Author : Manoj Joshi

Expert Speak Raisina Debates
Published on Jun 24, 2023 Updated 0 Hours ago

अमेरिकी प्रभुत्व या वैश्वीकरण 2.0 को बरक़रार रखने के लिए अमेरिका की नीति को आकार देने में बाइडेन प्रशासन असाधारण तौर पर काफ़ी तेज़ी से और ज़ोरदार तरीक़े से कार्य कर रहा है.

वैश्वीकरण 2.0 को आकार देने में राष्ट्रीय सुरक्षा की भूमिका अहम!

ऐसा महसूस होता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा वैश्वीकरण 2.0 का मूल मंत्र बन गई है, जिस प्रकार से मुक्त व्यापार इससे पहले वैश्वीकरण का मूल मंत्र था. अप्रैलमें इस बात पर कोई हैरानी नहीं हुई थी, जब संयुक्त राज्य अमेरिका (US) की वित्त मंत्री जैनेट येलेन ने यह स्पष्ट कर दिया कि चीन के साथ संबंधों मेंराष्ट्रीय सुरक्षा की हमेशा आर्थिक मुद्दों से अधिक अहमियत होगी. हालांकि, उनकी इन टिप्पणियों का उद्देश्य प्रौद्योगिकी को बीजिंग के लिए सीमितकरने वाले हालिया नीतिगत क़दमों के बारे में चीन को फिर से आश्वस्त करना था, लेकिन उन्होंने इसके माध्यम से चीज़ों को देखने के वाशिंगटन के एकनए नज़रिए को स्पष्ट कर दिया था

राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने "राष्ट्रीय सुरक्षा को पार्टी की विचारधारा का मुख्य घटक बना दिया है." मूलतः इसमें राजनीतिक, क्षेत्रीय, सैन्य, आर्थिक, सांस्कृतिक, तकनीक़ी और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्र शामिल थे, लेकिन अब इसमें सूचना की सुरक्षा, संसाधनों की सुरक्षा, जैव सुरक्षा और अंतरिक्ष सुरक्षा जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं.

हालांकि इससे पहले, चीन ने यह साफ कर दिया था कि राष्ट्रीय सुरक्षा उसके वैश्विक मॉडल में सबसे महत्वपूर्ण तत्व है. मेरिक्स के एक पेपर में कहा गयाहै कि जबकि "व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा" को आधिकारिक तौर पर वर्ष 2014 में पेश किया गया था, लेकिन अब इसमें 16 सुरक्षा क्षेत्र शामिल हैं, जिन्हेंचीन की प्रगति और भविष्य के लिए ज़रूरी माना जाता है.

राष्ट्रीय सुरक्षा की महत्ता

पेपर के मुताबिक़ चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने "राष्ट्रीय सुरक्षा को पार्टी की विचारधारा का मुख्य घटक बना दिया है." मूलतः इसमें राजनीतिक, क्षेत्रीय, सैन्य, आर्थिक, सांस्कृतिक, तकनीक़ी और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्र शामिल थे, लेकिन अब इसमें सूचना की सुरक्षा, संसाधनों की सुरक्षा, जैव सुरक्षा औरअंतरिक्ष सुरक्षा जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं.

इसके अलावा, शी जिनपिंग ने क़ानूनी और संस्थागत सहायता प्रणालियों को विकसित एवं उन्नत किया है और पार्टी एवं राज्य की संस्थाओं में सुरक्षाकार्यों को समन्वित करने के लिए वर्ष 2014 में एक नेशनल सिक्योरिटी कमीशन (NSC) की स्थापना की थी. चीन में केंद्रीय स्तर पर राष्ट्रीय सुरक्षाकमीशन के अलावा, प्रांतीय स्थानीय स्तर पर भी NSC हैं.

पिछले महीने के अंत में 20वीं पार्टी कांग्रेस के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग की पहली बैठक आयोजित की गई. इस बैठक में इस बात पर बल दिया गयाकि "मौज़ूदा वक़्त में हम जिन राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दों का सामना कर रहे हैं, उनकी जटिलता और मुश्किल काफ़ी बढ़ गई है." बैठक में "बॉटम लाइन सोचयानी किसी स्थिति को लेकर सबसे महत्वपूर्ण विचार और सबसे ख़राब परिस्थिति वाली सोच" का पालन करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया. इसमें यह भी कहा गया कि "नए सुरक्षा मॉडल के साथ विकास के नए तरीक़ों की गारंटी देना और अनुकूल बाहरी सुरक्षा वातावरण को आकार देने केलिए पहल करना ज़रूरी है."

इस बैठक के रीडआउट में कहा गया है कि मीटिंग में राष्ट्रीय सुरक्षा ज़ोख़िम निगरानी एवं प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली के निर्माण में तेज़ी लाने और राष्ट्रीयसुरक्षा शिक्षा को मज़बूत करने को लेकर दस्तावेज़ों की समीक्षा की गई और उन्हें मंजूरी प्रदान की गई.

बाइडेन प्रशासन ने भी टैरिफ़ को बरक़रार रखा है, लेकिन चीन में स्थापित बिजनेस को अपने देश वापस लाने या मित्र देशों में स्थापित करने को राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बना दिया है. इसने एक नई औद्योगिक नीति शुरू की है, जिसमें चीन को निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं और यह सब राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर किया गया है.

देखा जाए तो राष्ट्रीय सुरक्षा ने लंबे वक़्त से अमेरिका के वैश्विक नज़रिए को आकार दिया है. पिछले कई वर्षों की घटनाओं ने इसमें एक अलग बारीक़ साअंतर लाने का काम किया है और यह भी स्पष्ट हो गया है कि लक्ष्य चीन है. अतीत में भू-राजनीति और भू-अर्थशास्त्र के अपने अलग-अलग क्षेत्र थे. लेकिन बीजिंग के खिलाफ ट्रंप प्रशासन द्वारा शुरू किए गए टैरिफ़ युद्ध से एक स्पष्ट बदलाव आया है. बाइडेन प्रशासन ने भी टैरिफ़ को बरक़रार रखा है, लेकिन चीन में स्थापित बिजनेस को अपने देश वापस लाने या मित्र देशों में स्थापित करने को राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बना दिया है. इसने एक नईऔद्योगिक नीति शुरू की है, जिसमें चीन को निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं और यह सब राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर किया गया है. अमेरिका कीअक्टूबर 2022 की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति स्पष्ट है कि चीन "अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को नया आकार देने के मंसूबे की वजह से और ऐसा करने के लिए तेज़ीसे आर्थिक, राजनयिक, सैन्य और तकनीक़ी ताक़त हासिल करने के लिहाज़ से, दोनों ही मामलों में इकलौता प्रतिस्पर्धी है."

वैश्वीकरण 2.0 

अमेरिकी नीति निर्माताओं ने बयानों और घोषणाओं में इन क़दमों के महत्व को कम करने की कोशिश की है. लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता किइसको किस नज़रिए से देखा जाता है, लेकिन यह साफ नज़र आता है कि वैश्वीकरण 2.0 कैसा होगा. अमेरिका वित्त मंत्री येलेन ने ऊपर उद्धृत किए गएअपने बयान में कहा है कि, "हम चीन के साथ रचनात्मक और साफ-सुथरे आर्थिक संबंध चाहते हैं." उन्होंने स्वीकार किया कि अमेरिकी नीतियों की वजहसे आर्थिक असर पड़ेगा, लेकिन "वे नीतियां पूरी तरह से हमारी सुरक्षा और मूल्यों के बारे में हमारी चिंताओं से प्रेरित है."

वैश्वीकरण 2.0 कैसा दिखेगा इसके बारे में अप्रैल के अंत में अपने बयान में अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने इसके तत्वों को सामनेरखा. उन्होंने कहा कि इसमें अमेरिका और उसके आसपास के साझेदारों के भीतर एक नई औद्योगिक और नवाचार रणनीति शामिल होगी. यह"विविधीकृत और लचीली वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं" को बढ़ावा देगा और एक "निष्पक्ष और अधिक टिकाऊ आर्थिक व्यवस्था" का सृजन करेगा.

जहां तक चीन का मसला है, तो अमेरिका कुछ "बनावटी उपाय" कर रहा था, जो "सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं पर आधारित थे." इससे भी अहमबात यह है कि अमेरिका "अलगाव" के बारे में नहीं सोच रहा था, बल्कि अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं को "ज़ोख़िम मुक्त करने और उनमें विविधता लाने" केबारे में सोच रहा था. अतीत की तरह, अमेरिकी नियंत्रण कहीं कहीं "उस टेक्नोलॉजी पर सीमित रूप से केंद्रित होगा, जो सैन्य संतुलन को झुका सकताहै." इस पूरे विचार का मकसद प्रतिस्पर्धा को ज़िम्मेदारी के साथ प्रबंधित करना था.

रूस और चीन के बीच "असीमित" साझेदारी ने भी चिंता पैदा करने का काम किया है, क्योंकि आशंका है कि रूस ने जिस प्रकार का बर्ताव यूक्रेन के साथकिया है, चीन उससे प्रेरित होकर भविष्य में ताइवान के प्रति इसी प्रकार की कार्रवाई को अंज़ाम दे सकता है. इसने पश्चिमी गठबंधन और जापान कोमज़बूत करने और उन्हें नए अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा संवाद को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने का काम किया है. जैसा कि अपने एक हालियासाक्षात्कार में NATO के महासचिव जेन्स स्टोलेनबर्ग ने बताया है कि युद्ध "यह दर्शाता है कि सुरक्षा अब क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि सुरक्षा एक वैश्विकमुद्दा है."

व्यावहारिक तौर पर बाइडेन प्रशासन का राष्ट्रीय सुरक्षा दृष्टिकोण पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में खुद खुद सामने आया है. एशिया मामलों पर पेंटागन के शीर्षव्यक्ति एली रैटनर के शब्दों में, उन्होंने केवल अमेरिकी सहयोगियों को अपने नज़रिए के साथ जोड़ा है और उनके साथ निकटता से नेटवर्क स्थापितकिया है, बल्कि चीनी की आक्रामकता को रोकने के मकसद से अमेरिकी दृढ़ संकल्प का संकेत देने हेतु उन्हें सैन्य अभ्यास और संयुक्त अभ्यास में भीशामिल किया.

बाइडेन प्रशासन ने इन देशों के साथ नज़दीकी बढ़ाई और गठबंधन स्तर पर उनके साथ बातचीत को आगे बढ़ाने का काम किया. इस क्रम में जापान द्वारा अपनी "सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती" यानी चीन से निपटने की दिशा में अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति को उल्लेखनीय तौर पर परिवर्तित करने का निर्णय एक प्रमुख घटनाक्रम है.

बाइडेन प्रशासन ने सिर्फ़ क्वाड को एकजुट करने के काम की गति दोगुनी कर दी है, बल्कि एक नया सैन्य गठबंधन AUKUS भी बनाया है, जोयूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका की सहभागिता वाला एक त्रिपक्षीय सैन्य गठजोड़ है. ट्रम्प प्रशासन ने दक्षिण कोरिया और जापान कोदरकिनार कर दिया था, लेकिन बाइडेन प्रशासन ने इन देशों के साथ नज़दीकी बढ़ाई और गठबंधन स्तर पर उनके साथ बातचीत को आगे बढ़ाने का कामकिया. इस क्रम में जापान द्वारा अपनी "सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती" यानी चीन से निपटने की दिशा में अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति को उल्लेखनीय तौरपर परिवर्तित करने का निर्णय एक प्रमुख घटनाक्रम है.

एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम फिलीपींस की नई सरकार द्वारा अमेरिका को अपने देश में चार और सैन्य अड्डों तक पहुंच की अनुमति देने का फैसला है. इन चार सैन्य अड्डों में से तीन ठिकाने इस द्वीपीय देश के उत्तरी हिस्से में ताइवान से बाशी चैनल के विपरीत दिशा में मौज़ूद हैं, जबकि चौथा सैन्य अड्डाविवादित दक्षिण चीन सागर से सटे पलावन द्वीप पर स्थित है. अप्रैल के मध्य में फिलीपींस और अमेरिका ने अपना अब तक का सबसे बड़ा संयुक्त सैन्यअभ्यास आयोजित किया था, जिसमें 17,500 सैनिक शामिल हुए थे.

इस सबके बावज़ूद पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में सैन्य संतुलन चीन की तरफ झुकना शुरू हो गया है. जैसा कि अटलांटिक मैगजीन के लेख में बताया गया है, मुद्दा सिर्फ युद्ध नहीं है, बल्कि सच्चाई यह है कि अमेरिकी सैन्य प्रभुत्व ने "पूर्वी एशिया में अमेरिकी आर्थिक और सुरक्षा प्रणाली को सहारा दिया है". दूसरेशब्दों में इसे वैश्वीकरण कहा जा सकता है.

निष्कर्ष

बाइडेन प्रशासन अमेरिकी प्रभुत्व या वैश्वीकरण 2.0 को बरक़रार रखने के लिए अमेरिकी नीति को आकार देने में असामान्य तौर पर काफ़ी तेज़ी से औरज़ोरदार तरीक़े से कार्य कर रहा है. लेकिन इसकी गठबंधन प्रणाली के विभिन्न पहलुओं को प्रभावी ऑपरेशनल योजनाओं में एकीकरण करने को लेकरअभी भी बहुत कुछ काम किया जाना शेष है.

नए आर्थिक फ्रेमवर्क को आकार देना भी उतना ही अहम है, जो नए वैश्वीकरण 2.0 की आधारशिला होगी. पुरानी ट्रांस-पैसिफ़िक पार्टनरशिप (TPP) कोदोबारा से जीवित करने की संभावना कम है. बाइडेन प्रशासन ने इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क (IPEF) जैसे पहल को सामने लाने का काम कियाहै. लेकिन, अभी तक यह केवल एक परिकल्पना है, जिसका वादा ज़मीनी स्तर पर साबित करना होगा.

लेकिन अगर वर्ष 2024 के आगामी राष्ट्रपति चुनावों में डोनाल्ड ट्रम्प राष्ट्रपति चुने जाते हैं तो यह अमेरिकी मॉडल या उसके काम करने के तरीक़े मेंउलटफेर कर सकता है. राष्ट्रीय सुरक्षा पर ट्रम्प के विचार सर्वविदित हैं और उनके विचार अमेरिकी सहयोगियों के लिए बहुत उत्साहजनक नहीं हैं, फिरचाहे वो सहयोगी यूरोप में हों या एशिया में. वह जिस प्रकार की अस्थिर और मनमानी नीति बनाने के लिए जाने जाते हैं, वो और भी ज़्यादा हानिकार औरविपरीत हो सकता है. ज़ाहिर है कि वर्ष 2016 में जब डोनाल्ड ट्रम्प सत्ता में आए थे, तब की तुलना में वर्तमान की भू-राजनीतिक परिस्थितियां बहुतज़्यादा चिंताजनक और भयावह हैं.

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मनोज जोशी ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में डिस्टिंग्विश्ड फेलो हैं.

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Manoj Joshi is a Distinguished Fellow at the ORF. He has been a journalist specialising on national and international politics and is a commentator and ...

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