुई है.
अब यह वार्ताकारों पर निर्भर करता है कि इसे किस तरह आगे बढ़ाया जाता है. हालांकि दोनों देशों ने वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है. इससे तय है कि आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ेगा और इस राह में संभावित अवरोधों को समय रहते दूर करने का प्रयास किया जाएगा.
अमेरिका ने भारत को अत्याधुनिक रक्षा तकनीक और तेल एवं गैस के साथ ही अन्य उभरती हुई प्रौद्योगिकियों की जो पेशकश की है, उससे व्यापारिक संबंधों को नया आयाम मिलेगा. हिंद प्रशांत से लेकर पश्चिम एशिया में परस्पर हितों के लिए दोनों देशों के बीच सामरिक साझेदारी को सैन्य प्रौद्योगिकी हस्तांतरण से और मजबूती मिलेगी.
जहां तेल एवं गैस की बिक्री से भारत की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित होगी, वहीं हाइड्रोकार्बन खरीद में विविधीकरण बढ़ेगा और कुछ पक्षों पर निर्भरता घटेगी. इसी तरह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई जैसे नए उभरते हुए क्षेत्रों में दोनों पक्षों के बीच बढ़ता हुआ सहयोग न केवल द्विपक्षीय, बल्कि वैश्विक व्यवस्था को भी लाभ पहुंचाएगा.
रूस-यूक्रेन के बीच तनाव घटाने को लेकर ट्रंप जिस तरह सक्रिय एवं प्रतिबद्ध हैं, उससे भी भारत के लिए वैश्विक व्यापार में सुगमता बढ़ेगी, क्योंकि बाइडन प्रशासन ने रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए हुए थे. इसी तरह चाबहार बंदरगाह का मामला ट्रंप ने विदेश मंत्री मार्को रूबियो पर छोड़ दिया है कि वही तय करें कि क्या करना है. इससे यही संकेत मिलता है कि भारत को छूट जारी रहेगी.
सुपर पावर जुगलबंदी
सामरिक मोर्चे पर भी दोनों देशों की जुगलबंदी और बेहतर हो रही है. पश्चिम एशिया से लेकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए दोनों देशों ने अपने प्रयासों की प्रतिबद्धताओं को पुन: व्यक्त किया है. पश्चिमी एशिया में जहां आइटूयूटू को व्यापकता दी जाएगी वहीं हिंद-प्रशांत के लिए हिंद महासागर पहल की घोषणा की गई है.
अमेरिका बार-बार स्वतंत्र एवं मुक्त हिंद-प्रशांत क्षेत्र की बात दोहराता है और यह सुनिश्चित करने में भारत की साझेदारी को अहमियत देता रहा है. चीन की बढ़ती हुई चुनौती और प्रमुख वैश्विक व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा के लिए दोनों देशों के ऐसे प्रयास बहुत आवश्यक भी हैं.
आतंकवाद के मुद्दे पर भी दोनों देशों की साझा चिंता सामने आई. अमेरिका ने तहव्वुर राणा के प्रत्यर्पण को मंजूरी दे दी है. क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर भारत की चिंताओं से भी अमेरिका ने सहमति जताई है.
भारत के लिए परेशानी बढ़ा रहे बांग्लादेश के मामले में तो राष्ट्रपति ट्रंप ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि इस पड़ोसी देश के मामले में जो करना है वह प्रधानमंत्री मोदी ही तय करें. इसे बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के लिए कड़ा संदेश समझा जाए
भारत के लिए परेशानी बढ़ा रहे बांग्लादेश के मामले में तो राष्ट्रपति ट्रंप ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि इस पड़ोसी देश के मामले में जो करना है वह प्रधानमंत्री मोदी ही तय करें. इसे बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के लिए कड़ा संदेश समझा जाए, जिसके बारे में माना जाता है कि बाइडन प्रशासन की मेहरबानी से ही वह अस्तित्व में आ सकी.
प्रधानमंत्री मोदी के अमेरिका दौरे में आर्थिक, सामरिक एवं रणनीतिक संबंधों पर व्यापक सहमति बनी है. दोनों देश 21वीं सदी की आवश्यकताओं के अनुरूप संबंधों को आकार देने की दिशा में आगे बढ़े हैं. कुछ मुद्दों पर जरूर अभी भी पेच फंसा हुआ है, लेकिन मोदी-ट्रंप की आत्मीयता और परस्पर हितों की गहरी समझ को देखते हुए आने वाले समय में उनके भी सुलझने की उम्मीद बढ़ी है.
The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.