Author : Harsh V. Pant

Originally Published हिंदुस्तान Published on Feb 27, 2025 Commentaries 20 Hours ago

यूएसएड का भविष्य अब उलझ गया है. रिपब्लिकन जहां इसे बंद करने पर आमादा हैं, तो वहीं डेमोक्रेट राष्ट्रपति ट्रंप के इस कदम को असांविधानिक बता रहे हैं. 

USAID का 'वजूद संकट', ट्रंप-मस्क की जोड़ी ने छेड़ी मुहिम

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ट्रंप प्रशासन ने रविवार को यूएस एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट, यानी 'यूएसएड' के 1,600 से भी अधिक कर्मचारियों को नौकरी से बाहर कर दिया. अमेरिका के बाहर काम करने वाली इस एजेंसी के कई कर्मचारियों को वेतन देकर छुट्टी पर भेज दिया गया है और इसके आला अधिकारियों व कुछ खास कर्मचारियों को ही काम पर रखा गया है. यह कार्रवाई अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके सलाहकार एलन मस्क के उस एजेंडे का हिस्सा है, जिसके तहत वे चुनाव से पहले इस एजेंसी के बजट और आकार को कम करने की बात किया करते थे. ये दोनों यूएसएड को 'अमेरिका प्रथम' नीति के तहत नए सिरे से गढ़ना चाहते हैं.

ट्रंप प्रशासन का क्या है संकेत 

इससे पहले ट्रंप प्रशासन ने 20 जनवरी को पद संभालते ही विदेशी सहायता भुगतान पर 90 दिनों की रोक लगा दी थी. भुखमरी और घातक बीमारियों से लड़ने वाले कार्यक्रमों से लेकर दुनिया भर में लाखों विस्थापितों के हित में चलाई जा रही योजनाओं की राशि रोक दी गई है. सिर्फ सुरक्षा से जुड़े कुछ कार्यक्रमों, ड्रग्स के खिलाफ चल रहे अभियानों और मानवीय राहत की कुछ योजनाओं के लिए सीमित मदद जारी रखी गई है. अमेरिकी प्रशासन करीब 40 अरब डॉलर के आसपास के ऐसे सहायता कार्यक्रम चलाता है, जिसमें से महज 10 करोड़ डॉलर के अभियानों को ही राहत दी गई. साफ संकेत है कि ट्रंप प्रशासन यूएसएड के खिलाफ सख्त रवैया अपनाने जा रहा है.

 

वास्तव में, राष्ट्रपति ट्रंप ने बार-बार इस पर हमले किए हैं. पिछले दिनों उन्होंने इस एजेंसी को 'वामपंथी घोटाला' बताया था और दावा किया कि इसकी फंडिंग रोककर इस घोटाले को प्रभावी ढंग से समाप्त कर दिया गया है. इतना ही नहीं, इस एजेंसी का नाम इसकी इमारत से हटा दिया गया है और अब वह स्थान अमेरिकी आव्रजन-प्रवर्तन एजेंसी 'कस्टम्स ऐंड बोर्डर पेट्रोल' के कर्मियों को देने की बात कही गई है. यह सब इसलिए किया गया है, क्योंकि एलन मस्क और डोनाल्ड ट्रंप की जोड़ी विदेशी जमीन पर अमेरिकी खर्च को लेकर आग्रही है और इसे हर हाल में रोकना चाहती है. ट्रंप प्रशासन मानता है कि इस तरह की फंडिंग को लेकर अमेरिका में नाराजगी है और ये अमेरिकी हितों को पूरा भी नहीं कर रहीं. एलन मस्क तो इस एजेंसी को ' आपराधिक संस्था' तक कह चुके हैं.

 ट्रंप प्रशासन मानता है कि इस तरह की फंडिंग को लेकर अमेरिका में नाराजगी है और ये अमेरिकी हितों को पूरा भी नहीं कर रहीं. एलन मस्क तो इस एजेंसी को ' आपराधिक संस्था' तक कह चुके हैं.

इन सबसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राहत व मानवीय मदद के कार्यों में जो मदद मिल रही थी, उसमें बड़ा बदलाव आएगा, क्योंकि अमेरिका इस मदद में सबसे ज्यादा पूंजी मुहैया कराने वाला देश रहा है. मानव विकास के लिए वह काफी काम करता रहा है. इन सबको एक झटके में खत्म कर देना खुद अमेरिका की छवि के लिए ठीक नहीं है. इससे यह धारणा बन सकती है कि अमेरिकी मदद भरोसेमंद नहीं रही. चूंकि कई देशों में अमेरिकी मदद से राहत एवं पुनर्वास के काम चल रहे हैं, जाहिर है, उन सबके भविष्य पर अब एक सवालिया निशान लग गया है.

 

बेशक, ट्रंप और मस्क चाहते हैं कि 'सबसे पहले अमेरिका' की नीति के अनुसार अमरिकी धन खर्च हो, लेकिन इसे एकतरफा बंद करना आसान नहीं होगा. उन्हें यह बताना होगा कि आखिर कैसे इस एजेंसी के तहत मिलने वाली मदद अमेरिकी हितों के खिलाफ रही है. यूएस कांग्रेस (संसद) में इस बाबत प्रस्ताव लाना होगा, जहां डेमोक्रेट के विरोध मुखर हो सकते हैं. इस एजेंसी का गठन 1961 में किया गया था और इसका प्राथमिक उद्देश्य मानवीय सहायता पहुंचाना ही है. 60 से अधिक देशों में इसके कार्यक्रम चल रहे हैं. यह एजेंसी खुद संबंधित देशों में काम नहीं करती, बल्कि स्थानीय एजेंसी को फंड देकर काम करवाती है.

भारत पर क्या होगा असर?

सवाल है कि भारत जैसे देश इससे कितने प्रभावित होंगे ? भारत चूंकि अगले चंद वर्षों में शीर्ष तीन आर्थिक ताकतों में शुमार होने वाला है, इसलिए इसकी सेहत पर शायद ही कोई असर पड़े, मगर कई ऐसे देश हैं, जहां इस एजेंसी का काम काफी विस्तार ले चुका है.

 भारत चूंकि अगले चंद वर्षों में शीर्ष तीन आर्थिक ताकतों में शुमार होने वाला है, इसलिए इसकी सेहत पर शायद ही कोई असर पड़े, मगर कई ऐसे देश हैं, जहां इस एजेंसी का काम काफी विस्तार ले चुका है.

स्वास्थ्य सेवा, खाद्य सुरक्षा, परिवहन, सूखा, टीकाकरण, महामारी जैसे तमाम क्षेत्रों में सुरक्षात्मक उपायों की दिशा में इन अमेरिकी पैसों का इस्तेमाल होता है. चूंकि ज्यादातर पैसा गरीब और अविकसित देशों को जाता है, इसलिए वहां ट्रंप का नया आदेश काफी रुकावटें पैदा कर सकता है. इससे आने वाले दिनों में अमेरिका की जगह अगर दूसरे देश लेते हुए दिखें, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए. उल्लेखनीय है कि चीन खुलकर अमेरिका को टक्कर दे रहा है. ऐसे में, वह अमेरिकी प्रशासन के नए फैसले का इस्तेमाल अपनी विस्तारवादी नीतियों में कर सकता है, जिससे पूरे विश्व का नुकसान होगा.

 

राष्ट्रपति ट्रंप को लगता है कि जो काम यूएसएड के माध्यम से हो रहा है, उसमें अमेरिकी करदाताओं के पैसा बेजा इस्तेमाल हो रहा है. उन्होंने कुछ आंकड़े भी जारी किए हैं. मगर ऐसा करते हुए ट्रंप ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका अब पुराने ढर्रे पर चलने को तैयार नहीं है. इस पैसे का इस्तेमाल वह अपनी सुरक्षा मजबूत करने में करेगा. अमेरिकी विदेश मंत्री को इस बाबत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है.

 

ट्रंप बेशक यह दावा करते हैं कि अमेरिकी मदद को कम करने की सोच आम अमेरिकियों की है, लेकिन इस मदद ने अमेरिका की छवि एक 'सॉफ्ट पावर' की गढ़ी. जाहिर है, अब अमेरिकी विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे. ट्रंप यह भी मानते हैं कि इस तरह की मदद का इस्तेमाल अन्य कामों में हुआ है और भारत का नाम भी उन्होंने लिया है. मगर भारतीय वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट बता रही है कि अमेरिकी मदद वाली परियोजनाएं चुनाव से जुड़ी हुई नहीं रही हैं. उन पैसों का इस्तेमाल कृषि और खाद्य सुरक्षा, पानी, स्वच्छता, अक्षय ऊर्जा, आपदा प्रबंधन और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में हुआ है. यानी, ट्रंप के दावों से भले ही भारतीय राजनीति को प्रभावित करने के प्रयास किए जा रहे हों, लेकिन असलियत में इस बाबत सुबूत नहीं मिलते.

 

अमेरिकी सहायता का भविष्य

साफ है, यूएसएड का भविष्य अब उलझ गया है. रिपब्लिकन जहां इसे बंद करने पर आमादा हैं, तो वहीं डेमोक्रेट राष्ट्रपति ट्रंप के इस कदम को असांविधानिक बता रहे हैं. बेशक, इस मसले का आखिरी समाधान कांग्रेस में होगा, लेकिन इन सबसे अमेरिका की विदेश नीति और विकास नीति जिस तरह प्रभावित हो रही है, उससे पूरी विश्व व्यवस्था पर असर पड़ना तय है.

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