भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी (AEP) के इस साल दस वर्ष पूरे हो रहे हैं. इससे पहले भारत में लुक ईस्ट पॉलिसी थी, लेकिन वर्ष 2014 में सरकार में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसकी जगह पर एक्ट ईस्ट पॉलिसी का ऐलान किया था. ज़ाहिर है कि 13 नवंबर 2014 को भारत के प्रधानमंत्री ने म्यांमार के नेपिडॉओ में आयोजित 9वीं ईस्ट एशिया समिट के दौरान एक्ट ईस्ट पॉलिसी की घोषणा की थी. एक्ट ईस्ट पॉलिसी के ऐलान ने न केवल दक्षिण पूर्व एशिया को लेकर भारत के नज़रिए में नया परिवर्तन लाने का काम किया, बल्कि इसने भू-राजनीतिक लिहाज़ से साउथ-ईस्ट एशिया के महत्व में भी इज़ाफा किया. पिछले दस वर्षों के दौरान भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी ने सिर्फ़ दक्षिण पूर्व एशिया में ही भारत के महत्व को नहीं बढ़ाया है, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र के दूसरे देशों के साथ भी भारत के रिश्तों को मज़बूत करने का काम किया है और कहीं न कहीं इस दिशा में एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 10 और 11 अक्टूबर को दो दिवसीय लाओस की यात्रा पर गए थे, जहां उन्होंने 21वें ASEAN-इंडिया समिति एवं 19वें पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (EAS) में हिस्सा लिया था. इस सबके मद्देनज़र एक्ट ईस्ट पॉलिसी को लेकर भारत द्वारा उठाए गए क़दमों एवं इसके प्रभाव का मूल्यांकन करना आज बेहद अहम हो जाता है.
पिछले दस वर्षों के दौरान भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी ने सिर्फ़ दक्षिण पूर्व एशिया में ही भारत के महत्व को नहीं बढ़ाया है, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र के दूसरे देशों के साथ भी भारत के रिश्तों को मज़बूत करने का काम किया है और कहीं न कहीं इस दिशा में एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाई है.
भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी का एक सबसे अहम पहलू हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लेकर भारत एवं दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन यानी आसियान (ASEAN) के राजनीतिक दृष्टिकोण का रणनीतिक मेलजोल है, यानी उनके नज़रिए में लचीलापन, पारस्परिक निर्भरता और कुछ नया करने का इरादा है. इतना ही नहीं भारत की इस नीति में ASEAN को प्रमुखता देने, आसियान की एकजुटता एवं आसियान आउटलुक ऑन द इंडो-पैसिफिक (AOIP) यानी इंडो-पैसिफिक को लेकर ASEAN के दृष्टिकोण के प्रति भारत के संकल्प को ज़ाहिर किया गया है. भारत और आसियान के बीच इस बढ़ते तालमेल एवं आपसी समझ ने देखा जाए तो दोनों के बीच व्यापक स्तर पर रणनीतिक साझेदारी को भी मज़बूती प्रदान की है. इसी के चलते दोनों के बीच राजनेताओं के उच्च स्तरीय दौरों में बढ़ोतरी हुई है, जैसा कि चित्र-1 में दिखाया गया है. ये उच्च स्तरीय आधिकारिक यात्राएं स्पष्ट तौर पर बताती हैं कि इस क्षेत्र के साथ भारत के रिश्तों में प्रगाढ़ता आई है. कुछ इसी प्रकार का रुझान आसियान की ओर से भी देखने को मिलता है. व्यापार से लेकर कनेक्टिविटी और डिफेंस से लेकर सुरक्षा तक तमाम मसलों पर आसियान देश भी भारत के रुख के साथ क़दमताल करते हुए दिखाई देते हैं. भारत और ASEAN की यह साझेदारी साफ तौर पर बताती है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र अंतर्राष्ट्रीय नियम-क़ानूनों पर आधारित वैश्विक व्यवस्था को बरक़रार रखने में अपना योगदान देता रहेगा, साथ ही भविष्य में होने वाले वैश्विक आर्थिक विकास की अगुवाई करेगा.
चित्र 1 : वर्ष 2014 से अब तक उच्च स्तरीय आधिकारिक दौरे
उच्च स्तरीय आधिकारिक यात्राएं
|
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे
|
कुल
|
अवधि
|
2014-2019
|
2019-2024
|
2024 से अब तक
|
फिलीपींस
|
12वीं ईस्ट एशिया समिट 2017
|
राजनयिक संबंधों की 70वीं वर्षगांठ मनाने के लिए राष्ट्रपति की यात्रा 2019
|
|
2
|
सिंगापुर
|
द्विपक्षीय दौरा 2015,
13वीं ईस्ट एशिया समिट 2018
|
|
द्विपक्षीय दौरा 2024
|
3
|
थाईलैंड
|
|
14वीं ईस्ट एशिया समिट 2019
|
|
1
|
लाओ पीडीआर
|
उपराष्ट्रपति का राजकीय दौरा 2015, 11वीं EAS 2016
|
|
21 वां भारत-आसियान शिखर सम्मेलन एवं 19वीं ईस्ट एशिया समिट
|
3
|
मलेशिया
|
10वीं ईस्ट एशिया समिट एवं द्विपक्षीय दौरा 2015, द्विपक्षीय दौरा 2018
|
|
|
2
|
वियतनाम
|
द्विपक्षीय यात्रा 2016, राष्ट्रपति का आधिकारिक दौरा 2016, उपराष्ट्रपति की आधिकारिक यात्रा 2019
|
वर्चुअल द्विपक्षीय सम्मेलन 2020, 15वीं ईस्ट एशिया समिट 2020 (विदेश मंत्री द्वारा अध्यक्षता की गई)
|
|
5
|
म्यांमार
|
12वां इंडिया-आसियान शिखर सम्मेलन 2014, द्विपक्षीय दौरा 2017
|
|
|
2
|
कंबोडिया
|
|
19 वें भारत-आसियान शिखर सम्मेलन के लिए उपराष्ट्रपति का दौरा और 17वीं ईस्ट एशिया समिट, वर्चुअल द्विपक्षीय बैठक 2022
|
|
2
|
ब्रुनेई
|
उपराष्ट्रपति का आधिकारिक दौरा 2016
|
16वां पूर्वी एशिया सम्मेलन 2021
|
द्विपक्षीय दौरा 2024
|
3
|
इंडोनेशिया
|
द्विपक्षीय दौरा 2018
|
G20 शिखर सम्मेलन 2022, 20वीं इंडिया-आसियान समिट
|
|
3
|
कुल यात्राएं
|
14
|
9
|
3
|
26
|
स्रोत: लेखक द्वारा संकलित
* उच्च स्तरीय अधिकारिक यात्राओं में केवल राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के दौरे शामिल हैं.
* इस सूची में आसियान सदस्य देशों के साथ आयोजित की गईं महत्वपूर्ण वर्चुअल समिट्स भी शामिल हैं.
कूटनीतिक, रक्षा एवं सुरक्षा सहयोग
भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी के अगर सबसे अहम योगदान की चर्चा की जाए तो, निसंदेह तौर पर इसने जहां भारत की कूटनीति को धार देने का काम किया है, वहीं भारत के भू-रणनीतिक दबदबे को भी बढ़ाया है. वहीं दूसरी तरफ अगर लुक ईस्ट पॉलिसी की बात की जाए, तो इसका प्रमुख फोकस केवल आर्थिक सहयोग मज़बूत करने पर था, जबकि एक्ट ईस्ट पॉलिसी का प्रमुख फोकस रणनीतिक लिहाज़ से भारत को आगे बढ़ाना है और ख़ास तौर पर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सामरिक लिहाज़ से भारत की स्थिति को मज़बूत करना है. ज़ाहिर है कि भारत द्वारा एक्ट ईस्ट पॉलिसी को इतनी तवज्जो देने के पीछे कहीं न कहीं इंडो-पैसिफिक रीजन का बढ़ता भू-राजनीतिक महत्व तो था ही, साथ ही साथ इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते दख़ल के बाद पैदा हुई नई-नई चुनौतियों एवं अस्थिर माहौल से भी निपटना था. हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा एक बहुत बड़ा मसला रहा है और इसी मुद्दे ने भारत को इस क्षेत्र में अपनी सक्रियता बढ़ाने के लिए विवश किया है. ऐसा करके ही भारत इस इंडो-पैसिफिक रीजन में निर्बाध समुद्री आवाजाही, समुद्री मार्गों के ज़रिए होने वाली अवैध गतिविधियों पर निगरानी रखने और समुद्री डकैती जैसे गैर-पारंपरिक सुरक्षा ख़तरों से निपटने में सक्षम हो सकता है. भारत के इस दृष्टिकोण ने उसे न केवल इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था में एक भरोसेमंद भागीदार बनाने का काम किया है, बल्कि भारत को क्वाड व दूसरे बहुपक्षीय वैश्विक मंचों पर सशक्त सहभागी राष्ट्र के रूप में भी स्थापित किया है.
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा एक बहुत बड़ा मसला रहा है और इसी मुद्दे ने भारत को इस क्षेत्र में अपनी सक्रियता बढ़ाने के लिए विवश किया है.
अगर भारत की कूटनीति की बात करें, उसकी जड़ों में सबसे अहम चीज़ दूसरे देशों के साथ नीतिगत आधार पर तालमेल स्थापित करना और उसे सशक्त करना है. उदाहरण के तौर पर इंडो-पैसिफिक ओशन इनीशिएटिव (IPOI) एवं आसियान आउटलुक ऑन दि इंडो-पैसिफिक (AOIP) देखा जाए तो कई मामलों में एक दूसरे सहायक हैं. इसके अलावा, ईस्ट एशिया समिट (EAS), आसियान रीजनल फोरम (ARF) और ASEAN रक्षा मंत्रियों की बैठक (ADMM-प्लस) में भारत ने मज़बूती के साथ अपनी आवाज़ को बुलंद किया है. विभिन्न मंचों पर भारत द्वारा साफगोई के साथ अपनी बात रखने की वजह से कहीं न कहीं भारत की कूटनीति को भी मज़बूती मिली है. इस क्षेत्र के विभिन्न क्षेत्रीय संगठनों में इस सक्रिय भागीदारी की वजह से भारत दक्षिण पूर्व एशिया में तेज़ी से बदल रहे हालातों में अपनी अहम भूमिका स्थापित करने में सफल रहा है. वर्ष 2023 में पहले भारत-आसियान समुद्री अभ्यास और क्षेत्र में रणनीतिक साझेदार देशों के साथ डिफेंस डिप्लोमेसी यानी रक्षा कूटनीति को सशक्त करने के रूप में भारत द्वारा किए गए प्रयासों का नतीज़ा भी सभी के सामने है. इसके अलावा, समय के साथ-साथ जैसे-जैसे भारत की एक्ट ईस्ट नीति फली-फूली, तो इसका दायरा भी आसियान से कहीं आगे तक फैल गया. इतना ही नहीं, जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया के साथ मज़बूत होते रणनीतिक रिश्तों का भी भारत की हिंद-प्रशांत रणनीति को आकार में देने योगदान कम नहीं रहा है. एक्ट ईस्ट पॉलिसी के अंतर्गत जापान आज भारत के सबसे नज़दीकी साझीदार देशों में से एक बन चुका है. भारत और जापान के प्रगाढ़ होते द्विपक्षीय संबंधों में रक्षा सहयोग की भूमिका सबसे अहम बनकर उभरी है.
व्यापार एवं कनेक्टिविटी
जहां तक भारत और आसियान के बीच व्यापारिक रिश्तों की बात है, तो मौज़ूदा समय में भारत आसियान का सातवां सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है, जबकि ASEAN भारत का चौथा सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है. गौरतलब है कि व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर के बाद से भारत और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के बीच व्यापार में संतोषजनक वृद्धि दर्ज़ की गई है. भारत और साउथ ईस्ट एशिया के बीच वर्ष 2002 में जो व्यापार महज 9 बिलियन अमेरिकी डॉलर का था, वो वित्तीय वर्ष 2023 में बढ़कर 122 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया. इतना ही नहीं, उम्मीद है कि वर्ष 2024 के आख़िर तक दोनों के बीच व्यापार 150 बिलियन अमेरिकी डॉलर के आंकड़े को भी पार कर जाएगा. (जैसा कि चित्र 2 में दर्शाया गया है) भारत की तमाम निजी सेक्टर की कंपनियों, जैसे कि जिंदल स्टील, टीवीएस मोटर और ब्लूबर्ड सोलर आदि ने आसियान के तेज़ी से आगे बढ़ते बाज़ारों में ख़ासतौर पर दिलचस्पी दिखाई है और वहां रिन्यूएबल एनर्जी, मोबिलिटी स्टार्टअप, खनन एवं फार्मास्यूटिकल्स जैसे सेक्टरों में निवेश किया है. हालांकि, भारत और आसियान के बीच व्यापार असंतुलन एक बड़ा मुद्दा बन कर सामने आया है. आसियान के साथ भारत का व्यापार घाटा वर्ष 2011 में 7.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर था, जो कि वर्ष 2023 में बढ़कर 44 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया. गौरतलब है कि वर्ष 2025 तक आसियान-भारत वस्तु व्यापार समझौते (AITIGA) की समीक्षा की जानी है और उम्मीद है कि इसके बाद भारत और ASEAN के बीच द्विपक्षीय व्यापार में और अधिक बढ़ोतरी होगी, साथ ही व्यापार में विविधता भी आएगी. ऐसा भारत और आसियान दोनों के लिहाज़ से लाभदायक सिद्ध होगा.
भारत की तमाम निजी सेक्टर की कंपनियों, जैसे कि जिंदल स्टील, टीवीएस मोटर और ब्लूबर्ड सोलर आदि ने आसियान के तेज़ी से आगे बढ़ते बाज़ारों में ख़ासतौर पर दिलचस्पी दिखाई है और वहां रिन्यूएबल एनर्जी, मोबिलिटी स्टार्टअप, खनन एवं फार्मास्यूटिकल्स जैसे सेक्टरों में निवेश किया है.
चित्र 2: भारत-ASEAN व्यापार के आंकड़े (बिलियन अमेरिकी डॉलर में)
आसियान के साथ भारत का व्यापार
|
2016-17
|
2017-18
|
2018-19
|
2019-20
|
2020-21
|
2021-22
|
2022-23
|
निर्यात
|
30.96
|
34.20
|
37.47
|
31.55
|
31.49
|
42.32
|
44.00
|
% वृद्धि
|
23.19
|
10.47
|
9.56
|
-15.82
|
-0.19
|
34.43
|
3.95
|
आयात
|
40.62
|
47.13
|
59.32
|
55.37
|
47.42
|
68.08
|
87.57
|
% वृद्धि
|
1.77
|
16.04
|
25.86
|
-6.66
|
-14.36
|
43.57
|
28.64
|
कुल
|
71.58
|
81.34
|
96.80
|
86.92
|
78.90
|
110.4
|
131.57
|
व्यापार घाटा
|
-9.66
|
-12.93
|
-21.85
|
-23.82
|
-15.93
|
-25.76
|
–43.57
|
स्रोत: वाणिज्य विभाग
भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी में मज़बूत कनेक्टिविटी की स्थापना भी एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू है. ज़ाहिर है कि आर्थिक एवं व्यापारिक संभावनाओं का भरपूर उपयोग करने के लिए कनेक्टिविटी की भूमिका बहुत अहम होती है. भारत और ASEAN के बीच इंफ्रास्ट्रक्चर एवं डिजिटल कनेक्टिविटी से जुड़ी तमाम परियोजनाओं पर काम चल रहा है. भारत और आसियान के बीच कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने के लिए दो प्रमुख परियोजनाओं पर कार्य चल रहा है. ये परियोजनाएं हैं- भारत-म्यांमार-थाईलैंड ट्रिलैटरल हाइवे प्रोजेक्ट और कलादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट (KMMTT) परियोजना ( समुद्री मार्ग एवं सड़क मार्ग). इनमें से भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग परियोजना पर तेज़ गति से कार्य किया जा रहा है, जबकि दूसरी परियोजना का उद्घाटन 9 मई 2023 को किया गया था और वर्तमान में इस पर भी काम चल रहा है. इसके अलावा, तकनीक़ी रिश्ते भी भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी का अहम हिस्सा बन चुके हैं. ASEAN में शामिल सिंगापुर व मलेशिया जैसे दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के साथ भारत के बहुत ही प्रगाढ़ तकनीक़ी संबंध हैं. हाल ही में जब भारत के प्रधानमंत्री ने सिंगापुर का दौरा किया था, तब इन तकनीक़ी रिश्तों को और मज़बूती मिली. सिंगापुर में प्रधानमंत्री मोदी के दौरे के वक़्त दोनों देशों के बीच सेमीकंडक्टर निर्माण को लेकर समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए थे. ज़ाहिर है कि सेमीकंडक्टर उद्योग को अगली औद्योगिक क्रांति के लिए बहुत अहम माना जाता है. इसके अतिरिक्त, भारतीय तकनीक़ी और आर्थिक सहयोग (ITEC) कार्यक्रम के माध्यम से भारत आसियान के कई दूसरे सदस्यों, जैसे कि कंबोडिया, लाओस और वियतनाम जैसे दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के साथ क्षमता निर्माण में भी जुटा हुआ है. इन देशों के भारत के द्विपक्षीय संबंधों में डिजिटल कनेक्टिविटी बेहद अहम है. डिजिटल कनेक्टिविटी में दोनों पक्ष वाणिज्य और कई दूसरे क्षेत्रों में परस्पर सहयोग को मज़बूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. इनमें डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) और डिजिटल भविष्य के लिए भारत-ASEAN फंड जैसे सहयोगी क़दम शामिल हैं.
सांस्कृतिक जुड़ाव
भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी में क्षेत्र के विभिन्न देशों के साथ सांस्कृतिक रिश्तों को मज़बूती देना भी शामिल है. इस नीति का यह पहलू दक्षिण पूर्व एशिया के साथ भारत के संबंधों को सशक्त करने में अहम भूमिका निभा रहा है, क्योंकि दोनों ही ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों की विरासत को साझा करते हैं. सांस्कृतिक संबंधों को प्रगाढ़ करने की दिशा में उठाए गए प्रमुख क़दमों में भगवान बुद्ध से जुड़ी विरासतों को बढ़ावा देना शामिल है. इसी के तहत नालंदा विश्वविद्यालय और इंटरनेशनल बुद्धिस्ट कन्फेडरेशन का कायाकल्प करने जैसी परियोजनाओं पर काम किया जा रहा है. भारत द्वारा उठाए गए ये क़दम कहीं न कहीं म्यांमार, थाईलैंड और कंबोडिया जैसे देशों के साथ आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक संबंधों को सशक्त करने का काम कर रहे हैं. इसके साथ ही, भारत के इन क़दमों से यह भी प्रतीत होता है कि वह बौद्ध सर्किटों के पुनरुद्धार में सक्रियता से जुटा हुआ है. एक्ट ईस्ट पॉलिसी का एक और अहम पहलू शैक्षिक व सांस्कृतिक आदान-प्रदान है. इसके अंतर्गत भारत द्वारा ASEAN के छात्र-छात्राओं को स्कॉलरशिप दी जाती है. इसके अलावा, ASEAN -इंडिया सांस्कृतिक केंद्र के तहत आसियान सामाजिक-सांस्कृतिक कम्युनिटी की स्थापना की गई है. इतना ही नहीं, मलेशिया और सिंगापुर जैसे देशों में रहने वाले भारतीय प्रवासी देखा जाए तो सांस्कृतिक सेतु का कार्य करते हैं और इससे भी इन देशों के साथ भारत के द्विपक्षीय रिश्ते परवान चढ़ रहे हैं. इसके अलावा, ASEAN के साथ सांस्कृतिक संबंधों को सशक्त करने में योगा डिप्लोमेसी ने भी अहम भूमिका निभाई है. दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस ज़ोर-शोर के साथ मनाया जाता है, इससे भी इन देशों में भारत की सांस्कृतिक पहुंच में काफ़ी विस्तार हुआ है. कुल मिलाकर भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी का जो सांस्कृतिक पहलू है, वो इस नीति के तहत आगे बढ़ाई जा रही रणनीतिक एवं आर्थिक पहलों के साथ निकटता से जुड़ा हुआ है. कहने का मतलब है कि सांस्कृतिक संबंधों के प्रगाढ़ होने से जहां दक्षिण पूर्व एशिया के साथ भारत की पारस्परिक समझबूझ बेहतर हुई है, वहीं इससे कूटनीतिक कोशिशों को भी गति मिली है.
भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र के मध्यम दर्ज़े के देशों, जैसे कि दक्षिण कोरिया, वियतनाम एवं न्यूजीलैंड के साथ भी अपने संबंधों को और सशक्त करना चाहिए, साथ ही इन देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी के क्षेत्रों का विस्तार करने की दिशा में भी गंभीरता से प्रयास करना चाहिए.
निष्कर्ष
भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी के दस वर्ष पूरे हो रहे हैं और इस दौरान दक्षिण पूर्व एशिया के देशों के साथ भारत के व्यापारिक, तकनीक़ी, रक्षा एवं सुरक्षा संबंधों के साथ ही कनेक्टिविटी में ज़बरदस्त परिवर्तन देखने को मिला है. इससे देखा जाए तो दक्षिण-पूर्व एशियाई रीजन के साथ भारत की व्यापक रणनीतिक साझेदारी को भी नए आयाम हासिल हुए हैं. जिस प्रकार से दक्षिण-पूर्व एशिया में जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों का प्रकोप बढ़ता जा रहा है और गैर-पारंपरिक सुरक्षा ख़तरों में भी बढ़ोतरी हो रही है, उससे निसंदेह तौर पर आने वाले दिनों में क्षेत्रीय आपदा प्रबंधन, जलवायु कूटनीति और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में भारत की भूमिका में इज़ाफा होगा. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2023 में आसियान नेताओं के साथ विचार-विमर्श के दौरान अपने 12-सूत्री प्रस्ताव में दक्षिण पूर्व एशियाई रीजन के साथ सहयोग के अगले चरण के लिए एक नया ब्लूप्रिंट प्रस्तुत किया था. इस ब्लूप्रिंट में ASEAN के साथ रिश्तों को और सशक्त करने एवं पारस्परिक सहयोग का दायरा बढ़ाकर उसे नए क्षेत्रों में विस्तारित करने पर विशेष ज़ोर दिया गया था. भारत खाद्य सुरक्षा एवं जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए भी आसियान के साथ काम कर रहा है और ग्लोबल साउथ समिट में भारत की भागीदारी से स्पष्ट हो जाता है कि वह इसको लेकर काफ़ी गंभीर है. इसके अलावा, भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र के मध्यम दर्ज़े के देशों, जैसे कि दक्षिण कोरिया, वियतनाम एवं न्यूजीलैंड के साथ भी अपने संबंधों को और सशक्त करना चाहिए, साथ ही इन देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी के क्षेत्रों का विस्तार करने की दिशा में भी गंभीरता से प्रयास करना चाहिए.
अभिषेक शर्मा ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च असिस्टेंट हैं.
प्रत्नाश्री बसु ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रैटेजिक स्डटीज़ प्रोग्राम में एसोसिएट फेलो हैं.
The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.