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श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमार दिसानायके और उनकी नेशनल पीपुल्स पावर (एनपीपी) गठबंधन की जीत को श्रीलंकाई राजनीति में बड़ा उलटफेर माना गया. उम्मीद जताई जा रही थी कि नई सरकार घरेलू और विदेश नीति में बड़े बदलाव करेगी लेकिन उनकी सरकार की अब तक की विदेश नीति में पहले ही की तरह स्थिरता और निरंतरता दिख रही है. भारतीय नीति निर्माताओं को विशेष रूप से दो प्रमुख चीज़ों पर ध्यान देना चाहिए: यथार्थवाद और दूरदर्शिता. यहां यथार्थवाद का अर्थ ये है कि भारत को श्रीलंका के मूल हितों के बारे में समझ विकसित करते रहनी और उसी हिसाब से श्रीलंका के साथ संपर्क रखना चाहिए. दूरदर्शिता का मतलब ऐसे मुद्दों का खोजना है, जिस पर दोनों देश समान रूप से सहमत हो सके.
यर्थाथवाद के क्या मायने?
दिसानायके ऐसी विदेश नीति अपनाने की योजना बना रहे हैं, जो राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देती है. एनपीपी सरकार का व्यावहारिक दृष्टिकोण कोलंबो की पिछले दो दशकों की विदेश नीति की यथार्थवादी नींव को बनाए रखने की मंशा को दर्शाता है. पार्टी के नेताओं ने कहा है कि श्रीलंका को किसी एक विदेशी साझेदार पर ज़्यादा निर्भर नहीं रहना चाहिए. राष्ट्रीय हित के लिए यथार्थवादी रणनीतिक स्वायत्तता की ऐसी ही विदेश नीति भारत भी अपनाता है.
चुनावी अभियान के दौरान, एनपीपी ने कोई भारत विरोधी बयान नहीं दिए. इसकी बजाय, उसने ऐसे मुद्दों की खोज की, जिनसे अपने हित साधे जा सके.
अपने शुरुआती वर्षों में जनता विमुक्ति पेरामुना (जेवीपी) की नीतियां चरम वामपंथी पार्टियों की तरह ही थी. एक ज़माने में उसने श्रीलंका में तैनात भारतीय सैनिकों के विरोध में आंशिक रूप से क्रांति की कोशिश भी की, लेकिन अब उसने अपनी नीतियों में महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए भारत के प्रति एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया है. चुनावी अभियान के दौरान, एनपीपी ने कोई भारत विरोधी बयान नहीं दिए. इसकी बजाय, उसने ऐसे मुद्दों की खोज की, जिनसे अपने हित साधे जा सके. इतना ही नहीं चुनाव से पहले ही दिसानायके ने मोदी सरकार के निमंत्रण पर भारत का दौरा किया. दिल्ली में उन्होंने विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से मुलाकात की. इसी तरह भारतीय विदेश मंत्री भी कोलंबो गए. आम चुनाव के बाद दिसानायके फिर भारत आए. दिसानायके और भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग और आर्थिक संबंधों के बारे में घोषणाएं की. आर्थिक संबंधों में ऊर्जा व्यापार और निवेश शामिल हैं. दोनों देशों के बीच एक पाइप लाइन स्थापित करने पर भी सहमति बनी है.
यथार्थवाद दूसरी दिशा में भी जा सकता है. भ्रष्टाचार की जांच के नाम पर एनपीपी सरकार ने अडानी रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट की समीक्षा की. इसके बाद अडानी को परियोजना बंद करनी पड़ी. सरकार का ये फैसला भी बढ़ी हुई कीमतों को रोककर अपने राष्ट्रीय हित का पालन करना था.
अगर भारत को श्रीलंका के साथ अपने रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाना है, तो उसे श्रीलंका की सुरक्षा और आर्थिक प्राथमिकताओं को ध्यान में रखना होगा. समुद्री सुरक्षा समझौतों के तहत जब दोनों देश संयुक्त सैन्य अभ्यास कर रहे थे, तब इसकी आलोचना की गई. ये कहा गया कि ये समझौता श्रीलंका की तुलना में भारत के लिए ज़्यादा फायदेमंद है. भारत अगर श्रीलंका के उत्तरी तट पर मछली पकड़ने के बारे में उसकी चिंताओं को ध्यान में रखे तो इससे विश्वास पैदा किया जा सकता है. सबसे ज़रूरी बात ये है कि भारत को तमिलनाडु के राजनेताओं के दबाव का विरोध करना चाहिए और राज्यों के अधिक अधिकारों के वितरण जैसे मुद्दों पर बातचीत करते समय ज़्यादा संवेदनशीलता दिखानी चाहिए. अगर आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो भारत से निवेश, व्यापार और सहायता का लाभ श्रीलंका को मिलता है, लेकिन रामसेतु के ऊपर दो देशों को जोड़ने वाले पुल जैसे परियोजनाओं पर विचार करते समय उप-राष्ट्रीय और स्थानीय हितों के प्रति संवेदनशीलता दिखाई जानी चाहिए.
श्रीलंका के प्रति कैसा दृष्टिकोण हो?
चूंकि एनपीपी की तरफ जनता के झुकाव का सबसे बड़ा कारण इस पार्टी की विशुद्ध वामपंथी विचारधारा था, लेकिन अब सरकार का यथार्थवाद रुख़ को वामपंथी समावेश का नाम देंगे. राष्ट्रीय हित को बहुसंख्यक आबादी के हितों यानी गरीबों के हितों के रूप में परिभाषित किया जाएगा. एनपीपी के लिए अपनी वामपंथी छवि को बचाए रखने के लिए जनता-प्रथम वाले रवैये को बनाए रखना आवश्यक होगा. इसी के ज़रिए वो अपने उन कामकाजी और मध्यवर्गीय मतदाताओं के व्यापक गठबंधन का समर्थन बरकरार रख सकेगी, जिन्होंने पिछले चुनाव में उस पर भरोसा किया था. कर्ज़ से उबरने और कटौती पैकेज की मूल शर्तों के साथ आगे बढ़ने के लिए हाल ही में सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से 2.9 अरब डॉलर लिए थे, जिसकी वामपंथियों ने जमकर आलोचना की. इस गठबंधन की जो लोकतांत्रिक भावना है, उसका मतलब ये है कि सरकार मध्यम अवधि में नीति के प्रति सार्वजनिक असंतोष यानी जनता की नाराज़गी को नज़रअंदाज नहीं करेगी.
इस गठबंधन की जो लोकतांत्रिक भावना है, उसका मतलब ये है कि सरकार मध्यम अवधि में नीति के प्रति सार्वजनिक असंतोष यानी जनता की नाराज़गी को नज़रअंदाज नहीं करेगी.
भारत के साथ कुछ समझौतों पर पुनर्विचार करने के लिए एनपीपी को अपने मूल वोटबैंक से दबाव का सामना करना पड़ सकता है. उदाहरण के लिए, श्रीलंका के त्रिंकोमाली शहर को एक भारतीय आर्थिक केंद्र में बदलने के समझौते की आलोचना सरकार में शामिल वामपंथी पार्टी और जेवीपी से अलग हुए गुट फ्रंटलाइन सोशलिस्ट पार्टी द्वारा की गई है. इसी तरह आर्थिक और प्रौद्योगिकी सहयोग समझौते (ईटीसीए) की भी आलोचना की गई.
फिर भी, भारत के लिए एनपीपी के मूल विचारों से लाभ उठाना एक वैश्विक दृष्टिकोण का सवाल है. श्रीलंका की नई सरकार रुख़ साम्राज्यवादी विचारधारा के विरोध का है. हालांकि लंबे समय से ये श्रीलंका की विदेश नीति का एक स्तंभ रहा है, लेकिन एनपीपी शासन के तहत इसके और अधिक स्पष्ट होने की संभावना है. हाल के वर्षों में साम्राज्यवाद का विरोध अक्सर एक बहु-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था की प्राथमिकता का पक्षधर रहा है. अब हर देश ये दिखाना चाहता है कि वो पश्चिम या यूरोपीय सांस्कृतिक विरासत वाले देशों के प्रभुत्व में नहीं है. भारत का जो मौजूदा वैश्विक दृष्टिकोण है, उसमें भी यही केंद्रीय विचार है.
एनपीपी सरकार और उसके जनाधार को भारत अपनी कोशिशों से आकर्षित कर सकता है. भारत को सिर्फ ये संदेश देना है कि वो एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को तेज़ करने की दिशा में काम कर रहा है. इन प्रयासों में सैन्य कार्रवाइयों से लेकर ग़ाज़ा और यूक्रेन जैसे प्रमुख वैश्विक संघर्षों पर अपनी स्थिति स्पष्ट रखना, संयुक्त राष्ट्र में मतदान और कूटनीतिक बयानबाजी शामिल हैं. एक और महत्वपूर्ण कदम ये होगा कि श्रीलंका के साथ चीन के संबंधों के प्रति भारत क्या दृष्टिकोण रखता है. अगर भारत के अब तक के रुख़ को देखें तो श्रीलंका में चीन के प्रभाव और बढ़ती साझेदारी को लेकर भारत का स्टैंड समायोजित करने वाला रहा है. भारत ने कभी श्रीलंका को प्रोत्साहन दिया तो कभी उसके प्रति कठोर नीतियां अपनाने को भी मज़बूर किया है. इसका एक उदाहरण तब दिखा भारत ने श्रीलंका के समुद्री शेल्फ के विस्तार का विरोध किया. भारत ने ये स्पष्ट कर दिया कि वो इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों को लेकर चिंतित है. इतना ही नहीं भारत द्वारा सुरक्षा चिंता जताए जाने के बाद श्रीलंका ने जाफना द्वीपों में हाइब्रिड रिन्यूएबल पावर प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया. गोतबाया राजपक्षे के राष्ट्रपति रहने के दौरान प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के बाद इस परियोजना का काम एक चीनी कंपनी को मिला था. राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे के शासन के तहत ये परियोजना अनुदान के तहत भारत को सौंपी गई.
चीन के साथ श्रीलंका की भागीदारी को लेकर अगर भारत समायोजन वाला दृष्टिकोण अपनाएगा तो इससे दोनों देशों यानी चीन-भारत के बीच भी विश्वास पैदा होगा.
हाल के वर्षों में भारत ने रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों का मज़बूती से किया. भारत और चीन ने मेल-मिलाप का काम शुरू किया, जिसमें रूस मध्यस्थ के रूप में था. चीन के साथ श्रीलंका की भागीदारी को लेकर अगर भारत समायोजन वाला दृष्टिकोण अपनाएगा तो इससे दोनों देशों यानी चीन-भारत के बीच भी विश्वास पैदा होगा. बहु-ध्रुवीयता को लेकर भारत की की प्राथमिकता का लाभ तभी होगा, जब वो अमेरिका की दादागिरी वाली कार्रवाइयों का समर्थन करने से बचें, जैसे कि श्रीलंका के साथ चीन की भागीदारी को चुनौती देने से. भारत अगर ख़ुद को पड़ोस के ख़तरों के प्रति ही केंद्रित रखेगा तो उसकी छवि एक क्षेत्रीय शक्ति की ही रहेगी. इसके विपरीत अगर वो थोड़ा उदार दृष्टिकोण अपनाता है तो इससे भारत की पहचान एक वैश्विक शक्ति के रूप में बनने में मदद मिलेगी. इससे श्रीलंका के लोगों के बीच भी भारत की छवि सुधरेगी. भारत की ही तरह श्रीलंका की जनता भी ये नहीं चाहती कि कोई दूसरा देश उन्हें ये बताए कि वो किसके साथ संबंध रखें और किसके साथ नहीं. इसके अलावा श्रीलंका की बहुसंख्यक सिंहली जनसंख्या के मन में अभी भी चीन को लेकर समर्थन है. सिंहली लोगों को ये बात याद है कि चीन द्वारा की गई हथियारों की मदद ने श्रीलंका में लंबे समय से चले आ रहे गृहयुद्ध को ख़त्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
अगर भारत ये साबित कर सके कि वो इसके लिए काम कर रहा है तो ये भारत को एनपीपी और श्रीलंका की जनता के बीच लोकप्रिय बना सकता है.
निष्कर्ष
श्रीलंका को दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया के सबसे आशाजनक देश के रूप में देखा जाता था. यहां तक कि गृहयुद्ध से पहले भी श्रीलंका की छवि काफ़ी सकारात्मक थी. अगर दिसानायके इन तीन महत्वपूर्ण स्तंभों- सुरक्षा और समृद्धि के राष्ट्रीय हित, पार्टी के आधारभूत मूल्यों और जनता की इच्छा- के बीच सही तरीके से संतुलन बना सके तो वो श्रीलंका के लोगों के लिए अपने वादों को पूरा कर सकते हैं. भारत के लिए भी ये ज़रूरी है कि अगर वो श्रीलंका के साथ बेहतर संबंध चाहता है तो उसे एनपीपी की समाजवादी जड़ों को समझना और उनका सम्मान करना होगा. श्रीलंका की जनता एक बहु-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था के पक्ष में है. अगर भारत ये साबित कर सके कि वो इसके लिए काम कर रहा है तो ये भारत को एनपीपी और श्रीलंका की जनता के बीच लोकप्रिय बना सकता है. ऐसा होने पर श्रीलंका भी भारत की वैश्विक शक्ति बनने की महत्वाकांक्षा को आगे बढ़ाने में मदद करेगा. एक अधिक न्यायपूर्ण, बहु-ध्रुवीय विश्व के भारत के लक्ष्य का समर्थन करेगा.
कदिरा पेथियागोडा जियो पॉलिटिकल एक्सपर्ट, पूर्व राजनीतिक सलाहकार और राजनयिक हैं.
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