तालिबान ने तीन साल पहले अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर दोबारा कब्जा कर लिया था. इन तीन वर्षों में तालिबान भले ही देश पर व्यापक नियंत्रण स्थापित करने में सफल हो गया हो, लेकिन आम अफ़ग़ानों की स्थिति अब भी अस्थिर बनी हुई है. तालिबान 1.0 के दौरान तीन देशों यानी पाकिस्तान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने अफ़ग़ानिस्तान को आधिकारिक तौर पर मान्यता दी थी, लेकिन इस बार अभी तक किसी भी देश औपचारिक रूप से अफ़ग़ानिस्तान की वर्तमान तालिबानी सरकार को मान्यता नहीं दी है. हालांकि मौजूदा सरकार का कई देशों के साथ कूटनीतिक संपर्क बना हुआ है लेकिन अगर समग्र तौर पर देखें तो पूरा परिदृश्य ‘बीजान्टिन’ यानी काफ़ी जटिल लग रहा है. ऐसा इसलिए है क्योंकि तालिबान प्रशासन के साथ कूटनीतिक संपर्क होने के बावजूद कोई भी देश उसे औपचारिक मान्यता प्रदान करने और कूटनीतिक संबंध स्थापित करने को तैयार नहीं है.
अप्रत्यक्ष मान्यता : तालिबान का मामला क्या है?
अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का सत्ता में आना एक असाधारण चुनौतीपूर्ण मामले का प्रतिनिधित्व करता है. इसकी वजह ये है कि अफ़ग़ानिस्तान में संवैधानिक रूप से चुनी गई सरकार का संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा स्वीकृत समूह द्वारा तख्तापलट कर दिया है. इसने ताक़त और गैर-संवैधानिक साधनों के ज़रिए सत्ता हासिल की थी. इसलिए ऐसी सत्ता को अन्य देशों द्वारा वैध नहीं माना जाना चाहिए. फिर भी तालिबान के साथ बढ़ती राजनयिक भागीदारी "अंतर्निहित" मान्यता की अवधारणा को सामने लाती है. ये एक ऐसी स्थिति है जहां एक मान्यता प्राप्त देश कुछ कार्रवाई करता है, जैसे कि राजनयिक संबंध तैयार करना, लेकिन आधिकारिक तौर पर दूसरे देश को मान्यता नहीं देता है. इस प्रकार की मान्यता को "अंतर्निहित“ कहा जाता है. एक मान्यता प्राप्त देश दूसरे देश को अप्रत्यक्ष रूप से मान्यता देने से बचता है. अगर वो औपचारिक रूप से ये घोषणा करता है कि उसके किसी भी कार्य की व्याख्या मान्यता की घोषणा के रूप में नहीं की जानी चाहिए.
‘देश की मान्यता’ का अर्थ ये हुआ कि राष्ट्रों का अंतर्राष्ट्रीय समुदाय एक अंतर्राष्ट्रीय कानूनी व्यक्तित्व के साथ एक नए या मौजूदा देश की स्थापना को मान्यता देता है.
वर्तमान परिस्थिति मान्यता की प्रासंगिकता और निहितार्थ से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी प्रकाश डालती है. किसी देश को मान्यता दिए जाने से उसे वैधता मिलती है. बड़े पैमाने पर दुनिया के दूसरे देश और सरकारों के लिए उसका महत्व बढ़ाती हैं. "देश की मान्यता" और "सरकार की मान्यता" शब्द को अंतरराष्ट्रीय कानून में अलग-अलग तरीके से परिभाषित किया गया है. ‘देश की मान्यता’ का अर्थ ये हुआ कि राष्ट्रों का अंतर्राष्ट्रीय समुदाय एक अंतर्राष्ट्रीय कानूनी व्यक्तित्व के साथ एक नए या मौजूदा देश की स्थापना को मान्यता देता है. दूसरी ओर “सरकार की मान्यता” का अर्थ दो संस्थाओं के बीच पहले से ही मान्यता प्राप्त देश या देश के अंदर सत्ता के हस्तांतरण से है. एक नया "प्राधिकरण" या "सरकार" और वर्तमान या निवर्तमान प्रशासन. चूंकि तालिबान आक्रमण या अलगाव के माध्यम से एक नए राज्य की स्थापना का दावा नहीं करता है, इसलिए इसकी प्रमुखता से वृद्धि राज्य मान्यता का मुद्दा नहीं उठाती है. सत्ता में उनके कब्जे का अर्थ है सरकार में अचानक बदलाव, देश में नहीं.
हालांकि, अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अब्दुल क़हर बल्खी ने मोंटेवीडियो कन्वेंशन का जिक्र करते हुए अफ़ग़ानिस्तान के देश के दर्जे और शासन को एक साथ जोड़ा. उन्होंने इस बात पर बहस करते हुए कि कहा कि अफ़ग़ानिस्तान को देश की मान्यता देना तालिबान शासन के शासन की वैधता को स्वीकार करना है. मोंटेवीडियो कन्वेंशन का अर्थ राज्यों के अधिकार और कर्तव्य, जिसमें एक स्थायी आबादी, एक परिभाषित क्षेत्र, एक प्रभावी सरकार और अन्य देशों के साथ संबंधों से जुड़े होने की क्षमता शामिल है.
अस्पष्ट क्षेत्र से राजनयिक संपर्क
तालिबानी शासन को सार्वजनिक रूप से मान्यता दिए बिना उसके साथ राजनयिक रूप से संपर्क रखना संबंधित देशों को विभिन्न रणनीतिक लाभ प्रदान करता है. ये दृष्टिकोण अलग-अलग देशों को अपने हितों के लिए आसानी से बातचीत करने में सक्षम बनाता है और तालिबान शासन को आधिकारिक तौर पर वैधता प्रदान किए बिना उनकी आवश्यकताओं को संतुलित करता है. जहां तक तालिबान का सवाल है तो ये कूटनीतिक जुड़ाव उसके जनसंपर्क को बढ़ावा देता है. इससे वो ये दावा कर सकता है कि उसे अंतरराष्ट्रीय तौर पर बहिष्कृत नहीं किया गया है, जैसा कि उसके आलोचक कहते हैं. ऐसा करके अफ़ग़ानिस्तान के आसपास के देश अपने राष्ट्रीय हितों को संरक्षित कर सकते हैं. राजनयिक संबंधों को बनाए रखते हुए अफ़ग़ानिस्तान में अपनी सीमाओं को सुरक्षित कर सकते हैं. उन्हें इसका एक ये फायदा भी होता है कि तालिबान की विवादास्पद नीतियों और मानवाधिकार के खराब रिकॉर्ड को देखते हुए वो खुद को इससे अलग भी कर सकते हैं. हालांकि इस दौरान भी वो महत्वपूर्ण बातचीत और सहयोग के लिए तालिबान से जुड़े हो सकते हैं.
राजनयिक संबंधों को बनाए रखते हुए अफ़ग़ानिस्तान में अपनी सीमाओं को सुरक्षित कर सकते हैं. उन्हें इसका एक ये फायदा भी होता है कि तालिबान की विवादास्पद नीतियों और मानवाधिकार के खराब रिकॉर्ड को देखते हुए वो खुद को इससे अलग भी कर सकते हैं.
चीन, रूस और पाकिस्तान जैसे देशों ने तालिबान के सत्ता में वापस आने के बाद से उसके साथ राजनयिक संबंध बनाए हैं. चीन पहला देश था जिसने बिलाल करीमी को बीजिंग में अफ़ग़ानिस्तान के राजदूत के रूप में आधिकारिक तौर पर मान्यता दी थी. तालिबान के साथ चीन की बातचीत अब तक विशुद्ध रूप से लेन-देन की रही है. इसका एक उदाहरण चीन के झिंजियांग मध्य एशिया पेट्रोलियम और गैस कंपनी द्वारा किया गया सौदा है. ये सौदा तालिबान द्वारा अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता संभालने के बाद से हासिल किया गया पहला महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा निष्कर्षण समझौता है. एक हालिया घटनाक्रम में तालिबान के मुख्य प्रवक्ता जबीहुल्ला मुजाहिद ने घोषणा की है कि चीन, रूस, ताज़िकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ईरान, पाकिस्तान और क्षेत्र के अन्य देशों के साथ उनके संबंध आधिकारिक हैं. इसके लिए उन्होंने इन देशों के दूतावासों की उपस्थिति, अंतर्देशीय यात्रा, व्यापारियों के आने-जाने और माल स्थानांतरित करने और वाणिज्य दूतावासों की उपस्थिति का हवाला दिया. काबुल में राजनयिक उपस्थिति बनाए रखने या फिर से स्थापित करने के बाद, कई क्षेत्रीय देशों ने अपनी राजधानियों में तालिबान के दूतों की नियुक्ति को स्वीकार कर लिया है. हालांकि इसके साथ ही वो देश ये भी कह रहे हैं कि इस तरह का प्रतिनिधित्व अंतर्निहित या स्पष्ट मान्यता के बराबर नहीं है. उनके मुताबिक अफ़ग़ानिस्तान के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए ये एक "तकनीकी" शर्त है.
अंतर्राष्ट्रीय संगठन और अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रभाव : एक और दृष्टिकोण
अलग-अलग देशों के द्वारा किसी देश की सरकार को मान्यता देने की तुलना में सरकारों को मान्यता देने के अंतरराष्ट्रीय संगठनों के कानूनी प्रभाव बहुत ज़्यादा जटिल हैं. उदाहरण के लिए, एक मान्यता प्राप्त देश को एक नई मान्यता प्राप्त सरकार के साथ बातचीत करने, राजनयिक संपर्क बनाने या अपने संबंध को व्यापक बनाने के लिए मज़बूर नहीं किया जाता है. इसके विपरीत, एक अंतरराष्ट्रीय संगठन अपनी संस्था के भीतर नई सरकार के अधिकारों, सदस्यता या अन्य कर्तव्यों को प्रतिबंधित नहीं कर सकता है. उपरोक्त उदाहरण से ये बात स्पष्ट होती है कि अलग-अलग देशों की तुलना में कई अंतरराष्ट्रीय संगठन तालिबान को मान्यता देने के लिए कम इच्छुक क्यों हैं. यही वजह है कि कुछ सरकारों की तरह ने भले ही तालिबान के शासन को अप्रत्यक्ष रूप से मान्यता दे दी है लेकिन किसी भी अंतर्राष्ट्रीय संगठन ने तालिबान को वैध रूप से अफ़ग़ानिस्तान का प्रतिनिधित्व करने की मंजूरी नहीं दी है.
इसी कड़ी में देखा जाए तो संयुक्त राष्ट्र ने यूएन में अफ़ग़ानिस्तान की सीट पर कब्जा करने के तालिबान की कोशिशों को खारिज़ कर दिया, जबकि तालिबान एक से ज्यादा बार इस तरह के प्रयास कर चुका है. दिसंबर 2022 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने निर्विवाद रूप से संयुक्त राष्ट्र क्रेडेंशियल कमेटी की स्थगित सिफारिश को अपनाया. इसमें ये सुझाव दिया गया था कि यूएन की सीट पूर्व अफ़ग़ान सरकार के पास ही रहनी चाहिए, जिसका प्रतिनिधित्व अब राष्ट्रपति अशरफ गनी द्वारा तय किए गए राजनयिक द्वारा किया जाता है.
इसी कड़ी में देखा जाए तो संयुक्त राष्ट्र ने यूएन में अफ़ग़ानिस्तान की सीट पर कब्जा करने के तालिबान की कोशिशों को खारिज़ कर दिया, जबकि तालिबान एक से ज्यादा बार इस तरह के प्रयास कर चुका है.
हालांकि संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों पर ये बाध्यता नहीं है कि एक वास्तविक प्रशासन को मान्यता देने के लिए वो अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन करें लेकिन कुछ परिस्थितियों में देशों को एक नई सरकार को मान्यता देने से बचना पड़ सकता है. जैसा कि अंतर्राष्ट्रीय विधि आयोग के लेखों के अनुच्छेद 41 (2) में कहा गया है. अंतर्राष्ट्रीय रूप से गलत अधिनियमों के राज्यों की जिम्मेदारी पर लेख (2001) के मुताबिक अगर कोई देश अंतर्राष्ट्रीय कानून (jus cogens) के मौलिक नियम का उल्लंघन करता है, तो अन्य देश उस स्थिति को स्वीकार नहीं कर सकते हैं जो इस उल्लंघन ने पैदा की थी. उन्हें इसे अवैध मानना चाहिए और उल्लंघन किए गए नियम का सम्मान करने वाली स्थिति को बहाल करने के लिए काम करना चाहिए.
इसका मतलब ये हुआ कि अगर कोई नई इकाई सामान्य अंतरराष्ट्रीय कानून के एक स्थायी नियम का उल्लंघन करती है, तो अन्य देशों को इसे गैर-मान्यता के सिद्धांत के तहत देश या सरकार के रूप में मान्यता देने से इनकार करना चाहिए. इसमें साफ तौर पर लिखा गया है कि यदि कोई देश अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन करता है, तो अन्य देश इसके नतीजे की स्थिति को पहचानने या माफ नहीं करने के लिए बाध्य हैं. उन्हें ऐसे किसी भी काम का समर्थन या सहायता प्रदान करने से बचना चाहिए जो उनके उल्लंघन को वैध ठहराएगा. एक संधि या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का बाध्यकारी प्रस्ताव सरकारों को एक नए वास्तविक प्रशासन को मान्यता नहीं देने का निर्देश दे सकता है. इस मामले में, तालिबान शासन को मान्यता देने वाले देशों को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा लगाए गए कई प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है, जैसे राजनयिक अलगाव और अन्य देशों से सहयोग, व्यापार और सहायता प्रतिबंध. इसके अलावा ऐसे देशों को अपने सरकारी अधिकारियों पर यात्रा प्रतिबंध और कुछ अन्य पाबंदियों का सामना करना पड़ सकता है. इतना ही नहीं दूसरे देशों का दौरा करते समय अपने नागरिकों के लिए वीज़ा और यात्रा प्रतिबंध भी लग सकते हैं.
निष्कर्ष
अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का कठोर शासन इसे "सरकार" के रूप में वर्गीकृत करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता है. तालिबान सरकार को मान्यता मिलने के लिए ज़्यादा ज़रूरी ये है कि वो समकालीन अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन करने के लिए किस हद तक तैयार है. इसके अलावा कानूनी रूप से गैर-मान्यता प्राप्त रहना तालिबान को अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकारों और मानवीय कानूनों के तहत अपने दायित्वों से मुक्त नहीं करता है, क्योंकि ये सरकार की स्थिति के बजाय प्रशासन पर निर्भर करता है. संयुक्त राष्ट्र के हाल के शोध के अनुसार 60 प्रतिशत से अधिक अफ़ग़ान महिलाओं का मानना है कि अगर तालिबान सरकार को औपचारिक तौर पर अंतर्राष्ट्रीय मान्यता दी जाती है कि उनके अधिकारों की स्थिति और खराब हो जाएगी. इतना ही नहीं इससे मानवाधिकार की समस्या भी ज़्यादा खराब हो सकती है. इस बात की संभावना बढ़ जाएगी कि तालिबान अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं और अन्य अल्पसंख्यक समूहों पर अत्याचार करने वाले नियमों को और कड़ा कर दे. फिलहाल के हालात देखकर तो ये कहा जा सकता है कि रणनीतिक और सुरक्षा कारणों से कुछ देश आने वाले दिनों में भी तालिबान के साथ अपना अप्रत्यक्ष राजनयिक जुड़ाव जारी रखेंगे. तालिबान के इस्लामिक अमीरात को औपचारिक मान्यता मिलने में कुछ समय लग सकता है.
शिवम शेखावत ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में जूनियर फेलो हैं.
पूर्वा व्यास ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में रिसर्च असिस्टेंट हैं.
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