Author : Akshay Joshi

Expert Speak Urban Futures
Published on Mar 28, 2025 Updated 0 Hours ago
प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी): ‘इन-सीटू’ पुनर्विकास का विश्लेषण

9 अगस्त 2024 को भारत सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी (पीएमएवाई-यू) 2.0 को मंजूरी दी. इस योजना का लक्ष्य अगले पांच साल में शहरी गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए एक करोड़ घर उपलब्ध कराना है. “इन-सीटू” स्लम रिहैबिलिटेशन (आईएसएसआर) प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी 1.0 में एक स्वतंत्र योजना घटक था. “इन-सीटू” का अर्थ होता है मूल जगह. यानी जिस जगह झुग्गियां थी, उसी जगह घर देने की योजना है. इसे भूमि को संसाधन के रूप में इस्तेमाल करके और निजी निवेश को आकर्षित करके झुग्गीवासियों को किफायती आवास प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया था. पीएमएवाई-यू 2.0 में सरकार ने आईएसएसआर को लाभार्थी नेतृत्व निर्माण (बीएलसी) और भागीदारी में किफायती आवास घटकों के अंतर्गत शामिल किया है. चूंकि सरकार ने अब इसे लेकर एक नया नीतिगत दृष्टिकोण अपनाया है, इसे ध्यान में रखते हुए आईएसएसआर के प्रदर्शन और योजना के कार्यान्वयन की सीमाओं को दूर करने के लिए सरकार द्वारा अपनाई जा सकने वाली रणनीतियों का विश्लेषण करना उचित है.

पीएमएवाई-यू 1.0 के तहत आईएसएसआर का मूल उद्देश्य निजी निवेश को आकर्षित करके झुग्गीवासियों को किफायती आवास उपलब्ध कराना था.

पीएमएवाई-यू 1.0 के तहत आईएसएसआर का मूल उद्देश्य निजी निवेश को आकर्षित करके झुग्गीवासियों को किफायती आवास उपलब्ध कराना था. भारत में 60 प्रतिशत झुग्गी बस्तियां सरकारी ज़मीन पर बनी हैं, इसलिए इस योजना का मक़सद इन बस्तियों में रहने वाले लोगों को स्थानांतरित करने के बजाय मौजूदा झुग्गी स्थलों पर बुनियादी ढांचे का विकास करना था. पुनर्विकास का काम करने वाली निजी कंपनियां बाकी बची हुई ज़मीन का इस्तेमाल व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए कर सकते हैं. इसके अलावा, सरकार ने निजी संस्थाओं को प्रति यूनिट औसतन 1 लाख रुपये की सहायता देने का आश्वासन दिया. बदले में, झुग्गीवासियों को मुफ्त आवासीय ईकाइयां प्रदान की गईं. कागज़ पर देखने में लगता है कि इस योजना से दोनों पक्षों को फायदा होगा. पुनर्विकास करने वाली संस्थाओं को भी और झुग्गी की बजाए घर हासिल करने वाले को भी. लेकिन हकीक़त में इस योजना का प्रदर्शन एक अलग ही वास्तविकता को दिखाता है.

तालिका 1: आईएसएसआर का प्रदर्शन

स्वीकृत मकान  

भूतल

निर्माण पूर्ण

 रिहाइश

2.95 लाख

2.26 लाख

77%

1.63 लाख

55%

1.10 लाख

37%

स्रोत: सूचना और प्रसारण मंत्रालय


पीएमएवाई-यू के आंकड़ों के अनुसार, आईएसएसआर वर्टिकल के लिए सबसे कम संख्या में घरों को मंजूरी दी गई. वर्टिकल यानी बहुमंजिला या हाईराइज बिल्डिंग. केंद्र सरकार ने वर्टिकल के तहत 2.95 लाख घरों को मंजूरी दी. चौंका देने वाली बात ये है कि इस योजना के तहत जो घर निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं, उनमें 63 प्रतिशत खाली पड़े हैं. इससे ये स्पष्ट होता है कि योजना का प्रदर्शन खराब है. हालांकि, ये आंकड़ा योजना की प्रगति का समग्र दृष्टिकोण नहीं दिखाता. 2.95 लाख की ये संख्या स्वीकृत घरों के संशोधित आंकड़ों के अनुसार है. अगर हम 2022 के आईएसएसआर-स्वीकृत आंकड़ों का करीबी अध्ययन करें तो वास्तविकता और भी चिंताजनक है.

 

तालिका 2: आईएसएसआर का संशोधित लक्ष्य

योजना की शुरुआत में मांग

2022 में स्वीकृत मकान

2024 में स्वीकृत मकान

अंतर

14.35 लाख

4.33 लाख

2.95 लाख

-1.38 लाख

स्रोत: आवास और शहरी मामलों की स्टैंडिंग कमेटी

 

डेटा से पता चलता है कि कई ऐसी परियोजनाओं को ड्रॉप यानी छोड़ दिया गया है, जिन्हें पहले मंजूरी दी गई थी. इसके अलावा, अगर कब्जे वाले घरों की संख्या की तुलना शुरू में स्वीकृत आवासों से की जाए, तो ये स्पष्ट होता है कि आईएसएसआर योजना वाले सिर्फ 8 प्रतिशत घरों में ही लोग रहते हैं. आसान शब्दों में समझाएं तो देश भर में आईएसएसआर वाली बहुत कम परियोजनाएं ही सफल रही हैं.

अब सरकार ने इस योजना को अपने में समाहित कर लिया है. सरकार के इस फैसले के पीछे की सबसे बड़ी वजह ज़मीनी स्तर पर इस योजना की धीमी प्रगति हो सकती है. 

अब सरकार ने इस योजना को अपने में समाहित कर लिया है. सरकार के इस फैसले के पीछे की सबसे बड़ी वजह ज़मीनी स्तर पर इस योजना की धीमी प्रगति हो सकती है. हालांकि, नीतिगत खामियों को समझने और योजना की धीमी प्रगति के लिए जिम्मेदार दूसरे कारकों के बारे में जानना भी ज़रूरी है.

योजना की सीमाएं

  • विश्वसनीय आंकड़ों की कमी: आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय की तरफ से राज्यसभा में प्रश्न संख्या 556 पर दिए गए जवाब के मुताबिक, "पिछले पांच साल में झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोगों की संख्या का राज्यवार और वर्षवार डेटा उपलब्ध नहीं है". मंत्रालय अपनी योजना बनाने के लिए 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर निर्भर करता है. जनसंख्या में लगातार वृद्धि के साथ शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन बढ़ रहा है. सस्ता आवास उपलब्ध नहीं होने की वजह से कई लोग झुग्गी-झोपड़ियों में शरण लेने को मज़बूर हैं. झुग्गी बस्तियों की आबादी पर नज़र रखने के लिए शहरी विकास मंत्रालय या किसी अन्य सरकारी एजेंसी के पास कोई तंत्र नहीं है. केंद्र, राज्य या स्थानीय सरकारों द्वारा झुग्गी बस्तियों के बारे में सही जानकारी नहीं होने का का मतलब है कि हज़ारों झुग्गियों की पहचान नहीं की जा सकी हैं. इन झुग्गी-झोपड़ियों के बारे में आंकड़े उपलब्ध नहीं होने की वजह से वो प्रशासनिक तंत्र से गायब और नीति निर्धारण के दायरे से बाहर हैं.
  • झुग्गी बस्तियों की पहचान: पीएमएवाई-यू 1.0 दिशा-निर्देशों के अनुसार झुग्गी बस्ती एक ऐसी जगह को कहा जाएगा, जहां "कम से कम 300 लोगों या लगभग 60-70 परिवार एक सघन क्षेत्र में रहते है. ये बस्ती खराब और अनियोजित तरीके से हो. वहां साफ-सफाई की बेहतर व्यवस्था ना हो. जहां आमतौर पर अपर्याप्त बुनियादी ढांचा, स्वच्छता और पेयजल सुविधाओं की कमी हैं". शहरों में ऐसे क्षेत्रों का सर्वेक्षण करने और उन्हें झुग्गी बस्ती घोषित करने की जिम्मेदारी शहरी स्थानीय निकायों (ULB) की होगी. हालांकि, यूएलबी किसी क्षेत्र को झुग्गी-बस्ती के रूप में गिनने से बचते हैं. अगर गणना की जाती है तो फिर शहरी स्थानीय निकायों को उन झुग्गी बस्तियों में सड़क, पानी और स्वच्छता जैसी मूलभूत सेवाएं देनी चाहिए.
  • झुग्गियों को रहने योग्य कैसे बनाया जाए: आईएसएसआर परियोजना के तहत आने के लिए किसी झुग्गी बस्ती का टिकाऊ, रहने योग्य और व्यावहारिक होना ज़रूरी है. आईएसएसआर में दी गई परिभाषा के मुताबिक एक झुग्गी बस्ती को उसी स्थान पर तभी नियमित किया जा सकता है, जब वो जगह मानव निवास के लिए उपयुक्त होती है. अगर झुग्गी-झोपड़ियां पर्यावरण की दृष्टि से ख़तरनाक जगहों (जैसे नदी के किनारे, तालाब वाली जगहें, पहाड़ी या दलदली इलाके), पारिस्थितिकी के लिहाज से संवेदनशील जगहों (मैंग्रोव, राष्ट्रीय उद्यान या अभयारण्य) या सार्वजनिक इस्तेमाल वाली जगहों और सेवाओं (जैसे प्रमुख सड़कें और रेलवे ट्रैक) के लिए चिह्नित भूमि पर स्थित होती हैं तो फिर उन्हें नियमित नहीं किया जा सकता. ऐसी जगह पर मौजूद सभी झुग्गी बस्तियों को आईएसएसआर के दायरे से बाहर रखा गया है और ये उचित भी है. इसके अलावा, उन झुग्गियों को रहने योग्य आवास के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिए. जो उपयुक्त जगह मौजूद हैं. इसमें ये निर्धारित करना शामिल है कि स्थान, आकार, भूमि और वर्तमान आवास के बाज़ार मूल्य जैसे कारकों के आधार पर झुग्गियों का पुनर्विकास किए जाने में आर्थिक समझदारी है या नहीं. छोटे शहरों और कस्बों में अधिकांश झुग्गियां रहने योग्य आवास बनाए जाने के मानदंडों को पूरा करने में नाकाम रहती हैं. कुल मिलाकर देखा जाए तो कुछ ही झुग्गियां रहने योग्य होने और व्यवहार्यता के दूसरे मानदंडों को पूरा कर पाती हैं.

 आईएसएसआर परियोजना के तहत आने के लिए किसी झुग्गी बस्ती का टिकाऊ, रहने योग्य और व्यावहारिक होना ज़रूरी है. आईएसएसआर में दी गई परिभाषा के मुताबिक एक झुग्गी बस्ती को उसी स्थान पर तभी नियमित किया जा सकता है, जब वो जगह मानव निवास के लिए उपयुक्त होती है.

आईएसएसआर के क्रियान्वयन में कई अन्य कारक भी बाधा डालते हैं. डेटा का ना होना धीमी प्रगति का एक बड़ा कारण है. इसके अलावा शहरी स्थानीय निकायों द्वारा झुग्गी बस्तियों की पहचान ना करना, रहने की स्थिति और व्यवहार्यता के कारक और भूमि अधिकारों का ना होने जैसे कारण आईएसएसआर के कार्यान्वयन के रास्ते में आने वाली महत्वपूर्ण बाधाएं हैं. इन सब कारकों की वजह से आईएसएसआर के तहत लाई जा सकने वाली झुग्गी बस्तियों की संख्या बहुत कम हो जाती है. (तालिका 3 देखें).

 

तालिका 3: केंद्र शासित प्रदेशों में आईएसएसआर का प्रदर्शन

केंद्रशासित प्रदेश

स्वीकृत मकान

भूतल के मकान

निर्माण पूरा

रिहायशी घर

दिल्ली

0

0

0

0

चंडीगढ़

0

0

0

0

स्रोत: सूचना और प्रसारण मंत्रालय

उपरोक्त आंकड़ों से ये स्पष्ट पता चलता है कि दिल्ली या चंडीगढ़ में कोई आईएसएसआर परियोजना स्वीकृत नहीं की गई है, ना ही ऐसी किसी योजना पर काम चल रहा है. 2011 की जनगणना के अनुसार, दिल्ली में 1.785 मिलियन और चंडीगढ़ में 95,000 लोग झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं. झुग्गी बस्तियों को इस योजना के तहत लाने की जो शर्तें हैं, वो बहुत बड़ी बाधा बन रही है. इससे जिससे झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों के साथ अन्याय हो रहा है.

 

योजना को सफल बनाने के लिए सिफारिशें

  • झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों को किफायती आवास मुहैया कराने का पहला कदम उनकी पहचान करना है. सरकार को झुग्गी-झोपड़ियों की गणना के लिए देश भर में सर्वेक्षण करने और शहरी स्थानीय निकायों को सख़्त दिशा-निर्देश देने की ज़रूरत है.
  • सरकार को झुग्गियों में रहने वाली आबादी के हिसाब शहरी स्थानीय निकायों को विकास निधि देनी चाहिए. इससे शहरी निकायों को झुग्गियों की पहचान करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा. सरकार यूएलबी को इस बात के लिए भी प्रोत्साहित कर सकती है कि वो आंकड़ों की अनुपलब्धता और झुग्गियों की पहचान की बाधाओं को दूर करने में उसकी मदद करें.
  • झुग्गी-झोपड़ियों से जुड़े आंकड़ों और उनकी पहचान संबंधी मुद्दों को संबोधित करने के बाद, केंद्र सरकार पंजाब झुग्गी-झोपड़ी निवासियों (स्वामित्व अधिकार) अधिनियम 2020 से प्रेरणा ले सकती है. ये कानून झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों को सुरक्षित भूमि स्वामित्व और भूमि अधिकार मुहैया कराता है. इस कानून के अनुसार, शहरी स्थानीय निकाय द्वारा इस अधिनियम को अपनाए जाने के बाद झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों को भूमि के स्वामित्व संबंधी अधिकार मिलते हैं. ये अधिनियम झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों को प्रशासनिक तंत्र के औपचारिक ढांचे में एकीकृत करने की एक रूपरेखा तय करता है और इसे कानूनी मान्यता प्रदान करता है. इस कानून की एक खास बात ये है कि भूमि के मालिकाना अधिकार विरासत में तो मिलते हैं, लेकिन 30 साल तक इन्हें हस्तांतरित नहीं किए जा सकता. इससे झुग्गियों में रहने वालों की दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित होती है. उन्हें आवंटित भूमि को बेचने से बचा जा सकता है. इसके अलावा, अगर झुग्गीवासियों के कब्जे वाली भूमि वर्तमान में सरकार की है, तो उन्हें मालिकाना भूमि अधिकार दिए जाते हैं. ये अधिकार या तो मुफ्त दिए जाते हैं या फिर निवासियों की सामाजिक-आर्थिक श्रेणी के आधार पर रियायती दरों पर भूमि का स्वामित्व उन्हें मिलता है. पंजाब के इस अधिनियम को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाने से झुग्गी-झोपड़ियों के नियमितीकरण और भूमि अधिकारों को बढ़ावा मिलेगा.
  • झुग्गी-झोपड़ी को लेकर सरकार के वर्तमान नीति दृष्टिकोण में इनके पुनर्विकास में निजी संस्थाओं को साथ लेना शामिल है. हालांकि, इस रणनीति की कई महत्वपूर्ण सीमाएं हैं. ऐसे में इस रणनीति को व्यावहारिक बनाने के लिए सरकार को एक बहुआयामी ढांचा विकसित करने की ज़रूरत है.

झुग्गी बस्तियों की श्रेणी

सिफारिशें

रहने योग्य और स्थायी झुग्गी बस्तियां

मौजूदा आईएसएसआर मॉडल

रहने योग्य और अव्यवहार्य झुग्गियां

ओडिशा का जागा मिशन मॉडल

ना रहने योग्य व्यवहार्य झुग्गियां

विकसित करना आर्थिक समझदारी नहीं

ना रहने योग्य और अव्यवहार्य झुग्गियां

दूसरी जगह बसाया जाए

  • जो झुग्गी बस्तियां रहने योग्य जगहों पर हैं, वहां मौजूदा आईएसएसआर मॉडल को लागू किया जा सकता है.
  • टिकाऊ झुग्गी बस्तियों के लिए सरकार ओडिशा में सफल हो चुके जगा मिशन मॉडल को लागू कर सकती है. ये मॉडल वर्किंग टाइटल (कार्यकारी स्वामित्व) बनाकर झुग्गीवासियों के लिए भूमि अधिकारों पर ध्यान केंद्रित करता है. इस मॉडल में भूमि अधिकार विरासत में मिलते हैं लेकिन ये हस्तांतरणीय नहीं हैं. इसके अलावा, सरकार आवास इकाइयों के पुनर्विकास में निवेश करती है. पूरे झुग्गी क्षेत्र में सड़क, पानी और सीवरेज जैसी बुनियादी सुविधाओं का उपलब्धता सुनिश्चित करती है.
  • जिन झुग्गी बस्तियों को रहने योग्य नहीं होने की श्रेणी में वर्गीकृत किया गया, जो व्यवहार्यता के मानदंडों को पूरा नहीं कर सकती हैं, उनके आर्थिक और विकास संबंधी अस्थिरता पैदा होगी. इसलिए सरकार को ऐसी सभी झुग्गियों को अव्यवहारिक घोषित कर देना चाहिए. सरकार को इन झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों को पास की आवासीय परियोजनाओं में स्थानांतरित करने के लिए पर्याप्त सहायता देनी चाहिए.

 इस मॉडल को रहने योग्य और अव्यवहार्य झुग्गियों, दोनों के लिए अपनाया जा सकता है क्योंकि ये झुग्गी बस्तियों की आबादी को एक स्थायी और समावेशी अवसर प्रदान करता है. 

निष्कर्ष

सभी को आवास उपलब्ध कराने के लक्ष्य को पूरा करने से पहले झुग्गियों के अस्तित्व को स्वीकार करना ज़रूरी है. सरकार को पूरे देश में झुग्गी बस्तियों की गणना सुनिश्चित करने के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए, साथ ही इसे लागू करने के लिए संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है. केंद्र सरकार इसे लेकर राज्य सरकारों की नीतियों से अपनी योजना तैयार कर सकती है. पंजाब झुग्गी-झोपड़ी निवासी (स्वामित्व अधिकार) अधिनियम 2020 पूरे भारत में झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों को स्वामित्व अधिकार प्रदान करने के लिए एक व्यापक रूपरेखा प्रदान करता है. इसके अलावा, ओडिशा का जागा मिशन झुग्गी पुनर्विकास के लिए एक समग्र दृष्टिकोण मुहैया कराता है. ये भूमि अधिकारों से आगे की बात करता है और झुग्गी बस्तियों के भौतिक बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए राज्य सरकार द्वारा पर्याप्त निवेश का वादा करता है. इस मॉडल को रहने योग्य और अव्यवहार्य झुग्गियों, दोनों के लिए अपनाया जा सकता है क्योंकि ये झुग्गी बस्तियों की आबादी को एक स्थायी और समावेशी अवसर प्रदान करता है. अलग-अलग जगहों की झुग्गी बस्तियों की ज़रूरतों के आधार पर सरकार को उसी हिसाब से विभिन्न नीतियां बनानी चाहिए. आईएसएसआर मॉडल सभी के लिए एक जैसा समाधान सुझाता है, इसलिए इसके परिणाम आशा के अनुरूप नहीं आए.


अक्षय जोशी अशोका यूनिवर्सिटी में चीफ मिनिस्टर्स गुड गवर्नेंस एसोसिएट प्रोग्राम में डिप्टी मैनेजर हैं.

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