व्यापक तौर पर सरकार का आदेश मानने से इनकार करने के अभियानों की भरमार, लगभग पूरी तरह खाली विदेशी मुद्रा भंडार, गेहूं, प्याज, दूध और मांस जैसी जरूरी चीजों की आसमान छूती कीमतें, बिजली गुल होने का लगातार सिलसिला और संघर्ष कर रहे लोग जो इस साल होने वाले चुनाव में वोट देंगे- ये ऐसी स्थितियां हैं जो संकेत देती हैं कि पाकिस्तान एक आर्थिक और राजनीतिक हादसे के कगार पर है. इसके अलावा, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के नेतृत्व वाली सरकार इमरान खान, जिनकी अगुवाई वाली सरकार को आजादी के बाद देश के पहले सफलअविश्वास प्रस्तावके जरिए हटाया गया था, के द्वारा भड़काई गई आंतरिक राजनीतिक उथल-पुथल की वजह से परेशान है. साथ ही सरकार पर अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के विषय में अंतर-सरकारी एजेंसियों का बाहरी दबाव भी है.
खस्ताहालअर्थव्यवस्था
महामारी की वजह से सप्लाई चेन में जो रुकावट आई उसने पाकिस्तान समेत दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर असर डाला. इसके कारण रिटेल से लेकर ऑटोमोबाइल उत्पादन तक सभी सेक्टर पर असर पड़ा. 2022 के आखिर में चीन- जो वैश्विक GDP में लगभग18 प्रतिशतके योगदान के साथ दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और जो पूरे दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया में ग्लोबल वैल्यू चेन (GVC) से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है- में कोविड-19 के मामलों में आई तेजी ने दुनिया के बाकी देशों परअसरके मामले में एक बार फिर से झटका दिया है.
महामारी की वजह से सप्लाई चेन में जो रुकावट आई उसने पाकिस्तान समेत दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर असर डाला. इसके कारण रिटेल से लेकर ऑटोमोबाइल उत्पादन तक सभी सेक्टर पर असर पड़ा.
फरवरी 2023 तक पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गया.3.19 अरब अमेरिकी डॉलरके साथ इसमें ऐतिहासिक गिरावट आई. इतनी कम रकम पाकिस्तान के लिए महज दो हफ्तों के आयात का खर्च उठाने के लिए पर्याप्त थी जबकि IMF की तरफ से ये अनिवार्य किया गया है कि तीन महीने के आयात के खर्च के बराबर विदेशी मुद्रा होनी चाहिए. इस तथ्य से हालात और बिगड़ते हैं कि पाकिस्तान के सामने 2025 तक73 अरब अमेरिकी डॉलरके विशाल कर्ज का भुगतान करने की चुनौती है, वो भी तब जब पाकिस्तान एक अस्थिर राजनीतिक स्थिति और कर्ज देने वाले अप्रत्याशित देशों से जूझ रहा है. पाकिस्तान के126 अरब अमेरिकी डॉलरके भारी-भरकम कर्ज के बोझ में मुख्य रूप से चीन और सऊदी अरब से हासिल विदेशी कर्ज शामिल हैं.
आंकड़ा1:पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार की बदलती स्थिति
पाकिस्तान और चीन के बीच मजबूत लग रहे संबंधों के बावजूद सिंध और बलूचिस्तान प्रांतों में हिंसकअलगाववादी समूहोंके द्वारा खड़ी की गई सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. ये समूह इन प्रांतों में काम कर रहे चीन के नागरिकों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं. इसके जवाब में चीन ने पाकिस्तान में बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) और चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) के तहत चल रही परियोजनाओं के जरिए अपनी विकास से जुड़ी पहल को रोकने की आशंका जताई है. इसके अलावा, चीन ने इन परियोजनाओं में काम कर रहे अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए चीन की सुरक्षा कंपनियों के तैनात करने का प्रस्ताव दिया है. लेकिन पाकिस्तान के भीतर चीन की सुरक्षा एजेंसियों को काम करने के लिए इजाजत देने से विदेशी नागरिकों को सुरक्षा देने की पाकिस्तानी सेना की क्षमता पर सवाल खड़े होंगे. साथ ही, आतंकवादी गतिविधियों के लिए फलने-फूलने की जगह के तौर पर पाकिस्तान के बारे में अंतर्राष्ट्रीय धारणा विदेशी निवेश और सहायता के लिए उसकी उम्मीदों पर असर डालेगी.
पाकिस्तान के सामने 2025 तक 73 अरब अमेरिकी डॉलर के विशाल कर्ज का भुगतान करने की चुनौती है, वो भी तब जब पाकिस्तान एक अस्थिर राजनीतिक स्थिति और कर्ज देने वाले अप्रत्याशित देशों से जूझ रहा है.
अगर पाकिस्तान को दिए गए कर्ज के एक छोटे से हिस्से कातुरंत भुगतानकरने की कभी-कभी की मांग को छोड़ दिया जाए तो सऊदी अरब अपेक्षाकृत रूप से स्थायी मददगार रहा है. वैसे तो सऊद शाही परिवार और पाकिस्तान के बीच रिश्ते सामरिक साझेदारी में बदल गए हैं क्योंकि पाकिस्तान सऊदी अरब की सेना को मजबूत बना रहा है और सऊदी अरब पाकिस्तान में महत्वपूर्ण निवेश मुहैया करा रहा है लेकिन बेशक इस दोस्ती के भविष्य की जड़ें भू-राजनीतिक (जियोपॉलिटिकल) और धार्मिक हितों में हैं.
अनंत काल तक कर्ज
मौजूदा हालात भले ही कुछ और संकेत दे रहे हों लेकिन चीन और सऊदी अरब जैसे दो प्रमुख सहयोगियों के साथ पाकिस्तान के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों की जड़ें काफी गहरी हैं.पाकिस्तान के विकास और व्यापारमें चीन की भागीदारी 60 के दशक से है जब चीन ने तकनीकी और बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं के लिए 85 मिलियन अमेरिकी डॉलर (जो आज के कई अरब डॉलर के बराबर है) का बिना ब्याज का कर्ज मुहैया कराया था. चीन और भारत के बीच युद्ध के बाद पाकिस्तान में औद्योगीकरण की रफ्तार को तेज करने के लिए द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर भी दस्तखत किए गए.
चीन और उसके व्यावसायिक बैंकों ने पाकिस्तान के कुल बाहरी कर्ज में लगभग30 प्रतिशतमुहैया कराया है जो 100 अरब अमेरिकी डॉलर से ज्यादा है. ये अनुपात कर्ज में डूबे श्रीलंका को चीन से मिली वित्तीय मदद से भी ज्यादा है. श्रीलंका के कुल सार्वजनिक बाहरी कर्ज में चीन ने20 प्रतिशतहिस्सा ही मुहैया कराया है. इसके अलावा, आने वाले वित्तीय संकट को हल्का करने के लिए 2023 की शुरुआत में चाइना डेवलपमेंट बैंक (CDB) से हासिल700 मिलियन अमेरिकी डॉलरका अतिरिक्त कर्ज इस साल पाकिस्तान के सामने विदेशी कर्ज का भुगतान करने की जिम्मेदारी के बोझ को और बढ़ाता है.
सऊदी अरब की वित्तीय मदद के जवाब में पाकिस्तान ने वहां की सैन्य क्षमता को बढ़ाने में योगदान दिया है, खास तौर पर परमाणु और हथियारों की सुरक्षा के मामले में. एक-दूसरे से काफी हद तक जुड़ी दुनिया में तेजी से बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य के संदर्भ में इस तरह के कूटनीतिक गठबंधन में पिछले कई दशकों के दौरान बदलाव हुआ है.
एक बार फिर से बता दें कि इस्लामिक दुनिया में पाकिस्तान के पक्के साझेदार के रूप में सऊदी अरब 1943 से मदद कर रहा है. सऊदी अरब ने उस वक्त मोहम्मद अली जिन्ना की तरफ से समर्थन की अपील के जवाब में मदद का फैसला लिया था. सऊदी अरब की वित्तीय मदद के जवाब में पाकिस्तान ने वहां कीसैन्य क्षमताको बढ़ाने में योगदान दिया है, खास तौर पर परमाणु और हथियारों की सुरक्षा के मामले में. एक-दूसरे से काफी हद तक जुड़ी दुनिया में तेजी से बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य के संदर्भ में इस तरह के कूटनीतिक गठबंधन में पिछले कई दशकों के दौरान बदलाव हुआ है. ये साझा हितों पर आधारित सफल अंतर्राष्ट्रीय साझेदारी के सबूत के तौर पर काम करते हैं.
आंकड़ा2:2006 से 2022 तक पाकिस्तान का कुल विदेशी कर्ज (मिलियन अमेरिकी डॉलर में)
पाकिस्तान के द्वारा विदेशी कर्ज की अपनी जिम्मेदारी के मामले में इस साल डिफॉल्ट की आशंका पहले से कहीं ज्यादा लगती है. पाकिस्तान के डॉलर मूल्य वाले बॉन्ड, जो अगले साल मैच्योर होने वाले हैं, अभी तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं. इसकी वजह से निवेशक संभावित नतीजों का अंदाजा लगा रहे हैं. पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार में कमी और आने वाले महीनों में7 अरब अमेरिकी डॉलरके भुगतान का बोझ, जिसमें चीन को चुकाया जाने वाला 2 अरब अमेरिकी डॉलर का कर्ज भी शामिल है, इस हालात को और बिगाड़ रहा है. इसके अलावा, बेलआउट के लिए IMF के साथ बातचीत में देरी ने पाकिस्तान की अनिश्चितताओं को और बढ़ा दिया. हालांकि बाद में पाकिस्तान और IMF के बीच 3 अरब अमेरिकी डॉलर के बेलआउट पैकेज को लेकर सहमति बन गई लेकिन इसके बाद भी कर्ज के मामले में डिफॉल्ट से बचने और तेजी से गिरते बॉन्ड की कीमत, जिसमें लगभग 60 प्रतिशत की गिरावट आई है, को स्थिर करने में काफी मशक्कत करनी होगी. पाकिस्तान जैसे-जैसे खुद को महंगे कर्ज के जाल में फंसा पाएगा उसके लिए तथाकथित लाभदायक विदेशी साझेदारी, जिसने उसे अभी तक कुछ समर्थन मुहैया कराया है, के बारे में करीब से जांच- पड़ताल करना महत्वपूर्ण होगा.
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Soumya Bhowmick is a Fellow and Lead, World Economies and Sustainability at the Centre for New Economic Diplomacy (CNED) at Observer Research Foundation (ORF). He ...