Author : Kashvi Chaudhary

Expert Speak Raisina Debates
Published on Apr 02, 2025 Updated 0 Hours ago

इज़रायल को ट्रंप का समर्थक और मज़बूत होता जा रहा है, लेकिन इसकी अमेरिका को क्या कीमत चुकानी पड़ेगी? मध्य पूर्व को लेकर ट्रंप की महत्वाकांक्षाएं क्षेत्रीय स्थिरता पर टिकी हैं. इज़रायल को प्राथमिकता देने से ट्रंप की महत्वाकांक्षाओं की राह में बाधा उत्पन्न होगी या मदद मिलेगी?

ट्रंप की इज़रायल नीति: असरदार योजना या अरब देशों से संबंध बिगड़ने का ज़ोखिम?

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दुनिया ये उम्मीद जता रही थी कि अपने दूसरे कार्यकाल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इज़रायल के प्रति व्यावहारिक और ज़्यादा यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाएंगे, लेकिन इसकी बजाए उन्होंने इज़रायल को अपना समर्थन और मज़बूत किया है. हालांकि, इस बार ये उन्हें महंगा पड़ सकता है. उनकी एक मुख्य प्राथमिकता युद्धग्रस्त मध्य पूर्व में आर्थिक पहलों और 'मेगा डील' के माध्यम से क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देना होगी. इस कार्यकाल में ट्रंप का सऊदी अरब पर ज़्यादा फोकस दिख रहा है. दोनों देशों के बीच संभावित 600 अरब डॉलर की डील की प्रक्रिया चल रही है. इतना ही नहीं सऊदी अरब मौजूदा दौर में अमेरिका-रूस की बीच बातचीत के लिए एक प्रमुख राजनयिक केंद्र के रूप में भी उभर रहा है. हालांकि, सऊदी अरब और कई अन्य खाड़ी देशों का इज़रायल के प्रति बढ़ता विरोध और ट्रंप की प्रस्तावित ग़ज़ा योजना को सिरे से खारिज़ करना इस रास्ते में एक बड़ी बाधा साबित हो सकती है. अब ऐसे में ये सवाल खड़ा होता है कि ट्रंप 2.0 का मध्य पूर्व का लेकर मुख्य एजेंडा क्या होगा. क्या अपने पहले कार्यकाल की तरह इस पर भी उनका ध्यान इज़रायल की स्थिति को मज़बूत करना होगा, या फिर ट्रंप इज़रायल का इस्तेमाल अपने क्षेत्रीय लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए करेंगे. ट्रंप के इन लक्ष्यों में I2U2 (इंडिया, इज़रायल, संयुक्त अरब अमीरात, और यूनाइडेट स्टेट) जैसी व्यापार सहयोग और बड़े पैमाने पर संपर्क (कनेक्टिविटी) परियोजनाएं शामिल हैं.

अब ऐसे में ये सवाल खड़ा होता है कि ट्रंप 2.0 का मध्य पूर्व का लेकर मुख्य एजेंडा क्या होगा. क्या अपने पहले कार्यकाल की तरह इस पर भी उनका ध्यान इज़रायल की स्थिति को मज़बूत करना होगा, या फिर ट्रंप इज़रायल का इस्तेमाल अपने क्षेत्रीय लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए करेंगे.

मध्य पूर्व को लेकर क्या है ट्रंप का नज़रिया?

अगर ट्रंप के सामने मौजूद वास्तविक स्थितियों की बात करें तो सबसे यथार्थवादी दृष्टिकोण ये होगा कि वो इज़रायल पर युद्धविराम का पालन करने का दबाव डालें. इससे मध्य पूर्व में स्थिरता लाई जा सकती है. इतना ही नहीं अगर ऐसा होता है तो फिर शायद ये सऊदी अरब और इज़रायल के बीच शांति समझौते की योजनाओं को वास्तविकता में बदलने का एकमात्र व्यवहारिक तरीका है, हालांकि, फरवरी 2025 में वॉशिंगटन डीसी में ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू की बीच हुई बैठक को देखें तो दोनों नेताओं के बीच के समीकरण अब पहले से बेहतर दिख रहे हैं. लेकिन इसका नुकसान ये है कि सऊदी अरब जैसा महत्वपूर्ण साझेदार दूर जा रहा हैं, जो अमेरिका के साथ एक मज़बूत गठबंधन चाहता है. 

अमेरिकी दूतावास को तेल अवीव से जे़रूशलम स्थानांतरित करने वाले ट्रंप पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बन गए थे. इसके अलावा, जनवरी 2020 में ट्रंप ने एक ऐसा प्रस्ताव दिया, जिसे उन्होंने “सदी का सौदा” कहा था. इस योजना के तहत इज़रायल को वेस्ट बैंक के 30 प्रतिशत हिस्से का अधिग्रहण प्रस्तावित था. इसमें इज़रायल की बस्तियां और जॉर्डन घाटी भी शामिल थी.

ग़ज़ा समस्या को ख़त्म करने के लिए ट्रंप जिस तरह चरम समाधान और अजीबो-गरीब उपाय सुझा रहे हैं, वो व्यावहारिकता से कोसों दूर दिख रहे हैं. ट्रंप का प्रस्ताव है कि ग़ज़ा से फ़िलीस्तीनी नागरिकों का पड़ोसी देशों में सामूहिक स्थानांतरण किया जाए. इसके बाद अमेरिका द्वारा यहां "मध्य पूर्व का रिवेरा" विकसित किया जाएगा. ये प्रस्ताव अवास्तविक है. मिस्र और जॉर्डन ने कह दिया है कि वो ऐसे स्थानांतरण को स्वीकार नहीं करेंगे. फ़िलीस्तीनी नागरिकों को अपने यहां नहीं लेंगे. इतना ही नहीं इस योजना का वित्तीय और लॉजिस्टिक (रसद संबंधी) बोझ भी बहुत ज़्यादा होगा. सऊदी अरब ने भी कह दिया है कि फ़िलीस्तीनी नागरिकों को उनके अधिकार मिलने ही चाहिए. सऊदी अरब ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया है कि इज़रायल के साथ शांति समझौता तब तब मुमकिन नहीं है, जब तक अलग फ़िलीस्तीन देश को मान्यता नहीं मिल जाती. ट्रंप के इस प्रस्ताव ने इज़रायल के कट्टर सियासी पार्टियों और संगठनों को भी चौंका दिया, क्योंकि ये प्रस्ताव तो फ़िलीस्तीन को लेकर उनके दृष्टिकोण से भी बहुत ज़्यादा सख्त है. ट्रंप शायद इज़रायल द्वारा वेस्ट बैंक के अधिग्रहण का समर्थन कर सकते हैं. इसके समर्थन में ट्रंप ये दलील दे सकते हैं कि हमास के क्षेत्रीय प्रभुत्व को ख़त्म करने और उसे यहां से बेदख़ल करने के लिए ऐसा किया जाना आवश्यक है. ट्रंप का नज़रिया ये है कि समस्या की जड़ ग़ज़ा का अस्तित्व है, ना कि नेतन्याहू का नेतृत्व या इज़रायल की नीतियां. ट्रंप ये मानते हैं कि युद्ध विराम समझौते की किस्मत में फेल होना लिखा है. उनका मानना है कि युद्धविराम स्थायी नहीं हो सकता. यही वजह है कि ट्रंप ने इज़रायल पर समझौते के लिए दबाव डालने की बजाए एक अव्यावहारिक प्रस्ताव पेश किया है. वो भी तब, जब कि हमास ने कहा है कि अगर फ़िलीस्तीन से इज़रायली सेना पूरी तरह हट जाती है तो वो सत्ता छोड़ सकता है. इस पर विचार करने की बजाए ट्रंप ने करीब-करीब एक असंभव और अस्थिर करने वाला समाधान पेश किया है. ट्रंप एक ऐसे शहर को जड़ से उखाड़ना चाहते हैं, जिसका चार हजार साल का इतिहास रहा है. यही वजह है कि उनके इस सुझाव को मध्य पूर्व देशों से भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है. अरब लीग के देशों ने वैकल्पिक उपाय तलाशने शुरू कर दिए हैं.

ट्रंप-नेतन्याहू संबंधों की विरासत

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल को लेकर नेतान्याहू और अमेरिका में इज़रायल के राजदूत येचियल लेइटर ने काफ़ी उम्मीदें लगा रखी हैं. उनकी उम्मीदों की वजह ये है कि ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में इज़रायल की महत्वाकांक्षाओं को लेकर उसका खुलकर समर्थन किया था. इस समर्थन की सबसे उल्लेखनीय घटना 2017 में ट्रंप द्वारा जे़रूशलम को इज़रायल की राजधानी के रूप में मान्यता देना था. अमेरिकी दूतावास को तेल अवीव से जे़रूशलम स्थानांतरित करने वाले ट्रंप पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बन गए थे. इसके अलावा, जनवरी 2020 में ट्रंप ने एक ऐसा प्रस्ताव दिया, जिसे उन्होंने “सदी का सौदा” कहा था. इस योजना के तहत इज़रायल को वेस्ट बैंक के 30 प्रतिशत हिस्से का अधिग्रहण प्रस्तावित था. इसमें इज़रायल की बस्तियां और जॉर्डन घाटी भी शामिल थी. वेस्ट बैंक के बाकी बचे 70 प्रतिशत हिस्से को भविष्य के फ़िलीस्तीन राष्ट्र के लिए निर्धारित किया गया, लेकिन उससे पहले उसे कुछ शर्तों को पूरा करना था. इस योजना में इज़रायल के कुछ अरब-बहुल क्षेत्रों को भविष्य के फ़िलिस्तीनी राष्ट्र में स्थानांतरित करने की संभावना का भी सुझाव दिया गया था. हालांकि, ट्रंप की द्वि-राष्ट्र की ये कोशिशें व्यर्थ साबित हुईं. क्योंकि उन्होंने दोनों पक्षों के मुख्य चिंताओं का कोई व्यावहारिक समाधान नहीं सुझाया और इज़रायल की स्थिति को मज़बूत किया.

2018 में ट्रंप की 'शांति योजना' में संयुक्त राष्ट्र राहत और कार्य एजेंसी के फंड को रोकने का प्रावधान भी शामिल था. ये एजेंसी फ़िलस्तीनी शरणार्थियों और इज़रायल के कब्जे वाले क्षेत्रों में लोगों की मदद करती है. ट्रंप ने फ़िलीस्तीनियों को इज़रायल के साथ शांति वार्ता फिर से शुरू करने के लिए प्रेरित किया. इससे पहले उन्होंने यूएस एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (USAID) की फंडिंग को भी अस्थायी रूप से भी रोक दिया. इस एजेंसी के ज़्यादातर कार्यक्रम उस समय ग़ज़ा में ही चल रहे थे. 

एरॉन डेविड मिलर के मुताबिक ट्रंप का दृष्टिकोण हमेशा से ये रहा है कि फ़िलीस्तीन उनकी शांति योजना पर सहमत हो जाएं. इसके लिए वो दबाव डालते हैं. इसके अलावा उनका एक उद्देश्य अमेरिका के पैसे बचाना भी रहा है. एरॉन डेविड मिलकर कई अमेरिकी विदेश मंत्रियों के पूर्व मध्य पूर्व मामलों के सलाहकार रह चुके हैं.

1948 में राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने इज़रायल को स्वतंत्र देश के तौर पर मान्यता दी थी. इसके बाद से इज़रायल उन देशों में शामिल रहा है, जिससे अमेरिका की सबसे ज्य़ादा विदेशी सहायता मिलती है. अमेरिका से इज़रायल अब तक करीब 310 अरब डॉलर हासिल कर चुका है. अक्टूबर 2023 और 2024 के बीच, अमेरिका ने इज़रायल को करीब 17.9 अरब डॉलर दिए हैं. यही वजह है कि इज़रायल 2023 के बाद से अमेरिका के सबसे महत्वपूर्ण विदेशी सैन्य खर्चों में से एक बन गया. दोनों देशों के बीच 10 साल का एक समझौता ज्ञापन (MoU) है. इसके मुताबिक अमेरिका हर साल इज़रायल को 3.3 अरब डॉलर की सैनिक सहायता देता है. ये अपनी तरह का एक अनूठा समझौता है, क्योंकि अमेरिका ने किसी और देश के साथ इस तरह का समझौता नहीं किया है. ये समझौता ज्ञापन 2028 में ख़त्म होना है. इस एमओयू पर पुनर्विचार करना ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में एक बड़ा सिरदर्द साबित हो सकता है. अमेरिका के विदेश व्यय का सबसे बड़ा हिस्सा इज़रायल पर खर्च होता है. ट्रंप ने अपने चुनाव अभियान में अमेरिका में महंगाई कम करने को मुख्य चुनावी मुद्दा बनया था. ऐसे में इज़रायल पर हो रहे अमेरिकी खर्च पर पुनर्विचार करना अगला तार्किक कदम होना चाहिए, खासकर ये देखते हुए कि उन्होंने USAID की फंडिंग रोक दी है और यूक्रेन के संबंध में भी उनकी नीति में वित्तीय और लेन-देन संबंधी रुख़ अहम भूमिका निभा रहा है.

कितने ‘युद्धों’ का सामना कर रहे हैं ट्रंप?

अमेरिका के खर्चे कम करना ट्रंप का एक मुख्य युद्ध होना चाहिए, क्योंकि घरेलू स्तर पर महंगाई का मुद्दा उनके मतदाता आधार को बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण कारक रहा है. इसके अलावा ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ वॉर का आशंका जताई जा रही है. इसे देखते हुए इस बात की संभावना है कि चीन अपने निर्यात को मध्य पूर्व की तरफ मोड़ दे. वैसे भी हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में चीन का व्यापार बहुत तेज़ी से बढ़ा है. रूस और चीन के संबंध जिस तरह मज़बूत हो रहे हैं, उसे देखते हुए ये ज़रूरी है कि ट्रंप मध्य पूर्व में स्थिरता लाने की कोशिश करें. तभी वो चीन के मुकाबले में संतुलन स्थापित करने में सक्षम हो सकते हैं. इन सब भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच अगर अमेरिका फिर भी इज़रायल की क्षेत्रीय स्थिति को मज़बूत करना जारी रखता है तो ये इस क्षेत्र में अमेरिकी प्रभाव सुनिश्चित करने के लिए एक व्यावहारिक रणनीति नहीं हो सकती है.

रूस और चीन के संबंध जिस तरह मज़बूत हो रहे हैं, उसे देखते हुए ये ज़रूरी है कि ट्रंप मध्य पूर्व में स्थिरता लाने की कोशिश करें. तभी वो चीन के मुकाबले में संतुलन स्थापित करने में सक्षम हो सकते हैं.

ट्रंप इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEEC) पर भारत के साथ मिलकर काम करना चाह रहे हैं. इस सबके बीच अगर पीछे मुड़कर देखें तो ट्रंप की मध्य पूर्व रणनीति दोधारी तलवार साबित हो रही है. ये क्षेत्रीय स्थिरता में बहुत कम योगदान देती है. इसके विपरीय ये मूल रूप से अमेरिका और उसके सहयोगियों की महत्वाकांक्षाओं की राह में बाधा उत्पन्न करती है. खासकर भारत की महत्वाकांक्षा इस क्षेत्र में कनेक्टिविटी, आधारभूत संरचना परियोजनाओं और खाड़ी देशों में बड़े पैमाने पर निवेश करना शामिल है. अगर लेन-देन की सोच रखने वाले ट्रंप क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता देते हैं तो  इससे आईएमईईसी और भविष्य के अन्य कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट तेज़ी से प्रगति कर सकती हैं. ट्रंप चाहते हैं कि वो भारत, यूरोप, और अन्य मध्य पूर्व के सहयोगियों के साथ मज़बूत साझेदारी करें. इसके लिए मध्य पूर्व में स्थिरता ज़रूरी है. 

हालांकि ट्रंप से उम्मीद की जाती है कि वह मध्य पूर्व को लेकर अपनी अलग रणनीतियां बनाएंगे लेकिन वो बाइडेन की कुछ पहलों, जैसे कि I2U2, पर भी काम करना जारी रख सकते हैं. अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप ने सऊदी अरब के अलावा दूसरे कई अरब देशों के साथ व्यापारिक सौदे किए. अपने दूसरे कार्यकाल में वो इन्हें और विस्तार दे सकते हैं. अगर ट्रंप इज़रायल पर युद्धविराम समझौते का पालन करने का ज़्यादा दबाव डालते हैं तो इससे मध्य पूर्व में अमेरिका के पक्ष में ज़्यादा बेहतर माहौल बनेगा. मध्य पूर्व में उसके भागीदार देश अमेरिका के साथ अपने व्यापक क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने के लिए बेहतर स्थिति में होंगे.

निष्कर्ष

ट्रंप के लिए इज़रायल पर संघर्ष विराम समझौते का पालन करने के लिए दबाव डालना एक व्यावहारिक रास्ता है. इससे मध्य पूर्व में स्थिरता आएगी और उन्हें अपनी व्यावसायिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में भी मदद मिलेगी. हालांकि, ऐसा करने के लिए नेतन्याहू को मनाना बड़ी चुनौती होगी, विशेष रूप से ये देखते हुए कि हमास इस क्षेत्र से फिलहाल कहीं नहीं जाने वाला है. सऊदी अरब, क़तर और जॉर्डन जैसे देश अमेरिका के साथ सहयोग करना तो चाहते हैं लेकिन ये तभी होगा, जब अमेरिका की तरफ से इज़रायल पर संघर्ष विराम समझौते को पूरा करने का दबाव डाला जाए.

इस बात में कोई संदेह नहीं कि इज़रायल अब भी मध्य पूर्व में अमेरिका के लिए निवेश का एक महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है, लेकिन अमेरिका के पास अब क्षेत्रीय सहयोगियों के लिए अधिक विकल्प हैं. इज़रायल को अमेरिका के अटूट समर्थन से संभावित साझेदारों में झिझक पैदा हो रही है. ट्रंप की 'ग़ज़ा योजना' का AI वीडियो आग में घी डालने का काम कर सकता है. 

अगर इतिहास के नज़रिए से देखें तो ट्रंप प्रशासन के लिए एक संतुलित मध्य पूर्व नीति बनाना लगातार चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है. इज़रायल को करीब 3 अरब डॉलर के हथियारों की बिक्री के मामले को तेज़ी से आगे बढ़ाने के अमेरिका के हालिया फैसले के बाद स्थितियां और विकट हुई हैं.

हालांकि, अगर इतिहास के नज़रिए से देखें तो ट्रंप प्रशासन के लिए एक संतुलित मध्य पूर्व नीति बनाना लगातार चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है. इज़रायल को करीब 3 अरब डॉलर के हथियारों की बिक्री के मामले को तेज़ी से आगे बढ़ाने के अमेरिका के हालिया फैसले के बाद स्थितियां और विकट हुई हैं. अगर ट्रंप का लक्ष्य व्यापक क्षेत्रीय सहयोग को प्राथमिकता देना है, तो उन्हें इज़रायल के प्रति अपने नज़रिए पर फिर से विचार करना होगा. ऐसा करने पर ही वो मध्य पूर्व के दूसरे देशों के साथ रणनीतिक और आर्थिक जुड़ाव को मज़बूत कर सकते हैं.


कशवी चौधरी ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च असिस्टेंट हैं

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