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ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों के जो शहर मौसम में चरम बदलावों के ख़तरों का सामना कर रहे हैं, उनमें शीर्ष पर हैं दिल्ली, मनीला, जकार्ता, लागोस, मेक्सिको सिटी, बीजिंग और शंघाई. अगर जलवायु न्याय की बात को छोड़ भी दिया जाए तो ये माना जा सकता है कि ग्लोबल नॉर्थ यानी विकसित देश इस समाचार को गंभीरता से नहीं लेंगे. उन्हें इससे निपटने की ज़रूरत समझ नहीं आएगी. सबसे चिंताजनक बात ये है कि जलवायु परिवर्तन से पैदा हुए वाली आपदाएं हमारे दरवाजे पर खड़ी हैं. यूरोपीय महाद्वीप में इसका आर्थिक प्रभाव 10 अरब यूरो से ज़्यादा है. टोरंटो में इसका असर 1 अरब डॉलर से अधिक है, जबकि फ्लोरिडा में इससे 85 अरब डॉलर का नुकसान होने की आशंका है.
लेकिन सवाल ये है कि क्या जलवायु अनुकूलन गतिविधियों की कमी पर ग्लोबल साउथ के देशों में एक समान चिंता होनी चाहिए? यहां जलवायु अनुकूलन से हमारा अर्थ वास्तविक या भविष्य में अनुमानित जलवायु के अनुसार खुद को समायोजित करने की क्षमता से है.
2050 तक विकासशील देशों में शहरी आबादी दोगुनी हो जाएगी. अगर दूसरे सभी चीजें समान रहें तब भी ग्लोबल साउथ के देशों में होने वाली किसी भी हलचल का ग्लोबल नॉर्थ पर आर्थिक प्रभाव पड़ेगा. ऐसे ही तीन कारणों के बारे में आपको बताते हैं.
वेरिस्क मेपलक्रॉफ्ट ने जलवायु संबंधित ज़ोखिमों का सामना कर रहे शहरों पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है. इनमें से टॉप-100 शहरों में से 99 शहर एशिया में हैं. एशिया और अफ्रीका उन क्षेत्रों की सूची में शीर्ष पर हैं जहां जलवायु परिवर्तन, उच्च तापमान में सबसे ज़्यादा योगदान दे रहा है. तूफान, सूखे और बाढ़ की आशंका को बढ़ा रहा है. इससे इन क्षेत्र के देशों के आर्थिक विकास और यहां रहने वाले लोगों के जीवन की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है.
अंतर सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल की छठी आकलन रिपोर्ट में इसके ख़तरों का उल्लेख किया गया था. इस रिपोर्ट से पता चलता है कि 1950 के दशक से ग्लोबल साउथ के कई इलाकों में चरम गर्मी की लहरों की आवृत्ति और तीव्रता ढाई गुना बढ़ गई है. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की जलवायु परिवर्तन रिपोर्ट-2021 में भी इन ज़ोखिमों का ज़िक्र है. रिपोर्ट के मुताबिक विकासशील देशों ने पिछले दशक की तुलना में जलवायु से संबंधित आपदाओं में 20 प्रतिशत की वृद्धि का अनुभव किया है.
क्या विकासशील देशों में हो रहे जलवायु परिवर्तन का असर विकसित देशों पर होगा?
क्या ग्लोबल नॉर्थ को ग्लोबल साउथ में हो रहे जलवायु परिवर्तन से चिंतित होना चाहिए? ये सवाल इसलिए खड़ा हो रहा है कि ये देश बहुत गर्व से ग्लोबल नॉर्थ-फर्स्ट की नीति की तरफ बढ़ रहे हैं? उनकी अपनी चुनौतियां हैं, जैसे कि सस्ती आवास और स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच, गन सेफ्टी, रोजगार और अवैध इमिग्रेशन. इन विकसित देशों के लिए विकासशील देशों के शहरों का भविष्य चर्चा का विषय क्यों होना चाहिए? इसे बोर्ड रूम के एजेंडे में या विधायिका जैसे मज़बूत मंच पर जगह क्यों मिलनी चाहिए?
एक मशहूर कहावत है कि "जब किसी चीज की वजह से पैसों पर ख़तरा पैदा होने लगा है तो सबसे उदासीन बैठे लोग भी अचानक उसमें रुचि लेने लगते हैं". 2050 तक विकासशील देशों में शहरी आबादी दोगुनी हो जाएगी. अगर दूसरे सभी चीजें समान रहें तब भी ग्लोबल साउथ के देशों में होने वाली किसी भी हलचल का ग्लोबल नॉर्थ पर आर्थिक प्रभाव पड़ेगा. ऐसे ही तीन कारणों के बारे में आपको बताते हैं.
- विदेशी प्रत्यक्ष निवेश पर ख़तरा
विकासशील देशों के जिन शहरों में जलवायु परिवर्तन से सबसे ज़्यादा ख़तरा है, उन्हीं शहरों में विकसित देशों की तरह से काफ़ी विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) किया गया है. इन शहरों में पूंजी का प्रवाह भी हुआ है. यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस ऑन ट्रेड एंड डेवलपमेंट (UNCTAD) की विश्व निवेश रिपोर्ट 2024 के मुताबिक एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र के विकासशील देशों में करीब 866 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हुआ है. ये वैश्विक एफडीआई का 60 प्रतिशत है. 1.3 ट्रिलियन डॉलर इन देशों में निवेश किए गए हैं. ये निवेश मुख्य रूप से विनिर्माण, प्रौद्योगिकी और बुनियादी ढांचे के विकास पर किया गया है.
इस तरह के निवेश का एक बड़ा उदाहरण ये है कि, कुछ अनुमानों के अनुसार, एप्पल और उसके सप्लायर फॉक्सकॉन ने भारत में करीब 1.5 अरब से 2 अरब डॉलर के बीच निवेश किया है. ये भारत में बने सभी आईफोनों का लगभग 14 प्रतिशत आपूर्ति करता है, जिसकी कीमत 14 अरब डॉलर है. कहा जा रहा है कि 2024 के अंत से, एप्पल ने अपनी आपूर्ति श्रृंखला में विविधता लाने का फैसला किया है. अब वो भारत में एयरपॉड्स का उत्पादन भी करेगा. सटीक तुलना करने के लिए अगर ग्लोबल नॉर्थ एक व्यक्ति या एक कंपनी मान लिया जाए तो ये कहा जा सकता है कि उसने 1.3 ट्रिलियन डॉलर का जो निवेश किया है, उसके पोर्टफोलियो का 60 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा ग्लोबल साउथ के देशों में आवंटित किया गया है. ज़ाहिर सी बात है कि अगर ग्लोबल साउथ के देशों में जलवायु परिवर्तन से संबंधित कोई ख़तरा पैदा होता है तो ग्लोबल नॉर्थ के देशों को भी इसके ज़ोखिम का सामना करना पड़ेगा, खासकर इसके आर्थिक प्रभाव.
इससे बचने के लिए विकसित देश कुछ समय के लिए विकासशील देशों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को कम करने का विकल्प चुन सकते हैं, जिससे इस आर्थिक ज़ोखिम को सीमित किया जा सके. हालांकि, ऐसा किए जाने पर वो निवेश प्रभावित हो सकता है जो ग्लोबल साउथ के देश ग्लोबल नॉर्थ में करते हैं. 2023 की यूएनसीटीएडी स्टैटिक्स हैंडबुक के मुताबिक ये निवेश करीब 459 अरब डॉलर का था, जो ग्लोबल नॉर्थ में होने वाले कुल एफडीआई का 25 प्रतिशत है. इसके अलावा, विकसित देशों को विकासशील देशों से कम लागत में दक्षता मिलती है. अगर कोई संकट खड़ा होता है तो ग्लोबल नॉर्थ के देशों को बिना कीमत बढ़ाए या अपनी निचली रेखा को प्रभावित किए बिना दक्षता खोजने में मुश्किल होगी.
- ख़तरे में हैं विकसित देशों की आपूर्ति श्रृंखलाएं
विकासशील देश अपने यहां मिलने वाले कच्चे माल से लेकर उनसे निर्मित विभिन्न उत्पादों को विकसित देशों में निर्यात करते हैं. उदाहरण के लिए, कॉफी का उत्पादन मुख्य रूप से ब्राजील, कोलंबिया, होंडुरास, ग्वाटेमाला, इथियोपिया, युगांडा, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे विकासशील देशों में होता है. जलवायु परिवर्तन कॉफी की गुणवत्ता और इसकी पैदावार को ख़तरे में डाल रहा है. अगर जलवायु अनुकूलन गतिविधियों पर काम नहीं किया गया तो इससे कॉफी की आपूर्ति पर ज़ोखिम उत्पन्न हो सकता है. इसका मतलब है ये कि करीब 40 अरब डॉलर का उद्योग और हर रोज़ एक कॉफी पीने की आदत जलवायु परिवर्तन के कारण ख़तरे में है, खासकर ग्लोबल साउथ के देशों में.
2021 में, ग्लोबल साउथ से 5.6 ट्रिलियन डॉलर से ज़्यादा का निर्यात किया गया था. इसमें अफ्रीका और लैटिन अमेरिका ने खनिजों और कृषि उत्पादों जैसी प्राथमिक वस्तुओं का निर्यात किया, जबकि चीन और भारत जैसे एशियाई देशों के निर्यात में सबसे ज़्यादा हिस्सेदारी विनिर्मित वस्तुओं (मैन्युफेक्चर्ड गुड्स) की थी. इसने ग्लोबल साउथ को वैश्विक व्यापार नेटवर्क का एक अभिन्न अंग बना दिया है. जलवायु परिवर्तन से अगर इन देशों में कोई आपदा आती है तो फिर उत्पादन और इस वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में ज़ोखिम पैदा होगा. इन देशों के उत्पादों की गुणवत्ता और उनकी उपलब्धता में बदलाव भी आ सकता है. उद्योग और कारोबार करने की लागत बढ़ सकती है. अगर ऐसा होता है तो बढ़ी हुई लागत को बोझ अंतिम उपयोगकर्ता यानी आम आदमी पर डाली जाएगी. इससे उनकी जीवन यापन की लागत बढ़ जाएगी.
- उत्पादकता और आजीविका में कमी आना
हालांकि इस बात का अनुमान लगाना मुश्किल है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से कितनी मौतें होती हैं, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने इस बात का अनुमान लगाया है कि इसका काम के घंटों पर क्या असर पड़ता है. आईएलओ के मुताबिक बढ़ते तापमान, खराब वायु गुणवत्ता और बाढ़ जैसी आपदाओं में बढ़ोत्तरी वैश्विक कार्य के घंटों को 2.2 प्रतिशत कम कर देगी, विशेष रूप से उन उद्योगों में, जिनमें बड़ी संख्या में श्रम का इस्तेमाल होता है. अगर इससे वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को होने वाले नुकसान का अंदाज़ा लगाएं तो ये 2.4 ट्रिलियन डॉलर और 8 करोड़ पूर्णकालिक नौकरियों के बराबर होता है. सबसे अधिक प्रभावित देशों में दक्षिण एशिया और उप-सहारा अफ्रीका के देश शामिल हैं, क्योंकि यहां की बड़ी आबादी कृषि और श्रम से जुड़ी गतिविधियों में शामिल है. 2.4 ट्रिलियन डॉलर का ये नुकसान कितना बड़ा है, इसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि ये कनाडा, इटली या ब्राजील की वार्षिक जीडीपी के बराबर होगा.
जलवायु परिवर्तन से अगर इन देशों में कोई आपदा आती है तो फिर उत्पादन और इस वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में ज़ोखिम पैदा होगा. इन देशों के उत्पादों की गुणवत्ता और उनकी उपलब्धता में बदलाव भी आ सकता है.
जलवायु परिवर्तन की वजह से उत्पादकता और बुनियादी ढांचे को होने वाले नुकसान के संयुक्त प्रभाव से विकासशील देशों में जीडीपी की वृद्धि दर धीमी होने की आशंका है. जलवायु ज़ोखिम और उसकी प्रतिक्रिया पर मैकिन्से रिपोर्ट इसके ख़तरों की तरफ इशारा करती है. रिपोर्ट के मुताबिक 2050 तक जलवायु परिवर्तन से जीडीपी को होने वाला नुकसान कुछ क्षेत्रों में 15-20 प्रतिशत तक पहुँच सकता हैं. अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के देश इससे ज़्यादा प्रभावित होंगे, क्योंकि इन देशों की अर्थव्यवस्थाएं कृषि और प्राकृतिक संसाधनों पर बहुत ज़्यादा निर्भर हैं. विश्व आर्थिक मंच ने तो यहां तक अनुमान लगा दिया कि सिर्फ बाढ़ की वजह से 2040 तक हर साल 4.3 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है. अगर इस संकट का समाधान नहीं निकाला गया तो सबसे ज़्यादा नुकसान ग्लोबल साउथ के देशों को होगा.
जलवायु परिवर्तन का गंभीर प्रभाव उन लोगों पर पड़ेगा, जो विकसित देशों के लिए वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करते हैं. इसका असर ग्लोबल नॉर्थ के देशों से वस्तु और सेवाएं खरीदने वाले ग्लोबल साउथ के लोगों पर भी होगा. कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि इसका असर विकसित देशों से विकासशील देशों में किए गए विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के लाभ पर पड़ेगा. इतना ही नहीं ये विकसित देशों की कंपनियों के लिए व्यापार करने की लागत को और बढ़ाएगा.
विकसित देश क्या कर सकते हैं?
उपरोक्त सभी बातों को ध्यान में रखते हुए ये कहा जा सकता है कि विकसित देशों को जलवायु अनुकूलन गतिविधियों के लिए विकासशील देशों को वित्तीय मदद देनी चाहिए. ऐसा कहने के कई मज़बूत कारण हैं. सबसे बड़ा कारण तो ये है कि अगर जलवायु अनुकूलन का काम नहीं किया जाता तो इसका असर ग्लोबल नॉर्थ के देशों पर भी पड़ेगा. विकसित देशों में रहने वाले हर नागरिक की जीवन यापन की लागत को ये सीधे और नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा. अब सवाल ये है कि जब वित्तीय मदद के ऐसे मज़बूत तर्क मौजूद हैं तो ग्लोबल नॉर्थ के देशों ने जलवायु अनुकूलन गतिविधियों के लिए 2021-22 में सिर्फ 63 अरब डॉलर का ही योगदान क्यों दिया, जबकि विकासशील देशों को 2030 तक इस काम के लिए हर साल 212 अरब डॉलर की मदद की ज़रूरत है?
इस काम के लिए सार्वजनिक पूंजी की क्षमता सीमित है, इसलिए निजी पूंजी की सक्रिय भागीदारी ज़रूरी है. निजी पूंजी अपने साथ तकनीकी विशेषज्ञता और दक्षता भी लाती है. सिर्फ अमेरिकी कंपनियों के पास 4.6 ट्रिलियन डॉलर की नकद का भंडार है, और वर्तमान में प्राइवेट इक्विटी 2.4 ट्रिलियन डॉलर की नकद राशि जमा कर रही है.
पैसों की कमी को पूरा करने विकसित देशों से क्यों नहीं आ रही निजी पूंजी?
इस सवाल का जवाब उन नैतिक मूल्यों में छिपा है, जहां निवेश में हितधारकों के फायदे को सही ठहराया जाता है. पारंपरिक रूप से बात की जाए तो जलवायु अनुकूलन गतिविधियों को सार्वजनिक हित के काम के रूप में देखा जाता है. इसे ऐसा काम माना जाता है, जिसे पूरा करने की जिम्मेदारी सरकारों की है, निजी कंपनियों या संस्थाओं की नहीं. सरकार इस पर काम कर भी रही है. सार्वजनिक बुनियादी ढांचे पर खर्च करके, उसे बनाए रखकर और उसकी रक्षा करके व्यक्तियों के लिए उसे बेहतर बनाया जा रहा है. हर व्यक्ति इस उम्मीद में काम करता है कि उसका भविष्य वर्तमान से अच्छा होगा. सरकार टैक्स के माध्यम से इस काम के लिए वित्त हासिल भी कर रही है. अपने पिछले काम के आधार पर प्रतिभूति उपकरणों के ज़रिए पूंजी जुटा रही है. उन लोगों के कल्याण पर रकम खर्च कर रही है, जो सत्तारूढ़ पार्टी को सरकार में बनाए रखने के लिए वोट देते हैं.
अब सवाल ये है कि जब वित्तीय मदद के ऐसे मज़बूत तर्क मौजूद हैं तो ग्लोबल नॉर्थ के देशों ने जलवायु अनुकूलन गतिविधियों के लिए 2021-22 में सिर्फ 63 अरब डॉलर का ही योगदान क्यों दिया, जबकि विकासशील देशों को 2030 तक इस काम के लिए हर साल 212 अरब डॉलर की मदद की ज़रूरत है?
निजी पूंजी के लिए सबसे बड़ा आकर्षण मौजूदा ग्राहकों को बरकरार रखना और नए ग्राहकों को जोड़ना होता है. इसके अलावा उसकी मुख्य चिंता ये होती है कि आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षित रहे, जिससे वस्तुओं और सेवाओं को बनाने और स्थानांतरित करने का काम जारी रहे. इसी से ये सुनिश्चित होता है कि उन्होंने जिस पूंजी का निवेश किया है. उस पर उन्हें लाभ मिलता रहे. मान लीजिए एक छोटे से गांव में जलवायु अनुकूलन गतिविधियों में निजी पूंजी का निवेश होता है. इससे वहां के निवासियों को तो सुविधा होगी, लेकिन ये ज़रूरी नहीं कि इससे निजी पूंजी निवेश करने वाले को फायदा हो. उसे लाभ तभी होगा, जब वहां के निवासी आपूर्ति श्रृंखला में सीधे योगदान करते हों, वस्तुओं और सेवाओं के एक महत्वपूर्ण हिस्सा का उपभोग करते हों, या फिर निजी पूंजी की निष्क्रियता मौजूदा या भविष्य के ग्राहकों की सुरक्षा को ख़तरे में डालती हो. उदाहरण के लिए, OpenAI, सॉफ्टबैंक और ओरेकल द्वारा हाल ही में घोषित 500 अरब डॉलर के निवेश के मामले को ही देख लें. ये निवेश टेक्सास में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का बुनियादी ढांचा और डेटा सेंटर बनाने के लिए किया गया है. टेक्सास की अर्थव्यवस्था में निवेश करने के पीछे निजी क्षेत्र का अपना स्वार्थ है. इससे यहां करीब 1 लाख नौकरियां पैदा होंगी, टैक्स के ज़रिए भी योगदान दिया जाएगा, लेकिन इन कंपनियों का भरोसा है कि वो ग्राहकों से सदस्यता शुल्क लेकर अपने निवेश पर लाभ कमा सकती है. उन्हें इस बात पर विश्वास है कि लोग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की कम्प्यूटेशनल पावर का इस्तेमाल करना चाहते हैं, क्योंकि ये कम लागत के साथ बेहतर दक्षता देती है.
इसी तरह के किसी मॉडल का इस्तेमाल कर विकसित देशों से प्रबंधित पूंजी जुटा सके और ये बता सकें कि विकासशील देशों में इसके इस्तेमाल से हमें कितनी पूंजी हासिल हुई तो हम ग्लोबल साउथ के देशों में जलवायु अनुकूलन गतिविधियों के लिए फंड जुटा सकते हैं.
हालांकि निजी पूंजी को इस काम में भागीदारी निभाने के लिए मज़बूर करने वाली अनिवार्य नीति पारित करने से पहले कुछ चीजों का आकलन करना ज़रूरी है. लक्षित जलवायु अनुकूलन गतिविधियों के माध्यम से होने वाले लाभ को सुनिश्चित करने के निजी पूंजी तक आसान पहुंच दिया जाना ज़रूरी है.
जलवायु अनुकूलन गतिविधियों में वित्तीय मदद देने के लिए कई फंडिंग मॉडल बनाए जाने का अवसर हमारे सामने है. एक मॉडल तो प्रॉपर्टी असेस्ड क्लीन एनर्जी (PACE) भी है. इस फंड का इस्तेमाल बुनियादी ढांचे को कार्बन मुक्त बनाने के लिए किया जाता है. अगर इसी तरह के किसी मॉडल का इस्तेमाल कर विकसित देशों से प्रबंधित पूंजी जुटा सके और ये बता सकें कि विकासशील देशों में इसके इस्तेमाल से हमें कितनी पूंजी हासिल हुई तो हम ग्लोबल साउथ के देशों में जलवायु अनुकूलन गतिविधियों के लिए फंड जुटा सकते हैं.
आदित्य टांगरी ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में नॉन रेज़ीडेंट कॉन्ट्रिब्यूट (रिसर्च) हैं.
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