Author : Roshni Kapur

Expert Speak Raisina Debates
Published on Feb 14, 2025 Updated 0 Hours ago

दुनिया के तमाम देशों को अमेरिका से मिलने वाली मदद पर रोक लगाने का ट्रंप का हालिया आदेश ये संकेत देता है कि कमज़ोर समुदायों को मदद करने के निष्पक्षता और सार्वभौमिकता के पारंपरिक सिद्धांतों की प्रासंगिकता कम-ओ-बेश ख़त्म हो चुकी है.

दुनिया को मिल रही मदद पर ट्रंप का ब्रेक: इंसानियत से राजनीतिक यथार्थवाद की ओर...

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सत्ता में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी से विकास में सहायता, बहुपक्षवाद और विदेश नीति के प्रवाह में खलल डाल दिया है. अमेरिका के नए राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकारी आदेश जारी करने के बाद विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने अंतरराष्ट्रीय विकास में सहायता देने वाली अमेरिका की एजेंसी USAID के पुनर्मूल्यांकन की शुरुआत की है, ताकि ये सुनिश्चित किया जा सके कि विदेशी सहायता की तमाम पहलें, अमेरिका की विदेश नीति के साथ तालमेल वाली हों. ‘काम रोकनेका आदेश विकास की सभी विदेशी सहायताओं पर लागू होगा, सिवा उनके जिनको इससे छूट दी गई है, मसलन, आपातकालीन खाद्य सहायता. वैसे तो ये एलान कोई हैरानी वाला नहीं था. लेकिन, जिस रफ़्तार से और जितने बड़े पैमाने पर इसको लागू किया गया, उसकी किसी ने उम्मीद नहीं लगाई थी. ट्रंप के आदेश ने पूरी दुनिया में USAID की सहायता से चल रही परियोजनाओं पर भी रोक लगा दी है.

 ट्रंप सरकार देश के हितों पर आधारित एक व्यावहारिक रवैया अपना रही है, जो आगे चलकर उसकी नैतिक और यहां तक कि क़ानूनी जवाबदेहियों को भी चोट पहुंचा सकती है.

वैसे तो मानवीय सहायता का राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के हितों से तालमेल बिठाने का प्रयास करना कोई नई बात नहीं है और ऐसा बाइडेन प्रशासन के दौरान भी हुआ था, ख़ास तौर से इज़राइल को कूटनीतिक और सैन्य मदद के मामले में. फिर भी, बाइडेन ने विदेशी सहायता देने के मामले में बहुत उसूलों वाला नज़रिया अपनाया था और उनका ज़ोर मानव अधिकारों की रक्षा के साथ साथ बहुपक्षीय सहयोग पर था. लेकिन, अंतरराष्ट्रीय सहायता के मामले में अमेरिका की नई सरकार के लिए निरपेक्षता, निष्पक्षता और मानवता के सिद्धांतों पर आधारित वो रूप-रेखा अब प्राथमिकता नहीं होगी. ट्रंप सरकार देश के हितों पर आधारित एक व्यावहारिक रवैया अपना रही है, जो आगे चलकर उसकी नैतिक और यहां तक कि क़ानूनी जवाबदेहियों को भी चोट पहुंचा सकती है. इससे अमेरिका की मानवीय सहायता देने वाले और इसको प्रोत्साहित करने वाले देश की उस छवि को गहरा धक्का लग सकता है, जो अमेरिका पिछले कई दशकों से गढ़ता आया है. मानवीय सहायता के मामले में दुनिया भर में अमेरिका की गतिविधियों पर उसके सियासी और आर्थिक दबदबे का गहरा असर पड़ता रहा है. वैसे तो अमेरिका ऐतिहासिक रूप से मानवीय क्षेत्र का एक अहम दानदाता देश रहा है. लेकिन, अमेरिका के पूरे संघीय बजट में विदेशी सहायता की हिस्सेदारी एक फ़ीसद से भी कम रही है.

 

हितों पर आधारित दृष्टिकोण की ओर बड़ा झुकाव

क्या ट्रंप के दौर में राजनीति और मानवीय सहायता के बीच से संबंध पर अब विदेश नीति के लक्ष्यों का ज़्यादा से ज़्यादा दबदबा रहेगा? सहायता के तेज़ी से हो रहे राजनीतिकरण और इसको सुरक्षा से जोड़ने से आख़िर सार्वभौमिकता, निरपेक्षता और निष्पक्षता के बुनियादी सिद्धांतों की रक्षा कैसे हो सकेगी?

 

वैसे तो मानवतावादी हमेशा ये कहते आए हैं कि वो सहायता को लेकर उन्हीं नियमों का पालन करेंगे, जो संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव 46/182 में दर्ज हैं. लेकिन, लाभार्थियों को दी जाने वाली सहायता और इसकी रक़म हमेशा ही उनके हितों के हिसाब से बदलती रही है. मानवीय सहायता कभी भी निरपेक्ष, कल्याणकारी और राजनीति से मुक्त नहीं रही है. क्योंकि, सहायता हमेशा ही दानदाता देश की राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ी रही है और सहायता पाने वाले देशों के साथ दान देने वाले देशों के संबंध का असर इस मदद पर पड़ता रहा है. ये सहायता अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था या क्षेत्रीय ढांचे में किसी देश की भूमिका और हैसियत से भी प्रभावित होती रही है.

 

शीत युद्ध के दौरान देशों की संप्रभुता का सम्मान करते हुए, उनके अंदरूनी मामलों में किसी अन्य देश का बहुत सीमित दख़ल होता था. इसमें मानवीय सहायता भी शामिल रहा करती थी. ये उपनिवेशवाद से मुक्ति की प्रक्रिया से भी जुड़ी थी, ताकि किसी देश के स्वायत्तता बनाए रखने के अधिकार का सम्मान हो सके, वो देश विदेशी प्रभाव से मुक्त रह सके और सहायता की वजह से देशों के बीच टकराव की स्थिति पैदा होने से टाला जा सके. हालांकि, शीत युद्ध के बाद के दौर में अंतरराष्ट्रीय संबंधों को दिशा निर्देश देने वाली रूप-रेखा में तब्दीली आई और ज़्यादा दखल देने वाला एक नया ढांच उभरकर सामने आया. धीरे धीरे इसका असर सहायता पर भी पड़ा और ये अपने बुनियादी नियम के रास्ते से भी हट गई और मानवीय सहायता का एक नया मॉडल उभरा जिसके केंद्र में ये दावा था कि विदेशी सहायता को राजनीति से तो अलग किया जा सकता है, ऐसा करना उपयोगी रहेगा. अमेरिका पर 9/11 के आतंकी हमले के बाद ये तरीक़ा और भी महत्वपूर्ण हो गया, और मानवीय सहायता के क़दम ज़्यादा से ज़्यादा राष्ट्रीय सुरक्षा के मॉडल से जुड़ने लगे. अमेरिका का तो विशेष तौर से ये इतिहास रहा है कि वो स्थानीय रूप से अहम किरदारों से मदद हासिल करने, खुफिया सैन्य जानकारी हासिल करने और अपनी सॉफ्ट पावर बनाए रखने के बदले में उनको मदद के रूप में भारी रक़म देता आया है.

 कुछ दानदाता देश तो विकास में सहायता के नाम पर मदद पाने वाले देशों की संप्रभुता में भी हस्तक्षेप करने लगे हैं. इससे दान देने वाले देशों को अपनी बेहतर स्थिति को और मज़बूत करने और वैश्विक व्यवस्था के मौजूदा ढांचे में अपनी स्थिति बरकरार रखने का मौक़ा मिला. 

सहायता का इस्तेमाल नियमित रूप से दान हासिल करने वाले देश की विदेश, घरेलू और भू-राजनीतिक नीतियों को प्रभावित करने के लिए होता आया है. कुछ दानदाता देश तो विकास में सहायता के नाम पर मदद पाने वाले देशों की संप्रभुता में भी हस्तक्षेप करने लगे हैं. इससे दान देने वाले देशों को अपनी बेहतर स्थिति को और मज़बूत करने और वैश्विक व्यवस्था के मौजूदा ढांचे में अपनी स्थिति बरकरार रखने का मौक़ा मिला. दानदाता देश कमज़ोर देशों को दी जाने वाली मदद की खुलकर नुमाइश भी करने लगे. इसकी वजह से लाभार्थी देशों को अपने यहां की राजनीतिक व्यवस्था पर नियंत्रण और स्वायत्तता से भी महरूम किया जाने लगा.

 

मदद में रोक का विदेशी कार्यक्रमों पर असर

ट्रंप प्रशासन द्वारा विदेशी सहायता पर लगाए गए ब्रेक से उन देशों को अंतरराष्ट्रीय सहायता और विकास में मदद मिलने पर सवालिया निशान लग गए हैं, जो लंबे समय से मानवता के संकटों से जूझ रहे हैं या उनके यहां की व्यवस्थाएं नाज़ुक दौर से गुज़र रही हैं. इससे उन मानवीय संगठनों के लिए भी नई चुनौतियां खड़ी होंगी, जो अपने लक्ष्य हासिल करने के लिए अमेरिका पर केवल वित्तीय बल्कि राजनीतिक, कूटनीतिक और सामाजिक मदद के लिए भी निर्भर रहे हैं. जो साझीदार और ठेकेदार USAID से जुड़कर काम कर रहे थे, उनके ठेके या तो रद्द कर दिए गए या फिर उन्हें छुट्टी पर भेज दिया गया है.

 

मदद देने वाले संगठनों ने पहले ही इस बात की चिंताएं जताई हैं कि थाईलैंड और म्यांमार की सीमा पर खाने पीने के सामान और दवाओं की कमी हो सकती है और कुछ स्वास्थ्य सेवा केंद्रों को बंद किया जा सकता है. थाईलैंड म्यांमार की सीमा पर म्यांमार के लगभग एक लाख शरणार्थी रह रहे हैं. वैसे तो ट्रंप प्रशासन के सहायता रोकने का आदेश देने से पहले से ही कम आर्थिक विकास, म्यांमार में जारी संघर्ष और पर्याप्त अंतरराष्ट्रीय सहायता मिलने की वजह से ज़मीनी हालात पहले से ही चुनौतीपूर्ण बने हुए थे. फिर भी मानवीय सहायता देने वाले संगठन शरणार्थियों के लिए कुछ स्थायी केंद्र बनाकर उन्हें बुनियादी सुविधाएं मुहैया करा रहे थे. सीमा के पार, म्यांमार के कई हिस्सों ख़ास तौर से विवादित या फिर किसी पक्ष द्वारा हाल ही में क़ब्ज़ा किए गए इलाक़ों में स्वयंसेवी संगठन एक अहम पक्ष के रूप में उभरे हैं और गृह युद्ध से प्रभावित लोगों को आपातकालीन खाद्यान्न, स्वास्थ्य सेवा और पनाह दे रहे हैं. इन संगठनों की गतिविधियों में भी खलल पड़ेगा और ज़मीनी स्तर पर समुदायों पर इसका विपरीत असर होगा. सहायता पर ट्रंप प्रशासन की रोक ने शरणार्थियों के पुनर्वास और छात्रों को मिलने वाली छात्रवृत्ति के कार्यक्रमों को बाधित कर दिया है. म्यांमार में तख़्तापलट के बाद डाइवर्सिटी एंड इन्क्लूजन स्कॉलरशिप प्रोग्राम (DISP) का गठन किया गया था, ताकि म्यांमार में शिक्षण संस्थाओं के काम में आई बाधा के बाद एशिया के दूसरे विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे छात्रों की सहायता की जा सके

 

वैसे तो, शरणार्थी शिविरों और कच्ची बस्तियों में मुश्किल वक़्त बिता रहे रोहिंग्या समुदाय के लोगों को दी जा रही मदद को इस रोक से छूट दी गई है. लेकिन, कई मीडिया संगठनों ने बताया है कि किस तरह ये रियायत इस मामले से जुड़े अन्य संगठनों, जैसे कि क़ानून व्यवस्था की देख-रेख करने वालों को नहीं मिल पाएगी. जबकि ये संगठन रोहिंग्याओं को सुरक्षा मुहैया कराते हैं. ट्रंप प्रशासन के ब्रेक का असर इस अहम मोड़ पर बांग्लादेश में रहे राजनीतिक परिवर्तन पर भी पड़ेगा. अगस्त 2024 में छात्रों के विद्रोह की वजह से शेख़ हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश में अंतरिम सरकार का गठन हुआ था. वैसे तो कार्यवाहक सरकार की ज़िम्मेदारी आम तौर पर चुनाव की तैयारी करने तक सीमित रहती है. लेकिन, मौजूदा सरकार ने देश में दूरगामी लोकतांत्रिक और राजनीतिक बदलाव करने का अनूठा बीड़ा उठाया हुआ है. काम रोकने के आदेश से अमेरिका, आने वाले समय में बांग्लादेश में होने जा रहे चुनावों में सहायता और उनकी निगरानी से भी वंचित हो सकता है. वोटों की धांधली, राजनीतिक हिंसा और मतदाताओं से हेरा-फेरी के बीच चूंकि कई बार पहले भी चुनाव हो चुके हैं. ऐसे में बांग्लादेश में विश्वसनीय और ठोस चुनाव कराना केवल देश की चुनावी प्रक्रिया में जनता का भरोसा बहाल करने के लिए ज़रूरी होगा, बल्कि वहां क़ानून व्यवस्था और लोकतंत्र के लिहाज से भी ज़रूरी होगा.

 अगस्त 2024 में छात्रों के विद्रोह की वजह से शेख़ हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश में अंतरिम सरकार का गठन हुआ था. वैसे तो कार्यवाहक सरकार की ज़िम्मेदारी आम तौर पर चुनाव की तैयारी करने तक सीमित रहती है.

सहायता से चलने वाले देश के तौर पर अफ़ग़ानिस्तान में मानवीय स्थिति पिछले कई दशकों से नाज़ुक बनी हुई है. लेकिन, अगस्त 2021 में सत्ता पर तालिबान के क़ब्ज़े के बाद विकास में इस सहायता पर रोक से हालात और बिगड़ चुके हैं. अंतरराष्ट्रीय समुदाय अभी भी इस दुविधा में फंसा हुआ है कि वो तालिबान की सरकार से संवाद करे, उसे अलग थलग रखे या फिर उसका विरोध करे. बहुत से मानवीय सहायता देने वाले संगठन पहले ही अफ़ग़ानिस्तान में अपनी सहायता में कटौती करने की योजना बना रहे हैं. स्वास्थ्य सेवाएं और दूसरी तरह की मदद मुहैया करा रहे तमाम अलाभकारी संगठनों ने पहले ही या तो अपनी गतिविधियां पूरी तरह से या फिर अस्थायी तौर पर रोक दी हैं. अमेरिका के पूर्व सहयोगियों के लिए अफ़ग़ान स्पेशल इमिग्रेंट वीज़ा (SIV) कार्यक्रम को निलंबित करने से इस बात पर अनिश्चितता के बादल छा गए हैं कि क्या वो लोग अभी भी अमेरिका में आकर बस सकते हैं या फिर नहीं. इनमें ऐसे लोग भी शामिल हैं, जो किसी तीसरे देश में अटके हुए हैं. इस मौक़े पर अभी ये भी साफ़ नहीं है कि कितनी तरह की मदद को हमेशा के लिए निलंबित कर दिया जाएगा या फिर किन कार्यक्रमों को दोबारा शुरू किया जाएगा. मानवीय सहायता नई सरकार के लिए अभी भी ऐसा मसला है जिसके तहत वो इस बात का मूल्यांकन कर रहे हैं कि ऐसी मदद किस तरह से अमेरिका के लिए फ़ायदे का सौदा हो सकती है. दूर-दराज के इलाक़ों में रह रहे शरणार्थी अमेरिका को क्या ही लाभ दे सकेंगे; ऐसे में इस बात की उम्मीद कम ही है कि नई सरकार इन कमज़ोर समुदायों की तरफ़ मदद का हाथ बढ़ाएगी. ऐसा लगता है कि ट्रंप की सरकार मेंजीवन बचाने वाली मानवीय सहायताकी अहमियत की गहरी समझ का भी अभाव है. क्योंकि, बहुत से रोके गए कार्यक्रम ऐसे थे, जो बेहद जोखिम वाले और कमज़ोर तबक़ों की मदद के लिए चलाए जा रहे थे. मानवीय मदद देने वाले बहुत से समूहों ने अपने ख़ौफ़ को बताते हुए इस बात की समझ की कमी भी जताई हैं कि वो इन इकतरफ़ा आदेशों से बचने के लिए किस तरह से अर्ज़ी लगाएं.

 

निष्कर्ष

बड़े पैमाने पर खड़े हो रहे संकटों और आपदाओं की चपेट में रहे लोगों और समूहों की बढ़ती संख्या ने मानवीय सहायता के सेक्टर का दायरा बढ़ा दिया है. ये संगठन सीमित और अनियमित फंडिंग के साथ साथ लगातार उभरते नए संकटों की चुनौती से भी जूझ रहे हैं. जो एजेंसियां और संस्थाएं दानदाता संगठनों की स्वैच्छिक मदद के भरोसे हैं, वो ट्रंप सरकार के ताज़ा आदेश से बहुत बुरी तरह प्रभावित होंगे. अब ये देखने वाली बात होगी कि मानवीय सहायता देने वाले मदद हासिल करने के लिए किन वैकल्पिक स्रोतों का सहारा लेंगे और क्या दान देने वाले दूसरे देश इन संगठनों को मदद के लिए आगे आएंगे, ताकि वो अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वहन जारी रख सकें. हालांकि, इससे दूरगामी अवधि में परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं. ये बदलाव केवल अंतरराष्ट्रीय विकास के मामले में देखने को मिलेंगे, बल्कि बहुपक्षीयवाद पर भी इनका असर दिख सकता है.

 इस लेख में हमने दिखाया है कि राजनीति और सहायता का ये घालमेल नुक़सानदेह हो सकता है और ये मानवता के नियमों को भी चोट पहुंचा सकता है.

इस बीच, मानवीय सहायता देने वाले मदद के आवंटन में बहुत सोच-समझकर विकल्प का चुनाव करके सहायता पहुंचाना जारी रखेंगे. हालांकि, ये चुनिंदा मदद देने का चलन केवल व्यावहारिक तौर पर हैरान करने वाला है, बल्कि ये तमाम संकटों को लेकर दान देने वालों की सैद्धांतिक अपेक्षाओं को भी दर्शाता है. ऐसे विवेकाधीन चुनाव, वैश्विक व्यवस्था के नियम पर आधारित व्यवस्था के तौर पर उभरने में भी बाधक बन सकते हैं. इस लेख में हमने दिखाया है कि राजनीति और सहायता का ये घालमेल नुक़सानदेह हो सकता है और ये मानवता के नियमों को भी चोट पहुंचा सकता है. वैसे तो विदेशी सहायता तकनीकी तौर पर आर्थिक होती है. लेकिन, इसको सहयोग करने, आपसी समझ और स्थानीय संगठनों और समुदायों के प्रति संवेदनशीलता अपनाने से अलग नहीं किया जा सकता है. मानव विकास की ज़रूरतों को सहायता के इन मॉडलों के साथ जोड़ा जाना चाहिए, जिससे लाभार्थियों के हित, उनके अस्तित्वों और आवाज़ों का आपस में मिलान हो सके.

 

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