बाइडेन प्रशासन ने हाल ही में यूक्रेन को दी जा रही दीर्घकालिक सुरक्षा गारंटी को आगे बढ़ाने ऐलान किया है. इटली में आयोजित जी7 बैठक के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के साथ द्विपक्षीय सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. इस समझौते में युद्धग्रस्त यूक्रेन में अगले 10 वर्षों तक सुरक्षा सहयोग जारी रखने का वादा किया गया है. इस समझौते में न सिर्फ़ मौज़ूद वक़्त में यूक्रेन को दी जाने वाली रक्षा मदद से संबंधित योजनाएं शामिल हैं, बल्कि भविष्य में भी उसे दी जाने वाली रक्षा सहायता का भी उल्लेख किया गया है. इस समझौते के मुताबिक़ एक ऐसी सेना का गठन किया जाएगा जो रूस का सामना करने में सक्षम होगी. यानी इस समझौते के बाद यूक्रेन को एक ऐसा सैन्य बल मिलेगा, जिसका गठन पश्चिमी देशों के मापदंडों के मुताबिक़ होगा. इस प्रकार से नाटो में कीव की सदस्यता से संबंधित मुद्दे को भी दरकिनार किया जा सकेगा.
ज़ाहिर है कि अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं और नवंबर में डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति बन सकते हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर ट्रंप के विचार कुछ अलग हैं. ट्रंप ने यूक्रेन में चल रहे युद्ध को एक दिन में ही समाप्त करने का वादा किया है. ऐसे में ट्रंप की जीत से दुनिया को लेकर अमेरिका की नीति में भले ही कोई बदलाव नहीं आए, लेकिन यूरोप को लेकर अमेरिकी नीति में व्यापक परिवर्तन ज़रूर आ सकता है.
रॉयटर्स की एक ख़बर के मुताबिक़ डोनाल्ड ट्रंप के दो सलाहकारों ने यूक्रेन पर एक योजना बनाई है और वे इसी योजना को अमल में लाने की सोच रहे हैं. बताया जा रहा है कि अगर इस रणनीति को लागू किया जाता है, तो यूक्रेन हर हाल में शांति प्रक्रिया में शामिल होने के लिए विवश होगा. ख़बर के अनुसार अगर ट्रंप के रणनीति के मुताबिक़ रूस के साथ शांति स्थापित करने की क़वायद में यूक्रेन शामिल नहीं होता है, तो अमेरिका उसे हथियारों की आपूर्ति रोकने की धमकी देगा. इसके अलावा इस रणनीति के तहत अमेरिका द्वारा कीव को समर्थन बढ़ाने का दिखावा किया जाएगा और इस प्रकार से मास्को पर भी दबाव बनाया जाएगा, ताकि वो शांति वार्ता में सकारात्मक रूप से हिस्सा ले और कोई आनाकानी न करे.
ट्रंप की इस रणनीति में रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध विराम शामिल है और यह युद्ध विराम यथास्थिति बनाए रखते हुए होगा. इस योजना को तैयार करने वाले इस बात को लेकर निश्चित नहीं हैं कि यूक्रेन को रूस के कब्जे वाले इलाकों को छोड़ने के लिए मज़बूर किया जाएगा या नहीं. हालांकि, अगर दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम हो जाता है, तो 2024 में जब कभी भी लड़ाई थमेगी, तब जो भी ज़मीनी हालात होंगे, यानी जिस देश का कब्जा जिस इलाक़े में होगा, उसे उसी देश की हिस्सा माना जाएगा. अगर ऐसा होता है, तो यूक्रेन के पूर्व और दक्षिण में मौज़ूद बड़े इलाक़े रूस के पास चले जाएंगे, क्योंकि इन इलाक़ो पर फिलहाल रूसी सेना का कब्ज़ा है.
इस समझौते के बाद यूक्रेन को एक ऐसा सैन्य बल मिलेगा, जिसका गठन पश्चिमी देशों के मापदंडों के मुताबिक़ होगा. इस प्रकार से नाटो में कीव की सदस्यता से संबंधित मुद्दे को भी दरकिनार किया जा सकेगा.
ज़ाहिर है कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने जून के मध्य में कहा था कि अगर यूक्रेन नाटो की सदस्यता हासिल करने के अपने इरादे को छोड़ देता है, साथ ही रूसी कब्ज़े वाले पूर्वी और दक्षिणी क्षेत्रों में स्थित चारों प्रदेशों को रूस को दे देता है, तो वो यूक्रेन के ख़िलाफ़ युद्ध को समाप्त कर देंगे.
वहीं, दूसरी तरफ राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने बार-बार इस बात को दोहराया है कि जब तक मास्को यूक्रेन के क्रीमिया प्रांत समेत कब्ज़े वाले सभी क्षेत्रों से अपनी दावेदारी नहीं छोड़ता है, तब तक रूस के साथ कोई बातचीत नहीं की जाएगी.
डोनाल्ड ट्रंप ने जून में अपने चुनाव प्रचार अभियान के दौरान एक जनसभा में यूक्रेन को दी जाने वाली अमेरिकी मदद पर सवाल उठाते हुए व्यापक पैमाने पर की जा रही सहायता को लेकर बाइडेन प्रशासन पर हमला बोला था. इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि नवंबर में अगर वे चुनाव जीतकर सत्ता में लौटते हैं, तो यूक्रेन युद्ध के मसले को चुटकियों में सुलझा देंगे. ट्रंप ने राष्ट्रपति जेलेंस्की पर भी निशाना साधा और अमेरिका द्वारा उन्हें दी गई 60 बिलियन अमेरिकी डॉलर की सहायता का उल्लेख करते हुए उन्हें "बेहद चालाक किस्म का सेल्समैन" करार दिया. ज़ाहिर है कि यूक्रेन को दी जाने वाली आर्थिक मदद का बहुत बड़ा हिस्सा ही जेलेंस्की द्वारा अमेरिका को गोला-बारूद और सैन्य साज़ो-सामान के उत्पादन के लिए फंड मुहैया कराने के लिए दिया जा रहा है. इतना ही नहीं कुछ दिनों पहले एक पॉडकास्ट इंटरव्यू के दौरान भी ट्रंप ने नाटो की सदस्यता को लेकर यूक्रेन के प्रयासों पर संदेह जताया था.
रूस और यूक्रेन के बीच वर्तमान में जिस प्रकार से लड़ाई चल रही है, उसके मद्देनज़र ट्रंप के सलाहकारों द्वारा जिस रणनीति का सुझाव दिया गया है, वो कहीं न कहीं रूस के सामने यूक्रेन द्वारा घुटने टेक देने जैसा होगा. ज़ाहिर है कि पिछले साल यानी 2023 में गर्मियों के दौरान यूक्रेन की ओर से रूस पर ज़बरदस्त जवाबी हमला किया गया था, लेकिन तब रूस ने उसका बखूबी मुक़ाबला किया था. लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि रूस की तरफ से यूक्रेन पर किया जा रहा आक्रमण भी दिशाहीन सा हो गया है, यानी उसका कोई ज़्यादा असर दिखाई नहीं दे रहा है.
रूस-यूक्रेन के बीच ज़मीनी युद्ध
मौज़ूदा लड़ाई में यूक्रेन का पूरा ध्यान अपने प्रमुख शहर खारकीव की रूसी हमलों से सुरक्षा करना है और यह सुनिश्चित करना है कि इस पर रूसी सेना का कब्ज़ा न हो पाए. रूसी सेना ने इस साल की शुरुआत में खारकीव पर हमला करने के मामले में बढ़त हासिल कर ली थी और उसके काफ़ी नज़दीक पहुंच गई थी. रूस द्वारा खारकीव पर एक बार फिर से हमले तेज़ किए गए हैं और ऐसे में यूक्रेन अपनी सेना को मज़बूत और एकजुट करने की कोशिश कर रहा है, ताकि रूसी हमलों का मुंहतोड़ जवाब दिया जा सके.
बाइडेन प्रशासन ने पिछले महीने के आख़िर में यूक्रेन को सिर्फ़ खारकीव शहर के इर्द-गिर्द मौज़ूद रूसी सेना के कुछ ठिकानों पर हमला करने के लिए अमेरिकी हथियारों के इस्तेमाल की मंजूरी दी थी. अमेरिका के इस क़दम का असर यह हुआ कि खारकीव पर होने वाले रूसी मिसाइल हमलों में ज़बरदस्त कमी आई है. मई के महीने में जहां रूस की तरफ से 25 मिसाइलें दागी गई थीं, वहीं जून में एक भी मिसाइल हमला नहीं हुआ है. ऐसा यूक्रेन द्वारा ज़मीन से हवा में निशाना साधने वाली रूस की S-300 और S-400 मिसाइलों को नष्ट करने या उनके नष्ट होने के डर से हुआ है. दरअसल, रूस को डर है कि अमेरिका द्वारा यूक्रेन को दी गई HIMARS और ATACMS जैसी हथियार प्रणालियों से उसकी मिसाइलों को भारी क्षति पहुंच सकती है.
अमेरिका ने यूक्रेन को सीमित क्षेत्रों में अमेरिकी हथियारों का उपयोग करने की अनुमति दी है, इस वजह से रूस की तरफ से किए जाने वाले हमलों पर बहुत ज़्यादा असर नहीं पड़ा है और वो यूक्रेन पर लगातार बमबारी कर रहा है. इतना ही नहीं, यूक्रेन पर आक्रमण के लिए रूस अपने घातक UMPK ग्लाइड बमों का इस्तेमाल कर रहा है. ज़ाहिर है कि रूस के इन हमलों से यूक्रेन की सेना और यूक्रेनी नागरिक व्यापक स्तर पर प्रभावित हो रहे हैं.
यूक्रेन पर आक्रमण के लिए रूस अपने घातक UMPK ग्लाइड बमों का इस्तेमाल कर रहा है. ज़ाहिर है कि रूस के इन हमलों से यूक्रेन की सेना और यूक्रेनी नागरिक व्यापक स्तर पर प्रभावित हो रहे हैं.
एक सच्चाई यह भी है कि रूस और यूक्रेन के बीच सीमाएं बहुत व्यापक हैं और अच्छी तरह से निर्धारित नहीं हैं. इसके चलते दोनों देशों द्वारा ही सीमाओं पर पुख्ता सुरक्षा इंतज़ाम नहीं किए जाते हैं. इस वजह से सीमा के पास स्थित किसी इलाक़े में हवाई हमला, तोपों से हमला और रॉकेट के ज़रिए हमला होने की संभावना बनी रहती है. एक बात यह भी है रूस-यूक्रेन युद्ध में ड्रोन का जमकर इस्तेमाल किया जा रहा है और दोनों देशों की सेनाओं की कोशिश होती है कि उनके सैनिकों की गतिविधियों के बारे में ड्रोन को पता न चल पाए. इसके चलते दोनों सेनाएं अपने इलाक़ों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए खास रणनीति अपनाती हैं, जिसमें दुश्मन की निगाहों से बचते-बचाते सैनिकों को आगे बढ़ाया जाता है और उन्हें ड्रोन व तोपों का कवर दिया जाता है. इस तरह से सैनिकों की टुकड़ी कभी-कभी दूसरे देश की सीमा में 2 किलोमीटर तक अंदर घुस जाती है और ताबड़तोड़ हमलों को अंज़ाम देती है.
यूक्रेन को सहायता
यूक्रेन को 50 बिलियन अमेरिकी डॉलर का कर्ज़ मिलने का रास्ता भी साफ हो गया है. यूक्रेन को यह कर्ज़ रूस की ज़ब्त की गई संपत्तियों के ब्याज से मिलेगा. ज़ाहिर है कि यह राशि अप्रैल में अमेरिका द्वारा मंजूर की गई 61 बिलियन अमेरिकी डॉलर की सहायता के अतिरिक्त है और इससे यूक्रेन को अपनी सैन्य ताक़त बढ़ाने, गोला-बारूद और दूसरे सैन्य साज़ो-सामान जुटाने में सहायता मिलेगी
इसके अलावा, अमेरिका एवं यूरोपीय देशों द्वारा गोला-बारूद एवं सैन्य उपकरणों के उत्पादन में तेज़ी लाई गई है. इन देशों की इस क़वायद का मकसद अपने आयुध भण्डार की पूर्ति करने के साथ-साथ यूक्रेन की सैन्य मदद करना है. यूरोपियन यूनियन के एक प्रवक्ता के मुताबिक़ यूरोपीय देशों द्वारा मार्च 2023 में एक साल में 5,00,000 गोला-बारूद का उत्पादन किया गया था, जो कि जनवरी 2024 तक बढ़कर दस लाख तक पहुंच गया था. उन्होंने आगे बताया कि हमारी योजना अब 2024 के अंत तक गोला-बारूद का उत्पादन बढ़ाकर 1.4 मिलियन और 2025 तक 2 मिलियन तक करने का है.
अगर अमेरिका की बात की जाए, तो यूक्रेन के लिए 60 बिलियन अमेरिकी डॉलर के सहायता पैकेज का प्रस्ताव पास होने के बाद से ही उसने हथियारों एवं गोला-बारूद का उत्पादन बढ़ा दिया है. बताया जा रहा है कि अमेरिका की योजना हर महीने होने वाले 155 मिमी गोलों के उत्पादन को वर्ष 2025 तक तीन गुना बढ़ाकर 1.2 मिलियन तक पहुंचाना है.
इतना ही नहीं, यूरोपीय राष्ट्र अपनी तरफ से यूक्रेन के लिए गोला-बारूद जुटाने की भी कोशिश कर रहे हैं. इसी साल फरवरी में चेक रिपब्लिक ने युद्धरत यूक्रेन की मदद के लिए दुनिया के अलग-अलग देशों से एक मिलियन तोप के गोले ख़रीदे थे. चेक गणराज्य द्वारा ख़रीदे गए इन गोलों में से 1,80,000 गोलों की आपूर्ति इसी महीने होने की उम्मीद है. इतना ही नहीं, यूक्रेन की मदद के लिए दिए जाने वाले बाक़ी गोलों की आपूर्ति के लिए समझौते पर भी हस्ताक्षर किए गए हैं.
रूस के साथ चल रही जंग में यूक्रेन द्वारा फिलहाल दुश्मन के ठिकानों पर रोज़ाना 2,000 गोले दागे जा रहे हैं, जबकि रूसी सेना द्वारा यूक्रेन के ऊपर इससे तीन गुना ज़्यादा गोले बरसाए जा रहे हैं. ख़बरों के मुताबिक़ हाल ही में उत्तर कोरिया द्वारा रूस को 10,000 शिपिंग कंटेनर भेजे गए हैं और कहा जा रहा है कि इन कंटेनरों में 5 मिलियन गोले हो सकते हैं. हैरानी की बात यह है कि सर्बिया जैसे देश, जिसे रूस का समर्थक माना जाता है, ने अपने देश में निर्मित लगभग 855 मिलियन अमेरिकी डॉलर का गोला-बारूद अमेरिका, स्पेन और चेक गणराज्य को उपलब्ध कराया है. बताया जा रहा है कि ये देश सर्बिया द्वारा प्रदान किए गए इस गोला-बारूद की आपूर्ति यूक्रेन को कर सकते हैं.
रूस और यूक्रेन के बीच जारी जंग में देखा जाए तो इलेक्ट्रॉनिक युद्धक (EW) प्रणाली में महारत रूस के लिए बहुत फायदेमंद साबित हो रही है. रूस के इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम ने कहीं न कहीं यूक्रेन के एयर डिफेंस को तहस-नहस कर दिया है. युद्ध में रूस की इस बढ़त की वजह से ही यूक्रेन को अपनी वायु रक्षा प्रणालियों को वापस लेने पर मज़बूर होना पड़ा. इस वजह से रूस बेरोकटोक तरीक़े से यूक्रेन पर गाइडेड बमों का हमला कर पाया और ज़ाहिर है कि इन गाइडेड बमों के आक्रमण ने यूक्रेन में व्यापक स्तर पर तबाही मचाई है.
हैरानी की बात यह है कि सर्बिया जैसे देश, जिसे रूस का समर्थक माना जाता है, ने अपने देश में निर्मित लगभग 855 मिलियन अमेरिकी डॉलर का गोला-बारूद अमेरिका, स्पेन और चेक गणराज्य को उपलब्ध कराया है.
इन सारे हालातों के बीच, सबसे अहम बात यह है कि आने वाले महीनों में यूक्रेन को अमेरिकी एफ-16 लड़ाकू विमान की आपूर्ति शुरू हो जाएगी. एफ-16 लड़ाकू विमान मिलने के बाद यूक्रेन अमेरिकी मिसाइलों और गाइडेड हथियारों के साथ रूस पर हमला करने में सक्षम हो जाएगा और कहीं न कहीं उसे रूस की इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर प्रणाली को भेदने में भी मदद मिलेगी. जब तक अमेरिका द्वारा यूक्रेन को एफ-16 लड़ाऊ विमानों की आपूर्ति नहीं की जाती है, तब तक यूक्रेन को हवाई सुरक्षा में मदद करने के लिए अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों को यूक्रेन के लिए पैट्रियट बैटरी की आपूर्ति करने हेतु राज़ी करने का फैसला किया है. इसके अलावा यह भी बताया गया है कि इस दौरान अपने सहयोगी राष्ट्रों को पैट्रियट मिसाइलों की आपूर्ति करने से पहले अमेरिका द्वारा यूक्रेन को इन मिसाइलों की आपूर्ति करने का भी निर्णय लिया गया है.
इसके अतिरिक्त, यूक्रेन के लिए एक अच्छी बात यह भी है कि नीदरलैंड के प्रधानमंत्री मार्क रूट नाटो के अगले महासचिव होंगे. नीदरलैंड के प्रधानमंत्री मार्क रूट की यूरोपीय संघ में काफ़ी प्रतिष्ठा है और उन्हें यूरोपियन यूनियन के भीतर यूक्रेन का एक मज़बूत समर्थक माना जाता है. मार्क रूट की अगुवाई में ही नीदरलैंड ने न केवल अपने रक्षा व्यय को 2 प्रतिशत की सीमा से ऊपर बढ़ा दिया है, बल्कि यूक्रेन को एफ-16 लड़ाकू विमान के साथ-साथ गोला-बारूद और ड्रोन उपलब्ध कराने का भी फैसला लिया है.
यूक्रेन की सैन्य क्षमता में इज़ाफा करने के लिए दूसरे यूरोपीय देश भी हाथ आगे बढ़ा रहे हैं. इसी क्रम में फ्रांस इस साल के अंत तक यूक्रेन के 26 पायलटों को प्रशिक्षित करेगा. ट्रेनिंग के दौरान इन यूक्रेनी पायलटों को ब्रिटेन, फ्रांस और रोमानिया में प्रशिक्षित किया जाएगा, साथ ही इस दौरान इन्हें मिराज-5 और एफ-16 लड़ाकू विमान उड़ाने का प्रशिक्षण दिया जाएगा.
यूक्रेन को परोक्ष रूप से दक्षिण कोरिया से भी सैन्य सहायता मिल रही है. हालांकि, दक्षिण कोरिया की नीति है कि वो किसी भी जंग लड़ रहे देश की मदद नहीं करता है, लेकिन वो भी अपनी नीति से परे जाकर यूक्रेन की मदद कर रहा है. दक्षिण कोरिया ने अमेरिका को 155 मिमी गोलों की आपूर्ति की है, ताकि वो आगे इन गोलों को यूक्रेन के लिए भेज सके. ऐसी भी संभावना जताई जा रही है कि जिस प्रकार से उत्तर कोरिया और रूस के बीच सैन्य समझौता हुआ है, ऐसे हालातों में दक्षिण कोरिया अपनी युद्धरत देशों को सैन्य मदद नहीं भेजने की नीति को भी बदल सकता है और कीव को सीधे हथियार एवं गोला-बारूद की आपूर्ति कर सकता है.
इस सबके अलावा तमाम यूरोपीय राष्ट्र अपनी सैन्य ताक़त को सशक्त करने की कोशिशों में भी जुटे हुए हैं. ज़ाहिर है कि अगर यूरोपीय देश सैन्य लिहाज़ से मज़बूत होंगे तो कहीं न कहीं प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इसका लाभ यूक्रेन को भी मिलेगा. इतना ही नहीं, नाटो के सदस्य देशों ने अपने रक्षा ख़र्च में भी बढ़ोतरी की है, इस वजह से ज़्यादातर नाटो देशों के रक्षा बजट का आंकड़ा दो प्रतिशत की सीमा के ऊपर चला गया है.

कूटनीतिक दांवपेच
इस सबके बावज़ूद, यूक्रेन की मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं और कहीं न कहीं वह तमाम तरह की चुनौतियों से घिरा हुआ है. यूक्रेन और उसके पश्चिमी सहयोगी देशों को भली-भांति मालुम है कि रूस का सामना करना इतना आसान नहीं है. रूस का मक़ाबला करने के लिए उन्हें न केवल व्यापक स्तर पर वित्तीय एवं सैन्य संसाधनों की आवश्कता होगी, बल्कि बड़ी संख्या में मानव संसाधन या कहा जाए सैनिकों की भी ज़रूरत पड़ेगी.
हालांकि, इस दौरान कुछ ऐसे घटनाक्रम हुए हैं, जिनसे यूक्रेन और उसके पश्चिमी सहयोगी देशों के प्रयासों को ताक़त मिलेगी. इन्हीं घटनाक्रमों में से एक यूक्रेन को यूरोपियन यूनियन की सदस्यता को लेकर शुरू हुई बातचीत है. हालांकि, यह निश्चित है कि यूक्रेन को ईयू की सदस्यता मिलने में वर्षों का समय लग सकता है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि इस दिशा में चर्चा की शुरुआत होने से राष्ट्रपति जेलेंस्की और यूक्रेन का आत्मविश्वास बढ़ा है. अगर यूक्रेन को नाटो की सदस्या मिलने के मुद्दे के बारे में बात की जाए, तो वो अभी दूर की कौड़ी दिख रही है.
गौरतलब है कि स्विट्जरलैंड में आयोजित इस यूक्रेन पीस समिट से ठीक पहले रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने अपनी ओर से एक शांति योजना पेश की थी.
इसी तरह का एक घटनाक्रम स्विट्जरलैंड में हाल ही में आयोजित हुई यूक्रेन पीस समिट थी. यह समिट भी यूक्रेन का मनोबल बढ़ाने वाली साबित हुई है. हालांकि, इस शांति शिखर सम्मेलन में रूस और चीन ने हिस्सा नहीं लिया था. इसी वजह से इस शांति शिखर सम्मेलन का कोई मुकम्मल नतीज़ा सामने नहीं आ पाया. लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि इस पीस समिट में दुनिया के लगभग 90 देशों के प्रतिनिधियों ने शिरकत की थी और ज़ाहिर तौर पर इतने देशों की मौज़ूदगी से कीव का हौसला बढ़ा है. हालांकि, इस शांति शिखर सम्मेलन के अंतिम प्रस्ताव की संयुक्त विज्ञप्ति पर सिर्फ़ 84 देशों ने ही हस्ताक्षर किए थे. सऊदी अरब, भारत और दक्षिण अफ्रीका ने इस संयुक्त विज्ञप्ति पर हस्ताक्षर नहीं करने का निर्णय लिया था. गौरतलब है कि स्विट्जरलैंड में आयोजित इस यूक्रेन पीस समिट से ठीक पहले रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने अपनी ओर से एक शांति योजना पेश की थी. पुतिन के इस शांति प्रस्ताव का जिक्र पहले किया जा चुका है कि किस प्रकार से यह यूक्रेन के लिए रूस को सामने हथियार डालने जैसा था. शांति शिखर सम्मेलन की चर्चा-परिचर्चा के दौरान पुतिन के इस शांति प्रस्ताव को कोई ख़ास तवज्जो नहीं मिली थी और बहुत ही कम देशों ने इसका समर्थन किया था.
निष्कर्ष
कुल मिलाकर वास्तविकता यह है कि यूक्रेन को हथियार, गोला-बारूद, सैन्य साज़ो सामान के साथ-साथ वित्तीय मदद की बहुत अधिक ज़रूरत है. हथियार और गोला-बारुद के मामले में यूक्रेन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए तो हर स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन बाक़ी मोर्चों पर यूक्रेन अभी भी सहायता की उम्मीद लगाए बैठा है. हालांकि, इन मोर्चों पर यूक्रेन की सहायता के लिए जो छोटे-छोटे प्रयास किए जा रहे हैं, वो उसकी दिक़्क़तों के सामने ऊंट के मुंह में जीरा जैसे प्रतीत हो रहे हैं. इतना ही नहीं, अमेरिका के सहयोगी देश और कुछ डेमोक्रेट सांसद चाहते हैं कि बाइडेन प्रशासन द्वारा यूक्रेन को दिए गए हथियारों के उपयोग को लेकर जो प्रतिबंध लगाए गए हैं, उन्हें हटा लिया जाए.
जिस प्रकार से यूक्रेन और रूस के बीच लंबे अर्से से चल रही जंग एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जिसका कोई ओर-छोर नज़र नहीं आ रहा है और जिस तरह से यूक्रेन को लेकर स्विट्जरलैंड में आयोजित शांति शिखर सम्मेलन में कोई नतीज़ा नहीं निकला है, उसके मद्देनज़र इसकी उम्मीद बहुत कम है कि 2024 में यह युद्ध थम जाएगा और यूक्रेन में शांति की बहाली होगी. रूस इस जंग को अपनी पूरी शक्ति के साथ लड़ रहा है और उसके पास लंबी अवधि तक इस लड़ाई को जारी रखने के लिए सभी संसाधन भी मौज़ूद है. दूसरी ओर, यूक्रेन युद्ध में बने रहने के लिए पूरी तरह से पश्चिमी देशों से मिलने वाली मदद पर निर्भर है और यह मदद भी उसे टुकड़ों में मिल रही है. हालांकि, हाल में जो घटनाक्रम हुए हैं उनसे लगने लगा है कि यूक्रेन को मिलने वाली सैन्य और आर्थिक सहायता में निरंतरता आ रही है और उसकी ज़रूरतें भी पूरी हो रही हैं.
हालांकि, नवंबर में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में अगर डोनाल्ड ट्रंप की जीत होती है, तो इस बात की प्रबल संभावना है कि सारी स्थितियां उलट-पुलट सकती हैं. यानी ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने से ऐसे हालात पैदा हो सकते हैं, जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी.
मनोज जोशी ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में डिस्टिंग्विश्ड फेलो हैं.
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