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भारत का परमाणु ऊर्जा उद्योग एक बहुत बड़े बदलाव के दौर से गुज़रने वाला है. इसका कारण है न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) के द्वारा आगामी परमाणु परियोजनाओं में हिस्सेदारी खोलने और छोटे रिएक्टर के विकास में प्राइवेट कंपनियों को आमंत्रण के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोज़ल (प्रस्ताव के लिए अनुरोध या RFP) जारी करने का साहसिक और ऐतिहासिक कदम. ये परमाणु क्षेत्र को लेकर भारत के दृष्टिकोण में एक महत्वपूर्ण क्षण का प्रतीक है. NPCIL नियामक अनुमतियों के साथ विशेषज्ञता और तकनीक साझा करके उद्योग के इन अन्वेषकों (पायनियर) की सहायता कर सकता है. ये तालमेल कार्यकुशलता बढ़ाने, लागत कम करने और परमाणु केंद्रों के डिज़ाइन, निर्माण एवं प्रबंधन में इनोवेशन में मदद कर सकता है. इसके बदले में उद्योगों को अपने कैप्टिव यूज़ (अपने इस्तेमाल के लिए) या फिर से बिक्री के लिए शुद्ध बिजली उत्पादन का फायदा मिलेगा. हालांकि इसके लिए परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) के टैरिफ रेगुलेशन को मानना होगा. उपयोग के मामलों के दोहरे प्रभाव के कारण ये उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है. परमाणु ऊर्जा की निवेश सूची (पोर्टफोलियो) पर रक्षा मंत्रालय और दूसरे राष्ट्रीय राजनीतिक गलियारों ने हमेशा से विशेष ध्यान दिया है. इसे हमेशा निजी भागीदारों से बचाया गया है. ये अभूतपूर्व कदम स्वच्छ एवं स्थिर बिजली उत्पादन के लिए भारत की प्रतिबद्धता को मज़बूत करता है और परमाणु ऊर्जा में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम है.
बाज़ार में निजी कंपनियां
निजी संस्थानों को हमेशा से परमाणु क्षेत्र में प्रवेश करने से रोका गया है. इसका मुख्य कारण 1962 के परमाणु ऊर्जा अधिनियम के तहत स्थापित सख्त नियामक रूपरेखा है जो परमाणु ऊर्जा से जुड़ी गतिविधियों को लेकर केंद्र सरकार को विशेष अधिकार प्रदान करती है. भारत में ये संघीय संस्थानों जैसे कि DAE और NPCIL के माध्यम से लागू किया जाता है. ये केंद्रीकरण प्रभावी रूप से प्राइवेट कंपनियों को परमाणु ऊर्जा उत्पादन से जुड़ी मुख्य गतिविधियों में शामिल होने से रोकता है और प्राइवेट कंपनियों को परमाणु ऊर्जा का उत्पादन और उपयोग करने पर प्रतिबंध लगाता है (AEA की धारा 22). हालांकि हाल के वर्षों में बदलाव किए गए हैं. इसके तहत नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन (NTPC) ने माही बांसवाड़ा में बड़े स्तर का प्लांट बनाने के लिए NPCIL के साथ एक संयुक्त उपक्रम के ज़रिए परमाणु सेक्टर में प्रवेश किया है. ऐसा पहली बार हुआ है जब NPCIL के अलावा कोई अन्य संस्था परमाणु क्षेत्र में उतरी है और इसे इस क्षेत्र के निजीकरण की दिशा में पहले कदम के रूप में देखा जा सकता है.
सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बीच पुल का काम: भारत स्मॉल रिएक्टर को बढ़ावा
सुरक्षा और स्थिरता के लिए भारत की प्रतिबद्धता देसी स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) यानी भारत स्मॉल रिएक्टर (BSR) के विकास से उजागर होती है. सरकार ने निजी निवेश को आकर्षित करने और परमाणु ऊर्जा के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए SMR बाज़ार की तरफ ध्यान देने की आवश्यकता को स्वीकार किया और इस तरह BSR की घोषणा की जो ठोस, परिवर्तनीय और जल्दी उपयोग करने के योग्य है. देसी प्रेशराइज्ड हैवी वाटर रिएक्टर (PHWR) तकनीक पर आधारित BRS विशेष आर्थिक क्षेत्र, स्मार्ट सिटी जैसी आर्थिक और बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं और उच्च ऊर्जा आवश्यकता वाले उद्योगों में एक प्रमुख भूमिका निभा सकता है लेकिन BSR को शामिल करने के लिए परमाणु इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार करने की वित्तीय प्रतिबद्धता बहुत अधिक है जो अक्सर अकेले सरकार की क्षमता से अधिक होती है. रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल या RFP के माध्यम से निजी निवेश को प्रोत्साहन न केवल ये बोझ कम करता है बल्कि लाभ कमाने वाले अलग-अलग पूंजीवादी लोगों को भी साथ लाता है. ये भारत की ऊर्जा रणनीति के तीन महत्वपूर्ण स्तंभों- स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा- का समाधान भी करता है.
RFP चार स्तरीय परियोजना के दृष्टिकोण को उजागर करता है जिसकी शुरुआत परियोजना से पहले की समीक्षा से होती है जिसमें साइट का अध्ययन और दोहरी इकाई (2 x 220 MWe) के लिए न्यूनतम 331 हेक्टेयर भूमि क्षेत्र की मंज़ूरी शामिल है. इसके बाद इस क्षेत्र को दीर्घकालिक लीज़ (99 वर्ष या अधिक) के लिए NPCIL को सब-लीज़ किया जाएगा. फिर NPCIL की निगरानी के तहत निर्माण का चरण शुरू होगा. जब प्लांट तैयार हो जाएगा तो ज़मीन समेत परियोजना की सभी संपत्तियों को 1 रुपये के सांकेतिक दाम पर नियंत्रण और संचालन के लिए NPCIL को हस्तांतरित कर दिया जाएगा. प्लांट की देखरेख NPCIL के द्वारा की जाती है और लागत का भार उपयोग करने वाला उठाता है. अंत में प्लांट को डीकमीशन (काम बंद करना) किया जाता है जिसके लिए भी पैसे का भुगतान परमाणु ऊर्जा अधिनियम के तहत उपयोग करने वाले के द्वारा किया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया के दौरान उपयोग करने वाले को प्लांट की जगह चुनने, निर्माण करने, संचालन और डीकमीशनिंग के लिए परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) की गाइडलाइन का कड़ाई से पालन करना होगा.
वित्तीय अनिवार्यताएं
RFP स्पष्ट रूप से उपयोगकर्ता के वित्तीय दायित्व के क्षेत्रों के बारे में बताता है जहां रख-रखाव और डीकमीशनिंग की लागत समेत पूरा पूंजीगत खर्च और परिचालन खर्च उपयोग करने वाले के द्वारा किया जाएगा. इसके अलावा इसमें ये उल्लेख भी किया गया है कि उपयोगकर्ताओं को NPCIL की विशेषज्ञता एवं सेवाओं के लिए क्षतिपूर्ति समेत प्लांट के परिचालन और रखरखाव के लिए वार्षिक शुल्क का भुगतान करने की आवश्यकता है जो उत्पन्न बिजली के लिए 0.60 प्रति kWh की शुरुआती दर से है और ये हर साल 0.01 रुपया प्रति kWh तक बढ़ जाएगी. ये शुल्क NPCIL को तकनीकी निगरानी, नियामक अनुपालन और परिचालन विशेषज्ञता प्रदान करने के लिए है.
वैसे तो RFP से सीधे ये पता नहीं लगाया जा सकता कि NPCIL के साथ तालमेल करने के लिए संस्थानों को कितना वित्तीय निवेश करने की आवश्यकता है लेकिन वित्तीय योग्यता एवं 2023-24 तक कम-से-कम 3,000 करोड़ रुपये के नेट वर्थ का प्रमाण और बहुत अधिक साख की आवश्यकता जैसे कारकों से एक मोटा अनुमान लगाया जा सकता है कि परियोजना सस्ती नहीं होने वाली है.
अंतर्राष्ट्रीय पहलू: अमेरिका-भारत परमाणु संबंध
एक सकारात्मक घटनाक्रम के तहत अमेरिका ने भारत की परमाणु संस्थाओं से प्रतिबंध हटाने की घोषणा करके भारत के साथ अपनी सामरिक साझेदारी को मज़बूत किया है. सार्वजनिक रूप से पहली बार इसका ऐलान अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन की भारत यात्रा के दौरान किया गया जहां उन्होंने नीति में बदलाव की पुष्टि की और कहा कि अमेरिका का लक्ष्य उन बाधाओं को दूर करना है जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से नागरिक परमाणु सहयोग को बाधित किया.
ये निर्णय 2008 के अमेरिका-भारत नागरिक परमाणु समझौते के समय से वर्षों के लगातार विकास की परिणति का प्रतीक है. वैसे तो 1998 में भारत के परमाणु परीक्षण के बाद लगाई गई कई पाबंदियों को धीरे-धीरे हटा लिया गया था लेकिन भारत के परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत कई संस्था जैसे कि इंडियन रेअर अर्थ्स, इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR) और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) अमेरिका के वाणिज्य विभाग की प्रतिबंधित सूची में बने रहे. पिछले दिनों उठाया गया कदम लगातार जारी उन प्रतिबंधों का समाधान करता है, गहरे सहयोग को बढ़ावा देता है और 2019, जब दोनों देश भारत में अमेरिका के द्वारा डिज़ाइन किए गए छह परमाणु पावर प्लांट बनाने के लिए समझौता करने को तैयार हुए थे, के बाद भारत-अमेरिका परमाणु सहयोग में एक मानक को दर्शाता है. लेकिन दायित्व से जुड़ी चिंताओं और भारतीय संस्थाओं पर प्रतिबंध के कारण प्रगति धीमी रही है. इन बाधाओं के हटने के साथ हम इस परियोजना के बारे में तेज़ गति से विकास की उम्मीद कर सकते हैं.
निष्कर्ष
भारतीय परमाणु क्षेत्र में सार्वजनिक-निजी साझेदारी NPCIL के तालमेल के साथ इस उद्योग को प्रेरित करने के लिए तैयार है जो विश्वसनीय, स्वच्छ और लागत के मामले में ऊर्जा का एक स्थिर स्रोत प्रदान करके, दीर्घकालिक स्थिरता का लक्ष्य सुनिश्चित करके और आर्थिक एवं पर्यावरण से जुड़े फायदों के लिए तकनीक का इस्तेमाल करके बहुत अधिक ऊर्जा की मांग वाले अलग-अलग क्षेत्रों को महत्वपूर्ण लाभ पहुंचा सकती है. इसके अलावा, पिछले दिनों अमेरिका के द्वारा प्रतिबंधों को हटाने के निर्णय के साथ भारत के परमाणु ऊर्जा बाज़ार में निजी कंपनियों का प्रवेश देश की ऊर्जा गतिशीलता में एक निर्णायक क्षण का प्रतीक है जो भारत की ऊर्जा चुनौतियों का समाधान करने के लिए उसके साहसिक कदमों को दर्शाता है. नीतिगत समर्थन, अंतर्राष्ट्रीय तालमेल और प्राइवेट सेक्टर की प्रतिभा के सही मिश्रण के साथ भारत की परमाणु ऊर्जा से जुड़ी महत्वाकांक्षाएं अभूतपूर्व ऊंचाइयों तक पहुंचने के लिए तैयार है.
काव्य वाधवा टिकाऊ ऊर्जा समाधानों को बढ़ावा देने और नीतिगत सुधारों को प्रेरित करने के लिए परमाणु ऊर्जा की एक समर्पित समर्थक और नीति विश्लेषक हैं.
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