सप्लाई चेन्स के सिक्योरिटाइजेशन (securitisation) और चीन पर निर्भरता ख़त्म करने की बढ़ती कोशिशों के बीच, भारत ने सप्लाई चेन बदलाव में अपने लिए ज्य़ादा अहम भूमिका देखी है. विभिन्न क्षेत्रों (सेक्टरों) में काम करनेवाली फर्में और निवेशक, ख़ासकर जो इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्यूफैक्चरिंग सेवाओं (EMS) में हैं, अपनी सप्लाई चेन्स के बड़े हिस्सों को भारत स्थानांतरित कर चुके हैं. ‘मेक इन इंडिया’ और प्रोडक्शन लिंक्ड इनीशिएटिव (PLI) जैसी नीतियों से उत्साहित, एप्पल की आईफोन सप्लाई चेन में शामिल फॉक्सकॉन, विस्ट्रॉन और पेगाट्रॉन जैसी बड़ी ईएमएस फर्मों ने अपनी असेंबली लाइनों और सप्लाई चेनों को तमिलनाडु और कर्नाटक में स्थापित किया है. सप्लाई चेनों का स्थानांतरण उस डर को दिखाता है, जो वैश्विक सप्लाई चेन में बहुत से उत्पादों व घटकों (components) के इकलौते आपूर्तिकर्ता के बतौर चीन पर अति-निर्भरता से उपजा है. भू-राजनीति (geopolitics) में भी यह डर दिखता है. ऐसे में, अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए फार्मास्यूटिकल्स, इंटरनेट व कंप्यूटर टेक्नोलॉजी (ICT) के साथ-साथ सेवा व परामर्श (कंसल्टिंग) क्षेत्र में भारत एक आकर्षक विकल्प बन जाता है.
सप्लाई चेनों का स्थानांतरण उस डर को दिखाता है, जो वैश्विक सप्लाई चेन में बहुत से उत्पादों व घटकों (components) के इकलौते आपूर्तिकर्ता के बतौर चीन पर अति-निर्भरता से उपजा है. भू-राजनीति (geopolitics) में भी यह डर दिखता है.
हालांकि, मौक़ों के साथ चुनौतियां भी आती हैं. कमज़ोर मैन्यूफैक्चरिंग बेस (2020-21 में, भारत के मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र के आउटपुट की जीडीपी में हिस्सेदारी 17.4 फ़ीसद रही, जबकि चीन के मामले में यह 26.18 फ़ीसद है) के अलावा, भारत की सप्लाई चेनें जिन मुद्दों से जूझ रही हैं, उनका ज़िक्र आगे किया जा रहा है. पहला है, सप्लाई चेनों के पूर्ण इकोसिस्टम का अभाव. Hsu (2021) के मुताबिक़, हाल के वर्षों में, मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में बढ़ोतरी देखी गयी है. हालांकि, यह EMS और दूरसंचार (जैसे मोबाइल उपकरण निर्माण) पर ही ज्यादा केंद्रित है. कुछ ख़ास सेक्टरों में ग्रोथ के मामले में सीमित spill-over effect (एक क्षेत्र की घटना का दूसरे क्षेत्र पर प्रभाव) ही दिखा है, यानी ऐसे बड़े सप्लाई चेन क्लस्टर कम ही बने हैं जो सहायक फर्मों या उत्पादकों को फ़ायदा पहुंचा सकें. और दूरसंचार से संबंधित मैन्यूफैक्चरिंग के लिए सप्लाई चेनों का स्थानांतरण भारत की घरेलू बाज़ार की ज़रूरतों के चलते हुआ है, न कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों के लिए उत्पादन के वास्ते भारत को एक क्षेत्रीय उत्पादन हब मानकर.
सप्लाई चेन्स की छुपी लागतें से दिक्कत
दूसरा मुद्दा है भारत की मौजूदा सप्लाई चेनों में छुपी हुई लागतों (hidden costs) का. अर्थर डी. लिटल और सीआईआई (2020) द्वारा तैयार एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत की सप्लाई चेनों में लॉजिस्टिक लागत विकसित देशों में औसत लागत से चार गुना ज्य़ादा है. इसमें परिवहन (कुल लॉजिस्टिक लागत का यह 40 फ़ीसद है), गोदाम (26 फ़ीसद), इन्वेंट्री (24 फ़ीसद), और ऑर्डर प्रोसेसिंग व प्रशासन (10 फ़ीसद) चार सबसे बड़ी लागत हैं. दूसरी छिपी लागतें लालफीताशाही और कठोर किस्म की टैक्स व दूसरी प्रोत्साहन संबंधी नीतियां हैं. उदाहरण के लिए, चीन और आसियान (ASEAN) देशों की नीतियों से अलग, बॉन्डेड एरिया (देश के भीतर ही विशेष व्यापारिक नियम व शर्तों वाले क्षेत्र) में ‘प्रोसेसिंग ट्रेड’ (दूसरे देशों से आयात करने की कारोबारी गतिविधि) और ‘नॉन रेजीडेंट इन्वेंट्री’ की अनुमति भारत नहीं देता. दूसरी तरफ़, स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (SEZs), साथ ही कोस्टल इकोनॉमिक यूनिट (CEUs) या ज़ोन (CEZs) का काफ़ी विरोध है. 2016 में अपनी लॉन्चिंग के समय से ही, ‘सागरमाला प्रोजेक्ट’ का अहम हिस्सा रहे CEUs अब कछुआ चाल से आगे बढ़ रहे हैं. सप्लाई चेनों की ये छुपी लागतें चीन जैसों देशों से भारत में स्थानांतरण के लिए प्रोत्साहन को अनिवार्य रूप से कमज़ोर करेंगी.
2016 में अपनी लॉन्चिंग के समय से ही, ‘सागरमाला प्रोजेक्ट’ का अहम हिस्सा रहे CEUs अब कछुआ चाल से आगे बढ़ रहे हैं. सप्लाई चेनों की ये छुपी लागतें चीन जैसों देशों से भारत में स्थानांतरण के लिए प्रोत्साहन को अनिवार्य रूप से कमज़ोर करेंगी.
कमज़ोर मैन्यूफैक्चरिंग बेस, स्थानीय सप्लाई चेनों में छुपी लागतों जैसे मुद्दे, और मैन्यूफैक्चरिंग इकोसिस्टम के साथ ही अनुभवी श्रम बल (लेबर फोर्स) का अभाव वैश्विक या क्षेत्रीय सप्लाई चेन योजनाओं, जैसेकि भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया द्वारा बनाये गये रिज़िलिअंट सप्लाई चेन इनीशिएटिव (RSCI), से भारत के जुड़ाव को बाधित कर सकते हैं. लेखक प्रस्तावित करता है कि सप्लाई चेन में बदलाव का लाभ लेने के लिए, भारत को ताइवान के साथ सहयोग तलाशना चाहिए. पहला, ताइवान के पास मोबाइल उपकरण से लेकर लैपटॉप और सर्वर तक, EMS और ICT मैन्यूफैक्चिरिंग सेक्टरों की पूरी सप्लाई चेनें हैं. बड़ी ताइवानी फर्में अपनी सहायक फर्में को भी भारत में आकर्षित कर सकती हैं, जिसमें PLI जैसी तात्कालिक नीतियां प्रेरक-शक्ति का काम करेंगी. हालांकि, ताइवानी आईटी फर्मों से ज्यादा निवेश और टेक्नोलॉजी आकर्षित करने के लिए, सिंगल-विंडो वित्तीय व क़ानूनी सेवाओं, उत्पादन व परिवहन के लिए अच्छे बुनियादी ढांचे, साथ ही प्रोत्साहन देने वाली (incentivised) और लचीली नीतियों से युक्त SEZ अब भी ज़रूरी हैं.
महाराष्ट्र वैश्विक सप्लाई चेन में आ रहे बदलाव में अपनी जगह तलाशने के लिए, विभिन्न संभावित क्षेत्रों में ताइवान से सहयोग के मौक़ों को किस तरह भुनाता है उससे न सिर्फ़ राज्य को, बल्कि पूरे भारत को औद्योगिक उन्नयन की अगली लहर में फ़ायदा होगा.
यही वह बिंदु है जहां महाराष्ट्र को अपने सुस्थापित SEZs, शिक्षित कार्यबल, अच्छे बुनियादी ढांचे व परिवहन सुविधाओं, और पूरे राज्य में मज़बूत औद्योगिक क्लस्टरों की वजह से बढ़त हासिल है. दूसरी तरफ़, ताइवान के पास ICT मैन्यूफैक्चरिंग में पूरी सप्लाई चेनें और अनुभव है. बीते कुछ दशकों में उसका चीन में जो अनुभव रहा है उसे ठीक-ठाक हद तक भारत में स्थानांतरित और प्रतिरोपित किया जा सकता है. ताइवान अपने ‘चीनी अनुभव’ में भारत के हिसाब से ज़रूरी बदलाव कर, ICT से संबंधित उत्पादों के लिए इकोसिस्टम स्थापित करने में अपने अनुभव साझा कर सकता है. महाराष्ट्र मे बहुत सारे सरकारी व निजी विश्वविद्यालय और कॉलेज हैं, जिनमें मशहूर IIT Bombay के साथ ही पुणे स्थित राष्ट्रीय प्रयोगशालाएं और अनुसंधान संस्थान शामिल हैं. यह भारत और ताइवान के बीच अनुसंधान एवं विकास (R&D) में द्विपक्षीय सहयोग के लिए बड़ी संभावनाएं उपलब्ध कराता है. इलेक्ट्रिक्स और इलेक्ट्रॉनिक्स में विशेषज्ञता वाले ताइवान के शीर्ष राष्ट्रीय विश्वविद्यालय संभावनाशील और दिलचस्पी रखनेवाले भारतीय युवाओं को निखारने के लिए न सिर्फ़ अच्छा प्लेटफॉर्म मुहैया कराते है, बल्कि व्यवसायीकरण के लिए उपयुक्त बिजनेस आइडियाज पैदा करने के लिए इन्क्युबेटर की भी भूमिका निभाते हैं.
महाराष्ट्र-ताइवान के बीच कारोबारी रिश्ते
सप्लाई चेनों को बढ़ावा देने में महाराष्ट्र-ताइवान सहयोग को इस बात से भी ताकत मिलती है कि कारोबार और तकनीक में दोनों के दिलचस्पी के क्षेत्र काफ़ी हद तक एक जैसे हैं. 2018 में, ICT के अलावा, भारत और ताइवान के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालयों ने सहयोग के क्षेत्रों की पहचान की है और इनमें मिलकर काम किया जा रहा है. इन क्षेत्रों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), कृषि एवं खाद्य विज्ञान, बिग डेटा, बायोटेक, साइबर सुरक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), माइक्रो एंड नैनो-इलेक्ट्रॉनिक्स, और अक्षय ऊर्जा (renewable energy) इत्यादि शामिल हैं. महाराष्ट्र की राज्य सरकार ने भी कुछ हाइ-टेक ‘थ्रस्ट सेक्टर्स’ (जिन सेक्टरों पर विशेष जोर हो) की पहचान की है, जिनमें इलेक्ट्रिक व्हीकल (निर्माण, बुनियादी ढांचा और सर्विसिंग); इंडस्ट्री 4.0 (AI, 3D Printing, Internet of things and robotics, nanotechnology इत्यादि); एकीकृत डेटा सेंटर पार्क (IDCP); आईटी और आईटी-आधारित सेवाएं (ITeS); इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम्स डिजाइन एंड मैन्यूफैक्चरिंग (ESDM) और सेमीकंडक्टर फैब्रीकेशन (FAB) जैसे नाम शामिल हैं.
महाराष्ट्र मे बहुत सारे सरकारी व निजी विश्वविद्यालय और कॉलेज हैं, जिनमें मशहूर IIT Bombay के साथ ही पुणे स्थित राष्ट्रीय प्रयोगशालाएं और अनुसंधान संस्थान शामिल हैं. यह भारत और ताइवान के बीच अनुसंधान एवं विकास (R&D) में द्विपक्षीय सहयोग के लिए बड़ी संभावनाएं उपलब्ध कराता है.
हालांकि, दोनों पक्षों को सहयोग करने के दौरान संभावित निवेश जोख़िमों को प्रबंधित करने की अब भी ज़रूरत है. महाराष्ट्र EMS/ICT सेक्टरों में पड़ोसी कर्नाटक से, और सामान्य मैन्यूफैक्चरिंग में तमिलनाडु से प्रतिस्पर्धा का सामना करता है. आंध्र प्रदेश स्थित ‘श्री सिटी’ जैसे सुविकसित SEZs की लोकेशन पूर्व एशिया के साथ परिवहन, क्लस्टरिंग-लाभ और सेवाओं के लिहाज़ से ज्यादा बढ़िया है. इसका एक हालिया उदाहरण है, फॉक्सकॉन द्वारा नवी मुंबई में आईफोन के लिए प्लांट निर्माण के एमओयू को रद्द करना और अपने प्लांट को इसके बजाय तमिलनाडु ले जाना. ताइवान और महाराष्ट्र ICT के अलावा भी विभिन्न संभावित क्षेत्रों में बहुत-स्तरीय सहयोग स्थापित करने की शुरुआत कर सकते हैं. असल में, ताइवान की राष्ट्रपति Tsai Ing-wen के दूसरे कार्यकाल में, ताइपे इकोनॉमिक एंड कल्चरल सेंटर (TECC, जो कार्यत: भारत में ताइवान दूतावास की तरह है) ने महाराष्ट्र सरकार के साथ अपने संबंधों को उन्नत किया है. अगस्त 2021 में, भारत के लिए ताइवान के प्रतिनिधि, Mr. Baoshuan Ger ने महाराष्ट्र की यात्रा पर अधिकारियों के एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया और राज्य के साथ आर्थिक, व्यापारिक, तकनीकी और सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ावा देने के लिए कई सांसदों से मुलाक़ात की. महाराष्ट्र वैश्विक सप्लाई चेन में आ रहे बदलाव में अपनी जगह तलाशने के लिए, विभिन्न संभावित क्षेत्रों में ताइवान से सहयोग के मौक़ों को किस तरह भुनाता है उससे न सिर्फ़ राज्य को, बल्कि पूरे भारत को औद्योगिक उन्नयन की अगली लहर में फ़ायदा होगा. क्योंकि, महाराष्ट्र देश का तीसरा सबसे ज्यादा FDI हासिल करनेवाला राज्य है.
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