ये लेख हमारी सीरीज़, पाकिस्तान: दि अनरैवेलिंग का एक हिस्सा है.
12 मई की देर रात को पाकिस्तानी फ़ौज के आधिकारिक प्रवक्ता, मेजर जनरल अहमद शरीफ़ चौधरी, पाकिस्तान के टीवी चैनल जियो न्यूज़ पर आए, ताकि वो पाकिस्तानी फ़ौज़ में इस्तीफ़ों और अफ़सरों की बर्ख़ास्ती को लेकर चल रही अफ़वाहों को ख़ारिज कर सकें. 9 मई को जब इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी के बाद पूरे पाकिस्तान में भयंकर हिंसा भड़क उठी थी, तो अवाम के इस ग़ुस्से का ज़्यादातर निशाना पाकिस्तानी फ़ौज, उसके ठिकाने और अड्डे थे. उसके बाद से ही ख़बरें आ रही हैं कि पाकिस्तान की चौथी कोर के कोर कमांडर समेत कुछ दूसरे वरिष्ठ अफ़सरों को उनके ओहदों से हटा दिया गया है.
ब्रिटेन में बैठकर, फ़ौज के मौजूदा नेतृत्व के ख़िलाफ़ लगातार अभियान चला रहे पाकिस्तानी सेना के एक पूर्व मेजर ने 12 मई को ने उन अफ़सरों के नाम उजागर किए थे, जिन्हें नाफ़रमानी के चलते बर्ख़ास्त कर दिया गया है.
ब्रिटेन में बैठकर, फ़ौज के मौजूदा नेतृत्व के ख़िलाफ़ लगातार अभियान चला रहे पाकिस्तानी सेना के एक पूर्व मेजर ने 12 मई को ने उन अफ़सरों के नाम उजागर किए थे, जिन्हें नाफ़रमानी के चलते बर्ख़ास्त कर दिया गया है. ऐसी भी अटकलें थीं कि वैसे कई और कोर कमांडर भी अब बर्ख़ास्तगी की क़तार में हैं, जो इमरान ख़ान के मुरीद हैं, और बहुत जल्द उनके ख़िलाफ़ भी कार्रवाई होगी. पाकिस्तान में पिछले कुछ दिनों से इस तरह की सनसनीख़ेज़ ख़बरें जंगल में लगी आग की तरह फैल रही थीं. उसी के बाद इंटर सर्विसेज़ पब्लिक रिलेशंस (ISPR के मुखिया सामने आए और फ़ौज में फूट की अफ़वाहों को इतने बेमन और कमज़ोर तर्कों से ख़ारिज करने की कोशिश की, जिससे अटकलों और अफ़वाहों के बाज़ार में शायद ही कोई ठंडक पड़े.
साफ़ है कि पाकिस्तानी सेना के भीतर सबकुछ ठीक नहीं है. ये कोई नई ख़बर नहीं है कि पाकिस्तान की फ़ौज बंटी हुई है. पिछले एक साल से लगातार इस तरह की बातें चल रही हैं. सत्ता के गलियारों में इसे लेकर काना-फूसी हो रही है. इशारों में ऐसे मतलब निकाले जा रहे हैं, जिनसे पता चलता है कि पाकिस्तानी फ़ौज के जवानों ही नहीं अफ़सरों में भी फूट पड़ी हुई है. फ़ौज के भीतर ये दरार न केवल वैचारिक मसले पर, बल्कि सियासत के चलते भी पड़ी है. ऐसा लगता है कि पाकिस्तानी फौज में दरार डालकर, इमरान ख़ान ने वो काम कर दिखाया है, जिसे अब तक नामुमकिन और बर्दाश्त के क़ाबिल नहीं समझा जा सकता था. अगर अब जनरल आसिम मुनीर, फ़ौज पर अपना दबदबा क़ायम करने, और शायद बुरी तरह नाकाम मुल्क पाकिस्तान की इकलौती कुछ काम लायक़ संस्था यानी फ़ौज में कमान और कंट्रोल की व्यवस्था बहाल करने में जुटे हुए हैं, तो ये कोशिश जोख़िमों से भरपूर है.
अगर, पाकिस्तानी सेना के जनरलों का एक गिरोह, अपने सेनाध्यक्ष की नाफ़रमानी में सफल हो जाता है, तो ये एक ऐसी मिसाल बन जाएगा, जिसे बाद में दूसरे भी आज़मा सकते हैं.
इस मोड़ पर सेनाध्यक्ष की ताक़त दिखाने और फ़ौज के भीतर अनुशासन लाने के लिए अगर सख़्त क़दम उठाए जाते हैं, तो इससे या तो फ़ौज के भीतर एक नया संकट पैदा हो सकता है, या फिर सेना अपने आक़ा के पीछे मज़बूती से एकजुट हो सकती है. अगर फ़ौज के भीतर कोई नई चुनौती पैदा होती है, तो एक मुल्क के तौर पर पाकिस्तान का संकट और गहरा हो जाएगा. पाकिस्तानी सेना की संस्थागत अखंडता और एकजुटता में हमेशा के लिए दरार पड़ जाएगी. अगर, पाकिस्तानी सेना के जनरलों का एक गिरोह, अपने सेनाध्यक्ष की नाफ़रमानी में सफल हो जाता है, तो ये एक ऐसी मिसाल बन जाएगा, जिसे बाद में दूसरे भी आज़मा सकते हैं. सरकारों के तख़्तापलट की बात तो छोड़ दीजिए, आने वाले समय में पाकिस्तान में सेनाध्यक्ष के ख़िलाफ़ ही तख़्तापलट होने लगेगा. हालात और बिगड़े तो पाकिस्तान में भी सूडान जैसा ही मंज़र देखने को मिल सकता है. लेकिन, अगर जनरल आसिम मुनीर अपनी सत्ता स्थापित करने में कामयाब हो भी जाते हैं, तो फ़ौज के अफ़सरों और जवानों के बीच ये दरार पूरी तरह पाटी नहीं जा सकेगी और जनरल मुनीर और उनकी कमान के लिए चुनौती बनी रहेगी.
अनुशासन पर सवाल
इससे पहले भी पाकिस्तानी फ़ौज के बहुचर्चित अनुशासन पर दबाव पड़ता रहा है, जब महत्वाकांक्षी जनरलों ने सत्ता हथियाने की कोशिश की है और बीच के दर्जे वाले अधिकारियों और जूनियर अफ़सरों ने अपने आला अधिकारियों के बर्ताव पर सवाल उठाए हैं. 1971 में भारत से हार के बाद, पाकिस्तानी फ़ौज के जूनियर अधिकारियों ने खुलकर आला अफ़सरों को गालियां दी थीं, जिसके चलते बड़े जनरलों को अपने पद छोड़ने पड़े थे. 1970 के दशक में कुछ नौजवान अधिकारियों ने सेना के नेतृत्व के तख़्तापलट की योजना बनाई थी. 1990 के दशक के मध्य में मेजर जनरल ज़हीरुल इस्लाम अब्बासी की अगुवाई में अफ़सरों के एक समूह ने फ़ौज के सारे सीनियर अफ़सरों का सफ़ाया करके सत्ता अपने हाथ में लेने की साज़िश रची थी. 2000 के दशक की शुरुआत में कुछ नाख़ुश फ़ौजी अफ़सरों को गिरफ़्तार किया गया था, जो हिज़्बुत तहरीर संगठन से जुड़े हुए थे. गिरफ़्तार किए गए अफ़सरों में एक ब्रिगेडियर भी था.
2000 के दशक की शुरुआत में कुछ नाख़ुश फ़ौजी अफ़सरों को गिरफ़्तार किया गया था, जो हिज़्बुत तहरीर संगठन से जुड़े हुए थे. गिरफ़्तार किए गए अफ़सरों में एक ब्रिगेडियर भी था.
उस वक़्त, ISPR के महानिदेशक, मेजर जनरल अतहर अब्बास ने कहा था कि फ़ौज अपने अफ़सरों को किसी और समूह या गिरोह का सदस्य नहीं बनने दे सकती. लेकिन, आज बिल्कुल वही हो रहा है जब पाकिस्तानी फ़ौज के कुछ अधिकारी अपने संगठन से ज़्यादा इमरान ख़ान के मुरीद बन गए हैं. 2014 में भी जनरलों के एक गिरोह ने एक साज़िश रची थी. इसमें उस वक़्त के आईएसआई प्रमुख और कई कोर कमांडर शामिल थे. ये साज़िश तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ और सेनाध्यक्ष जनरल राहील शरीफ़ के ख़िलाफ़ रची गई थी. तब इमरान ख़ान के ‘धरने’ का इस्तेमाल ऐसे हालात पैदा करने के लिए करने का प्लान था, जिसमें नवाज़ शरीफ़ जनरल राहील शरीफ़ को बर्ख़ास्त करें और उसके बाद फ़ौज तख़्ता पलटने का दोहरा खेल खेले. यानी नवाज़ शरीफ़ के साथ साथ फ़ौज के भीतर भी सत्ता बदले.
हालांकि, ये सारी साज़िशें नाकाम रहीं. लेकिन, इनसे ये संकेत मिलता है कि पाकिस्तानी फ़ौज में अफ़सरों द्वारा सत्ता पर क़ाबिज़ होने का लालच करने की समस्या बनी हुई है. इस वक़्त भी उसी तरह का कुछ हो रहा है. लेकिन, ऐसा लगता है कि इस बार के हालात पहले से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक हैं.
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